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4G कवरेज में अव्वल लेकिन स्पीड में फिसड्डी है भारत

इस समय पूरी दुनिया में 4G इंटरनेट का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है और भारत 4G इंटरनेट कवरेज के लिहाज से दुनिया के टॉप देशों में शुमार हो चुका है। ओपनसिग्नल की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में इस समय 86.3 पर्सेंट 4G इंटरनेट की कवरेज है जो इसे कवरेज के मामले में टॉप देशों में शामिल करता है। लेकिन स्पीड के मामले में भारत 88 देशों में काफी फिसड्डी साबित हो रहा है।

 इस रिपोर्ट में बताया गया है कि 2017 भारत में 4G इंटरनेट की औसत स्पीड 6.07 Mbps रही है। भारत इस मामले में अपने पड़ोसी देशों से भी पिछड़ गया है। जहां पाकिस्तान में 4G की औसत स्पीड 13.56 Mbps है वहीं श्री लंका में यह 13.95 Mbps है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि पूरी दुनिया में 4G इंटरनेट की औसत स्पीड भारत से कहीं ज्यादा है। दुनियाभर में अभी 4G इंटरनेट की औसत स्पीड 16.9 Mbps है। हालांकि इसमें यह भी बताया गया है कि दुनिया का कोई भी देश अभी तक 50 Mbps की औसत 4G स्पीड तक नहीं पहुंच सका है।

दुनियाभर में अभी यह है 4G इंटरनेट का हाल

ओपन सिग्नल की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, 4G इंटरनेट स्पीड के मामले में इस समय सबसे ऊपर सिंगापुर 44.31 Mbps के साथ टॉप पर है। टॉप 5 देशों में सिंगापुर के बाद नीदरलैंड्स, नॉर्वे, साउथ कोरिया और हंगरी हैं। साथ ही पूरी दुनिया में 30 देश ऐसे हैं जिनमें 80 पर्सेंट से ज्यादा 4G इंटरनेट कवरेज है। हाल में इस लिस्ट में थाईलैंड, बेल्जियम, लाटविया, फिनलैंड, उरुग्वे, डेनमार्क जैसे देश शामिल हुए हैं।

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यात्री ने ऐसी दुर्गंध फैलाई कि विमान की हुई इमरजेंसी लैंडिंग

दुबई से नीदरलैंड्स जा रही एक फ़्लाइट की ऑस्ट्रिया के विएना शहर में उस वक़्त इमरजेंसी लैंडिंग करवानी पड़ी जब एक यात्री के लगातार दुर्गंध फैलाने पर सहयात्रियों ने ‘बग़ावत’ कर दी.

‘न्यूयॉर्क पोस्ट’ ने इसे ‘फ़ार्ट अटैक’ का नाम दिया है. उनकी ख़बर के मुताबिक़ ये मामला सस्ती विमान सेवा कही जाने वाली ट्रांसेविया एयरलाइन का है.

विमान में चार यात्रियों के बीच हुई कहासुनी जब बात बिगड़ने के हद तक पहुंच गई तो चालक दल ने इमरजेंसी लैंडिंग का फ़ैसला किया.

झगड़े में दो महिलाएं और दो पुरुष शामिल थे.

विमानइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES/DAVID RAMOS

‘हमने कोई नियम नहीं तोड़ा’

‘यूके एक्सप्रेस’ ने ख़बर छापी है कि दोनों महिलाओं को अन्य सदस्यों की राय लेने के बाद ही उतारा गया.

ऑस्ट्रिया पुलिस ने उन्हें गिरफ़्तार किया लेकिन किसी भी क़ानून के तहत मामला नहीं बन पाने के कारण उन्हें रिहा कर दिया गया.

दो में से एक लड़की, 25 साल की नोरा लाचेब नीदरलैंड में लॉ की स्टूडेंट है.

उन्होंने कहा है कि विमान कंपनी के इस व्यवहार के ख़िलाफ़ वो कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाएंगी.

“हमने कोई नियम नहीं तोड़ा था और न ही विमान के संचालन में कोई बाधा डाली थी.”

विमानइमेज कॉपीरइटTRANSAVIA AIRLINE

सोशल मीडिया पर भी इस ख़बर की ख़ूब चर्चा हो रही है.

‘यात्रियों को सिरदर्द और आँख में जलन’

जेएनयू की रिसर्चर अनीमा सोनकर ने इस ख़बर पर चुटकी लेते हुए ट्वीट किया, “ये तो अविश्वसनीय है. हम अपने यहां के हिन्दी अख़बारों में ऐसी ख़बरें पढ़ते थे. लेकिन इन्होंने तो…”

ब्रिटेन में रहने वाली गेस्टन कूपन ने ट्वीट किया है कि ये इस तरह की पहली घटना नहीं है. हाल ही में एक अमरीकी एयरलाइन में भी एक शख़्स ने ऐसा ही किया था.

