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सबसे मंहगी इस बाइक की खूबियां कर देंगी आपको हैरान, कीमत उड़ा देगी होश

दुनियाभर में सबसे ज्यादा कस्टमाइज्ड बाइक्स के शौकीनों के लिए हार्ले-डेविडसन पहली पसंद बनी हुई है और इसी पसंद को बरकरार रखने के लिए हार्ले-डेविडसन ने अपनी दुनिया की सबसे महंगी बाइक पेश की है, जिसका कीमत के आधार पर मुकाबला शायद ही कोई बाइक कर पाए। हार्ले डेविडसन की यह बाइक हीरों से जड़ी हुई है और इसे ब्लू एडिशन में बनाने के लिए वॉच और ज्वेलरी कंपनी बुकेरर के साथ बुंडनरबाइक के साथ साझेदारी की है।

हार्ले डेविडसन ब्लू एडिशन सॉफ्टेल स्लिम एस पर आधारित इस बाइक का बॉडीवर्क पर कस्टम रेट्रो-स्टाइल में काम किया गया है। कंपनी के मुताबिक इस मोटरसाइकिल के हर बॉडी पार्ट की वेल्डिंग, बीटिंग, शेप देना और पॉलिश करने जैसे सारे काम हाथों से किए गए हैं। इतना ही नहीं बाइक के व्हील रिम्स भी कस्टम-मेड हैं।

बाइक का लीवर, रिसर्वायरकैप, हेडलाइट कवर और फुट कंट्रोल जैसे पार्ट्स को गोल्ड ट्रीटमेंट दिया गया है। इस बाइक के हर पार्ट्स सिल्वर प्लेटेड हैं।

इतना ही नहीं बाइक में अलग-अलग रंगों के छह कोट्स किए गए हैं जिसे कंपनी की तरफ से ‘स्पेशल कोटिंग मेथड’ बताया गया है। बाइक के टॉप फ्यूल टैंक पर दो कटआउट्स हैं, जिसमें लेफ्ट वाले पर 5.40 कैरेट के हीरे वाला सॉलिटियर रिंग दिया गया है।

वहीं, दूसरी तरफ कस्टम-मेड वॉच का इस्तेमाल किया गया है और इसे साधने के लिए रिंग्स हैं ताकि वी-ट्विन मोटर के वाइब्रेशंस से इसे किसी तरह का कोई नुकसान न पहुंचे।

इस बाइक को बनाने के लिए दोनों कंपनियों के 8 लोग, स्विस क्राफ्ट्समेन, जर्मन मोटरसाइकिल डिजाइनर्स ने मिलकर 2500 घंटे तक काम किया है। हार्ले डेविडसन की इस ब्लू एडिशन बाइक को ज्यूरिक में पेश किया गया और करेंट एक्सचेज रेट के हिसाब से इसकी कीमत 12.2 करोड़ रुपये है।

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अमेरिका के प्रतिबंध पर करारा जवाब देगा रूस, दूसरे शीत युद्ध का हो सकता है आगाज

रूस ने अमेरिका के लगाए नए प्रतिबंधों पर हाथ पर हाथ रख बैठने की जगह मुंहतोड़ जवाब देने की बात कही है। दरअसल, पूर्व जासूस सरगेई स्क्रीपाल को जहर देने के बाद से दोनों के बीच राजनयिक संकट पैदा हो गया। इसके बाद अमेरिका ने रूस के सात सबसे प्रभावशाली कुलीनों, 12 कंपनियों, 17 वरिष्ठ अधिकारियों और हथियार निर्यातक सरकारी कंपनी पर प्रतिबंध लगा दिया है।

2016 में राष्ट्रपति चुनाव, साइबर युद्ध और यूक्रेन व सीरिया में दखल के लिए अमेरिका ने रूस को सजा देने के लिए कानून बनाया था। इसी आधार पर शुक्रवार को प्रतिबंध लगाया गया।

इसपर सख्त रुख अपनाते हुए रूस ने कहा, हम रूस के खिलाफ लिए गए हर कदम का करारा जवाब देंगे। रूस के रक्षा मंत्रालय की ओर से जारी बयान में कहा गया, ‘अमेरिका पहले भी 50 चरणों में प्रतिबंध लगाकर भी कुछ हासिल नहीं कर पाया। इसलिए वह वीजा जारी न करने और रूसी औद्योगिक कंपनियों की संपत्ति जब्त करने की धमकी दे रहा है। शायद वह भूल गया है कि निजी संपत्ति जब्त करना चोरी है। प्रतिबंध लगाने से अमेरिका खुद ही बाजार अर्थव्यवस्था और स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा का दुश्मन बन रहा है।’

दूसरे शीत युद्ध का हो सकता है आगाज
अमेरिका ने अल्यूमीनियम कारोबारी ओलेग डेरीपास्का और सरकारी उर्जा कंपनी गजप्रौम के निदेशक एलेक्सी मिलर पर प्रतिबंध लगाया है। ओलेग पर रूसी सरकार के लिए काम करने का आरोप है। ये दोनों राष्ट्रपति पुतिन के करीबी माने जाते हैं। अमेरिका के इस कदम से एक बार फिर शीत युद्ध हो सकता है। रूसी रक्षा मंत्रालय ने कहा कि किसी तरह का दबाव हमें अपने मकसद से नहीं भटका सकता है।
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उस इंटरव्यू में क्या बोले बराक़ ओबामा जो प्रिंस हैरी ने लिया

पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने सोशल मीडिया के गैरज़िम्मेदाराना इस्तेमाल को लेकर चेतावनी दी है.

जनवरी में पद से हटने के बाद बराक ओबामा का शायद ये पहला और अपनी तरह का अनोखा इंटरव्यू था.

ये इस वजह से भी ख़ास था क्योंकि ‘बीबीसी रेडियो 4’ के टुडे प्रोग्राम के लिए प्रिंस हैरी ओबामा का इंटरव्यू ले रहे थे.

ब्रिटेन के राज परिवार के प्रोटोकॉल में प्रिंस हैरी पांचवें पायदान पर हैं.

सोशल मीडिया के गैरज़िम्मेदाराना इस्तेमाल पर ओबामा ने चेतावनी दी कि इसे ग़लतफहमियां बढ़ती हैं और जटिल मुद्दों पर लोगों की समझदारी पर असर पड़ता है.

बराक ओबामाइमेज कॉपीरइटAFP
Image captionजनवरी में व्हाइट हाउस छोड़ते समय आख़िरी बार बतौर राष्ट्रपति प्रेस से बात करते हुए बराक ओबामा

सोशल मीडिया की इंतेहा पर…

पूर्व राष्ट्रपति ने आने वाले कल की उस स्थिति को लेकर चिंता ज़ाहिर की ‘जिसमें हक़ीक़त को नज़रअंदाज़ कर दिया जाएगा और लोग केवल वही बातें पढ़ना और सुनना चाहेंगे जो उनके अपने विचारों से मेल खाती हों.’

“इंटरनेट का एक ख़तरा ये भी है कि लोग पूरी तरह से अलग हक़ीक़तों में जी सकते हैं. लोगों के अपने पूर्वाग्रह होते हैं और वे इन्हीं पूर्वाग्रहों को मज़बूत करने वाली सूचनाओं के दायरे में सिमटकर दुनिया से अलग-थलग से बने रह सकते हैं.”

“सवाल ये है कि हम किस तरह से टेक्नॉलॉजी का इस्तेमाल करते हैं ताकि अलग-अलग तरह की आवाज़ों की जगह मिल सके, जो विविधता के लिए गुंजाइश बनाए और जो बंटवारे को बढ़ावा देने वाली ताक़तों को मौका न दे.”

ओबामा के उत्तराधिकारी ट्रंप ट्विटर का खूब इस्तेमाल करते हैं लेकिन पूर्व राष्ट्रपति ने उनका नाम नहीं लिया. ट्रंप पर ट्विटर के ज़्यादा इस्तेमाल का आरोप लगता रहा है हालांकि पूर्व राष्ट्रपति ओबामा ये मानते हैं कि ट्विटर की वजह से अमरीकी लोगों से सीधे जुड़ने में सहूलियत होती है.

बराक ओबामा, डोनल्ड ट्रंपइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

राष्ट्रपति पर पड़ने वाले दबाव पर…

ये मुश्किल है, लोगों की नज़र में बने रहना कई तरह से असहज करता है. एक तरह से ये चुनौतीपूर्ण भी है. जिन्हें आप पसंद करते हों, उन्हें भी दिक्कतें पेश आ सकती हैं. 20-30 साल पहले ऐसा नहीं होता था.

