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देश की सबसे महंगी फिल्म 2.0 #Most #Expensive #Film of #India

देश की सबसे महंगी इस फिल्म को लेकर इनके फैन्स इंतज़ार में थे, जिनके लिए ख़ुशी का मौका है लेकिन कुछ लोगों के लिए ये डेट मुश्किल बन कर आई है ।

और वो हैं फिल्म केदारनाथ से जुड़े लोग । अभिषेक कपूर के निर्देशन में बन रही सुशांत सिंह राजपूत और सारा अली खान की ये फिल्म 30 नवंबर को रिलीज़ के लिए तय है, लेकिन शंकर निर्देशत 2.0 को 29 नवंबर को रिलीज़ किये जाने की घोषणा के साथ ही अब केदारनाथ के सामने संकट आ गया है। वैसे पहले से ही केदारनाथ संकट से घिरी रही है । निर्देशक और पूर्व निर्माता कंपनी के बीच हुए विवाद के बाद ये फिल्म लगभग ठंडे बस्ते में चली गई थी लेकिन प्रोड्यूसर रॉनी स्क्रूवाला ने फिल्म को संकट से उबार लिया । सैफ़ अली खान की बेटी सारा की ये डेब्यू फिल्म है और जब ये संकेत मिलने लगे थे कि केदारनाथ बन नहीं पायेगी तो करण जौहर ने उन्हें अपने प्रोडक्शन में बन रही फिल्म सिंबा में रणवीर सिंह के साथ कास्ट कर लिया ।

फिल्म 2.0 की 29 नवंबर को रिलीज़ का मतलब केदारनाथ को या तो अपनी डेट आगे-पीछे करनी पड़ेगी या मुकाबले के लिए तैयार होना होगा l वैसे नवंबर और दिसंबर में बड़ी फिल्मों का टकराव रहेगा । सात नवंबर को आमिर खान और अमिताभ बच्चन स्टारर ठग्स ऑफ हिंदोस्तान आएगी और 22 दिसंबर को शाहरुख़ खान की फिल्म ज़ीरो रिलीज़ होगी । फिल्म 2.0 के मेकर ने इंतज़ार करवा कर जो डेट चुनी है वो बॉक्स ऑफ़िस पर काफ़ी उपयुक्त मानी जा रही है क्योंकि करीब 500 करोड़ तक पहुंच गई फिल्म की लागत से पार पाने के लिए फिल्म को लॉन्ग रन चाहिए होगा । बताया जा रहा है कि फिल्म के बजट में 100 करोड़ रूपये का अतिरिक्त खर्च जुट गया है क्योंकि फिल्म के स्पेशल इफ़ेक्ट्स का काम लगातार बढ़ता जा रहा था । रजनीकांत और ऐश्वर्या राय बच्चन स्टारर रोबोट/ इंधीरन का सीक्वल फिल्म 2.0 का पिछले दो साल से इंतज़ार हो रहा है ।

3 डी कन्वर्जन के साथ इंटरनेशनल स्तर के स्पेशल इफ़ेक्ट्स पर अब तक समय से काम पूरा न होने के कारण हुई है l अमेरिका की जिस कंपनी को फिल्म के स्पेशल इफेक्ट्स का ठेका दिया गया था वो कंपनी ही दिवालिया हो गई l इस फिल्म में रजनीकांत अपने पुराने वाले रोल में हैं जबकि अक्षय कुमार बड़े ही विचित्र गेट अप में विलेन बने दिखेंगे। पिछली बार फिल्म में ऐश्वर्या राय बच्चन थीं तो इस बार एमी जैक्सन फीमेल लीड में होंगी। अक्षय कुमार जिस डॉक्टर रिचर्ड का रोल कर रहे हैं उसका गेटअप एक राक्षसी कौवे जैसा है।

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किम जोंग उन से वार्ता के लिए प्योंगयोंग नहीं जाएंगे डोनाल्ड ट्रंप, अब यहां होगी वार्ता

किम जोंग उन से वार्ता के लिए अमेरिकी राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप अब प्‍योंगयोंग नहीं जाएंगे। लेकिन इसका अर्थ ये नहीं है कि यह वार्ता रद कर दी गई है, दरअसल, अब ये दोनों नेता उसी जगह पर मिलेंगे जहां पिछले दिनों दक्षिण कोरिया के राष्‍ट्रपति मून जे ने किम जोंग उन से मुलाकात की थी। इसका सुझाव खुद ट्रंप की तरफ से आया था जिसको किम ने हरी झंडी दे दी है।