वो इतनी भयंकर गैस पास कर रहे थे कि कई यात्रियों ने सिरदर्द और आँखों में जलन की शिक़ायत दर्ज कराई थी.

न्यूयॉर्क में रहने वाली पत्रकार गैबरियाला पैएला ने ट्वीट किया है, “ऐसे मामलों में घिरे सभी सह यात्रियों के प्रति मेरी पूरी सहानुभूति है.”

न्यूज़ीलैंड की जैसिक विलियम्स ने फ़ेसबुक पर लिखा है, “मेरा एक सवाल है… एयरलाइंस वाले सभी यात्रियों को तकिया देते हैं. वो हर सीट पर होता है. लेकिन इसके बावजूद ये यात्री इतनी आवाज़ कर रहा था कि सभी को पता चल जाए, तो सलाम है इन्हें.”

‘ये कोई नई बात नहीं’

कई लोगों ने फ़ेसबुक और ट्विटर पर लिखा है कि ये नेचुरल है. इसका मज़ाक बनाना ठीक नहीं. हालांकि लोगों की शिकायत पर ग़ौर करते हुए क्रू मेंबर्स को कुछ और हल निकालना चाहिए था.

कनाडा में रहने वाली और पेशे से प्रोफ़ेसर जेनेट मैकडॉनल्ड ने भी फ़ेसबुक पर अपना तजुर्बा शेयर किया है.

उन्होंने लिखा, “वैंकूवर से टोरंटो की एक फ़्लाइट में मैं भी ये झेल चुकी हूं. मैंने मुंह पर मफ़लर लपेट रखा था. हवा तेज़ की हुई थी. और सभी की हालत ख़राब थी. कई लोग तिरछी नज़रों से एक दूसरे को देख रहे थे. लेकिन ऐसे में क्या कहा जा सकता है.”

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Mission 2019 के लिए बनेगा सबसे बड़ा हथियार यूपी इंवेस्टर्स समिट

देश के सबसे बड़े सूबे के तौर पर उत्तर प्रदेश की पहचान होती है। एक कहावत भी है कि दिल्ली का रास्ता यूपी से होकर गुजरता है। लेकिन उत्तर प्रदेश को एक और नाम से जाना जाता है जिसे बीमारू कहते हैं। पीएम मोदी 2014 के चुनाव से पहले अपनी जनसभाओं में कहा करते थे कि एक ऐसा सूबा जो प्राकृतिक संसाधनों से लैस है,एक ऐसी धरती जहां के लोग कुछ कर गुजरने की माद्दा रखते हैं लेकिन नीतियों के अभाव में अदूरदर्शी निर्णयों की वजह से भारत मां का ये हिस्सा विकास की रेस में पिछड़ गया है। 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा का असाधारण प्रदर्शन रहा और इस बात की उम्मीद जगने लगी कि शायद अब कुछ बदलाव की बयार महसूस होगी। यूपी सरकार अपने कार्यकाल के एक साल पूरा करने से पहले दो दिवसीय इंवेस्टर्स समिट के जरिए ये संदेश देने की कोशिश कर रही है यूपी में अब निवेश सुरक्षित है और उस दिशा में सरकार एक कदम बढ़ती हुई दिखाई दे रही है।

इंवेस्टर्स समिट के पहले दिन 4 लाख 28 हजार करोड़ के एक हजार से ज्यादा करार पर दस्तखत हुए। इन करारों की सबसे बड़ी खासियत ये है कि देश का दूसरा डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर को बुंदेलखंड में स्थापित किया जाएगा जिससे ढ़ाई लाख से ज्यादा लोगों को रोजगार मिल सकेगा। लेकिन एक सवाल ये भी है कि क्या ये यूपी की सूरत और सीरत को बदलने की कवायद है या 2019 के लक्ष्य को साधने की कोशिश है। इस गूढ़ सवाल का जवाब तलाशने से पहले ये जानना जरूरी है कि पीएम मोदी इन्वेस्टर्स समिट में क्या कुछ कहा।

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सऊदी अरब और ईरान के बीच अगर युद्ध हुआ तो क्या होगा?

मंगलवार को सऊदी अरब की राजधानी रियाद पर एक मिसाइल दागी गई. इस मिसाइल के निशाने पर था सऊदी अरब का राजमहल. जहां पर सऊदी किंग सलमान बजट पेश करने वाले थे. मिसाइल अपने निशाने तक पहुंचती, उससे पहले ही इसे हवा में मार गिराया गया.