इसलिए ये एक तरह से बलिदान जैसा है. मुझे लगता है कि जब लोग राजनीति में जाने का फ़ैसला करते हैं तो उन्हें खुद को शांत रखना चाहिए. लेकिन आख़िरकार अगर आप दुनिया में सार्थक बदलाव ला पाते हैं तो राजनीति में आपका आना सार्थक हो जाता है.

ओबामा इन सब चुनौतियों के बीच अपनी पत्नी मिशेल से मिले सपोर्ट के लिए शुक्रगुजार महसूस करते हैं.

बराक ओबामाइमेज कॉपीरइटAFP

व्हाइट हाउस छोड़ने पर

“मिलाजुला अनुभव होता है. उन सभी कामों के लिए जो अधूरे रह गए. चिंता इस बात की है कि देश किस तरह से आगे बढ़े लेकिन आप जानते हैं कि मिलाजुलाकर सब कुछ ठीक है.”

व्हाइट हाउस में अपने कार्यकाल के दौरान ओबामा खुद को एक रीले रनर के तौर पर देखते हैं.

अगर आप मेहनत से दौड़ते हैं और आप अपना बेस्ट करते हैं तो आप कामयाबी से अपनी मशाल आगे बढ़ा सकते हैं. आप अपना काम अच्छे से करते हैं तो दुनिया थोड़ी बेहतर होती है.

लोगों को बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाएं सुनिश्चित कराने वाले ओबामाकेयर प्रोजेक्ट को वे अपनी बड़ी उपलब्धि बताते हैं.

“ये कहना कितना बड़ी बात है कि दो करोड़ अमरीकियों को स्वास्थ्य बीमा मुहैया कराया गया जो उनके पास पहले नहीं था.”

बराक ओबामा, डोनल्ड ट्रंपइमेज कॉपीरइटREUTERS

आना वाला कल कैसा दिखता है?

दुनिया के सामने मौजूद समस्याओं को ख़ारिज किए बिना ओबामा सकारात्मक बने हुए हैं.

अगर हम अपनी किस्मत खुद लिखते हैं, इसकी ज़िम्मेदारी लेते हैं, इसमें हिस्सा लेते हैं, इससे जुड़ते हैं, इस पर खुलकर बात करते हैं, अगर हम समुदायों के साथ काम करते हैं तो हर मुश्किल का हर निकाला जा सकता है, बावजूद उन डरावनी ख़बरों के जो हम देखते हैं.

अगर मानव इतिहास में कोई एक लम्हा आपको चुनने का मौका मिले जिसमें आप पैदा होना चाहें तो आप आज को चुनेंगे क्योंकि हक़ीक़त यही है कि दुनिया आज सबसे ज़्यादा स्वस्थ, संपन्न, ज्यादा शिक्षित, अधिक सहिष्णु और आधुनिक और कम हिंसक है.

बराक ओबामा, प्रिंस हैरीइमेज कॉपीरइटREUTERS

प्रिंस हैरी क्या बोले?

एडिटिंग के अलावा प्रिंस हैरी ने ये इंटरव्यू ख़ुद लिया.

“मैंने बहुत ज़्यादा इंटरव्यू नहीं किए हैं लेकिन ये एक अच्छा अनुभव था. ख़ासकर पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा का. हकीकत तो ये थी कि वे मुझे इंटरव्यू करना चाहते थे.”

“ये अनुभव हासिल करने के साथ-साथ सीखने जैसा भी था. लेकिन कई और भी अहम मुद्दे हैं जिनपर सोचने और बात किए जाने की ज़रूरत है.”

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पेट्रोल में मिलाया जाएगा 15 फीसद मेथेनॉल, समझें इसके फायदे-नुकसान

केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने आज लोकसभा में कहा कि अब पेट्रोल में 15 फीसद मेथेनॉल मिलाया जाएगा। उन्होंने कहा कि ऐसा करने से साल 2030 तक भारत का ईंधन बिल कम हो जाएगा। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि मेथेनॉल को बढ़ावा देने से प्रदूषण पर भी लगाम लगाई जा सकेगी। सरकार की इस योजना के बारे में नितिन गडकरी पहले भी जानकारी दे चुके हैं।

मेथेनॉल मिलाने से कितना सस्ता हो जाएगा पेट्रोल: मेथेनॉल कोयला से बनाया जा सकता है और इसकी लागत 22 रुपये प्रति लीटर होती है, जबकि पेट्रोल की कीमत 80 रुपये प्रति लीटर पड़ती है। चीन इसे 17 रुपये प्रति लीटर की लागत में तैयार कर रहा है। गडकरी ने कहा यह पेट्रोल की लागत को कम करेगा और प्रदूषण को भी कम करेगा। गडकरी ने कहा कि मुंबई के आस-पास की फैक्ट्री जिसमें दीपक फर्टिलाइजर्स और राष्ट्रीय केमिकल्स एंड फर्टिलाइजर्स भी शामिल हैं वो मेथेनॉल को तैयार कर सकती है।

समझें गणित कैसे सस्ता हो जाएगा पेट्रोल: (उदाहरण से समझें)

  • 1 लीटर पेट्रोल की कीमत दिल्ली में 69 रुपए है
  • यानी 1000 एमएल पेट्रोल की कीमत: 69 रुपए
  • इसमें अगर 15 फीसद एथेनॉल मिलेगा।
  • 850 एमएल पेट्रोल की कीमत: 69/1000X850= 58.65 रुपए
  • वहीं 1000 एमएल मेथेनॉल की कीमत 22 रुपए
  • 15 फीसद यानी 150 एमएल मेथेनॉल की कीमत: 22/1000X150= 3.3 रुपए
  • इस हिसाब से 1 लीटर पेट्रोल की कीमत होगी: 58.65+3.3= 61.95 रुपए

यानी इस हिसाब से आपको करीब 7 रुपए का सीधा-सीधा फायदा होगा।

क्या है मेथेनॉल: मेथनॉल आंतरिक दहन और अन्य इंजनों के लिए वैकल्पिक ईंधन है। इसे या तो गैसोलीन के साथ मिलकर इस्तेमाल किया जाता है या फिर सीधे तौर पर। काफी सारे देशों में इसका इस्तेमाल रेसिंग कार के लिए किया जाता है। अमेरिका में, पेट्रोलियम आधारित ईंधन के विकल्प के रूप में इथेनॉल ईंधन को मेथनॉल ईंधन तुलना में ज्यादा पसंद किया जाता है। सामान्य तौर पर, इथेनॉल कम विषाक्त (टॉक्सिक) होता है और इसका ऊर्जा घनत्व ज्यादा होता है। हालांकि मेथनॉल ऊर्जा उत्पादन के लिहाज से कम खर्चीला होता है। ओपेक देशों के वर्ष 1973 के तेल संकट के दौरान, रीड और लर्नर (1973) ने कोयला के इस्तेमाल से विनिर्माण प्रौद्योगिकी के साथ ईंधन के रूप में मेथनॉल को प्रस्तावित किया था और यह गैसोलीन को रिप्लेस करने के लिहाज से एक बेहतर (पर्याप्त) संसाधन भी है। ऐतिहासिक रूप से, मेथनॉल को पहली बार लकड़ी के विनाशकारी आसवन (pyrolysis) द्वारा उत्पादित किया गया था, जिसके परिणामस्वरूप लकड़ी के शराब के आम अंग्रेजी नाम का परिणाम था।

क्या कहते हैं एक्सपर्ट: केडिया कमोडिटी के प्रमुख अजय केडिया ने बताया कि देश के भीतर पेट्रोल में एथेनॉल तो मिलाया ही जा रहा है, लेकिन मेथेनॉल एक नया कॉन्सेप्ट है। अब पेट्रोल में मेथेनॉल मिलाने से बेशक प्रदूषण काफी कम होगा,जिसके लिए सुप्रीम कोर्ट दिल्ली सरकार को लताड़ लगाते हुए यह भी कह चुकी है कि राजधानी में प्रदूषण नियंत्रित करने के उनके प्रयास नाकाफी हैं। अगर पेट्रोल में मेथेनॉल मिलाया जाएगा तो जाहिर तौर पर पेट्रोल की कीमत में 8 से 10 रुपए की कमी आएगी। जो कि आम आदमी के लिए एक राहत की खबर है। हालांकि इस मसले पर चिंता की बात गाड़ियों के इंजन को लेकर है जो कि मेथनॉल मिलाए जाने के कारण खराब भी हो सकते हैं। हालांकि सरकार ने इस संबंध में वोल्वो से स्पेशल इंजन के लिए बात भी की है। साथ ही सरकार ने यह भी कहा है कि इससे देश के इंपोर्ट (आयात) पर भी असर पड़ सकता है।

