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Paytm founder Vijay Shekhar Sharma youngest Indian billionaire

Paytm founder Vijay Shekhar Sharma, 39, is the youngest Indian billionaire, while 92-year-old Samprada Singh, chairman emeritus of Alkem Laboratories, is the oldest, according to Forbes.

Sharma, ranked 1,394th on the list with a fortune of USD 1.7 billion, is the only Indian billionaire in the under-40 league.

Sharma founded fast-rising mobile wallet Paytm in 2011. He has also created Paytm Mall, an e-commerce business

& Paytm Payment Bank.
“One of the biggest beneficiaries of India’s demonetisation, Paytm has notched up 250 million registered users and 7 million transactions daily. Sharma owns 16 per cent of Paytm, which is now valued at USD 9.4 billion,” Forbes said.

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क्या उत्तर और दक्षिण कोरिया की दुश्मनी ख़त्म हो गई है?

साल 2017 के जाते-जाते कोरियाई प्रायद्वीप में एक बड़ा बदलाव हुआ. परमाणु कार्यक्रम को लेकर अपनी जिद पर अड़े उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग उन ने कुछ नरमी दिखाते हुए अपने पड़ोसी देश से संबंध सुधारने के संकेत दिए.

फिर उत्तर कोरिया ने दक्षिण कोरिया की मेज़बानी में हो रहे शीतकालीन ओलंपिक में अपनी टीम भेजने के फ़ैसला किया और एक क़दम और आगे बढ़ते हुए एलान किया कि उद्घाटन समारोह के दौरान दोनों देशों की टीमें एक ही झंडे के तले मार्च करेंगी.

किम जोंग उन ने ओलंपिक उद्घाटन के लिए अपनी बहन को प्योंगचांग भेजा और लौटने के बाद उनकी बहन ने जो रिपोर्ट सौंपी वो किम जोंग उन को पसंद भी आई.

उद्घाटन समारोह में जब उत्तर और दक्षिण कोरिया की टीमें एक झंडे तले मार्च कर रही थीं तो दुनिया के लिए ये बड़ा संदेश था, इसलिए भी कि जिस झंडे के नीचे ये टीमें थी उसमें सफेद पृष्ठभूमि पर एकीकृत कोरिया को दिखाया गया था.

अपने बीते कल और साझा इतिहास को याद कर उत्तर कोरिया के शीर्ष अधिकारियों की आंखें भी भर आईं और जब दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति मून जे इन और किम जोंग उन की बहन किम यो जोंग एक साथ बैठे तो दूरियां कम दिखीं.

कोरियाई प्रायद्वीप में शांति बनाए रखने के इच्छुक हैं दोनों देश

किम जोंग की बहन किम यो जोंग वहां संयुक्त महिला आइस हॉकी टीम का हौसला बढ़ाने के लिए मौजूद थीं तो उत्तर कोरिया की चीयरलीडर्स दुनियाभर से वहाँ पहुँचे दर्शकों का उत्साहवर्धन कर रही थीं.

लेकिन शीतकालीन ओलंपिक से रिश्तों में आई ये गर्माहट लंबे समय तक कायम रहेगी?

नई दोस्ती नहीं आ रही रास

यही लाख टके का सवाल है जिसका जवाब शायद दुनिया का हर शख़्स पाना चाहेगा.

उत्तर और दक्षिण कोरिया के खेल के बहाने ही सही एक-दूसरे के करीब आने की ख़बर दुनिया के हर कोने में चर्चा का विषय बनी.

लेकिन उत्तर और दक्षिण कोरिया की ये नई दोस्ती दक्षिण कोरिया में हर किसी को रास नहीं आ रही है.

किम यो जोंग
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ऐसे कई लोगों का मानना है कि मून सरकार ने अमरीका से अपना मुंह मोड़ लिया और उत्तर कोरिया की तरफ़ दोस्ती का हाथ बढ़ा दिया है.

परंपरावादी इस कदर हतोत्साहित हैं कि उत्तर कोरिया का दक्षिणपंथी मीडिया अपने संपादकीयों में नियमित तौर पर हर चर्चा में उत्तर कोरिया के ज़िक्र पर आपत्ति जताता है.