आपको बता दें कि किम और मून के बीच 27 अप्रैल को पुनमुंजोम गांव में बैठक हुई थी। यह उत्तर और दक्षिण कोरिया की सीमा पर स्थित है। यहां 1953 के कोरियाई युद्ध के बाद से ही युद्ध विराम लागू है। इसका एक हिस्‍सा उत्‍तर तो दूसरा हिस्‍सा दक्षिण कोरिया में पड़ता है। आपके लिए यह जानना भी बेहद दिलचस्‍प है कि यह सीमा रेखा दुनिया की सबसे खतरनाक सीमाओं में गिनी जाती है। यही वजह है कि उत्तर और दक्षिण कोरिया की सीमा एक बार फिर से चर्चा का विषय बनने के साथ-साथ ऐतिहासिक वार्ता का भी गवाह बनने वाली है।

पीस हाउस में बैठक का सुझाव

आपको बता दें कि डोनाल्ड ट्रंप ने ही किम जोंग उन के साथ पीस हाउस में बैठक करने का सुझाव दिया है। पीस हाउस उत्तर और दक्षिण कोरिया की सीमा पर स्थित है। ट्रंप ने ट्वीट कर कहा कि उत्तर कोरिया के साथ शिखर बैठक के लिए कई देशों पर विचार किया जा रहा है। लेकिन किसी तीसरे देश की अपेक्षा पीस हाउस/फ्रीडम हाउस ज्यादा महत्वपूर्ण और स्थायी जगह है। तीन से चार हफ्ते में ट्रंप और किम की मुलाकात होने की संभावना है। गुरुवार को अमेरिकी राष्ट्रपति ने एक इंटरव्यू में कहा था कि किम के साथ शिखर वार्ता के लिए पांच जगहों पर विचार किया जा रहा है। हालांकि वह कई बार यह भी कह चुके हैं कि बातचीत नहीं भी हो सकती है।

दोनों के बीच वार्ता के अहम बिंदु

किम जोंग उन और डोनाल्‍ड ट्रंप के बीच होने वाली वार्ता का सबसे अहम बिंदु कोरियाई प्रायद्वीप को परमाणु हथियार मुक्‍त बनाना है। हालांकि इसको लेकर किम के तेवर में अब काफी नरमी आ चुकी है। पिछले दिनों मून से हुई मुलाकात में किम ने कहा था कि अगर अमेरिका कोरियाई युद्ध को औपचारिक रूप से खत्म करने का वादा करे और उत्तर कोरिया पर हमला नहीं करने का वचन दे, तो उनका देश परमाणु हथियारों को त्यागने को तैयार है। लेकिन अगर ऐसा नहीं होता है, तो उन्‍हें एक बार फिर विचार करना पड़ेगा।

कई लिहाज से खास है बैठक

किम ने ट्रंप को संबोधित करते हुए ये भी कहा है कि हमारे बीच जब बातचीत शुरू हो जाएगी, तब अमेरिकी राष्‍ट्रपति जान जाएंगे कि मैं ऐसा शख्‍स नहीं हूं कि दक्षिण कोरिया या अमेरिका पर परमाणु हथियार से हमला करूंगा। उन्‍होंने इस बात की भी उम्‍मीद जताई है कि यदि दोनों देशों के बीच बैठकों का सिलसिला बढ़ा और आपसी विश्‍वास बहाली हो सकी यह काफी अच्‍छा होगा। हालांकि अभी इन दोनों नेताओं की बैठक का दिन और समय निश्चित नहीं हो पाया है। लेकिन इतना जरूर तय है कि इस बैठक में दक्षिण कोरिया भी मौजूद होगा। यह बैठक इस लिहाज से भी खास होगी क्‍योंकि पहली बार पद पर रहते हुए कोई अमे‍रिकी राष्‍ट्रपति उत्तर कोरिया के प्रमुख से बात करेगा।