क्या होंगे नुकसान: ऑटो एक्सपर्ट रंजॉय मुखर्जी ने बताया कि इस फैसले से गाड़ियों पर जाहिर तौर पर असर पड़ेगा। उन्होंने कहा कि फैक्ट्रियों से निकलने वाली गाड़ियां मौजूदा समय में मेथेनॉल के लिहाज से सक्षम नहीं हैं। इसलिए सरकार को अपनी इस योजना को अमलीजामा पहनाने से पहले कंपनियों को गाड़ियों को अपग्रेड करने का समय देना होगा। नहीं तो यह गाड़ियों के इंजन और उसके प्रदर्शन पर बुरा असर डाल सकता है।

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2017 में पीएम मोदी की 6-1 से बंपर जीत, कमलमय हुए ये प्रदेश

21 वीं सदी का 17 वां साल दस्तक दे रहा था और इसके साथ ही इस वर्ष को अनेकों राजनीतिक घटनाओं का गवाह भी बनना था। राजनीतिक तौर पर साल 2017 के सभी महीने किसी न किसी वजह से सुर्खियों में रहे। लेकिन फरवरी-मार्च के साथ नवंबर और दिसंबर का महीना कुछ राजनीतिक दलों के लिए जहां खुशी का लमहा लेकर आया तो कुछ के हिस्से में सिर्फ दुख और दर्द आया। कुछ राजनीतिक दलों और शख्सियतों को आत्मावलोकन की सीख दे गया तो कुछ के लिए ये संदेश कि सफलता को महफूज रखने के लिए आप को लगातार कोशिश करनी होगी। 2017 के जनवरी से दिसंबर के कालखंड में हम पीएम मोदी के उस प्रभामंडल की चर्चा करेंगे जिसका असर देश के सात सूबों में होने वाले चुनाव परिणाम में दिखा।

उत्तर प्रदेश में भाजपा 14 साल का वनवास खत्म
जनवरी और फरवरी में उत्तर भारत में कड़ाके की ठंड थी। लेकिन देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश की राजनीतिक फिजां में गरमी थी। राजनीतिक दल अवध पर कब्जे की तैयारी कर रहे थे। अवध पर कब्जे की तैयारी इसलिए भी महत्वपूर्ण होती है क्योंकि कहा जाता है कि दिल्ली का रास्ता लखनऊ के जरिए जाता है और जिसके हाथ से लखनऊ फिसला वो दिल्ली की सत्ता पर काबिज होने का सिर्फ सपना ही देख सकता है। उत्तर प्रदेश की तत्कालीन सपा सरकार अपने काम के दम और कांग्रेस के साथ गठबंधन कर समाजवादी झंडे को निर्बाध फहराने की तैयारी कर रही थी। इसके साथ ही केसरियां रंग भी यूपी को अपने रंग में सराबोर करने की तैयारी में था। मतदाताओं को लुभाने के लिए राजनीतिक दलों से अथक और अकथ कोशिश की गई। चुनाव प्रचार चरम पर था और राजनीतिक दल अपनी तरकश से एक से बढ़कर एक तीर के जरिए एक दूसरे पर निशाना साध रहे थे।


भाजपा जहां 14 साल के वनवास को खत्म करने के लिए अपने आपको मौका देने की मांग कर रही थी। वहीं सपा और कांग्रेस के नेता यूपी के लड़के करेंगे विकास का नारा बुलंद कर रहे थे। पीएम मोदी भाजपा के स्टार प्रचारक थे। वो लोगों से अपील कर रहे थे कि ये लड़ाई ईमानदारों और भ्रष्टाचारियों के बीच की है। वो ये भी कहा करते थे कि यूपी की जनता वंशवाद,जातिवाद से तंग आ चुकी है। इसके साथ ही इन नेताओं की अपील का कितना असर पड़ेगा इसे लेकर राजनीतिक टीकाकार अलग अलग ढंग से भविष्यवाणी कर रहे थे। लेकिन जब चुनाव परिणाम आया तो वो सभी के अनुमानों से जुदा था। यूपी की जनता ने अपना मत दे दिया था, देश का सबसे बड़ा सूबा अब उस राह पर चलने को तैयार था जो केसरिया रंग में रंग चुका था।

उत्तराखंड में प्रचंड विजय
उत्तर प्रदेश के साथ ही देवभूमि उत्तराखंड में चुनाव का आगाज हो चुका था। उत्तराखंड में हरीश रावत की कांग्रेस सरकार दोबारा सरकार बनाने की तैयारी के साथ चुनाव मैदान में थी। लेकिन भाजपा देवभूमि की जनता को ये समझा रही थी कि किस तरह से कांग्रेस शासन में उत्तराखंड विकास की पटरी से उतर गया था। एक तरफ कांग्रेस की तत्कालीन अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी जनमत को अपने पक्ष में बदलने की कोशिश करते रहे, वहीं भाजपा के स्टॉर प्रचारक पीएम मोदी ने कहा कि एक ऐसी पार्टी के हाथ में आप सत्ता कैसे सौंप सकते हैं जिसका दामन दागदार है। देवभूमि की धरती पर दोनों दल अपने अपने अंदाज में एक दूसरे की वादों और दावों की धज्जियां उड़ा रहे थे। लेकिन जन का मत कुछ और ही था। इवीएम से जब परिणाम बाहर आने शुरू हुए तो नतीजे प्रत्याशित लेकिन चौंकाने वाले थे। देवभूमि की जनता का फैसला सार्वजनिक हो चुका था और केसरिया झंडा मैदान से लेकर पहाड़ तक फहर रहा था।

गोवा और मणिपुर बनाई सरकार
यूपी और उत्तराखंड के साथ पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर और समुद्र के किनारे स्थित गोवा में भी चुनावी सरगर्मी तेज थी। भाजपा के विरोधी पणजी में जोरशोर से नोटबंदी के मुद्दे को उठा रहे थे। गोवा में विरोधी दल अपने तर्कों से समझाने की कोशिश कर रहे थे कि किस तरह से नोटबंदी ने गोवा की रीढ़ (पर्यटन व्यवसाय) को तोड़ दी है। लेकिन पीएम नरेंद्र मोदी कहते रहे कि उनकी लड़ाई गरीबों के लिए है। नोटबंदी के समर्थन में उन्होंने कहा कि वो जानते हैं कि इसका खामियाजा उठाना पड़ेगा। लेकिन गरीबों की पीड़ा को कम करने के लिए इस तरह का कदम उठाना जरुरी था। गोवा और मणिपुर में भाजपा-कांग्रेस के बीच जबरदस्त टक्कर में भाजपा भारी पड़ी और गोवा के साथ मणिपुर में कमल खिलने में कामयाब रहा।

पंजाब में  कांग्नेस को मिली कामयाबी
यूपी, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर के साथ ही पंजाब में विधानसभा के लिए चुनाव प्रचार परवान चढ़ चुका था। पंजाब में अकाली दल-भाजपा गठबंधन के खिलाफ कांग्रेस और आप मोर्चा खोले थी। कांग्रेस के नेता इस तथ्य को वहां की जनता के सामने रख रहे थे कि कैसे अकाली-भाजपा गठबंधन के शासन में पंजाब नशे की गिरफ्त में आ गया। कांग्रेस और आप के नेता जनता को ये बताने में कामयाब रहे कि पंजाब का भला सिर्फ कांग्रेस सोचती है और मौका मिलने पर वो प्रदेश को तरक्की के राह पर ले जायेंगे। पंजाब की जनता ने कांग्रेस पर भरोसा किया और सत्ता अमरिंदर सिंह के हाथों सौंप दी।