यूं तो ये मिसाइल सऊदी अरब के पड़ोसी देश यमन के बाग़ी हूथियों ने दागी थी, मगर सऊदी अरब को यक़ीन है कि इसका रिमोट यमन से दूर ईरान की राजधानी तेहरान में था. ईरान, जो कई दशकों से सऊदी अरब का सबसे बड़ा दुश्मन है.

सऊदी अरब समेत दुनिया के कई देश मानते हैं कि यमन के शिया हूथी विद्रोहियों की पुश्त पर ईरान का हाथ है. रियाद पर दागी गई ये मिसाइल, सऊदी अरब और ईरान के बीच क़रीब एक सदी से जारी तनातनी की सबसे ताज़ा मिसाल है. इस साल ये तीसरा मौक़ा था जब हूथी विद्रोहियों ने सऊदी अरब पर मिसाइल फेंकी थी.

 

अगर सऊदी अरब और ईरान के बीच युद्ध हुआ तो?इमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

सियासी और सामरिक ताक़त

इन दिनों पश्चिमी एशिया में हालात कुछ यूं हैं कि मानो सऊदी अरब और ईरान में जंग छिड़ने वाली हो. तो, अगर सऊदी अरब और ईरान के बीच युद्ध हुआ, तो क्या होगा?बीबीसी की रेडियो सिरीज़ द इंक्वॉयरी में इस सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश की गई है.

सऊदी अरब और ईरान पश्चिमी एशिया की दो बड़ी सियासी और सामरिक ताक़तें हैं. दोनों बड़े तेल उत्पादक देश हैं. अगर दोनों के बीच युद्ध हुआ, तो इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा. ब्रिटेन के माइकल नाइट अरब मामलों के जानकार हैं. वो ब्रिटिश सरकार के अरब मामलों के सलाहकार रहे थे.

नाइट बताते हैं, “ईरान, ऐतिहासिक रूप से बहुत असरदार देश रहा है. कई सदियों तक उसने अरब देशों पर राज किया. तब इसे पर्शिया के नाम से जाना जाता है. वहीं, सऊदी अरब और दूसरे अरब देशों ने पिछली एक सदी में तेल की वजह से काफ़ी तरक़्क़ी की है. इस दौरान ये अरब देश ताक़तवर बनकर उभरे हैं. इस वजह से ईरान का असर इन इलाक़ों पर कम होता गया है.”

 

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ताकि विरोधी पर दबदबा क़ायम कर सकें

माइकल नाइट कहते हैं, “सऊदी अरब और ईरान के बीच तनातनी की बड़ी वजह मज़हबी भी है. सऊदी अरब एक सुन्नी देश है. वहीं ईरान, इस्लाम के शिया फ़िरक़े को मानने वाला. दोनों ही देश, अपने धार्मिक साथियों को दूसरे देशों में भी बढ़ावा देते रहे हैं, ताकि विरोधी पर दबदबा क़ायम कर सकें. ये भी ईरान और सऊदी अरब के बीच कड़वाहट की बड़ी वजह है.”

पिछले कुछ सालों में ईरान, सऊदी अरब पर भारी पड़ता दिख रहा है. कई अरब देशों पर उसका दबदबा बढ़ रहा है. ईरान ने इराक़ में अपना असर बढ़ा लिया है. सीरिया और लेबनान में भी उसके प्यादे काफ़ी ताक़तवर हैं. वहीं, यमन में वो हूथी विद्रोहियों को हथियार और ट्रेनिंग मुहैया करा कर सऊदी अरब की नाक में दम किए हुए है.

माइकल नाइट का कहना है, “इसमें ईरानी फौज का इंक़लाबी दस्ता यानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स का बड़ा हाथ रहा है.” नाइट के मुताबिक़ रिवोल्यूशनरी गार्ड्स, ईरान का सबसे ताक़तवर हथियार हैं. इनका ख़ौफ़ अरब देशों पर तारी है. ये बेहद पेशेवर दस्ता है. जिसने कई मोर्चों पर अपनी ताक़त दिखाई है.

 

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Image captionरिवोल्यूशनरी गार्ड्स

शिया, सुन्नी और रिवोल्यूशनरी गार्ड्स

अरब देशों में शिया, रिवोल्यूशनरी गार्ड्स को अपनी फौज मानते हैं. वहीं सुन्नी अरब इससे डरते हैं.

