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दुर्लभ बीमारी का इलाज करवा रहे अभिनेता इरफान खान ने यह भावपूर्ण पत्र और कुछ खूबसूरत तस्वीरें साझा कीं। जरूर देखें!

जिंदगी कई बार ऐसे मोड़ पर ले आती है जब अनिश्चित ही निश्चित जान पड़ता है. मिजाज से योद्धा इरफ़ान की मानसिक अवस्था और अहसास को हम उनकी लिखी इन पंक्तियों में महसूस कर सकते हैं. हम उसे यहां अविकल रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं…

कुछ महीने पहले अचानक मुझे पता चला था कि मैं न्यूरोएन्डोक्राइन कैंसर से ग्रस्त हूं, मैंने पहली बार यह शब्द सुना था. खोजने पर मैंने पाया कि मेरे इस बीमारी पर बहुत ज्यादा शोध नहीं हुए हैं, क्योंकि यह एक दुर्लभ शारीरिक अवस्था का नाम है और इस वजह से इसके उपचार की अनिश्चितता ज्यादा है.

अभी तक अपने सफ़र में मैं तेज़-मंद गति से चलता चला जा रहा था. मेरे साथ मेरी योजनायें, आकांक्षाएं, सपने और मंजिलें थीं. मैं इनमें लीन बढ़ा जा रहा था कि अचानक टीसी ने पीठ पर टैप किया, “आप का स्टेशन आ रहा है, प्लीज उतर जाएं.’

मेरी समझ में नहीं आया, “ना ना मेरा स्टेशन अभी नहीं आया है.’

जवाब मिला, ‘अगले किसी भी स्टाप पर आपको उतरना होगा, आपका गन्तव्य आ गया.

अचानक एहसास होता है कि आप किसी ढक्कन (कॉर्क) की तरह अनजान सागर में, अप्रत्याशित लहरों पर बह रहे हैं… लहरों को क़ाबू कर लेने की ग़लतफ़हमी लिए.

इस हड़बोंग, सहम और डर में घबरा कर मैं अपने बेटे से कहता हूं, “आज की इस हालत में मैं केवल इतना ही चाहता हूं… मैं इस मानसिक स्थिति को हड़बड़ाहट, डर, बदहवासी की हालत में नहीं जीना चाहता. मुझे किसी भी सूरत में मेरे पैर चाहिए, जिन पर खड़ा होकर अपनी हालत को तटस्थ हो कर जी पाऊं. मैं खड़ा होना चाहता हूं.”

ऐसी मेरी मंशा थी, मेरा इरादा था…

कुछ हफ़्तों के बाद मैं एक अस्पताल में भर्ती हो गया. बेइंतहा दर्द हो रहा है. यह तो मालूम था कि दर्द होगा, लेकिन ऐसा दर्द… अब दर्द की तीव्रता समझ में आ रही है. कुछ भी काम नहीं कर रहा है. ना कोई सांत्वना, ना कोई दिलासा. पूरी कायनात उस दर्द के पल में सिमट आई थी. दर्द खुदा से भी बड़ा और विशाल महसूस हुआ.

मैं जिस अस्पताल में भर्ती हूं, उसमें बालकनी भी है. बाहर का नज़ारा दिखता है. कोमा वार्ड ठीक मेरे ऊपर है. सड़क की एक तरफ मेरा अस्पताल है और दूसरी तरफ लॉर्ड्स स्टेडियम है… वहां विवियन रिचर्ड्स का मुस्कुराता पोस्टर है. मेरे बचपन के ख्वाबों का मक्का, उसे देखने पर पहली नज़र में मुझे कोई एहसास ही नहीं हुआ. मानो वह दुनिया कभी मेरी थी ही नहीं.

मैं दर्द की गिरफ्त में हूं.

और फिर एक दिन यह अहसास हुआ… जैसे मैं किसी ऐसी चीज का हिस्सा नहीं हूं, जो निश्चित होने का दावा करे. ना अस्पताल और ना स्टेडियम. मेरे अंदर जो शेष था, वह वास्तव में कायनात की असीम शक्ति और बुद्धि का प्रभाव था. मेरे अस्पताल का वहां होना था. मन ने कहा. केवल अनिश्चितता ही निश्चित है.

इस अहसास ने मुझे समर्पण और भरोसे के लिए तैयार किया. अब चाहे जो भी नतीजा हो, यह चाहे जहां ले जाये, आज से आठ महीनों के बाद, या आज से चार महीनों के बाद या फिर दो साल. चिंता दरकिनार हुई और फिर विलीन होने लगी और फिर मेरे दिमाग से जीने-मरने का हिसाब निकल गया.