कमलमय हुआ गुजरात

साल 2017 के पहले तीन महीनों में देश के इन सूबों में चुनावी शोर खत्म हो चुका था। देश की राजनीति किसी और बड़ी घटना की गवाह बनने वाली थी। एक जुलाई 2017 को भारत एक बाजार में बदल चुका था। एक राष्ट्र और एक कर के जरिए जीएसटी को लाया जा चुका था। ठीक उसके बाद पीएम के गृहराज्य गुजरात और देवभूमि हिमाचल में विधानसभा चुनावों की रूपरेखा तैयार हो चुकी थी। राजनीति के जानकारों का मानना था कि गुजरात विधानसभा चुनाव पीएम मोदी के लिए लिटमस टेस्ट होगा। इसके साथ ही कई जानकारों का कहना था कि गुजरात में पाटीदार, दलित और पिछड़ो के मुद्दे पर मौजूदा भाजपा सरकार बैकफुट पर है। यही नहीं जीएसटी का फैसला भाजपा के लिए आत्मघाती साबित होगा। गुजरात में चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस के तत्कालीन उपाध्यक्ष राहुल गांधी कहा करते थे कि केंद्र की मोदी सरकार महज कुछ लोगों के फायदे के लिए सोचती है। ये बात अलग है कि इवीएम से निकले हुए परिणाम कुछ और ही हकीकत बयां कर रहे थे। गुजरात में छठी बार भाजपा सरकार बनाने में कामयाब हुई। लेकिन चुनाव नतीजे कुछ संकेत भी दे गए।

देवभूमि हिमाचल में खिला कमल
इसके साथ ही देवभूमि हिमाचल में कांग्रेस अपने प्रदर्शन को दोहराने में नाकाम रही। दूसरे राज्यों की तरह हिमाचल में भ्रष्टाचार का मामला छाया रहा। भाजपा के स्टॉर प्रचारक पीएम मोदी लोगों तक ये छाप छोड़ने में कामयाब रहे कि कांग्रेस का मतलब ही भ्रष्टाचार है। भ्रष्टाचार का समूल नाश करने के लिए वीरभद्र की सरकार से छुटकारा पाना ही होगा। कांग्रेस और भाजपा के बीच चुनावी लड़ाई में जनता ने अपने नायक पीएम मोदी पर भरोसा किया और राज्य की कमान भाजपा के हाथों में सौंप दी।

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मेरठ में एंबुलेंस में शराब और रशियन डांस, रसिया डॉक्टरों के खिलाफ जांच के आदेश

उत्तर प्रदेश में भले ही गंभीर मरीजों तथा गर्भवती महिलाओं को एंबुलेंस न मिले, लेकिन जलवा तो डाक्टर्स का हैं। इनके फंक्शन हो तो शराब एंबुलेंस में भरकर लाई जाती है। इसके साथ ही मेडिकल कालेज प्रांगण में रशियन डांसर के बैले भी होता है। जमकर जाम झलकाए जाते हैं और मामला बढऩे पर कॉलर भी पकड़े गए।

मेरठ के लाला लाजपत राय मेडिकल कॉलेज में कल 1992 बैच के डाक्टर्स का वार्षिक समारोह था। मेरठ के मेडिकल कालेज में बीते दो दिन से ओल्ड स्टूडेंट एसोसिएशन 1992 बैच के डाक्टरों का सिल्वर जुबली सेलिब्रेशन हुआ। भयंकर ठंड में यहां पर रशियन डांसरों के नाच पर डॉक्टरों ने जमकर ठुमके लगाए. इतना ही नहीं जिन वाहनों में मरीजों को अस्पतालों तक पहुंचाया जाता है उनमें मेडिकल कॉलेज के परिसर में शराब ढोकर लाई गई। मेडिकल कालेज परिसर में इस दौरान कल जमकर धमाल हुआ. खुले आसमान में शराब के जाम छलके, नाच-गाना हुआ. मनोरंजन के लिए रशियन डांसरों का डांस भी रखा गया और इस सबके बीच मरीजों से जुड़े संसाधन शराब ढोने में लगाये गये।

चिकित्सा के मंदिर मे सरेआम मदिरापान ने मर्यादाओं को तार-तार कर दिया। लाला लाजपत राय मेडिकल कालेज के 1992 बैच की रजत जयंती मे विदेशी महंगी शराब परोसी गई। अपने वरिष्ठों के सामने डाक्टरो ने न सिर्फ जमकर शराब पी, बल्कि कैपस मे मारपीट भी हो गई।

लाला लाजपत राय की मूर्ति के पायदान पर बैठकर शराब पी गई। शराब परोसने के लिए बाहर से बुलाई गई लड़कियां भी चर्चा का विषय बनी रही। उधर, कैपस मे खुलेआम शराब छलकाने की शिकायत शासन तक पहुंच गई।

मेडिकल कालेज में डाक्टरों ने इस बार तो दो पायदान आगे बढ़कर रजत जयंती मनाया।

इससे पहले डाक्टर कैंपस में गीत-संगीत, डांस और कामेडी तक सीमित थे, जबकि इस वर्ष पहली बार बेली डांस की थिरकन आकर्षक का केंद्र बनी।

एल्युमनी मीट में शराब का सेवन कोई नई बात नहीं है लेकिन प्रशासनिक ब्लाक के सामने स्थित कैंपस में आयोजित कार्यक्रम में पहली बार विदेशी बालाएं भी नजर आईं। इस दौरान बेली डांस के तीन आयटम पेश किए गए। यही आयोजन खासा चर्चा में रहा।

कुछ लोगों ने इसे लेकर असहजता भी दिखाई। मेडिकल कालेज परिसर में आयोजन में इस तरह के कार्यक्रमों को शामिल न करने की भी सलाह दी। यही वजह रही कि जब डाक्टर बेली डांस का आनंद उठा रहे थे, वहीं वरिष्ठ चिकित्सक दूसरे लान में चले गए।

कैंपस की एक वीडियो वायरल हुई और मामला मुख्यमंत्री तक पहुंच गया। सीएम कार्यालय से प्रशासन से जवाब-तलब की भी सूचना है। कार्यक्रम के दौरान कई बार लोग एक दूसरे से उलझते नजर आए।

आयोजन कमेटी के अध्यक्ष डा. परवेज अहमद ने एक व्यक्ति को बाहर निकाला, जिसके बाद कैंपस में कुछ देर के लिए तनाव बढ़ा। नौबत मारपीट की भी आ गई थी। इस पर डा. परवेज का कहना था कि जो गलत ढंग से कार्यक्रम में पहुंचा था, उसे बाहर निकाला गया।

दिनभर गुलजार रहा कैंपस

मेडिकल कैंपस में रजत जयंती कार्यक्रम में 1992 के डाक्टरों के अलावा करीब तीन हजार से ज्यादा लोग पहुंचे। व्यंजनों की खुशबू थी तो महंगी शराब का भी खुमार छाया हुआ था।

 

मेहमानों के साथ तमाम डाक्टर भी लडख़ड़ाते नजर आए। कैंपस में क्रिसमस का भी रंग था, इसलिए कई परिवार-बच्चों को भी लेकर पहुंचे।

सभी ने पल्ला झाड़ा अब जांच का आदेश 

लाला लाजपत राय मेडिकल कॉलेज की इस भद्दी तस्वीर को जब मीडिया ने दिखाया तो कॉलेज प्रशासन में खलबली मच गई। आनन-फानन में मेडिकल कॉलेज के कार्यवाहक प्रिंसिपल ने इस मामले में जांच करने के आदेश दे दिए। उन्होंने मामले से पल्ला झाड़ते हुए कहा कि उनकी जानकारी के बिना मेडिकल कॉलेज में रशियन बालाएं नचाई गई हैं। साथ ही एंबुलेंस में शराब ढोकर लाई गई। डॉक्टरों ने जाम छलकाते हुए फूहड़ गानों पर डांस किया।

सीएमओ मेरठ बेहद नाराज

सीएमओ मेेरठ, राजकुमार ने बताया मुझे पता चला कि कार्यक्रम में रूसी बैली नर्तकियों को बुलाया गया था।

कार्यक्रम के लिए शराब की पेटियां लाने को एंबुलेंस वैन का प्रयोग किया है। यह बिल्कुल गलत है, यह किसी सरकारी मेडिकल कॉलेज में नहीं होना चाहिए था। इस मामले में जांच का आदेश दिया गया है।

मामले की जांच होनी चाह‍िए

इस मामले में बीजेपी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी का कहना है कि यह घटना शर्मनाक है। इस पूरे मामले की जांच होनी चाहिए। विहिप के प्रांत प्रवक्ता शीलेंद्र कुमार ने कहा, डॉक्टर भगवान का रूप होते हैं। यदि वो ही ये सब करेंगे तो हमारे समाज पर इसका क्या असर होगा। उन्होंने इस पूरे मामले की जांच कर उचित कार्रवाई किए जाने की मांग करते हुए कहा कि है कि भविष्य में ऐसा फिर न हो, इसकी भी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।

