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अविराम गौसेवा के लिए जर्मन मूल की मथुरा निवासी अम्मा जी को पद्मश्री। जानें गौसेवा से जुड़ी यह अनोखी दास्तां!

42 वर्षों से मथुरा में गोसेवा कर रही जर्मन मूल की सुदेवी गोवर्धन “अम्मा जी” को पद्मश्री मिलने पर बहुत बहुत बधाई।

पाँच बीघा के क्षेत्र में फैले सुरभि गौशाला का संचालन कर रही सुदेवी ने 1,500 से भी अधिक गायों को पाल रखा है, जिनकी वह लगातार देखभाल करती हैं। इन गायों में से अधिकतर बीमार, नेत्रहीन या अपाहिज हैं। इनमें से 52 गायें नेत्रहीन है जबकि 350 पैरों से अपाहिज है। उनके पैरों की नियमित मरहम-पट्टी की जाती है।

जर्मन महिला फ्रेड्रिन इरिन ब्रूनिंग उर्फ़ ‘सुदेवी दासी गोवर्धन’ को केंद्र सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित किया है। सुदेवी राधाकुंड धाम में विगत 42 वर्षों से गौसेवा कर रहीं हैं। बीमार और असहाय गायों की सेवा करने के कारण उन्हें ‘गायों की मदर टेरेसा’ भी कहा जाता है। उन्हें पद्म सम्मान मिलने का समाचार पाकर स्थानीय निवासी भी ख़ुश हुए और गौशाला पहुँच कर उन्होंने सुदेवी को माला पहनाकर सम्मानित किया। उन्हें शनिवार (मार्च 16, 2019) को राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद के हाथों पद्म श्री से सम्मानित किया गया।

सुदेवी के अनुसार, जब मंत्रालय द्वारा उन्हें पुरस्कार मिलने की जानकारी दी गई, तब उन्हें समझ नहीं आया कि क्या हो रहा है। फिर स्थानीय निवासियों ने उन्हें इस से अवगत कराया। ये तब की बात है, जब सरकार ने उन्हें पद्मश्री देने की घोषणा की थी।

अपने माता-पिता की इकलौती संतान फ्रेड्रिन 42 वर्ष पहले भारत भ्रमण पर आई थी। इस दौरान उन्होंने ब्रज आकर श्रीकृष्ण के भी दर्शन किए। कृष्ण-भक्ति ने उन्हें अपनी तरफ ऐसा खींचा कि उन्होंने भारत में रहने की ठान ली। ब्रज में उन्होंने एक गाय भी पाल रखी थी, जिसके बीमार होने के बाद उन्होंने उसकी काफ़ी देखभाल की। इसके बाद वह जहाँ भी बीमार गाय देखती, उसकी देखभाल और सेवा में लग जाती। इसके बाद तो जैसे उन्होंने गोसेवा को ही अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। उन्होंने अपना पूरा जीवन ही गोसेवा को समर्पित कर दिया।

सुदेवी के पिता तीस वर्ष पहले तक दिल्ली स्थित जर्मन दूतावास में कार्यरत थे। इकलौती संतान होने के कारण उन्होंने पिता से मिलने वाली सारी धनराशि को गोसेवा में ही ख़र्च किया। उनकी गौशाला में गायों के लिए एक स्पेशल एम्बुलेंस भी है। अगर किसी गाय की मृत्यु निकट आ जाए और उसके बचने की कोई संभावना न रहे, तब सुदेवी उसे गंगाजल का सेवन कराती है। मरणोपरांत गायों के शरीर का अंतिम संस्कार भी पूरे विधि-विधान के साथ संपन्न किया जाता है।

सुदेवी बताती हैं कि गायों की सेवा में हर महीने ₹35 लाख तक ख़र्च होते हैं। गायों का इलाज डॉक्टरों द्वारा करवाया जाता है। सुदेवी दानदाताओं और जर्मनी से आने वाले रुपयों की मदद से इस गौशाला का संचालन कर रहीं हैं। सुरभि गौशाला में 70 से 80 कर्मचारी कार्यरत हैं। किराए की भूमि पर गौशाला चला रहीं सुदेवी को उम्मीद है कि उन्हें इस पुरस्कार के मिलने के बाद गौशाला के लिए भूमि उपलब्ध कराई जाएगी। साथ ही, उन्होंने इस बात की भी उम्मीद जताई कि अब गोसेवा के रास्ते में आने वाली अड़चनें दूर होंगी।

