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दिल्ली से 2 घंटे की दूरी पर हैं ये खूबसूरत लोकेशंस, फेस्टिव वीकेंड पर जरूर कर आएं सैर

फेस्टिव सीजन शुरू हो गया है। नवरात्रि के बाद दशहरा और फिर दिवाली यानि फुल ऑन मौज-मस्ती और ढेर सारी छुट्टियां। अगर आप दिल्ली के आसपास रहते हैं और इसी सोच में डूबे हैं कि ऐसी कौन सी जगह जाएं, जहां पर एक दिन में घूमकर वापस आ सकें तो आपकी इस परेशानी को हम चुटकियों में दूर कर देते हैं।

आज हम आपको दिल्ली एनसीआर के आसपास स्थित ऐसी पांच जगहों के बारे में बताने जा रहे हैं जहां पर आप एक दिन की ट्रिप पर जा सकते हैं।

दिल्ली से वृदांवन केवल 142 किलोमीटर है यानि की इतना समय तय करने में आपको गाड़ी से केवल 2 घंटे लगेंगे। ये स्थल भगवान कृष्ण की बाल लीलाओं से जुड़ा है जहां पर भगवान कृष्ण और राधा रानी के कई सारे मंदिर हैं। इसके साथ ही यहां पर स्थिन बांके बिहारी मंदिर काफी फेमस है जहां लोग दूर दूर से माथा टेकने आते हैं।

दिल्ली से महज 122 किलोमीटर दूर नीमराना फोर्ट-पैलेस है जहां पर आप दो घंटे में पहुंच सकते हैं। ये फोर्ट राजस्थान के अलवर में बना हुआ है जिसे अब आलिशान होटल के रूप में तब्दील कर दिया गया है।
चारों तरफ हरियाली और बीच में बना ये फोर्ट टूरिस्ट को अपनी तरफ अट्रैक्ट करता है। इस फोर्ट में पृथ्वी राज चौहान तृतीय का शासन था।

ताजनगरी आगरा का सफर भी आप एक दिन में पूरा कर सकते हैं। यह दिल्ली से महज 3 से 3:30 घंटे की दूरी पर है। जहां पर ताजमहल के अलावा आगरा फोर्ट भी टूरिस्ट के आकर्षण का केन्द्र बना रहता है।

अगर आप पशु पक्षियों से लगाव रखते हैं तो भरतपुर बर्ड सेन्चुरी आपके लिए एकदम परफेक्ट है। ये दिल्ली से 182 किलोमीटर की दूरी पर है जहां पर आप अलग अलग तरह के पक्षियों को देख सकते हैं।

इन सबके अलावा दिल्ली से सटा हुआ फरीदाबाद रिजॉर्ट भी किसी टूरिस्ट प्लेस से कम नहीं है। भीड़ भाड़ वाले इलाके से दूर स्थित इन रिजॉर्ट में लोग शांति की तलाश में आते हैं जहां पर आपको हर तरह की सुख सुविधाएं मिलेगी।

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प्रथम शैलपुत्री गौरी की आराधना के उपरांत आज करें देवी ब्रह्मचारिणी का ध्यान

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नवरात्रि 2017: आइए जानते है नवरात्रि का क्या है महत्व ?

2017 के शारदीय नवरात्र 21 सितंबर से शुरू होंगे और 30 सितंबर तक चलेंगे. नवरात्र में मां के नौ रूपों की पूजा होती है. मान्यता है कि इन नौ दिनों में दुर्गा मां धरती पर आकर भक्तों का उद्धार करती हैं.

नवरात्रि का महत्व

नवरात्र अश्विन मास की पहली तारीख और सनातन काल से ही मनाया जा रहा है. नौ दिनों तक, नौ नक्षत्रों और दुर्गा मां की नौ शक्तियों की पूजा की जाती है. माना जाता है कि सबसे पहले शारदीय नवरात्रों की शुरुआत भगवान राम ने समुद्र के किनारे की थी. लगातार नौ दिन के पूजन के बाद जब भगवान राम रावण और उसकी लंका पर विजय प्राप्त करने के लिए गए थे. विजयी होकर लौटे. यही कारण है कि शारदीय नवरात्रों में नौ दिनों तक दुर्गा मां की पूजा के बाद दसवें दिन दशहरा मनाया जाता है. माना जाता है कि धर्म की अधर्म पर जीत, सत्‍य की असत्‍य पर जीत के लिए दसवें दिन दशहरा मनाते हैं.

