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अंतरिक्ष की जंग: जिसे शुरू रूस ने किया और अंजाम अमेरिका ने

रहस्य से आश्चर्य पैदा होता है. इंसान के अंदर जो समझने की ललक पैदा होती है, उसे पैदा करने वाला ये आश्चर्य ही है.

                                                                                      – नील आर्मस्ट्रॉन्ग (चांद पर कदम रखने के बाद)


 

जो पंछी हर साल एक मौसम के बाद गायब हो जाते हैं, वो दरअसल चांद चले जाते हैं. फिर वहां से लौटकर धरती वापस आते हैं.

                                                                                       – चार्ल्स मॉर्टन, ब्रिटिश वैज्ञानिक, 17वीं सदी

चांद सदियों तक लोगों के लिए पहेली बना रहा. किसी को उसमें अपनी माशूका का चेहरा नजर आता. कभी चरखा कातती बुढ़िया. किसी को लगता, वहां परियां रहती हैं. किसी को कलंक नजर आता. कभी उसकी पूजा हुई. कभी उससे डर लगा. लोग तरह-तरह की बातें करते चांद के बारे में. चार्ल्स मॉर्टन की भी अपनी थिअरी थी. उनको लगता है, माइगेट्री पंछी चांद चले जाते हैं. तभी साल के बाकी महीने नहीं दिखते. इन सबका दिल टूट गया. उस दिन जब नील आर्मस्ट्रॉन्ग नाम का एक शख्स चांद पर उतरा. उसने बताया, चांद तो उजाड़ है. चांद के इस सफर की शुरुआत हुई थी 4 अक्टूबर, 1957 को. बस चांद की ही क्यों? हम जो किसी दिन सूरज पर जा पहुंचे, उसकी शुरुआत भी इसी दिन में छुपी हुई है.


 

चाहे चांद पर इंसान के पहुंचने की कहानी हो, या मंगल का मिशन, या फिर भविष्य की तमाम योजनाएं और सफलताएं, उन सबकी शुरुआत इसी 4 अक्टूबर की तारीख में छुपी है.

60 साल पहले शुरू हुआ था ये सफर, जो अब सूरज पहुंचने की तैयारी में है
4 अक्टूबर, 1957, 60 साल, इस दिन सोवियत संघ ने पहला कृत्रिम उपग्रह छोड़ा था, अंतरिक्ष में. सैटेलाइट का नाम था स्पूतनिक. रूसी भाषा में यात्री के लिए ये ही शब्द है. इंसानों के हाथों बनी पहली ऐसी कृत्रिम चीज, जिसे पृथ्वी की कक्षा में स्थापित किया गया था. इस तारीख ने यूं ही नहीं इतिहास बनाया. स्पूतनिक की लॉन्चिंग के साथ ही एक स्पेस ऐज शुरू हुआ. अंतरिक्ष युग. अमेरिका और सोवियत के बीच. स्पूतनिक की लॉन्चिंग की खबर सुनकर दुनिया भौंचक्की रह गई. अमेरिका को तो झटका लग गया. दोनों के बीच एक जंग जमीन पर चल रही थी. स्पूतनिक के बाद ये जंग अंतरिक्ष में पहुंच गई. होड़ लग गई दोनों में. आगे निकलने की. आज NASA का नाम कितनी मुहब्बत से लेते हैं हम. ये NASA भी इसी स्पेज ऐज की पैदाइश है. अमेरिका की महत्वाकांक्षी औलाद. बड़ी उम्मीदों से पैदा किया गया था इसे. NASA ने भी उम्मीदों को साबित किया. बड़ी लायक औलाद निकला.

पश्चिमी जर्मनी की एक बच्ची बर्लिन वॉल को तोड़ने की कोशिश करती हुई. दूसरे विश्व युद्ध के बाद सोवियत और अमेरिका में जो कोल्ड वॉर शुरू हुआ, वो सोवियत के बिखरने पर ही खत्म हुआ.