माइकल नाइट के मुताबिक़, “सऊदी अरब और ईरान के बीच औपचारिक जंग भले न छिड़ी हो. मगर, दोनों ही देश कई मोर्चों पर लड़ रहे हैं. इसकी सबसे बड़ी मिसाल है यमन. जहां पर सऊदी अरब की अगुवाई में कई देशों की सेनाएं, हूथी विद्रोहियों से लड़ाई लड़ रही हैं. वहीं हूथियों को ईरान की सरपरस्ती हासिल है. सऊदी अरब, यमन पर लगातार हवाई हमले कर रहा है. मगर, वो निर्णायक जीत हासिल करने में नाकाम रहा है. सऊदी अरब की नज़र में उसकी जीत की राह में ईरान सबसे बड़ा रोड़ा है.”

यमन के अलावा, सीरिया में भी सऊदी अरब और ईरान, अलग-अलग गुटों के साथ हैं. ईरान, जहां राष्ट्रपति बशर अल असद का समर्थन कर रहा है. वहीं, सऊदी अरब, असद के ख़िलाफ़ बग़ावत करने वालों का साथ दे रहा है.

 

1980-88 ईरान इराक के बीच युद्ध के दौरान प्रदर्शित मिसाइलेंइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES
Image caption1980-88 ईरान इराक के बीच युद्ध के दौरान प्रदर्शित मिसाइलें

शीत युद्ध की स्थिति

लेबनान में ईरान समर्थित हिज़बुल्लाह गुट ताक़तवर है. वहीं सऊदी अरब भी वहां के सुन्नियों का साथ देता है. इराक़ में भी ईरान और सऊदी अरब के बीच दबदबा बढ़ाने की होड़ लगी है. इराक़ की सरकार ने इस्लामिक स्टेट पर जीत हासिल की, तो इसमें ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स का बड़ा हाथ माना जाता है.

इसी तरह, एक छोटे से मुल्क़ बहरीन में भी सऊदी अरब और ईरान आमने-सामने हैं. बहरीन एक शिया बहुल मुल्क़ है. मगर यहां का शेख़ सुन्नी है. सऊदी अरब यहां के राजा के साथ है. वहीं, ईरान, बहरीन में सरकार विरोधी शिया गुरिल्ला संगठनों के साथ है.

माइकल नाइट कहते हैं कि अभी सऊदी अरब और ईरान के बीच कई देशों में शीत युद्ध सा चल रहा है. लेकिन ये कभी भी असल जंग का रूप ले सकता है.

एंथनी कोडिसमन अमरीका और नैटो के अरब मामलों के सलाहकार रहे हैं. वो मानते हैं कि ईरान और सऊदी अरब के बीच जंग एक छोटी सी चिंगारी के तौर पर शुरू हो सकती है. जो आगे चलकर बड़ी जंग बन सकती है. एंथनी मानते हैं कि ये जंग लंबे वक़्त तक चल सकती है.

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सऊदी अरब के पास F-15, F-16 और ब्लैक टॉरनेडो

हालांकि एंथनी को लगता है कि ज़मीनी मोर्चे पर तो दोनों देशों की सेनाएं शायद ही आमने-सामने आएं. हां, हवाई जंग ज़रूर भयंकर हो सकती है. एंथनी के मुताबिक़, “हवाई ताक़त में सऊदी अरब फ़िलहाल ईरान पर भारी दिखता है.”

वो कहते हैं, “ईरान के पास सत्तर और अस्सी के दशक के लड़ाकू विमान हैं. ईरान ने इनका रख-रखाव बड़े अच्छे तरीक़े से कर रखा है. साथ ही ईरान ने रूस से भी कुछ लड़ाकू विमान अस्सी के दशक में ख़रीदे थे. यही विमान ईरान की एयरफ़ोर्स की प्रमुख ताक़त हैं.”

वहीं, सऊदी अरब की वायुसेना के पास अमरीकी लड़ाकू विमान जैसे F-15 और F-16 हैं. ब्लैक टॉरनेडो है. यानी हवाई मोर्चे पर सऊदी अरब ज़्यादा ताक़तवर दिखता है. हालांकि ईरान के पास, सऊदी अरब से ज़्यादा बेहतर मिसाइलें और ड्रोन हैं. ये सऊदी अरब के अहम शहरी ठिकानों को निशाना बना सकती हैं.

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Image captionब्लैक टॉरनेडो

इसराइल भी ईरान के ख़िलाफ़!

एंथनी कहते हैं कि जंग छिड़ी तो ईरान, सऊदी अरब के बुनियादी ढांचे को तबाह कर सकता है. ईरान की मिसाइलें, सऊदी अरब के पानी साफ़ करने के प्लांट और बिजलीघरों को निशाना बना सकता है. इससे सऊदी अरब बुरी तरह तबाह हो सकता है. सऊदी अरब के शहरों को पानी और बिजली की सप्लाई ठप हो जाएगी.