सुदेवी ने बताया कि अगर गौशाला के लिए उन्हें भूमि मिल जाती है तो मासिक किराए में ख़र्च हो रहे रुपयों की बचत होगी और उसका उपयोग गौसेवा में किया जाएगा। हाल ही में जब उनके वीजा की अवधि समाप्त हो गई थी तब उन्होंने मथुरा की सांसद हेमा मालिनी से लेकर विदेश मंत्री सुषमा स्वराज तक के दरवाज़े खटखटाए थे। इसके बाद उन्हें वीजा मिल गया था। सुदेवी अविवाहित हैं और अभी भी एक झोपड़ी में ही रहती हैं। स्थानीय निवासियों ने उन्हें भारतीय नागरिकता देने की भी माँग की है। उनके अतुलनीय सेवा कार्य के लिए हम सदा आभारी रहेंगे।

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रघुराम राजन को नहीं मिला अर्थशास्‍त्र का नोबेल: अमेरिकी अर्थशास्‍त्री रिचर्ड थैलर को चुना गया है

अर्थशास्त्र के नोबेल पुरस्कार के लिए अमेरिकी अर्थशास्‍त्री रिचर्ड थैलर को चुना गया है. 2017 के लिए चुने गए इस पुरस्‍कार की रेस में आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन भी शामिल थे. लेकिन उन्‍हें पुरस्‍कार नहीं मिला.थैलर शिकागो में व्यवहारिक विज्ञान के प्रोफेसर हैं.

अर्थशास्‍त्र-मनोविज्ञान के बीच की दूरी कम की
अवॉर्ड की घोषणा करते हुए रॉयल स्‍वीडिश अकेडमी ऑफ साइंसेज ने कहा है कि थैलर के योगदान ने एक व्यक्ति के फैसले लेने के मामले में आर्थिक और मनोवैज्ञानिक दूरी के बीच पुल का काम किया है. उनके काम ने इकोनॉमिक्‍स और साइकोलॉजी के बीच के गैप को कम किया है. इनाम के तौर पर 90 लाख स्वीडिश क्रोनर (करीब 7.25 करोड़ रुपए) दिए जाएंगे.

नोबेल ज्यूरी के मुताबिक, थैलर ने लिमिटेड रेशनलिटी, सोशल प्रेफरेंसेज और खुद पर कंट्रोल में कमी के बीच संबंध स्‍थापित करने का काम किया है. उन्‍होंने स्‍थापित किया है कि ये तीनों चीजें व्यक्तिगत आर्थिक फैसलों के साथ ही बाजार के फैसलों को भी प्रभावित करती हैं.


कौन हैं थैलर 
थैलर यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो के बूथ स्कूल ऑफ बिजनेस में बिहेवियरल साइंस और इकोनॉमिक्स के प्रोफेसर हैं. वे 2008 में आई पुस्‍तक Nudge के सह-लेखक हैं. थैलर ने यह पुस्‍तक कैस आर.संस्टीन के साथ लिखी थी. इसमें बताया गया था कि बिहेवियरल इकोनॉमिक्स के जरिए सोसाइटी की कई समस्‍याओं को हल किया जा सकता है.

राजन भी थे रेस में
आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन इकोनॉमिक्‍स के नोबेल पुरस्‍कार की रेस में थे. लिस्‍ट तैयार करने वाली रिसर्च कंपनी क्‍लैरिवेट एनालिटिक्‍स के अनुसार, कॉरपोरेट फाइनेंस से जु़ड़े निर्णयों के दायरे को बढ़ाने में अनोखे योगदान के लिए राजन के नाम पर विचार किया जा रहा था. राजन इस समय यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो के बूथ स्‍कूल ऑफ बिजनेस में कैथरीन डूसक मिलर डिस्टिंग्‍यूज्‍ड सर्विस प्रोफेसर हैं. इससे पहले 1998 में भारत के अमर्त्य सेन को वेलफेयर इकोनॉमिक्स के लिए अर्थशास्‍त्र का नोबेल पुरस्कार दिया गया था.

1968 में शुरू हुआ अर्थशास्‍त्र में नोबेल
अर्थशास्‍त्र में नोबेल पुरस्‍कार 1968 में शुरू हुआ. यह 1895 में अल्‍फ्रेड नोबेल द्वारा शुरू किए गए मूल पुरस्‍कारों में शामिल नहीं था.

अमेरिका का दबदबा है इकोनॉमिक्‍स के नोबेल में
इकोनॉमिक्‍स के नोबेल में अमेरिका का दबदबा रहा है. अभी तक जितने लोगों को अर्थशास्‍त्र का नोबेल पुरस्‍कार मिला है, उनमें लगभग आधे अमेरिकी ही हैं. 2000 और 2013 के बीच तो हर साल या तो अमेरिकी जीते, या फिर उन्‍होंने किसी और के साथ इसे शेयर किया.