दुर्गा अष्टमी का महत्व

नवरात्रि में दुर्गा पूजा के दौरान अष्टमी पूजन का विशेष महत्व माना जाता है. इस दिन मां दुर्गा के महागौरी रूप का पूजन किया जाता है. सुंदर, अति गौर वर्ण होने के कारण इन्हें महागौरी कहा जाता है. महागौरी की आराधना से असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं, समस्त पापों का नाश होता है, सुख-सौभाग्य की प्राप्‍ति होती है और हर मनोकामना पूर्ण होती है.

कलश स्थापना का महत्व

शास्त्रों के अनुसार नवरात्र व्रत-पूजा में कलश स्थापना का महत्व सर्वाधिक है, क्योंकि कलश में ही ब्रह्मा, विष्णु, रूद्र, नवग्रहों, सभी नदियों, सागरों-सरोवरों, सातों द्वीपों,चौंसठ योगिनियों सहित सभी 33 करोड़ देवी-देवताओं का वास रहता है, तभी विधिपूर्वक कलश पूजन से सभी देवी-देवताओं का पूजन हो जाता है.

शारदीय नवरात्र में अखंड ज्योत का महत्व:

अखंड ज्योत को जलाने से घर में हमेशा मां दुर्गा की कृपा बनी रहती है. ऐसा जरूरी नही है कि हर घर में अखंड ज्योत जलें. अखंड ज्योत के भी कुछ नियम होते हैं जिन्हें नवरात्र के दिनों में पालन करना होता है. हिन्दू परंम्परा के मुताबिक जिन घरों में अखंड ज्योत जलाते हैं उन्हें जमीन पर सोना होता पड़ता है.

क्यों होता है 9 कन्याओं का पूजन

नौ कन्याएं को नौ देवियों का रूप माना जाता है. इसमें दो साल की बच्ची, तीन साल की त्रिमूर्ति, चार साल की कल्याणी, पांच साल की रोहिणी, छह साल की कालिका, सात साल की चंडिका, आठ साल की शाम्भवी, नौ साल की दुर्गा और दस साल की कन्या सुभद्रा का स्वरूप होती हैं. नवरात्र के नौ दिनों में मां अलग-अलग दिन आवगमन कर भक्तों का उद्धार करेंगी.

– रविवार व सोमवार को माता का वाहन हाथी होता है

– शनिवार व मंगलवार को माता का वाहन घोड़ा होता है

– गुरुवार व शुक्रवार को माता का वाहन पालकी होता है

– बुधवार को नौका माता का वाहन होती है

– रविवार व सोमवार माता का वाहन भैंसा होता है

– शनिवार और मंगलवार को माता का वाहन शेर होता है

– बुधवार व शुक्रवार को माता का वाहन हाथी होता है

– गुरुवार को माता का वाहन नर होता है

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नवरात्रि 2017: पालकी पर आ रही हैं मां दुर्गा, जानिए क्या होगा आपके जीवन पर असर

नवरात्र के नौ दिनों में मां दुर्गा का वाहन क्या होगा शास्त्रों में इसे लेकर एक नियम है- ‘शशिसूर्ये गजारूढ़ा शनिभौमे तुरंगमे। गुरौ शुक्रे च दोलायां बुधे नौका प्रकी‌र्त्तिता.’ इसका अर्थ है कि नवरात्र शुरू होने पर रविवार या सोमवार को मां दुर्गा हाथी पर सवार होकर आती हैं. शनिवार और मंगलवार को पहली पूजा पर माता घोड़े पर सवार होकर आती हैं. नवरात्र शुरू होने पर गुरुवार और शुक्रवार को माता पालकी में आती हैं. जबकि, बुधवार को मां दुर्गा बुध नाव पर आती हैं.

इस साल 21 सितंबर को गुरुवार के दिन से शारदीय नवरात्र आरंभ हो रहा है. ज्योतिषियों की गणना के अनुसार इस बार मां दुर्गा धरती पर पालकी में चढ़कर आ रही हैं. मां जगदंबा पालकी में बैठकर आएंगी और पालकी में ही बैठकर जाएंगी.

कब होगा नवरात्र का आरंभ?

ज्योतिषियों की दृष्टि से मां दुर्गा के पालकी में आने का मतलब क्या है और वो ऐसे क्यों आ रही हैं इसे जान और समझ लीजिए.

इस बार माता का आगमन और गमन जनजीवन के लिए हर प्रकार की सिद्धि देने वाला है. इस बार गुरुवार के दिन हस्त नक्षत्र में घट स्थापना के साथ शक्ति उपासना का पर्व काल शुरु होगा. गुरुवार के दिन हस्त नक्षत्र में यदि देवी आराधना का पर्व शुरू हो, तो यह देवीकृपा व इष्ट साधना के लिए विशेष रूप से शुभ माना जाता है.