इसके बदले में सऊदी अरब अपने लड़ाकू विमानों से ईरान में बिजली सप्लाई करने वाले ठिकानों, पानी साफ़ करने वाले संयंत्रों पर हमला कर सकता है. इसके अलावा सऊदी अरब, ईरान के तेल के ठिकानों और रिफ़ाइनरी पर हवाई हमले कर सकता है.

एंथनी मानते हैं, “ईरान और सऊदी अरब की जंग बड़ी आर्थिक तबाही का बायस बन सकती है. वो इसकी तुलना शतरंज के त्रिकोणीय मुक़ाबले से करते हैं. सऊदी अरब के साथ जहां संयुक्त अरब अमीरात, मिस्र, ओमान, जॉर्डन, अमरीका, ब्रिटेन और फ्रांस खड़े नज़र आते हैं. वहीं ईरान के खेमे में सीरिया, रूस और इराक़ जैसे देश हैं.”

तेल सप्लाईइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

युद्ध हुआ तो तेल सप्लाई ठप

एंथनी मानते हैं कि जंग की सूरत में इसराइल भी ईरान के ख़िलाफ़ गठबंधन में शामिल हो सकता है. साफ़ है कि ईरान और सऊदी अरब के बीच युद्ध की सूरत में अमरीका और रूस जैसे देशों का रोल ज़्यादा बड़ा होगा. अमरीका फ़िलहाल सऊदी अरब के साथ खड़ा है.

मैरी कॉलिंस, अमरीका की जॉन हॉपकिंस इंस्टीट्यूट से जुड़ी हैं. उन्होंने कई बरस अमरीकी रक्षा मंत्रालय के साथ काम किया है.

मैरी मानती हैं कि ईरान और सऊदी अरब के बीच युद्ध में अमरीका यक़ीनी तौर पर दखल देगा. फारस की खाड़ी स्थित होर्मुज़ जलसंधि से दुनिया के तेल कारोबार का एक बड़ा हिस्सा गुज़रता है. युद्ध हुआ तो ये सप्लाई ठप हो सकती है. इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा.

आधुनिक लड़ाकू विमान

अमरीका क़तई नहीं चाहेगा कि दुनिया को तेल की सप्लाई पर असर पड़े. इसीलिए, ईरान और सऊदी अरब के बीच युद्ध की सूरत में अमरीका का शामिल होना तय है.

मैरी कॉलिंस कहती हैं कि होर्मुज़ में ईरान समुद्र में बारूदी सुरंगे बिछा सकता है. इससे उस इलाक़े से गुज़रने वाले जहाज़ तबाह होने का ख़तरा हो सकता है. ऐसी तबाही होने से रोकने के लिए अमरीका युद्ध होने के एक घंटे के भीतर शामिल हो जाएगा.

कॉलिंस कहती हैं कि खाड़ी देशों में अमरीका के 35 हज़ार से ज़्यादा सैनिक तैनात हैं. अमरीका वायुसेना के F-22 जैसे अति आधुनिक लड़ाकू विमान भी यहां पर तैनात हैं. एक बेड़ा हमेशा फ़ारस की खाड़ी में मौजूद रहता है.

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एक ही दिन में तबाही

कॉलिंस के मुताबिक़ ईरान और सऊदी अरब के युद्ध शुरू होने पर अमरीका सेनाएं फ़ौरन सक्रिय हो जाएंगी. और ये एक दिन में ईरान की पूरी की पूरी नौसेना को बर्बाद कर सकती हैं. वो नब्बे के दशक की एक मिसाल देती हैं. तब अमरीका का एक जहाज़ बारूदी सुरंग की वजह से तबाह हो गया था.

इसके बदले में एक दिन में ही अमरीका ने ईरान की पूरी नौसैनिक ताक़त को तबाह कर दिया था. अमरीकी दखल की वजह से ईरान और सऊदी अरब के बीच जंग कुछ दिनों में ही ख़त्म हो जाएगी. तो, क्या युद्ध के साथ ईरान और सऊदी अरब के बीच झगड़ा हमेशा के लिए ख़त्म हो जाएगा? क्या इस इलाक़े में शांति बहाल हो सकेगी?

ईरानी मूल के अली वाइज़ अमरीका में रहते हैं. वो इंटरनेशन क्राइसिस ग्रुप के लिए काम करते हैं. इस संगठन का काम जंग को रोकना है. अली वाइज़ का बचपन अस्सी के दशक के ईरान-इराक़ युद्ध के दौरान ईरान में गुज़रा था.