पहली बार मुझे शब्द ‘आज़ादी‘ का एहसास हुआ, सही अर्थ में! एक उपलब्धि का अहसास.

इस कायनात की करनी में मेरा विश्वास ही पूर्ण सत्य बन गया. उसके बाद लगा कि वह विश्वास मेरी एक एक कोशिका में पैठ गया. वक़्त ही बताएगा कि वह ठहरता है या नहीं. फ़िलहाल मैं यही महसूस कर रहा हूं.

इस सफ़र में सारी दुनिया के लोग… सभी मेरे सेहतमंद होने की दुआ कर रहे हैं, प्रार्थना कर रहे हैं, मैं जिन्हें जानता हूं और जिन्हें नहीं जानता, वे सभी अलग-अलग जगहों और टाइम जोन से मेरे लिए प्रार्थना कर रहे हैं. मुझे लगता है कि उनकी प्रार्थनाएं मिल कर एक हो गयी हैं, एक बड़ी शक्ति. तीव्र जीवन धारा बन कर मेरे स्पाइन से मुझमें प्रवेश कर सिर के ऊपर कपाल से अंकुरित हो रही हैं.

अंकुरित होकर यह कभी कली, कभी पत्ती, कभी टहनी और कभी शाखा बन जाती है. मैं खुश होकर इन्हें देखता हूं. लोगों की सामूहिक प्रार्थना से उपजी हर टहनी, हर पत्ती, हर फूल मुझे एक नई दुनिया दिखाती हैं. अहसास होता है कि ज़रूरी नहीं कि लहरों पर ढक्कन (कॉर्क) का नियंत्रण हो.

जैसे आप क़ुदरत के पालने में झूल रहे हों!

इरफान ने इस पत्र के साथ कुछ तस्वीरें भी साझा की हैं:

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दशहरा 2017 पीएम नरेंद्र मोदी ने किया रावण दहन

दशहरा समारोह में पीएम मोदी, राष्ट्रपति कोविंद, पूर्व पीएम मनमोहन सिंह और उपराष्ट्रपति वेंकैय्या नायडू शामिल हुए

पूरे देश में बुराई में अच्छाई की विजय का त्यौहार दशहरा पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है. इसी कड़ी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी में दिल्ली स्थित लालकिला मैदान में रावण दहन के लिए पहुंच चुके हैं. उनके साथ राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, उपराष्ट्रपति वेंकैय्या नायडू और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह हैं. इस पूरे आयोजन का सीधा प्रसारण इस लेख में दिए गए वीडियो लिंक के जरिए देख सकते हैं.

लालकिला में रावण दहन से पहले पीएम मोदी ने अपने संबोधन में कहा कि देश में उत्सव एक सामाजिक शिक्षा का प्रयास है. हमारे सभी त्यौहारों का उद्देश्य समाज में आपसी सौहार्द को बढ़ाना है. उन्होंने कहा कि हमारे उत्सव खेल खलिहान, इतिहास और सामाजिक सरोकारों से जुड़े हुए हैं. आज विजयादशमी के पर्व पर रावण दहन की परंपरा है. लेकिन एक नागरिक के नाते समाजिक जीवन में रावणीय प्रवृत्ति से निजात पानी होती है. ऐसे उत्सव सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं होनी चाहिए.

उन्होंने कि श्रीराम के अंदर लोकसंग्रह की कितनी बड़ी शक्ति रही होगी कि उनके साथ सब जुड़ते चले गए. आज विजयादशमी के पर्व पर हम संकल्प करें कि 2022 तक देश को सकारात्मक योगदान दें.

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने भी सभी देशवासियों को अपनी हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं दी. उन्होंने कहा कि यह नैतिकता की विजय का पर्व है. प्रभु श्रीराम के आदर्श सभी कामयाब होंगे जब हम उनके आदर्शों को अपने आचरण में ढालने का भी प्रयास करें. उन्होंने भगवान राम के जीवन का एक प्रेरक प्रसंग भी सुनाया. उन्होंने कहा कि जब रामेसतु का निर्माण हुआ तो उसमें गिलहियों तक ने अपना योगदान दिया था. हमें भी राष्ट्र निर्माण की दिशा में छोटे-छोटे ही सही लेकिन प्रयास करते रहने चाहिए.

