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तीन दोस्तों द्वारा शुरू की गयी ऑनलाइन फ़ूड डिलीवरी कंपनी को मिला 1 अरब डॉलर का निवेश। जानें कैसे मिली इन्हें सफलता!

देश की सबसे बड़ी फ़ूड डिलीवरी कंपनी स्विगी को हाल ही में 1 अरब डॉलर का निवेश मिला है। इस निवेश में 66 करोड़ डॉलर साउथ अफ्रीका की कंपनी नैस्पर ने किया जबकि बाकी निवेश टेनसेंट & हेज फंड्स और कैपिटल & वेलिंगटन मैनेजमेंट ने किया है। इस नई फंडिंग के समय पांच साल पुरानी स्विगी की कीमत 3.3 अरब डॉलर लगाई गई। इसके साथ ही अब स्विगी भारतीय कंपनियों में वैल्यूएशन के हिसाब से छठे नंबर की स्टार्टअप कंपनी बन गयी है।

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Swiggy को तीन दोस्तों ने मिलकर 5 साल पहले शुरू किया था। इस तिकड़ी में राहुल जैमिनी IIT खड़कपुर से, श्रीहर्ष IIT कलकत्ता से जबकि नंदन रेड्डी बिट्स से स्नातक हैं। 5 डिलीवरी बॉयज़ से शुरू हुई स्विगी में अब 1.2 लाख डिलीवरी पार्टनर्स हैं और 42 शहरों के 50 हजार से ज्यादा रेस्ट्रोंस स्विगी के साथ जुड़ चुके हैं।

फ़ूड डिलीवरी मार्केट में स्विगी ने जोमाटो से जंग जीत ली है। गुरुग्राम की जोमाटो को इस साल दो फंडिंग राउंड्स में 41 करोड़ डॉलर की फंडिंग मिली है जबकि स्विगी ने इस साल तीन फंडिंग राउंड्स में 1.31 अरब डॉलर की फंडिंग हासिल की है।

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Swiggy में प्रारम्भ में निवेश करने वाली एस्सेल पार्टनर्स, सैफ पार्टनर्स, बेसेमर वेंचर पार्टनर्स और नॉर्वेस्ट वेंचर्स ने इस राउंड में अपनी होल्डिंग्स करीब 20 करोड़ डॉलर में बेची है जबकि किसी भी कंपनी ने अपना पूरा हिस्सा नहीं बेचा है। एवेंडस कैपिटल इस राउंड की फाइनेंशल एडवाइजर रही।

इस फंडिंग के बाद स्विगी ने बताया की ताजा फंडिंग से वो अपने डिलीवरी ओन्ली किचेंस का विस्तार करेंगे, टीम को और मजबूती देंगे। इसके साथ ही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर आधारित नेक्स्ट जेनेरेशन प्लेटफॉर्म बनाया जायेगा।

आपको बता दें स्विगी फिलहाल हर महीने 2.5 करोड़ से ज्यादा ऑर्डर पूरे कर रही है जबकि जोमाटो ने अक्टूबर में 2.1 करोड़ ऑर्डर पूरा करने का दावा किया था।

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दीवार के पीछे की हमारी हलचल को पकड़ सकता है एम आई टी का नया एआइ सिस्टम

शोधकर्ताओं ने लोगों की सामान्य गतिविधियों, जैसे टहलने, बातचीत करने, बैठने, दरवाजा खोलने या लिफ्ट का इंतजार करने की हजारों फोटो एकत्र कीं। फिर इन तस्वीरों को कैमरे से निकालकर उनके स्टिक फिगर्स (एक तरह के रेखा-चित्र) प्राप्त किए गए। संबंधित रेडियो सिग्नल के साथ इन्हें न्यूरल नेटवर्क से जोड़ा गया। इस संयोजन के साथ सिस्टम रेडियो सिग्नल और स्टिक फिगर्स के बीच संबंध को समझ गया। ट्रेनिंग के बाद आरएफ-पोज इतना समर्थ हो गया कि वह कैमरे के बिना केवल वायरलेस रिफ्लेक्शन के आधार पर लोगों के मूवमेंट को नोट करने लगा।

निगरानी में मिलेगी मदद

वैज्ञानिकों के मुताबिक, सिस्टम सही तरह से काम करे तो बुजुर्गों की बेहतर निगरानी में मदद मिलेगी और उन्हें गिरने, चोट लगने और एक्टिविटी पैटर्न में बदलाव जैसी चीजों से बचाया जा सकेगा। शोधकर्ताओं की टीम मौजूदा समय में डॉक्टरों के साथ मिलकर हेल्थकेयर में इसके ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल को लेकर काम कर रही है।

सेंसर पहनने व डिवाइस चार्ज करने की जरूरत नहीं

एमआइटी के वैज्ञानिक दीना कताबी कहते हैं, हमने देखा है कि अक्सर लोगों को तेज चलते और सामान्य कामकाज करते हुए देखने के आधार पर ही डॉक्टर मर्ज को समझते हैं और इलाज की दिशा तय करते हैं। यहीं से हमें इसे तैयार करने का विचार आया। हमने इसी का एक जरिया उपलब्ध कराने की कोशिश की है। अब तक यह व्यवस्था नहीं थी।

शोधकर्ता के अनुसार, हमारी पहल की एक खासियत यह है कि इसमें मरीज को न तो कोई सेंसर पहनना पड़ता है और न ही अपनी डिवाइस को चार्ज करने की चिंता करनी पड़ती है। हेल्थकेयर के अलावा नया सिस्टम यानी आरएफ-पोज ऐसे वीडियो गेमों के लिए भी उपयोगी साबित हो सकता है, जिनमें खिलाड़ियों का मूवमेंट होता है।