दुनिया की अर्थव्यवस्था

ली वाइज़ मानते हैं कि ईरान और सऊदी अरब के युद्ध से दोनों देशों की अर्थव्यवस्था तबाह हो जाएगी. क्योंकि ज़्यादा से ज़्यादा नुक़सान पहुंचाने के लिए दोनों ही देश एक-दूसरे के तेल के ठिकानों, रिफाइनरी, पानी सप्लाई करने वाले प्लांट और बिजली घरों को निशाना बनाएंगे.

युद्ध हुआ तो कच्चे तेल का उत्पादन ठप हो सकता है. इसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा. ईरान और सऊदी अरब के बीच कुछ दिनों की जंग भी हुई, तो तेल के दाम आसमान पर पहुंच जाएंगे. अली मानते हैं कि सऊदी अरब और ईरान के बीच युद्ध की वजह से पूरे इलाक़े में शियाओं और सुन्नियों के बीच तनातनी बढ़ जाएगी.

यानी, ईरान-सऊदी अरब के युद्ध को तो अमरीका अपने दखल से कुछ दिनों में ही ख़त्म कर देगा. मगर इसके बाद, पूरे पश्चिमी एशिया में ईरान और सऊदी अरब के बीच शीत युद्ध का नया दौर शुरू होगा. ताक़त बढ़ाने के नए मोर्चे खुलेंगे. इराक़, सीरिया, यमन जैसे झगड़े दूसरे देशों में पांव पसारेंगे.

अगर सऊदी अरब और ईरान के बीच युद्ध हुआ तो?इमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

दशकों तक महसूस किएजाएंगे ज़ख़्म

क्योंकि अमरीका के हमले से ईरान की सेनाएं तो तबाह हो जाएंगी. मगर ईरान, सऊदी अरब के सुन्नी साथी देशों का विरोध करने वालों को समर्थन बढ़ा देगा. जैसे कि इराक़ में शिया और सुन्नी हथियारबंद गुटों के बीच झगड़े बढ़ जाएंगे. लेबनान में हिज़्बुल्लाह और सऊदी समर्थित गुटों की भिड़ंत बढ़ जाएगी.

यही हालात सीरिया और जॉर्डन में दिख सकते हैं. अली वाइज़ बताते हैं कि ईरान और सऊदी अरब के बीच न तो कारोबारी रिश्ते हैं, न सामाजिक और सांस्कृतिक संबंध हैं. ऐसे में युद्ध के ज़ख़्म आने वाले कई दशक तक महसूस किए जाते रहेंगे. कुल मिलाकर ये कहें कि अगर सऊदी अरब और ईरान के बीच युद्ध हुआ, तो ये हवाई जंग होगी.

दोनों देशों के बीच नौसैनिक युद्ध भी होगा. अमरीका, सऊदी अरब की तरफ़ से दखल देकर ईरान को कुछ दिनों में ही हरा देगा. मगर, ईरान सऊदी अरब के लिए छोटी-छोटी जंगों के दूसरे मोर्चे खोल देगा. युद्ध के ज़ख़्म भरेंगे नहीं. बल्कि दोनों देशों के बीच तनातनी का असर दूसरे देश झेलेंगे. इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा.

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जानिए क्या है देश का सबसे बड़ा 2G स्पेक्ट्रम घोटाला

केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की पटियाला हाऊस स्थित विशेष अदालत ने आज 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन मामले में पूर्व दूरसंचार मंत्री ए.राजा और द्रमुक नेता कनिमोझी सहित सभी आरोपियों को बरी कर दिया।अदालत ने 2010 के इस मामले पर अपना निर्णय देते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष अपना मामला साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा। इस मामले में राजा एवं कई अन्य आरोपी थे। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट में 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले को 1,76,000 करोड़ रुपए का बताया गया था। हालांकि सीबीआई ने अपनी चार्जशीट में करीब 31,000 करोड़ रुपए के घोटाले का उल्लेख किया था। 2014 के आम चुनाव में 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन बड़ा मुद्दा बना था।

जानें कब क्या-क्या हुआ

मई 2007: ए राजा ने दूरसंचार मंत्री के रूप में प्रभार संभाला।
अगस्त 2007: दूरसंचार विभाग ने यूनिफाइड एक्सेस र्सिवसेस (यूएएस) लाइसेंसों के साथ 2 जी स्पेक्ट्रम के आवंटन की प्रक्रिया आरंभ की।
25 सितंबर, 2007: दूरसंचार मंत्रालय ने आवेदन के लिए एक अक्तूबर, 2007 की अंतिम तिथि तय करते हुए प्रेस नोट जारी किए।
1 अक्तूबर, 2007: दूरसंचार विभाग को 46 कंपनियों के 575 आवेदन मिले।
2 नवंबर, 2007: तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने निष्पक्ष लाइसेंस आवंटन एवं प्रविष्टि शुल्क की उचित समीक्षा सुनिश्चित करने के लिए राजा को पत्र लिखा।
22 नवंबर, 2007: वित्त मंत्रालय ने अपनाई गई प्रक्रिया के संबंध में चिंताएं व्यक्त करते हुए दूरसंचार विभाग को पत्र लिखा।