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जाक दुबोशे, जोआखिम फ्रैंक और रिचर्ड हेंडर्सन को रसायन का नोबेल

सूक्ष्म और ठंड से जमे हुए अणुओं की तस्वीर उतारने के लिए एक आसान और बेहतर पद्धति क्रायो- इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कॉपी विकसित करने को लेकर तीन वैज्ञानिकों जेक्स डबशेट, जोशीम फ्रैंक और रिचर्ड हेंडरसन को रसायन विज्ञान के नोबेल पुरस्कार के लिए चुना गया है। इन वैज्ञानिकों की टीम की नई पद्धति से शोधकर्ता अब नियमित रूप से बायॉ-मोलेक्युल का त्रिआयामी (3डी) ढांचा बना सकते हैं।

बायॉ – मोलेक्युल जीवों के संभरण और उपापचय प्रक्रिया में शामिल होता है। इस पद्धति में कोशिकाओं के हिस्सों की तस्वीर उतारने के लिए इलेक्ट्रॉन बीम इस्तेमाल की गई। नोबेल कमेटी ने कहा कि शोधकर्ता अब बीच में ही बायॉ-मोलेक्युल को जमा सकते हैं और प्रक्रिया को दृश्य रूप दे सकते हैं जो वे पहले कभी नहीं कर सकते थे। यह चीज जीवन को समझने और दवाइयों के विकास के लिए महत्वपूर्ण है।

यह पद्धति बायो-मोलेक्युल को प्राकृतिक अवस्था में जमी हुई अवस्था (ठंड से) में रखने में मदद करेगा। कोशिका के ढांचों, विषाणुओं और प्रोटीन के सूक्ष्मतम ब्योरे का अध्ययन करने में इसका इस्तेमाल किया गया। कमेटी ने कहा कि शोधकर्ताओं को जब संदेह हुआ कि जीका विषाणु ब्राजील में नवजात शिशुओं के मस्तिष्क को नुकसान पहुंचा कर महामारी फैला रहा है तब उन्होंने विषाणु को चित्रात्मक रूप देने के लिए क्रायो इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी का रुख किया। पुरस्कार के तौर पर 11 लाख डॉलर दिया जाएगा।

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आपकी बॉडी क्लॉक की गुत्थी सुलझाने वालों को मिला नोबेल

चिकित्सा के क्षेत्र में इस साल तीन वैज्ञानिकों जेफ्री सी हॉल, माइकल रोसबाश और माइकल डब्ल्यू यंग को नोबल पुरस्कार देने की घोषणा की गई है. इन तीनों ने एक ऐसे मैकेनिज्म को खोजा है जो हमारे भीतर सर्काडियन रिदम यानी बायोलॉजिकल क्लॉक को चलाता है.

यह बायोलॉजिकल क्लॉक है क्या?
दरअसल, धरती पर जितनी भी ज़िंदा चीज़ें हैं, जैसे पेड़-पौधे, इंसान, जानवर और जीवाणु उनके अंदर एक घड़ी या बायोलॉजिकल रिदम होती है. हम सब इसी घड़ी के हिसाब से चलते हैं. इसी की वजह से चमगादड़ रात में जागते हैं और मनुष्य सोते हैं. इसी घड़ी के चलते मनुष्य सुबह जागता है और रात में सो जाता है.

ये रिदम हम सबको इस ग्रह पर दिन-रात और इसी तरह के बाकी प्राकृतिक चक्रों के साथ सामंजस्य स्थापित करने में मदद करते हैं. इसे आम बोलचाल की भाषा में बायोलॉजिक क्लॉक कहा जाता है. यह बायोलॉजिक क्लॉक हमारे खाने-पीने की आदतों, हॉर्मोन के स्तर, ब्लड प्रेशर और शरीर के तापमान को नियमित रखने में भी मदद करता है.


जगह बदले या हमारे खाने-पीने सोने का वक़्त, सब कुछ इसी बायोलॉजिकल क्लॉक से जुड़ा है. इन बदलावों के कारण हमारा बायोलॉजिकल क्लॉक बाहरी वातावरण से तालमेल नहीं बिठा पाता.

जीन का पता लगाया
नोबेल कमेटी के मुताबिक जेफ्री सी हॉल, माइकल रोसबाश और माइकल डब्ल्यू यंग की खोजों में बताया गया है कि पौधे, जानवर और इंसान किस प्रकार अपनी बायोलॉजिकल क्लॉक के हिसाब से खुद को ढालते हैं.