एक चिंता ये भी है कि उत्तर कोरिया अपने परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम पर रोक लगाने का वादा करने के बदले दक्षिण कोरिया और अमरीका के संयुक्त सैन्य अभ्यास को रोकने की मांग कर सकता है.

हक़ीक़त ये है कि उम्मीदें हर तरफ़ से हैं, साथ ही हर कोई ये भी चाहता है कि हालात और बुरे न हों. ये सही है कि एक खेल महोत्सव ने दोनों देशों को करीब लाने का मंच दिया, लेकिन इससे राजनीतिक गतिरोध एकदम दूर हो जाएगा, इसे लेकर संदेह है.

अविश्वास

किम जोंग उनइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

दशकों से चली आ रही बातचीत बेनतीजा रही है और बहुत अधिक उदासी या अविश्वास का मतलब प्रायद्वीप में तनाव, घबराहट और असहजता और वो भी स्थाई तौर पर.

65 साल पहले हुए कोरियाई युद्ध के बाद इन दोनों देशों के बीच रिश्ते अमूमन एक जैसे और स्थाई रहे हैं.

उत्तर कोरिया निश्चित तौर पर दुनिया का सबसे ख़तरनाक देश है और इसकी वजह है इसका परमाणु कार्यक्रम. किम जोंग उन के जखीरे में परमाणु हथियारों के होने से इसका ख़तरा दिन पर दिन बढ़ता ही जा रहा है.

तो क्या उत्तर कोरिया के व्यवहार या नीति में बदलाव रातों-रात आ गया और वो दक्षिण कोरिया के साथ दोस्ती करने के लिए बेताब है?

उत्तर कोरिया पहले भी बातचीत की मेज़ पर बैठ चुका है और कई दौर की बातचीत का कोई नतीजा नहीं निकल सका था. उत्तर कोरियाई बेहद चालाक होते हैं और मोलतोल में भी माहिर होते हैं.

वो हर इंच के लिए लड़ते हैं और हर बुरी बात का देर तक शोक मनाते हैं.

उत्तर कोरिया के साथ मोलभाव इतना आसान नहीं है, हां इतना तय है कि जो उत्तर कोरिया अपने परमाणु कार्यक्रम को लेकर पहले बात तक करने को तैयार नहीं था, वो कुछ कदम तो बढ़ा ही है.

उत्तर कोरिया में वामपंथी विचारधारा के लोगों को उम्मीद है कि उनकी सरकार भी इस मौके को बेकार नहीं जाने देगी.

लेकिन राष्ट्रपति मून इस राह पर कितना बढ़ पाएंगे, ये कहना अभी जल्दबाज़ी होगी. राष्ट्रपति मून 41 फ़ीसदी वोटों के साथ सत्ता में आए हैं और शायद खुद के दम पर बहुत दूर न चल पाएं.

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अमरीका की भूमिका

दूसरी तरफ़, उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया के बीच पनप रही ‘नई दोस्ती’ से ट्रंप प्रशासन असहज महसूस कर रहा है.

किम जोंग उन ने दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति को उत्तर कोरिया आने का निमंत्रण दिया है और हो सकता है कि आने वाले समय में राष्ट्रपति मून प्योंगयांग जाएं.

हालाँकि ये आमंत्रण औपचारिक तौर पर नहीं दिया गया है और मून ने कहा है कि वो चाहते हैं कि उत्तर कोरिया, अमरीका के साथ बातचीत के लिए तैयार हो.

अभी ये सिर्फ़ माहौल है और एक छोटी सी मुलाक़ात को रिश्तों में सुधार के रूप में पेश नहीं किया जा सकता, वो भी तब जब ये भी पता न हो कि उनके बीच किस मुद्दे पर चर्चा हुई.

दक्षिण कोरिया में चर्चा ये है कि राष्ट्रपति मून बातचीत करना चाहते हैं, लेकिन परंपरावादियों को डर है इसे कहीं तुष्टीकरण के रूप में न देखा जाए.