बैले डांस में मानक का उल्लंघन नहीं

आयोजन समिति के अध्यक्ष डॉ. परवेज अहमद ने कहा कि आबकारी एवं फायर समेत सभी संबंधित विभागों से परमीशन ली गई। कार्यक्रम पूरी तरह अनुशासित रहा। बेली डांस में किसी मानक का उल्लंघन नहीं हुआ। सभी ने पूरा सहयोग दिया। परिवार के जनों के साथ हम सभी ने कार्यक्रम का लुत्फ उठाया।

मेरे सामने तो सब ठीक था

कार्यवाहक प्रिसिंपल डॉ. विनय अग्रवाल ने कहा कि मेरे सामने तो सबकुछ ठीक था। कार्यक्रम के बाद कुछ लोगों ने शिकायतें की। हालांकि शासन से अब तक कोई पूछताछ नहीं हुई है।

आबकारी विभाग की अनुमति थी

जिला आबकारी अधिकारी मोहम्मद असलम ने कहा कि मेडिकल कालेज परिसर में सोमवार को चिकित्सकों के कार्यक्रम के लिए जिला आबकारी विभाग से अनुमति ली गई थी। डा. परवेज की ओर से अनुमति के लिए प्रार्थना पत्र दिया गया था।

जिला प्रशासन की अनुमति 

एडीएम सिटी, मुकेश चंद्र ने कहा कि मेडिकल कालेज में चिकित्सकों के सोमवार को आयोजित कार्यक्रम के लिए जिला प्रशासन से अनुमति ली गई थी। इस कार्यक्रम के बाबत कोई शिकायत आदि अभी जिला प्रशासन को प्राप्त नहीं हुई है।

चिकित्सा शिक्षा मंत्री बेहद गंभीर

प्रदेश के चिकित्सा शिक्षा मंत्री आशुतोष टंडन ने मेडिकल कालेज में दारू पार्टी तथा अश्लील डांस के मामले को बेहद गंभीरता से लिया है। उन्होंने कहा कि मेडिकल कालेज में डांस बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है, यह प्रकरण बेहद ही गंभीर है। डॉक्टर्स की शराब पार्टी बेहद शर्मनाक कृत्य है। फूहड़ डांस के साथ ही मैदान में दारू परोसा जाना निंदनीय है। चिकित्सा शिक्षा महानिदेशक की अध्यक्षता में एक कमेटी मामले की जांच करेगी। इसकी रिपोर्ट 48 घंटे में मांगी गई है। जांच रिपोर्ट आने के बाद कार्रवाई होगी, यह तय है।

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सऊदी अरब और ईरान के बीच अगर युद्ध हुआ तो क्या होगा?

मंगलवार को सऊदी अरब की राजधानी रियाद पर एक मिसाइल दागी गई. इस मिसाइल के निशाने पर था सऊदी अरब का राजमहल. जहां पर सऊदी किंग सलमान बजट पेश करने वाले थे. मिसाइल अपने निशाने तक पहुंचती, उससे पहले ही इसे हवा में मार गिराया गया.

यूं तो ये मिसाइल सऊदी अरब के पड़ोसी देश यमन के बाग़ी हूथियों ने दागी थी, मगर सऊदी अरब को यक़ीन है कि इसका रिमोट यमन से दूर ईरान की राजधानी तेहरान में था. ईरान, जो कई दशकों से सऊदी अरब का सबसे बड़ा दुश्मन है.

सऊदी अरब समेत दुनिया के कई देश मानते हैं कि यमन के शिया हूथी विद्रोहियों की पुश्त पर ईरान का हाथ है. रियाद पर दागी गई ये मिसाइल, सऊदी अरब और ईरान के बीच क़रीब एक सदी से जारी तनातनी की सबसे ताज़ा मिसाल है. इस साल ये तीसरा मौक़ा था जब हूथी विद्रोहियों ने सऊदी अरब पर मिसाइल फेंकी थी.

 

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सियासी और सामरिक ताक़त

इन दिनों पश्चिमी एशिया में हालात कुछ यूं हैं कि मानो सऊदी अरब और ईरान में जंग छिड़ने वाली हो. तो, अगर सऊदी अरब और ईरान के बीच युद्ध हुआ, तो क्या होगा?बीबीसी की रेडियो सिरीज़ द इंक्वॉयरी में इस सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश की गई है.

सऊदी अरब और ईरान पश्चिमी एशिया की दो बड़ी सियासी और सामरिक ताक़तें हैं. दोनों बड़े तेल उत्पादक देश हैं. अगर दोनों के बीच युद्ध हुआ, तो इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा. ब्रिटेन के माइकल नाइट अरब मामलों के जानकार हैं. वो ब्रिटिश सरकार के अरब मामलों के सलाहकार रहे थे.

नाइट बताते हैं, “ईरान, ऐतिहासिक रूप से बहुत असरदार देश रहा है. कई सदियों तक उसने अरब देशों पर राज किया. तब इसे पर्शिया के नाम से जाना जाता है. वहीं, सऊदी अरब और दूसरे अरब देशों ने पिछली एक सदी में तेल की वजह से काफ़ी तरक़्क़ी की है. इस दौरान ये अरब देश ताक़तवर बनकर उभरे हैं. इस वजह से ईरान का असर इन इलाक़ों पर कम होता गया है.”

 

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ताकि विरोधी पर दबदबा क़ायम कर सकें

माइकल नाइट कहते हैं, “सऊदी अरब और ईरान के बीच तनातनी की बड़ी वजह मज़हबी भी है. सऊदी अरब एक सुन्नी देश है. वहीं ईरान, इस्लाम के शिया फ़िरक़े को मानने वाला. दोनों ही देश, अपने धार्मिक साथियों को दूसरे देशों में भी बढ़ावा देते रहे हैं, ताकि विरोधी पर दबदबा क़ायम कर सकें. ये भी ईरान और सऊदी अरब के बीच कड़वाहट की बड़ी वजह है.”

पिछले कुछ सालों में ईरान, सऊदी अरब पर भारी पड़ता दिख रहा है. कई अरब देशों पर उसका दबदबा बढ़ रहा है. ईरान ने इराक़ में अपना असर बढ़ा लिया है. सीरिया और लेबनान में भी उसके प्यादे काफ़ी ताक़तवर हैं. वहीं, यमन में वो हूथी विद्रोहियों को हथियार और ट्रेनिंग मुहैया करा कर सऊदी अरब की नाक में दम किए हुए है.

माइकल नाइट का कहना है, “इसमें ईरानी फौज का इंक़लाबी दस्ता यानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स का बड़ा हाथ रहा है.” नाइट के मुताबिक़ रिवोल्यूशनरी गार्ड्स, ईरान का सबसे ताक़तवर हथियार हैं. इनका ख़ौफ़ अरब देशों पर तारी है. ये बेहद पेशेवर दस्ता है. जिसने कई मोर्चों पर अपनी ताक़त दिखाई है.

 

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Image captionरिवोल्यूशनरी गार्ड्स

शिया, सुन्नी और रिवोल्यूशनरी गार्ड्स

अरब देशों में शिया, रिवोल्यूशनरी गार्ड्स को अपनी फौज मानते हैं. वहीं सुन्नी अरब इससे डरते हैं.

माइकल नाइट के मुताबिक़, “सऊदी अरब और ईरान के बीच औपचारिक जंग भले न छिड़ी हो. मगर, दोनों ही देश कई मोर्चों पर लड़ रहे हैं. इसकी सबसे बड़ी मिसाल है यमन. जहां पर सऊदी अरब की अगुवाई में कई देशों की सेनाएं, हूथी विद्रोहियों से लड़ाई लड़ रही हैं. वहीं हूथियों को ईरान की सरपरस्ती हासिल है. सऊदी अरब, यमन पर लगातार हवाई हमले कर रहा है. मगर, वो निर्णायक जीत हासिल करने में नाकाम रहा है. सऊदी अरब की नज़र में उसकी जीत की राह में ईरान सबसे बड़ा रोड़ा है.”

यमन के अलावा, सीरिया में भी सऊदी अरब और ईरान, अलग-अलग गुटों के साथ हैं. ईरान, जहां राष्ट्रपति बशर अल असद का समर्थन कर रहा है. वहीं, सऊदी अरब, असद के ख़िलाफ़ बग़ावत करने वालों का साथ दे रहा है.