10 जनवरी, 2008: दूरसंचार विभाग ने ‘पहले आओ, पहले पाओ’ की तर्ज पर लाइसेंस जारी करने का निर्णय लिया। आवेदन की अंतिम तारीख निर्धारित तिथि से पहले कर 25 सितंबर तय की गई।

2009: केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) ने सीबीआई को 2 जी स्पेक्ट्रम के आवंटन में अनियमितताओं के आरोपों की जांच का आदेश दिया।
21 अक्तूबर, 2009: सीबीआई ने दूरसंचार विभाग के अज्ञात अधिकारियों, अज्ञात निजी व्यक्तियों/कंपनियों और अन्य के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की।

13 सितंबर, 2010: उच्चतम न्यायालय ने केंद्र और राजा से 2008 में टेलीकॉम लाइसेंस की मंजूरी में 70,000 करोड़ रुपए के घोटाले का आरोप लगाने वाली तीन याचिकाओं का 10 दिन में जवाब देने को कहा।
10 नवंबर, 2010: कैग ने 2जी स्पेक्ट्रम पर सरकार को रिपोर्ट सौंपी, राजस्व को 1.76 लाख करोड़ रुपए की हानि का दावा किया।
14, 15 नवंबर, 2010: राजा ने दूरसंचार मंत्री के पद से इस्तीफा दिया।

2 फरवरी, 2011: सीबीआई ने 2जी मामले में राजा को गिरफ्तार किया। पूर्व दूरसंचार सचिव सिद्धार्थ बेहुरा और राजा के पूर्व निजी सचिव रविंद्र कुमार चंदोलिया को भी गिरफ्तार किया गया।
8 फरवरी, 2011: स्वान टेलीकॉम प्राइवेट लिमिटेड के प्रमोटर शाहिद उस्मान बलवा को सीबीआई ने गिरफ्तार किया।
14 मार्च, 2011: दिल्ली उच्च न्यायालय ने विशेष रूप से 2जी मामलों के निपटान के लिए विशेष अदालत का गठन किया।
29 मार्च, 2011: उच्चतम न्यायालय ने सीबीआई को 31 मार्च के बजाए दो अप्रैल को आरोपपत्र दायर करने की अनुमति दी।
2 अप्रैल, 2011: सीबीआई ने पहला आरोपपत्र दायर किया। राजा, चंदोलिया और बेहुरा का नाम शामिल किया गया। रिलायंस एडीएजी ग्रुप के प्रबंध निदेशक गौतम दोशी, इसके वरिष्ठ उपाध्यक्ष हरि नायर, समूह के अध्यक्ष सुरेंद्र पिपारा, स्वान टेलीकॉम के प्रमोटर शाहिद उस्मान बलवा एवं विनोद गोयनका और यूनीटेक लिमिटेड के प्रबंध निदेशक संजय चंद्रा को आरोपी बनाया गया।  रिलायंस टेलीकॉम लिमिटेड, स्वान टेलीकॉम प्राइवेट लिमिटेड और यूनीटेक वायरलेस (तमिलनाडु) प्राइवेट लिमिटेड का नाम भी आरोप पत्र में शामिल किया गया।
25 अप्रैल, 2011: सीबीआई ने द्रमुक प्रमुख एम करुणानिधि की बेटी एवं सांसद कनिमोझी और चार अन्य का नाम भी दूसरे आरोप पत्र में शामिल किया।
23 अक्तूबर, 2011: सभी 17 आरोपियों के खिलाफ आरोप तय किए गए।
11 नवंबर, 2011: मामले की सुनवाई शुरू।
23 नवंबर, 2011: उच्चतम न्यायालय ने पांच आरोपियों हरि नायर, गौतम दोशी, सुरेंद्र पिपारा, संजय चंद्रा और विनोद गोयनका की जमानत मंजूर की।
28 नवंबर, 2011: दिल्ली उच्च न्यायालय ने कनीमोई, शरद कुमार, करीम मोरानी, आसिफ बलवा और राजीव अग्रवाल की जमानत मंजूर की।
29 नवंबर, 2011: विशेष अदालत ने शाहिद बलवा की जमानत मंजूर की।
1 दिसंबर, 2011: विशेष अदालत ने चंदोलिया की जमानत मंजूर की।
12 दिसंबर, 2011: सीबीआई ने तीसरा आरोपपत्र दायर किया। एस्सार ग्रुप के प्रमोटर रवि रुइया और अंशुमन रुइया, इसके निदेशक (रणनीति एवं योजना) विकास सर्राफ, लूप टेलीकॉम की प्रमोटर किरण खेतान और उनके पति आई पी खेतान का नाम शामिल किया गया।  लूप टेलीकॉम प्राइवेट लिमिटेड, लूप मोबाइल इंडिया लिमिटेड और एस्सार टेली होल्डिंग का नाम भी आरोपपत्र में शामिल किया गया।