दक्षिण और उत्तर कोरिया के नेताइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

दक्षिण कोरिया के इतिहासकार जॉन डेल्यूरी कहते हैं, “लोगों को लग रहा है कि मून जे इन को ठीक से श्रेय नहीं मिल रहा है. लोगों को लग रहा है उत्तर कोरिया मन बदल रहा है. अमरीका को समझना होगा कि दक्षिण कोरिया के हाथ बंधे हैं. समझना ज़रूरी है कि उत्तर कोरिया को दक्षिण कोरिया से डर नहीं लगता, बल्कि दक्षिण कोरिया को लगता है, क्योंकि परमाणु हथियार उसके पास नहीं हैं.”

उत्तर कोरिया के साथ परमाणु कार्यक्रम को लेकर बातचीत के दौर पूर्व में कामयाब नहीं रहे, लेकिन इस बार शायद उत्तर कोरिया अपने रुख़ में कुछ नरमी बरते- बिल्कुल ओलंपिक की भावना की तरह- आगे आए, बातचीत शुरू करे और उसे लेकर दुनियाभर में जो अविश्वास का माहौल बना है, उसे दूर करे.

लेकिन, ये भी तय है कि किम जोंग उन दक्षिण कोरिया और अमरीका को दूर-दूर करने की कोशिश करेंगे, क्योंकि उत्तर कोरिया को ये पता है कि राष्ट्रपति ट्रंप को दक्षिण कोरिया में नापसंद करने वालों की कमी नहीं है.

इसलिए, शीतकालीन ओलंपिक के बाद उम्मीद तो बंधी है, लेकिन सच ये है कि इस पहल से बहुत ज़्यादा उम्मीदें न रखी जाएं.

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ऑस्ट्रिया में यूरोपीय संघ के सबसे युवा नेता कुर्ज की जीत तय, करिश्माई है ये शख्स

ऑस्ट्रिया में मध्यावधि चुनाव के लिए मतदान हो चुका है. इसमें दक्षिणपंथी नेता 31 साल के सेबस्टियन कुर्ज  की जीत की संभावना प्रबल मानी जा रही है. यूरोपीय संघ के करीब 87.50 लाख की आबादी वाले इस सदस्य देश के दक्षिणपंथ की ओर झुकाव से ब्रसेल्स के लिए नई मुसीबतें खड़ी हो जाएंगी. वह ब्रिटेन के संघ छोड़ने और जर्मनी, हंगरी, पोलैंड और अन्य सदस्य देशों में राष्ट्रवादियों के उदय को लेकर पहले से संघर्ष कर रहा है.

हालांकि सभी संकेत इस ओर इशारा कर रहे हैं कि ऑस्ट्रिया के लोग शरण की मांग करने वाले लोगों की संख्या में रिकार्ड वृद्धि से तंग आ चुके हैं और मध्यमार्गी सरकार की बजाय अधिक सख्त सरकार के पक्ष में मतदान का मन बना चुके हैं. द पीपुल्स पार्टी ने करीब 30 प्रतिशत मतदाताओं को लुभाने के लिए अप्रवासियों पर सख्ती दिखाने और कर में ढील देने की घोषणा की है. कुर्ज ने इसे ‘निजी अभियान’ के तौर पर पेश किया.

कुर्ज 27 साल में ही बन गए विदेश मंत्री  

दरअसल, कुर्ज 2013 में उस समय चर्चा में आए जब वह मात्र 27 साल के थे और दुनिया के सबसे युवा विदेश मंत्री बने.  अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन कैरी और इरान के जावद जरीफ के साथ उनकी तस्वीरों ने खूब सुर्खियां बटोरीं. उनका राजनीतिक सफर स्कूल में ही शुरू हो गया था जब वह ए लेवल की पढ़ाई कर रहे थे. उन्होंने कंजरवेटिव ऑस्ट्रियन पीपल्स पार्टी के यूथ विंग की सदस्यता ली.

विएना में विवादास्पद और ध्रुवीकरण वाले स्थानीय चुनाव के दौरान कुर्ज ने पार्टी को एक तबके में बेहद मजबूत बनाया. उनके इस योगदान को देखते हुए पार्टी ने उन्हें 2011 में स्टेट सेक्रेटरी बनाया. चार साल पहले सोशल डेमोक्रेटिक-पीपल्स पार्टी की गठबंधन सरकार बनने पर कुर्ज को विदेश मंत्री बनाया गया. इस तरह वह यूरोप के सबसे युवा कूटनीतिज्ञ बने.