 

1980-88 ईरान इराक के बीच युद्ध के दौरान प्रदर्शित मिसाइलेंइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES
Image caption1980-88 ईरान इराक के बीच युद्ध के दौरान प्रदर्शित मिसाइलें

शीत युद्ध की स्थिति

लेबनान में ईरान समर्थित हिज़बुल्लाह गुट ताक़तवर है. वहीं सऊदी अरब भी वहां के सुन्नियों का साथ देता है. इराक़ में भी ईरान और सऊदी अरब के बीच दबदबा बढ़ाने की होड़ लगी है. इराक़ की सरकार ने इस्लामिक स्टेट पर जीत हासिल की, तो इसमें ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स का बड़ा हाथ माना जाता है.

इसी तरह, एक छोटे से मुल्क़ बहरीन में भी सऊदी अरब और ईरान आमने-सामने हैं. बहरीन एक शिया बहुल मुल्क़ है. मगर यहां का शेख़ सुन्नी है. सऊदी अरब यहां के राजा के साथ है. वहीं, ईरान, बहरीन में सरकार विरोधी शिया गुरिल्ला संगठनों के साथ है.

माइकल नाइट कहते हैं कि अभी सऊदी अरब और ईरान के बीच कई देशों में शीत युद्ध सा चल रहा है. लेकिन ये कभी भी असल जंग का रूप ले सकता है.

एंथनी कोडिसमन अमरीका और नैटो के अरब मामलों के सलाहकार रहे हैं. वो मानते हैं कि ईरान और सऊदी अरब के बीच जंग एक छोटी सी चिंगारी के तौर पर शुरू हो सकती है. जो आगे चलकर बड़ी जंग बन सकती है. एंथनी मानते हैं कि ये जंग लंबे वक़्त तक चल सकती है.

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सऊदी अरब के पास F-15, F-16 और ब्लैक टॉरनेडो

हालांकि एंथनी को लगता है कि ज़मीनी मोर्चे पर तो दोनों देशों की सेनाएं शायद ही आमने-सामने आएं. हां, हवाई जंग ज़रूर भयंकर हो सकती है. एंथनी के मुताबिक़, “हवाई ताक़त में सऊदी अरब फ़िलहाल ईरान पर भारी दिखता है.”

वो कहते हैं, “ईरान के पास सत्तर और अस्सी के दशक के लड़ाकू विमान हैं. ईरान ने इनका रख-रखाव बड़े अच्छे तरीक़े से कर रखा है. साथ ही ईरान ने रूस से भी कुछ लड़ाकू विमान अस्सी के दशक में ख़रीदे थे. यही विमान ईरान की एयरफ़ोर्स की प्रमुख ताक़त हैं.”

वहीं, सऊदी अरब की वायुसेना के पास अमरीकी लड़ाकू विमान जैसे F-15 और F-16 हैं. ब्लैक टॉरनेडो है. यानी हवाई मोर्चे पर सऊदी अरब ज़्यादा ताक़तवर दिखता है. हालांकि ईरान के पास, सऊदी अरब से ज़्यादा बेहतर मिसाइलें और ड्रोन हैं. ये सऊदी अरब के अहम शहरी ठिकानों को निशाना बना सकती हैं.

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Image captionब्लैक टॉरनेडो

इसराइल भी ईरान के ख़िलाफ़!

एंथनी कहते हैं कि जंग छिड़ी तो ईरान, सऊदी अरब के बुनियादी ढांचे को तबाह कर सकता है. ईरान की मिसाइलें, सऊदी अरब के पानी साफ़ करने के प्लांट और बिजलीघरों को निशाना बना सकता है. इससे सऊदी अरब बुरी तरह तबाह हो सकता है. सऊदी अरब के शहरों को पानी और बिजली की सप्लाई ठप हो जाएगी.

इसके बदले में सऊदी अरब अपने लड़ाकू विमानों से ईरान में बिजली सप्लाई करने वाले ठिकानों, पानी साफ़ करने वाले संयंत्रों पर हमला कर सकता है. इसके अलावा सऊदी अरब, ईरान के तेल के ठिकानों और रिफ़ाइनरी पर हवाई हमले कर सकता है.

एंथनी मानते हैं, “ईरान और सऊदी अरब की जंग बड़ी आर्थिक तबाही का बायस बन सकती है. वो इसकी तुलना शतरंज के त्रिकोणीय मुक़ाबले से करते हैं. सऊदी अरब के साथ जहां संयुक्त अरब अमीरात, मिस्र, ओमान, जॉर्डन, अमरीका, ब्रिटेन और फ्रांस खड़े नज़र आते हैं. वहीं ईरान के खेमे में सीरिया, रूस और इराक़ जैसे देश हैं.”

तेल सप्लाईइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

युद्ध हुआ तो तेल सप्लाई ठप

एंथनी मानते हैं कि जंग की सूरत में इसराइल भी ईरान के ख़िलाफ़ गठबंधन में शामिल हो सकता है. साफ़ है कि ईरान और सऊदी अरब के बीच युद्ध की सूरत में अमरीका और रूस जैसे देशों का रोल ज़्यादा बड़ा होगा. अमरीका फ़िलहाल सऊदी अरब के साथ खड़ा है.

मैरी कॉलिंस, अमरीका की जॉन हॉपकिंस इंस्टीट्यूट से जुड़ी हैं. उन्होंने कई बरस अमरीकी रक्षा मंत्रालय के साथ काम किया है.

मैरी मानती हैं कि ईरान और सऊदी अरब के बीच युद्ध में अमरीका यक़ीनी तौर पर दखल देगा. फारस की खाड़ी स्थित होर्मुज़ जलसंधि से दुनिया के तेल कारोबार का एक बड़ा हिस्सा गुज़रता है. युद्ध हुआ तो ये सप्लाई ठप हो सकती है. इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा.

आधुनिक लड़ाकू विमान

अमरीका क़तई नहीं चाहेगा कि दुनिया को तेल की सप्लाई पर असर पड़े. इसीलिए, ईरान और सऊदी अरब के बीच युद्ध की सूरत में अमरीका का शामिल होना तय है.

मैरी कॉलिंस कहती हैं कि होर्मुज़ में ईरान समुद्र में बारूदी सुरंगे बिछा सकता है. इससे उस इलाक़े से गुज़रने वाले जहाज़ तबाह होने का ख़तरा हो सकता है. ऐसी तबाही होने से रोकने के लिए अमरीका युद्ध होने के एक घंटे के भीतर शामिल हो जाएगा.

कॉलिंस कहती हैं कि खाड़ी देशों में अमरीका के 35 हज़ार से ज़्यादा सैनिक तैनात हैं. अमरीका वायुसेना के F-22 जैसे अति आधुनिक लड़ाकू विमान भी यहां पर तैनात हैं. एक बेड़ा हमेशा फ़ारस की खाड़ी में मौजूद रहता है.

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एक ही दिन में तबाही

कॉलिंस के मुताबिक़ ईरान और सऊदी अरब के युद्ध शुरू होने पर अमरीका सेनाएं फ़ौरन सक्रिय हो जाएंगी. और ये एक दिन में ईरान की पूरी की पूरी नौसेना को बर्बाद कर सकती हैं. वो नब्बे के दशक की एक मिसाल देती हैं. तब अमरीका का एक जहाज़ बारूदी सुरंग की वजह से तबाह हो गया था.

इसके बदले में एक दिन में ही अमरीका ने ईरान की पूरी नौसैनिक ताक़त को तबाह कर दिया था. अमरीकी दखल की वजह से ईरान और सऊदी अरब के बीच जंग कुछ दिनों में ही ख़त्म हो जाएगी. तो, क्या युद्ध के साथ ईरान और सऊदी अरब के बीच झगड़ा हमेशा के लिए ख़त्म हो जाएगा? क्या इस इलाक़े में शांति बहाल हो सकेगी?

ईरानी मूल के अली वाइज़ अमरीका में रहते हैं. वो इंटरनेशन क्राइसिस ग्रुप के लिए काम करते हैं. इस संगठन का काम जंग को रोकना है. अली वाइज़ का बचपन अस्सी के दशक के ईरान-इराक़ युद्ध के दौरान ईरान में गुज़रा था.

दुनिया की अर्थव्यवस्था

ली वाइज़ मानते हैं कि ईरान और सऊदी अरब के युद्ध से दोनों देशों की अर्थव्यवस्था तबाह हो जाएगी. क्योंकि ज़्यादा से ज़्यादा नुक़सान पहुंचाने के लिए दोनों ही देश एक-दूसरे के तेल के ठिकानों, रिफाइनरी, पानी सप्लाई करने वाले प्लांट और बिजली घरों को निशाना बनाएंगे.