नवरत्रि के 9 दिन सुख समृद्धिदायक होंगे. अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से 21 सितंबर गुरुवार को शारदीय नवरात्र का आरंभ होगा. शारदीय नवरात्र शक्ति स्वरूपा मां दुर्गा के नौ रूपों की आराधना का पर्व 21 सितंबर से शुरू होकर 29 सितंबर को समाप्त होगा और 30 सितंबर को विजयदशमी मनाया जाएगा.

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नवरात्रि 2017: जानिए क्या है कलश स्थापना और मां शैल पुत्री की पूजा का मुहूर्त नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा होती है, इनकी पूजा से जीवन में स्थिरता आती है

मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा का पहला दिन गुरुवार यानी 21 सितंबर है. शारदीय नवरात्र प्रारंभ हो गए हैं. माना जाता है कि यहां से सर्दियां दस्तक देती हैं. हालांकि पिछले कुछ सालों से ऐसा नहीं हो रहा है. मां दुर्गा का आशीर्वाद लेने के लिए लोग शुभ मुहूर्त में पूजा करते हैं. नवरात्र में लोग अपने घरों में कलश स्थापना करते हैं. मान्यता है कि कलश शुभ मुहूर्त में स्थापित करने से जीवन में आने वाली परेशानियां खत्म हो जाती हैं.

कैसे करें पूजा की तैयारी?

इस बार नवरात्रि का शुभ मुहूर्त सुबह 6 बजकर 3 मिनट से 8 बजकर 22 मिनट तक रहेगा. इसके बाद नौ दिन तक रोजाना मां दुर्गा का पूजन और उपवास किया जाता है. पहले दिन मां के शैलपुत्री रूप का पूजन किया जाता है. इसी दिन कलश स्थापना होती है. कलश पर स्वास्तिक बनाया जाता है. इसके बाद कलश पर मौली बांध कर उसमें जल भरकर उसे नौ दिन के लिए स्थापित कर दिया जाता है.

कलश स्थापना के लिए भूमि को शुद्ध किया जाता है. गोबर और गंगा-जल से जमीन को लीपा जाता है. विधि-विधान के अनुसार इस स्थान पर अक्षत डाले जाते हैं तथा कुमकुम मिलाकर डाला जाता है. इस पर कलश स्थापित किया जाता है.

मार्कण्डेय पुराण के अनुसार माता शैल पुत्री का नाम हिमालय के यहां जन्म होने से पड़ा. हिमालय हमारी शक्ति, दृढ़ता, आधार व स्थिरता का प्रतीक है. मां शैलपुत्री को अखंड सौभाग्य का प्रतीक भी माना जाता है.

इनकी पूजन विधि इस प्रकार है-

चौकी पर माता शैलपुत्री की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें. इसके बाद गंगा जल या गोमूत्र से शुद्धिकरण करें. चौकी पर चांदी, तांबे या मिट्टी के घड़े में जल भरकर उस पर नारियल रखकर कलश स्थापना करें. उसी चौकी पर श्रीगणेश, वरुण, नवग्रह, षोडश मातृका (16 देवी), सप्त घृत मातृका (सात सिंदूर की बिंदी लगाएं) की स्थापना भी करें. इसके बाद व्रत, पूजन का संकल्प लें और वैदिक एवं सप्तशती मंत्रों द्वारा मां शैलपुत्री सहित समस्त स्थापित देवताओं की षोडशोपचार पूजा करें.

ध्यान मंत्र

वन्दे वांछित लाभाय चन्द्रार्द्वकृतशेखराम्।

वृषारूढ़ा शूलधरां यशस्विनीम्॥

अर्थात- देवी वृषभ पर विराजित हैं. शैलपुत्री के दाहिने हाथ में त्रिशूल है और बाएं हाथ में कमल पुष्प सुशोभित है. यही नवदुर्गाओं में प्रथम दुर्गा है. नवरात्रि के प्रथम दिन देवी उपासना के अंतर्गत शैल पुत्री का पूजन करना चाहिए.

माता शैलपुत्री की आराधना करने से जीवन में स्थिरता आती है. हिमालय की पुत्री होने से यह देवी प्रकृति स्वरूपा भी है, महिलाओं के लिए उनकी पूजा करना ही श्रेष्ठ और मंगलकारी है.