Source: India.com

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लाजवाब है ‘न्यूटन’ की कहानी, जा रही है ऑस्कर

फिल्म का नाम: न्यूटन

डायरेक्टर: अमित मसूरकर

स्टार कास्ट: राजकुमार राव, पंकज त्रिपाठी, संजय मिश्रा, अंजलि पाटिल, रघुबीर यादव

अवधि: 1 घंटा 46 मिनट

सर्टिफिकेट: U/A

रेटिंग: 4 स्टार

डायरेक्टर अमित मसूरकर ने सुलेमानी कीड़ा नामक फिल्म बनायी थी जिसकी क्रिटिक ने काफी तारीफ की थी. उसके बाद अब एक बार फिर से अमित मसूरकर ने भारत के चुनाव सिस्टम पर आधारित विषय पर अपना पक्ष रखते हुए ‘न्यूटन’ फिल्म की है. फिल्म में मंझे हुए कलाकारों की कास्टिंग भी हुए है.

कहानी

यह कहानी नूतन कुमार (राजकुमार राव) की है जिसने अपने लड़कियों वाले नाम को दसवीं के बोर्ड में ‘न्यूटन’ लिख कर बदल लिया है. अब सभी लोग उसे न्यूटन के नाम से ही जानते हैं. न्यूटन ने फिजिक्स में एमएससी की पढ़ाई की है. आगामी इलेक्शन में ड्यूटी लगती है जिसके लिए उसे जंगल के नक्सल प्रभावित इलाके में जाकर वोटिंग करवानी पड़ती है. इलेक्शन की तैयारी के लिए न्यूटन की हेल्प संजय मिश्रा करते हैं उसके बाद एक टीम जिसमें लोकनाथ (रघुबीर यादव), मालको (अंजलि पाटिल), पुलिस अफसर आत्मा सिंह (पंकज त्रिपाठी) जंगली इलाके की तरफ बढ़ती है जहां जाने पर पता चलता है की कुल मिलाकर वहां के 76 वोटर्स की चर्चा है लेकिन वोट वाले दिन कोई नहीं आता. कुछ वक्त के बाद चीजें बदलती हैं और अंततः एक ख़ास तरह का रिजल्ट सामने आता है जिसे जानने के लिए आपको फिल्म देखनी पड़ेगी.

क्यों देख सकते हैं फिल्म

– फिल्म का डायरेक्शन लोकेशन सिनेमेटोग्राफी बहुत बढ़िया है.

– फिल्म की कहानी और डायलॉग्स बहुत ही कमाल के हैं और गंभीर मुद्दे पर आधारित इस कहानी के संवाद के लिए मयंक तिवारी की जितनी भी तारीफ की जाए कम है. बहुत ही जबरदस्त तरीके से इलेक्शन वोटिंग जैसे गंभीर मुद्दे को मनोरंजन से भरपूर डायलॉग्स के साथ परोसा गया है.

– इलेक्शन के दौरान तरह-तरह के चुनाव चिन्हों के साथ ही उम्मीदवारों के बारे में भी अलग तरह से बताया किया गया है जिसे देखकर हंसी आती हैं.

– फिल्म में राजकुमार राव ने एक बार फिर से अपनी उम्दा एक्टिंग से बता दिया है कि वो एक बेहतरीन कलाकर हैं, वहीँ उनके अपोजिट अलग तरह के पुलिस अफसर के रोल में पंकज त्रिपाठी ने बेहतरीन एक्टिंग की है. राजकुमार राव के साथ उनकी कैमि‍स्ट्री बहुत उम्दा है. वहीँ रघुबीर यादव ने भी मनोरंजन में कोई कमी नहीं छोड़ी है. अभिनेत्री अंजलि पाटिल का काम भी काफी सहज है और संजय मिश्रा की मौजूदगी आपके चेहरे पर मुस्कान जरूर लाती है.

कमजोर कड़ियां

इक्का दुक्का बातों को छोड़ दें तो फिल्म में ऐसी कोई बात नहीं है जो इसे कमजोर बनाती हो, हां इसमें आपको आइटम नंबर जैसी बातें नहीं मिलेगी और एक अलग तरह का क्लाइमेक्स देखने को मिलता है.

बॉक्स ऑफिस

प्रोडक्शन कॉस्ट और प्रोमोशन को मिलकर फिल्म का बजट लगभग 8-10 करोड़ बताया जा रहा है और फिल्म के लिए वर्ड ऑफ माउथ बहुत ही अहम रोल प्ले करेगा. फिल्म को 350 से ज्यादा स्क्रीन्स में रिलीज किया जाने वाला है.