युद्ध हुआ तो कच्चे तेल का उत्पादन ठप हो सकता है. इसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा. ईरान और सऊदी अरब के बीच कुछ दिनों की जंग भी हुई, तो तेल के दाम आसमान पर पहुंच जाएंगे. अली मानते हैं कि सऊदी अरब और ईरान के बीच युद्ध की वजह से पूरे इलाक़े में शियाओं और सुन्नियों के बीच तनातनी बढ़ जाएगी.

यानी, ईरान-सऊदी अरब के युद्ध को तो अमरीका अपने दखल से कुछ दिनों में ही ख़त्म कर देगा. मगर इसके बाद, पूरे पश्चिमी एशिया में ईरान और सऊदी अरब के बीच शीत युद्ध का नया दौर शुरू होगा. ताक़त बढ़ाने के नए मोर्चे खुलेंगे. इराक़, सीरिया, यमन जैसे झगड़े दूसरे देशों में पांव पसारेंगे.

अगर सऊदी अरब और ईरान के बीच युद्ध हुआ तो?इमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

दशकों तक महसूस किएजाएंगे ज़ख़्म

क्योंकि अमरीका के हमले से ईरान की सेनाएं तो तबाह हो जाएंगी. मगर ईरान, सऊदी अरब के सुन्नी साथी देशों का विरोध करने वालों को समर्थन बढ़ा देगा. जैसे कि इराक़ में शिया और सुन्नी हथियारबंद गुटों के बीच झगड़े बढ़ जाएंगे. लेबनान में हिज़्बुल्लाह और सऊदी समर्थित गुटों की भिड़ंत बढ़ जाएगी.

यही हालात सीरिया और जॉर्डन में दिख सकते हैं. अली वाइज़ बताते हैं कि ईरान और सऊदी अरब के बीच न तो कारोबारी रिश्ते हैं, न सामाजिक और सांस्कृतिक संबंध हैं. ऐसे में युद्ध के ज़ख़्म आने वाले कई दशक तक महसूस किए जाते रहेंगे. कुल मिलाकर ये कहें कि अगर सऊदी अरब और ईरान के बीच युद्ध हुआ, तो ये हवाई जंग होगी.

दोनों देशों के बीच नौसैनिक युद्ध भी होगा. अमरीका, सऊदी अरब की तरफ़ से दखल देकर ईरान को कुछ दिनों में ही हरा देगा. मगर, ईरान सऊदी अरब के लिए छोटी-छोटी जंगों के दूसरे मोर्चे खोल देगा. युद्ध के ज़ख़्म भरेंगे नहीं. बल्कि दोनों देशों के बीच तनातनी का असर दूसरे देश झेलेंगे. इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा.

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जानिए क्या है देश का सबसे बड़ा 2G स्पेक्ट्रम घोटाला

केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की पटियाला हाऊस स्थित विशेष अदालत ने आज 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन मामले में पूर्व दूरसंचार मंत्री ए.राजा और द्रमुक नेता कनिमोझी सहित सभी आरोपियों को बरी कर दिया।अदालत ने 2010 के इस मामले पर अपना निर्णय देते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष अपना मामला साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा। इस मामले में राजा एवं कई अन्य आरोपी थे। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट में 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले को 1,76,000 करोड़ रुपए का बताया गया था। हालांकि सीबीआई ने अपनी चार्जशीट में करीब 31,000 करोड़ रुपए के घोटाले का उल्लेख किया था। 2014 के आम चुनाव में 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन बड़ा मुद्दा बना था।

जानें कब क्या-क्या हुआ

मई 2007: ए राजा ने दूरसंचार मंत्री के रूप में प्रभार संभाला।
अगस्त 2007: दूरसंचार विभाग ने यूनिफाइड एक्सेस र्सिवसेस (यूएएस) लाइसेंसों के साथ 2 जी स्पेक्ट्रम के आवंटन की प्रक्रिया आरंभ की।
25 सितंबर, 2007: दूरसंचार मंत्रालय ने आवेदन के लिए एक अक्तूबर, 2007 की अंतिम तिथि तय करते हुए प्रेस नोट जारी किए।
1 अक्तूबर, 2007: दूरसंचार विभाग को 46 कंपनियों के 575 आवेदन मिले।
2 नवंबर, 2007: तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने निष्पक्ष लाइसेंस आवंटन एवं प्रविष्टि शुल्क की उचित समीक्षा सुनिश्चित करने के लिए राजा को पत्र लिखा।
22 नवंबर, 2007: वित्त मंत्रालय ने अपनाई गई प्रक्रिया के संबंध में चिंताएं व्यक्त करते हुए दूरसंचार विभाग को पत्र लिखा।

10 जनवरी, 2008: दूरसंचार विभाग ने ‘पहले आओ, पहले पाओ’ की तर्ज पर लाइसेंस जारी करने का निर्णय लिया। आवेदन की अंतिम तारीख निर्धारित तिथि से पहले कर 25 सितंबर तय की गई।

2009: केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) ने सीबीआई को 2 जी स्पेक्ट्रम के आवंटन में अनियमितताओं के आरोपों की जांच का आदेश दिया।
21 अक्तूबर, 2009: सीबीआई ने दूरसंचार विभाग के अज्ञात अधिकारियों, अज्ञात निजी व्यक्तियों/कंपनियों और अन्य के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की।

13 सितंबर, 2010: उच्चतम न्यायालय ने केंद्र और राजा से 2008 में टेलीकॉम लाइसेंस की मंजूरी में 70,000 करोड़ रुपए के घोटाले का आरोप लगाने वाली तीन याचिकाओं का 10 दिन में जवाब देने को कहा।
10 नवंबर, 2010: कैग ने 2जी स्पेक्ट्रम पर सरकार को रिपोर्ट सौंपी, राजस्व को 1.76 लाख करोड़ रुपए की हानि का दावा किया।
14, 15 नवंबर, 2010: राजा ने दूरसंचार मंत्री के पद से इस्तीफा दिया।

2 फरवरी, 2011: सीबीआई ने 2जी मामले में राजा को गिरफ्तार किया। पूर्व दूरसंचार सचिव सिद्धार्थ बेहुरा और राजा के पूर्व निजी सचिव रविंद्र कुमार चंदोलिया को भी गिरफ्तार किया गया।
8 फरवरी, 2011: स्वान टेलीकॉम प्राइवेट लिमिटेड के प्रमोटर शाहिद उस्मान बलवा को सीबीआई ने गिरफ्तार किया।
14 मार्च, 2011: दिल्ली उच्च न्यायालय ने विशेष रूप से 2जी मामलों के निपटान के लिए विशेष अदालत का गठन किया।
29 मार्च, 2011: उच्चतम न्यायालय ने सीबीआई को 31 मार्च के बजाए दो अप्रैल को आरोपपत्र दायर करने की अनुमति दी।
2 अप्रैल, 2011: सीबीआई ने पहला आरोपपत्र दायर किया। राजा, चंदोलिया और बेहुरा का नाम शामिल किया गया। रिलायंस एडीएजी ग्रुप के प्रबंध निदेशक गौतम दोशी, इसके वरिष्ठ उपाध्यक्ष हरि नायर, समूह के अध्यक्ष सुरेंद्र पिपारा, स्वान टेलीकॉम के प्रमोटर शाहिद उस्मान बलवा एवं विनोद गोयनका और यूनीटेक लिमिटेड के प्रबंध निदेशक संजय चंद्रा को आरोपी बनाया गया।  रिलायंस टेलीकॉम लिमिटेड, स्वान टेलीकॉम प्राइवेट लिमिटेड और यूनीटेक वायरलेस (तमिलनाडु) प्राइवेट लिमिटेड का नाम भी आरोप पत्र में शामिल किया गया।
25 अप्रैल, 2011: सीबीआई ने द्रमुक प्रमुख एम करुणानिधि की बेटी एवं सांसद कनिमोझी और चार अन्य का नाम भी दूसरे आरोप पत्र में शामिल किया।
23 अक्तूबर, 2011: सभी 17 आरोपियों के खिलाफ आरोप तय किए गए।
11 नवंबर, 2011: मामले की सुनवाई शुरू।
23 नवंबर, 2011: उच्चतम न्यायालय ने पांच आरोपियों हरि नायर, गौतम दोशी, सुरेंद्र पिपारा, संजय चंद्रा और विनोद गोयनका की जमानत मंजूर की।
28 नवंबर, 2011: दिल्ली उच्च न्यायालय ने कनीमोई, शरद कुमार, करीम मोरानी, आसिफ बलवा और राजीव अग्रवाल की जमानत मंजूर की।
29 नवंबर, 2011: विशेष अदालत ने शाहिद बलवा की जमानत मंजूर की।
1 दिसंबर, 2011: विशेष अदालत ने चंदोलिया की जमानत मंजूर की।
12 दिसंबर, 2011: सीबीआई ने तीसरा आरोपपत्र दायर किया। एस्सार ग्रुप के प्रमोटर रवि रुइया और अंशुमन रुइया, इसके निदेशक (रणनीति एवं योजना) विकास सर्राफ, लूप टेलीकॉम की प्रमोटर किरण खेतान और उनके पति आई पी खेतान का नाम शामिल किया गया।  लूप टेलीकॉम प्राइवेट लिमिटेड, लूप मोबाइल इंडिया लिमिटेड और एस्सार टेली होल्डिंग का नाम भी आरोपपत्र में शामिल किया गया।