सोवियत और अमेरिका, दोनों एक-दूसरे से ऑब्सेस्ड थे
दूसरा विश्व युद्ध खत्म हो गया था. धरती पर दो छोर हैं. उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव. अमेरिका और सोवियत भी ऐसे ही हो गए थे. पूंजीवादी अमेरिका. वामपंथी सोवियत. विचारधारा का अंतर तो था ही. एक-दूसरे से आगे निकलने की गलाकाट होड़ भी थी. ये वो दौर था, जब लगता था दुनिया में बस दो देश हैं. मेन हीरो. बाकी सारे देश सपोर्टिंग भूमिका में थे. जिंदगी का कोई ऐसा हिस्सा नहीं बाकी रहा, जहां सोवियत और अमेरिका में होड़ नहीं थी. हथियार की होड़. परमाणु शक्ति की होड़. सेना की होड़. कारोबार की होड़. अर्थव्यवस्था की होड़. जासूसी की होड़. कोवर्ट ऑपरेशन की होड़. धमकियों की होड़. अपना दबदबा बढ़ाने की होड़. अपने-अपनी विचारधारा को बेहतर साबित करने की होड़. दोनों पक्ष खुद को सवा शेर साबित करना चाहते थे.

स्पेस एजेंसी नासा उसी धक्कामुक्की के दौर की निशानी है. इसपर अमेरिका को रेस में आगे ले जाने की जिम्मेदारी थी.

फिर आया स्पूतनिक, इस सरप्राइज से बौखला गया अमेरिका
स्पूतनिक की लॉन्चिंग सरप्राइज जैसी थी. 18,000 मील प्रति घंटे की रफ्तार थी इसकी. दूरबीन लगाकर देखने से दिखता था. सूरज उगने से पहले और सूरज डूबने के बाद. ये सैटेलाइट धरती पर रेडियो सिग्नल भेजता था. इतने मजबूत सिग्नल कि नए सीखे रेडियो ऑपरेटर भी कैच कर लेते थे. अमेरिका में जिनके पास ऐसे उपकरण थे, वो बड़े दंग थे. ये सैटेलाइट एक घंटे और 36 मिनट में धरती की एक बार परिक्रमा करता. अमेरिका भी तो इसी धरती पर है. सोवियत का ये सैटेलाइट रोजाना कई बार अमेरिका के ऊपर से भी गुजरता. बुरी तरह से कुढ़ गई थी अमेरिकी सरकार. सोवियत उनसे पहले अंतरिक्ष में जो पहुंच गया था. स्पूतनिक का काम तय था. इसके माध्यम से धरती और सौर मंडल पर अध्ययन किया जा रहा था. शक अजीब मर्ज है लेकिन. अमेरिकियों को लगता था कि सोवियत की साजिश है ये. सैटेलाइट के बहाने कुछ तो साजिश रची जा रही है.

स्पूतनिक औचक से आया. किसी ने उम्मीद नहीं की थी कि सोवियत इतनी जल्दी और यकायक इतना आगे बढ़ जाएगा. 4 अक्टूबर, 1957 की ये तारीख ऐतिहासिक थी.

पहली दौड़ तो बेशक सोवियत ने ही जीती थी
अमेरिका ने जिस पहले उपग्रह की योजना बनाई थी, उससे करीब 10 गुना बड़ा था स्पूतनिक. उसे भी 1958 में लॉन्च होना था. सोवियत की जीत तो हुई थी. उसने खबर तक नहीं लगने दी अपने इरादों की. चुपचाप काम करता रहा. सोवियत की इस तकनीकी श्रेष्ठता से अमेरिकी सरकार, सेना और वैज्ञानिकों की बहुत किरकिरी हुई. इसे दिल पर ले लिया उन्होंने. कसम खाई, सोवियत से पहले चांद पर पहुंचेंगे. सेना, सरकार और वैज्ञानिकों ने मिलकर सोवियत को हराने की रेस शुरू की. इसके साथ ही आगाज हुआ अंतरिक्ष की इस दौड़ का.

लाइका. ये ही कुत्ता था, जिसे स्पूतनिक 2 पर अंतरिक्ष में भेजा गया था.

दूसरी रेस भी सोवियत ने ही जीती
3 नवंबर, 1957. सोवियत ने अपना दूसरा उपग्रह छोड़ा. स्पूतनिक 2. बैक-टू-बैक. एक महीने से भी कम समय में दो सैटेलाइट. ये कोई साधारण उपग्रह नहीं था. सोवियत ने इसके साथ एक कुत्ते को भी भेजा था. मैं जब कभी इसके बारे में पढ़ती हूं, मन मसोस जाता है. लाइका नाम था उस कुत्ते का. उसे वन-वे सफर पर भेजा गया था. मालूम था, जिंदा नहीं लौटेगा. लाइका पहला जीव था, जिसने अंतरिक्ष से पृथ्वी की परिक्रमा की. कहते हैं, लाइका को कोई तकलीफ नहीं हुई होगी मरते समय. जो भी हो. मिशन पर भेजे जाने की अनुमति तो किसी ने नहीं ली होगी उससे.