2 फरवरी, 2012: उच्चतम न्यायालय ए राजा के कार्यकाल में मंजूर किए गए 122 लाइसेंस रद्द किए। चार महीनों में लाइसेंसों की नीलामी के निर्देश दिए।
4 फरवरी, 2012: विशेष अदालत ने 2जी मामले में पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम को सह आरोपी बनाने की स्वामी की याचिका खारिज की।
24 अगस्त, 2012: उच्चतम न्यायालय ने 2जी मामले में चिदंबरम के खिलाफ जांच की याचिका खारिज की और कहा कि प्रथमष्टया किसी सामग्री से यह पता नहीं चलता कि चिदंबरम को आर्थिक लाभ भी मिला।

25 अप्रैल, 2014: ईडी ने 2जी संबंधी धनशोधन मामले में राजा, कनिमोझी और अन्य के खिलाफ आरोपपत्र दायर किए।
31 अक्तूबर, 2014: धनशोधन मामले में आरोप तय किए गए।

5 दिसंबर, 2017: विशेष अदालत ने 2जी मामले में फैसला सुनाने के लिए 21 दिसंबर की तारीख तय की।
21 दिसंबर, 2017: विशेष अदालत ने सभी तीनों मामलों में राजा समेत सभी आरोपियों को बरी किया।

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बिटकॉइन ने किया अमिताभ बच्चन को मालामाल, 2 साल में कमाए 114 करोड़ रुपए

वर्चुअल करेंसी बिटकॉइन दुनियाभर में चर्चा का बिषय बनी हुई है। इस समय जिस तेजी से बिटकॉइन आगे बढ़ रही है हर कोई इसमें निवेश करने की सोच रहा है। बिटकॉइन से मुनाफा कमाने वालों में बॉलीबुड के महानायक अमिताभ बच्चन भी शामिल हो गए हैं। बच्चन परिवार ने बिटकॉइन में ढाई साल पहले लगभग 1.6 करोड़ रुपए का निवेश किया था, जिसका कुल मूल्य अब 110 करोड़ रुपए से अधिक हो चुका है।

ढाई साल पहले किया था निवेश
जानकारी के मुताबिक बच्चन परिवार ने साल 2015 में पर्सनल इनवेस्टमेंट के तहत मेरिडियन टेक पीटीई में 1.6 करोड़ रुपए का निवेश किया था। मेरिडियन टेक एक सिंगापुर की कंपनी है जिसकी प्राइम मुख्य संपत्ति ZIDDU.COM है, जिसने पिछले हफ्ते ही एक विदेशी कंपनी लॉन्गफिन कॉर्प ने खरीदा है। Ziddu अलग-अलग देशों में बिटकॉइन सहित अन्य वर्चुलअल करेंसी का इस्तेमाल करके माइक्रोफाइनेंस की सुविधा मुहैया कराती है। बच्चन परिवार ने मेरिडियन टेक में जो निवेश किया हुआ था उसके बदले में उनको लॉन्गफिन कॉर्प के करीब 250000 शेयर मिले हैं, सोमवार को इस शेयर की कीमत करीब 70 डॉलर के करीब थी यानि बच्चन परिवार के 2.5 लाख शेयरों की कीमत करीब 1.75 करोड़ रुपए बैठती है जिसे डॉलर और रुपए के मौजूदा एक्सचेंज रेट पर देखा जाए तो 114 करोड़ बनते हैं। यानि ढाई साल पहले 1.6 करोड़ रुपए का निवेश अब 114 करोड़ रुपए हो गया है।

क्‍या है बिटकॉइन
बिटकॉइन एक वर्चुअल करेंसी (क्रिप्टो करेंसी) जैसी है जिसे एक ऑनलाइन एक्सचेंज के माध्यम से कोई भी खरीद सकता है। इसकी खरीद-फरोख्त से फायदा लेने के अलावा भुगतान के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है। इसके जरिए बिना बैंक को माध्‍यम बनाए लेन-देन किया जा सकता है। हालांकि भारत में इस मुद्रा को न तो आधिकारिक अनुमति है और न ही इसे रेग्युलेट करने का कोई नियम बना है।