2 फरवरी, 2012: उच्चतम न्यायालय ए राजा के कार्यकाल में मंजूर किए गए 122 लाइसेंस रद्द किए। चार महीनों में लाइसेंसों की नीलामी के निर्देश दिए।
4 फरवरी, 2012: विशेष अदालत ने 2जी मामले में पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम को सह आरोपी बनाने की स्वामी की याचिका खारिज की।
24 अगस्त, 2012: उच्चतम न्यायालय ने 2जी मामले में चिदंबरम के खिलाफ जांच की याचिका खारिज की और कहा कि प्रथमष्टया किसी सामग्री से यह पता नहीं चलता कि चिदंबरम को आर्थिक लाभ भी मिला।

25 अप्रैल, 2014: ईडी ने 2जी संबंधी धनशोधन मामले में राजा, कनिमोझी और अन्य के खिलाफ आरोपपत्र दायर किए।
31 अक्तूबर, 2014: धनशोधन मामले में आरोप तय किए गए।

5 दिसंबर, 2017: विशेष अदालत ने 2जी मामले में फैसला सुनाने के लिए 21 दिसंबर की तारीख तय की।
21 दिसंबर, 2017: विशेष अदालत ने सभी तीनों मामलों में राजा समेत सभी आरोपियों को बरी किया।

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बिटकॉइन ने किया अमिताभ बच्चन को मालामाल, 2 साल में कमाए 114 करोड़ रुपए

वर्चुअल करेंसी बिटकॉइन दुनियाभर में चर्चा का बिषय बनी हुई है। इस समय जिस तेजी से बिटकॉइन आगे बढ़ रही है हर कोई इसमें निवेश करने की सोच रहा है। बिटकॉइन से मुनाफा कमाने वालों में बॉलीबुड के महानायक अमिताभ बच्चन भी शामिल हो गए हैं। बच्चन परिवार ने बिटकॉइन में ढाई साल पहले लगभग 1.6 करोड़ रुपए का निवेश किया था, जिसका कुल मूल्य अब 110 करोड़ रुपए से अधिक हो चुका है।

ढाई साल पहले किया था निवेश
जानकारी के मुताबिक बच्चन परिवार ने साल 2015 में पर्सनल इनवेस्टमेंट के तहत मेरिडियन टेक पीटीई में 1.6 करोड़ रुपए का निवेश किया था। मेरिडियन टेक एक सिंगापुर की कंपनी है जिसकी प्राइम मुख्य संपत्ति ZIDDU.COM है, जिसने पिछले हफ्ते ही एक विदेशी कंपनी लॉन्गफिन कॉर्प ने खरीदा है। Ziddu अलग-अलग देशों में बिटकॉइन सहित अन्य वर्चुलअल करेंसी का इस्तेमाल करके माइक्रोफाइनेंस की सुविधा मुहैया कराती है। बच्चन परिवार ने मेरिडियन टेक में जो निवेश किया हुआ था उसके बदले में उनको लॉन्गफिन कॉर्प के करीब 250000 शेयर मिले हैं, सोमवार को इस शेयर की कीमत करीब 70 डॉलर के करीब थी यानि बच्चन परिवार के 2.5 लाख शेयरों की कीमत करीब 1.75 करोड़ रुपए बैठती है जिसे डॉलर और रुपए के मौजूदा एक्सचेंज रेट पर देखा जाए तो 114 करोड़ बनते हैं। यानि ढाई साल पहले 1.6 करोड़ रुपए का निवेश अब 114 करोड़ रुपए हो गया है।

क्‍या है बिटकॉइन
बिटकॉइन एक वर्चुअल करेंसी (क्रिप्टो करेंसी) जैसी है जिसे एक ऑनलाइन एक्सचेंज के माध्यम से कोई भी खरीद सकता है। इसकी खरीद-फरोख्त से फायदा लेने के अलावा भुगतान के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है। इसके जरिए बिना बैंक को माध्‍यम बनाए लेन-देन किया जा सकता है। हालांकि भारत में इस मुद्रा को न तो आधिकारिक अनुमति है और न ही इसे रेग्युलेट करने का कोई नियम बना है।

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प्रद्युम्न मामले में अभियुक्त पर बालिग की तरह मुकदमा चलेगा

गुड़गांव के चर्चित प्रद्युम्न हत्याकांड में एक बड़ा फ़ैसला आया है.

जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड ने फ़ैसला दिया है कि प्रद्युम्न की हत्या के नाबालिग अभियुक्त पर बालिग की तरह मुकदमा चलाया जाएगा.

11वीं में पढ़ने वाले इस अभियुक्त को सीबीआई ने आठ नवंबर को गिरफ़्तार किया था.

इस फ़ैसले के बाद अब जुवेनाइल बोर्ड ने ये मामला ज़िला सत्र अदालत को सौंप दिया है जहां 22 दिसंबर को अभियुक्त की पेशी होगी.

सात साल के प्रद्युम्न ठाकुर की हत्या आठ सितंबर को हुई थी. उनका शव गुड़गांव के रेयान इंटरनेशनल स्कूल में शौचालय के बाहर मिला था.

अभियुक्त भी उसी स्कूल का छात्र है. सीबीआई का दावा है कि अभियुक्त ने प्रद्युम्न की हत्या परीक्षाएं टलवाने के लिए की थी.

जुवेनाइल जस्टिस क़ानून में बदलाव के बाद ये पहला मामला है जिसमें किसी नाबालिग को जघन्य अपराध करने की वजह से बालिग मानकर मुकदमा चलाया जाएगा.

दिसंबर 2012 में हुए निर्भया हत्याकांड के बाद जुवेनाइल जस्टिस क़ानून को सख़्त किया गया था. नया क़ानून जनवरी 2016 में लागू हुआ.

रेयान इंटरनेशनल स्कूल, गुड़गांवइमेज कॉपीरइट/AFP/GETTY

इस क़ानून के मुताबिक़

  • अगर जुर्म ‘जघन्य’ हो, यानी आईपीसी में उसकी सज़ा सात साल से ज़्यादा हो तो, 16 से 18 साल की उम्र के नाबालिग़ को वयस्क माना जा सकता है.
  • ऐसा होने पर किशोर अपराधी पर सामान्य कोर्ट में मुकदमा चलाए जाने के बारे में निर्णय लेने का अधिकार जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के पास होगा.
  • पुराने क़ानून के तहत 18 साल से कम उम्र के अभियुक्त पर मुकदमा अदालत की जगह जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड में चलता था.
  • जघन्य अपराधों में दोषी पाए गए किशोर अपराधी को जेल की सज़ा दी जा सकती है, हालांकि उसे उम्र क़ैद या मौत की सज़ा नहीं होगी.
  • दोषी पाए जाने की सूरत में अपराधी को अधिकतम तीन साल की अवधि के लिए किशोर सुधार गृह भेजा जाता है.
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बालिग की तरह मुकदमा

किस अभियुक्त को बालिग माना जाए, इसकी सिफ़ारिश जांच एजेंसी करती है.

प्रद्युम्न मामले में सीबीआई ने अभियुक्त पर बालिग की तरह मुकदमा चलाने की सिफ़ारिश की थी. साथ ही प्रद्युम्न के पिता ने भी इसके लिए अर्ज़ी लगाई थी.

जुवेनाइल बोर्ड के वजह पूछने पर सीबीआई ने बताया कि अभियुक्त का जुर्म जघन्य की श्रेणी में आता है.

  • अभियुक्त को अगले तीन साल तक सुधार गृह में रखा जा सकता है.
  • उसके बाद भी अगर ज़मानत न मिली तो उसे जेल भेज दिया जाएगा.
  • उस पर मुकदमा बालिग के तौर पर चलेगा लेकिन उसे उम्र क़ैद या फांसी की सज़ा नहीं हो सकती