जब स्पूतनिक 2 लाइका को लेकर अंतरिक्ष गया, तो दुनिया में जैसे तहलका मच गया. पहला मौका था जब किसी जीव ने स्पेसक्राफ्ट में धरती की परिक्रमा की. अखबार में छपी ये खबर उसी मौके की है.

1958 में अमेरिका ने छोड़ा अपना पहला उपग्रह
31 जनवरी, 1958. वो तारीख जब अमेरिका ने अपना पहला सैटेलाइट छोड़ा. एक्सप्लोरर. जब तक अमेरिका ने अपना पहला कदम रखा, सोवियत आगे बढ़ गया था. ये जख्म पर मिर्च छिड़कने जैसी स्थिति थी.

बचपन में पढ़ा है कई बार. अंतरिक्ष में जाने वाले पहले शख्स का नाम यूरी गागरिन था. चांद पर कदम रखने वाले पहले शख्स का नाम नील आर्मस्ट्रॉन्ग था. इन दोनों के बीच का जो फासला था, वो स्पेस रेस का चरम है.

पहली-पहली बार करने के कई रेकॉर्ड तो सोवियत के ही नाम हैं
सोवियत का सिक्का जम गया था. उसे जैसे जुनून सवार था. पहली-पहली बार हासिल करने का. ऐसी कई उपलब्धियां सोवियत के नाम हैं. जिन्हें बचपन से ही हम सब सामान्य ज्ञान की किताबों में रटते आ रहे हैं.

अंतरिक्ष में जाने वाला पहला इंसान: यूरी गागरिन (रूस)
अंतरिक्ष में जाने वाली पहली महिला: वेलेंतिका तेरेशकोवा (रूस)
अंतरिक्ष में पहली बार चलने वाला शख्स: ऐलेक्सी लियोनोव (रूस)
चांद पर जाने वाला पहला अंतरिक्षयान: लूना 2
शुक्र की सतह पर भेजा गया पहला स्पेसक्राफ्ट:वेनेरा 3

इंसान भले ही अब अंतरिक्ष में काफी आगे निकल गया हो, लेकिन चांद पर पहला कदम रखने का अनुभव सबसे यादगार रहेगा.

फिर आया अमेरिका का दौर, सौ सोनार की और एक लोहार की
1960 के आखिरी सालों में अमेरिका ने बड़ा कदम बढ़ाया. राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी ने कहा था. दशक खत्म होने से पहले इंसान को चांद पर उतारेंगे. 1962 में जॉन ग्लेन पहले ऐसे अमेरिकी व्यक्ति बने, जिन्होंने स्पेसक्राफ्ट में धरती की परिक्रमा की. फिर आया NASA का ऐतिहासिक अपोलो मिशन. 1961 से 1964 के बीच अमेरिकी सरकार ने NASA का बजट करीब 500 फीसद बढ़ा दिया. चांद के मिशन के लिए NASA में करीब 34,000 कर्मचारी काम कर रहे थे. कॉन्ट्रैक्ट पर करीब पौने चार लाख लोग भी काम में लगाए गए थे. 1967 में अपोलो मिशन को झटका लगा. तीन अंतरिक्षयात्री मारे गए. सोवियत का लूनर मिशन उतना तेज नहीं था. सोवियत में इसे लेकर बहस थी. इसकी जरूरत है या नहीं, इसे लेकर. फिर सोवियत स्पेस प्रोग्राम के मुख्य इंजीनियर सेरेगी कोरोलोव की असमय मौत होने से भी सोवियत को धक्का लगा.

न वेकल सोवियत और अमेरिका की सरकारें, बल्कि दोनों देशों के लोग और मीडिया भी इस जंग का हिस्सा बन चुके थे. दोनों को एक-दूसरे से पिछड़ना किसी भी सूरत में मंजूर नहीं था.