छह देशों की बैठक पर लगी निगाह

इस बीच जानकारों की निगाह कोरियाई प्रायद्वीप को परमाणु हथियार मुक्‍त बनाने के लिए छह देशों की बैठक पर भी लगी है, जो वर्षों से निलंबित हैं। जानकारों की दिलचस्‍पी इस बात को लेकर है कि इस बाबत छह देशों की वार्ता दोबारा शुरू होगी या नहीं। इन छह देशों में उत्तर और दक्षिण कोरिया, जापान, चीन, रूस और अमेरिका शामिल हैं। यॉनहॉप एजेंसी की मानें तो जानकार इस बात से इंकार नहीं कर रहे हैं कि कोरिया प्रायद्वीप को लेकर इन देशों की बैठकों का दौर दोबारा शुरू हो सकता है। जानकारों के मुताबिक इसको लेकर उत्तर कोरिया भी शायद पीछे न हटे और ऐसा करने पर अपनी सहमति व्‍यक्त करे। इस बारे में जापान की मीडिया ने यहां तक कहा है कि पिछले दिनों किम ने जो बीजिंग की यात्रा कर शी चिनफिंग के समक्ष अपनी बात रखी है उसके बाद इस सिक्‍स नेशन टॉक को लेकर सहमति बनी है।

उत्तर कोरिया खफा हो जाए

हालांकि जानकारों का एक मत यह भी है कि मुमकिन है कि जापान की मौजूदगी से उत्तर कोरिया खफा हो जाए। इसकी वजह ये है कि जापान काफी समय से अपने अगवा किए नागरिकों की वापसी की मांग उत्तर कोरिया से करता रहा है। वहीं इसको लेकर उत्तर कोरिया साफ इंकार कर रहा है। आपको बता दें कि छह देशों की यह वार्ता सबसे पहले 2003 में हुई थी। 2005 में वार्ता के बाद एक अहम समझौता भी हुआ था जिसमें उत्तर कोरिया को सुरक्षा की गारंटी तक दी गई थी। लेकिन वर्ष 2009 में उत्तर कोरिया द्वारा परमाणु परिक्षण किए जाने के चलते इसको निलंबित कर दिया गया था। इसके बाद से इस मुद्दे को लेकर इन देशों के बीच कोई वार्ता नहीं हुई।

दोनों के बीच विवादित बोल

इसके अलावा यह बैठक इस लिहाज से भी खास है क्‍योंकि इससे पहले दोनों नेताओं के बीच बदजुबानी का लंबा सिलसिला चला है। एक ओर जहां ट्रंप ने किम को रॉकेट मैन कहा वहीं किम ने ट्रंप को बूढ़ा तक कह डाला था। आइए जानते हैं दोनों नेताओं ने कब-कब और क्‍या-क्‍या कहा।

– नवंबर 2017 में ट्रंप को उत्तर कोरियाई अधिकारियों ने ‘बूढ़ा पागल’ बताया था। इस पर ट्रंप ने ट्वीट कर अपनी नाराजगी जाहिर की थी और लिखा था, ‘भला किम जोग-उन मुझे बूढ़ा बुला कर मेरा अपमान क्यों करेंगे, जब मैं उन्हें कभी नाटा और मोटा नहीं कहूंगा।’

– इसी तरह सितंबर 2017 में संयुक्त राष्ट्र महासभा के 72वें सत्र को संबोधित करते हुए ट्रंप ने किम जोंग उन को रॉकेट मैन कहा था और उनके देश को नेस्तनाबूद करने की धमकी दी थी।

– इसके जवाब में किम जोंग उन की तरफ से जिस तरह का बयान आया, अमेरिका और ट्रंप ने कल्पना भी नहीं की होगी। उत्तर कोरिया ने कहा था, ‘डरे हुए कुत्ते ज्यादा भौंकते हैं। ट्रंप आग से खेलने के शौकीन एक दुष्ट व्‍यक्ति हैं।’

– जनवरी के पहले हफ्ते में भी पूरी दुनिया इन दोनों नेताओं के अजीब-गरीब बयानों की गवाह बनी थीं। दरअसल, किम जोंग उन ने नए साल के मौके पर अपने संबोधन में अमेरिका को तबाह करने की धमकी दी थी और कहा था कि परमाणु बम का बटन हर वक्त उनकी टेबल पर होता है।

– इसका जवाब देते हुए ट्रंप ने कहा था, ‘कोई किम जोंग उन को बताए कि मेरे पास भी न्यूक्लियर बटन है, जो उसके बटन से बहुत बड़ा और ताकतवर है। मेरा बटन काम करता है।’

– 23 फरवरी 2018 को डोनाल्ड ट्रंप ने उत्तर कोरिया के खिलाफ अब तक के सबसे कड़े प्रतिबंध लगाने का एलान किया है। उत्तर कोरिया के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रमों पर रोक लगाने के लिए दबाव बढ़ाने को अमेरिकी राष्ट्रपति ने यह कदम उठाया है।