इस तरह वे पृथ्वी की परिक्रमा के अनुसार खुद में बदलाव कर पाते हैं. ये तीनों वैज्ञानिक बायोलॉजिकल क्लॉक का पता लगाने और इसके काम करने के तरीके को स्पष्ट करने में सफल रहे हैं. इसके लिए इन वैज्ञानिकों ने उस जीन को अलग करने का काम किया जो रोजमर्रा की जैविक स्थिति को नियंत्रित करते हैं.

नोबेल टीम ने कहा कि वैज्ञानिकों ने दिखाया है कि यह जीन उस प्रोटीन को परिवर्तित करने का काम करता है, जो रात के समय कोशिका में जम जाती है और दिन के समय अलग हो जाती है. ये तीनों वैज्ञानिक करीब 11 लाख डॉलर की पुरस्कार राशि आपस में बांटेंगे.

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BlackHoles की टक्कर से तरंग खोजने वाले तीन अमेरिकी वैज्ञानिकों को मिलेगा Nobel

अमेरिकी खगोलविज्ञानियों बैरी बैरिश, किप थोर्ने तथा रेनर वेस को गुरत्व तरंगों की खोज के लिए बुधवार इस साल का भौतिकविज्ञान का नोबेल पुरस्कार देने की घोषणा की गयी है. उनकी यह खोज गहन ब्रह्मांड के दरवाजे खोलती है. अलबर्ट आइंस्टीन ने करीब एक सदी पहले अपनी सापेक्षता के सामान्य सिद्धांत के तहत गुरुत्व तरंगों का अनुमान लगाया था, लेकिन 2015 में ही इस बात का पता लगा कि ये तरंगे अंतरिक्ष-समय में विद्यमान हैं. ब्लैक होल के टकराने या तारों के केंद्र के विखंडन से यह प्रक्रिया होती है.

नोबेल पुरस्कार विजेताओं का चयन करने वाली स्वीडिश रॉयल एकेडमी ऑफ साइंसेस के प्रमुख जी के हनसॉन ने कहा कि उनकी खोज ने दुनिया को हिला दिया. उन्होंने सितंबर, 2015 में यह खोज की थी और फरवरी 2016 में इसकी घोषणा की थी. दशकों के वैज्ञानिक अनुसंधान के बाद यह ऐतिहासिक खोज हुई है और तभी से तीनों वैज्ञानिक खगोलशास्त्र के क्षेत्र में मिलने वाले सभी बड़े पुरस्कार अपने नाम करते आ रहे हैं.
थोर्ने तथा वेस ने प्रतिष्ठित कैलीफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में संयुक्त रूप से लेजर इंटरफियरोमीटर ग्रेविटेशनल-वेब ऑब्सर्वेटरी (लीगो) बनाया था. इसके बाद बैरिश ने परियोजना को अंतिम रूप प्रदान किया. इस संस्थान को 1901 में नोबेल पुरस्कारों की शुरुआत के बाद से 18 बार ये प्रतिष्ठित पुरस्कार मिल चुका है. करीब 1.3 अरब प्रकाशवर्ष दूर हुए घटनाक्रम के परिणामस्वरूप पहली बार गुरुत्व तरंगों का प्रत्यक्ष प्रमाण मिला था.

अकादमी ने कहा कि पृथ्वी पर जब सिग्नल पहुंचा, तो बहुत कमजोर था, लेकिन खगोलविज्ञान में यह बहुत महत्वपूर्ण क्रांति है. गुरत्व तरंगें अंतरिक्ष में सबसे प्रचंड घटनाक्रमों पर नजर रखने और हमारे ज्ञान की सीमाओं को परखने का पूरी तरह नया तरीका हैं. ब्लैक होल से कोई प्रकाश नहीं निकलता. इसलिए उनका पता केवल गुरुत्व तरंगों से चल सकता है.

पुरस्कार में 90 लाख स्वीडिश क्रोनर यानी करीब 11 लाख डॉलर (करीब 7.20 करोड रपये) की राशि प्रदान की जायेगी. इस साल के नोबेल पुरस्कारों में सबसे पहले चिकित्सा के क्षेत्र में विजेताओं के नाम की घोषणा की गयी और दूसरे स्थान पर भौतिकी के विजेताओं का नाम घोषित किया गया है. बुधवार को रसायनविज्ञान के विजेताओं के नाम की घोषणा होगी.

साहित्य का नोबेल जीतने वालों का नाम गुरुवार को और शांति के क्षेत्र में नोबेल प्राप्त करने वाले विजेता का नाम शुक्रवार को घोषित किया जायेगा. अर्थशास्त्र के नोबेल पुरस्कार विजेता के नाम का ऐलान सोमवार को किया जा सकता है.