ऐतिहासिक था वो दौर, पहली बार चांद पर उतरा था इंसान
दिसबंर 1968. इंसानों को लेकर पहला स्पेसक्राफ्ट चांद के लिए रवाना हुआ. इसे चांद की परिक्रमा करनी थी. 16 जुलाई, 1969. अपोलो 11 मिशन की रवानगी हुई. इसमें थे नील आर्मस्ट्रॉन्ग, ऐडविन अल्ड्रिन और माइकल कोलिन्स. 20 जुलाई को ये अंतरिक्षयान चांद की सतह पर पहुंचा. नील आर्मस्ट्रॉन्ग चांद की सतह पर कदम रखने वाले पहले इंसान बने. ये इतिहास था. सदियों से हम इंसान चांद को सिर उठाकर देखते आए थे. जाने कैसी-कैसी कल्पना करते थे. कविताओं में, कहानियों में, जाने कितने तरह की उपमाएं जोड़ते थे चांद के नाम पर. उसी चांद पर इंसानों ने कदम रखा. जब भी इंसानों की सबसे बड़ी उपलब्धियों की बात होगी, इस तारीख का जिक्र किया जाएगा. नील आर्मस्ट्रॉन्ग की वो तस्वीर पूरी इंसानी सभ्यता के सबसे यादगार पलों में से एक है.

सोवियत ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया, लेकिन चांद पर उतरने की उसकी कोशिशें लगातार नाकाम होती गईं.

चांद पर क्या पहुंचा अमेरिका, लगा दौड़ खत्म हो गई
स्पूतनिक के साथ दौड़ शुरू हुई. अपोलो ने इसे अंजाम पर पहुंचाया. वो कहते हैं ना, तुमने शुरू किया है लेकिन खत्म मैं करूंगा. वैसे ही. सोवियत में रेस में बने रहने की पुरजोर कोशिश की. 1969 से 1972 के बीच चार बार कोशिश की. चांद की सतह पर स्पेसक्राफ्ट लैंड करने की. हर बार नाकामयाबी हाथ लगी. जुलाई 1969 में लॉन्चिंग के वक्त जोरदार धमाका हुआ. सोवियत ने बहुत हाथ-पैर मारे आगे आने के लिए. कामयाब नहीं हो सका पर. एक बार जो पिछड़ा, तो पिछड़ ही गया. ऐस्ट्रोनॉट्स हीरो बन गए. लोग उन जैसा बनना चाहते थे. अमेरिकी जनता और अमेरिकी मीडिया शुरू से ही लगातार इस पूरी स्पेस रेस में बेहद दिलचस्पी ले रही थी. सरकार पर दबाव बना रही थी. सोवियत की हर उपलब्धि पर वहां सवाल होते थे. सरकार को जवाब देना पड़ता था. जमीन पर सोवियत और अमेरिका की तल्खियां चरम पर थीं. अंतरिक्ष में भी कुछ राहत नहीं थी. इन दोनों देशों ने हर मोर्चे पर जमकर दुश्मनी निभाई. दोनों एक-दूसरे से ऑब्सेस्ड थे. ये प्रतिस्पर्धा नहीं थी. ये दुश्मनी थी. दांत काटे की दुश्मनी.

बाईं ओर हैं अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज एच डब्ल्यु बुश और दाहिनी ओर सोवियत संघ के राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाचेव. ये तस्वीर 1991 में ली गई. मॉस्को में हाथ मिलाते हुए दोनों नेताओं की ये तस्वीर शीत युद्ध की सबसे प्रभावी तस्वीरों में से एक है.

हाथ मिलाया और रेस खत्म
साल 1975. अमेरिका और सोवियत का जॉइंट मिशन. अपोलो-सोयुज मिशन. अपोलो का स्पेसक्राफ्ट. सोवियत में बना सोयुज. दोनों यानों के अधिकारियों ने एक-दूसरे का अभिवादन किया. हाथ मिलाया. धरती की दुश्मनी को अंतरिक्ष में तिलांजलि दी गई. धरती पर दुश्मनी खत्म नहीं हुई थी. बराबर निभाई जा रही थी. उसे खत्म होने में वक्त लगा. बर्लिन की दीवार टूटी. सोवियत संघ टूटा. शीत युद्ध खत्म हुआ. स्पेस रेस में लोग अक्सर सोवियत को हारा हुआ खिलाड़ी बताते हैं. ऐसा नहीं है. कई अहम उपलब्धियां सोवियत के नाम हैं. पहली-पहली बार कई चीजें तो उसने ही की. शायद सोवियत को पीछे छोड़ने की ललक ही थी, जिसने अमेरिका को इतनी तेजी से पैर पसारने को मजबूर किया. बिना सोवियत के शायद ये सब मुमकिन नहीं हो पाता. सोवियत और अमेरिका की इस धक्कामुक्की में दुनिया को बहुत फायदा हुआ. अंतरिक्ष विज्ञान में इतनी तरक्की की इंसानों ने. देखा जाए, तो फायदा पूरी दुनिया का हुआ.

(सौजन्य: लल्लनटोप)

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