– 30 जनवरी को अमेरिका में सीआईए के निदेशक माइक पोंपियो ने आशंका जताई थी कि उत्तर कोरिया के पास ऐसी परमाणु मिसाइल हैं, जिससे वह कुछ महीनों के भीतर अमेरिका पर हमला कर सकता है।

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टीवी खरीदने से पहले जानें OLED और QLED में अंतर: क्या है खूबियां

OLED और QLED में क्या अंतर है? कौन सी तकनीक ज्यादा अच्छी है? इनमें से कौन सी तकनीक हमारे काम की है और हमें इन दो डिस्प्ले में से किसे खरीदना चाहिए? ये कुछ ऐसे सवाल हैं, जो एक आम यूजर्स के दिमाग में हमेशा आते हैं। कहना गलत नहीं होगा कि इन टेक टर्म्स ने यूजर्स को और भी ज्यादा कन्फ्यूज कर दिया है। ऐसे में अगर आप भी OLED और QLED को लेकर कन्फ्यूज्ड हैं, तो आपको हमारी ये खबर पूरी पढ़नी होगी, जिसके बाद आपकी सारी शंकाएं खत्म हो जाएंगी।

क्या है OLED?

  • ‘ओएलईडी’ टीवी को देखते ही हमारे मूंह से पहली चीज निकलती है ‘शानदार’। ‘ओएलईडी’ डिस्प्ले काफी स्मूथ होता है, इसमें करल और कॉन्ट्रास्ट निखर कर आता है।
  • ‘ओएलईडी’ का फुल फॉर्म ‘ऑर्गेनिक लाइट इमिटिंग डायोड’ है।
  • इस तकनीक में डिस्प्ले अपनी ही लाइट को बाहर फेकता है, जिसके चलते टीवी में भारी बैकलाइट की जरूरत नहीं होती है।
  • ‘ओएलईडी’ डिस्प्ले एक वॉलपेपर की तरह पतला होता है।
  • ‘ओएलईडी’ डिस्प्ले का हर पिक्सल खुद रौशनी फेकता है।
  • इस तकनीक में किसी भी इमेज को पिक्सल के आधार पर कंट्रोल किया जाता है।
  • ‘ओएलईडी’ पैनल में सेमी कंडक्टर्स के बीच ऑर्गेनिक फर्म्स को लगाया जाता है, इसके बाद इसमें बिजली की सप्लाई दी जाती है, ताकि हर पिक्सल स्विच ऑन या स्विच ऑफ हो सके।
  • ‘ओएलईडी’ डिस्प्ले पर अंधेरा या ज्यादा रौशनी देखने में रियल लगता है।
  • डिस्प्ले को ऐसे डिजाइन किया जाता है कि आपकी आंखें तेजी से कलर और कॉन्ट्रास्ट को एडजस्ट कर लेती हैं।

क्या है QLED?

  • ‘क्यूएलईडी’ का फुल फॉर्म ‘क्वांटम डॉट लाइट एमिटिंग डायोड’ है।
  • ‘क्यूएलईडी’ डिस्प्ले प्रीमियम टीवी में आता है।
  • ‘क्यूएलईडी’ डिस्प्ले ‘ओएलईडी’ से बिल्कुल अलग है।
  • ‘क्यूएलईडी’ डिस्प्ले खुद लाइट इमिट नहीं करते हैं।
  • ‘क्यूएलईडी’ डिस्प्ले की खासियत है इसका क्वांटम डॉट कलर फिल्टर है।
  • क्वांटम डॉट कलर फिल्टर की वजह से ‘क्यूएलईडी’ डिस्प्ले में ज्यादा ब्राइटनेस होता है।

इन मामलो में ‘क्यूएलईडी’ है परफेक्ट

  • ‘ओएलईडी’ डिस्प्ले के मुकाबले ‘क्यूएलईडी’ में ज्यादा ब्राइटनेस मिलता है।
  • ‘ओएलईडी’ के मुकाबले ‘क्यूएलईडी’ डिस्प्ले में ज्यादा शानदार कलर एक्सपीरियंस मिलता है।

इन मामलों में ‘ओएलईडी है बेस्ट’

  • रिस्पांस टाइम की बात करें तो यहां ‘ओएलईडी’ बाजी मार रहा है, जो ‘क्यूएलईडी’ से ज्यादा तेज रिस्पांस करता है।
  • ‘ओएलईडी’ डिस्प्ले का कॉन्ट्रास्ट ‘क्यूएलईडी’ के मुकाबले ज्यादा अच्छा है।
  • ब्लैक कलर का एक्सपीरियंस आपको ‘ओएलईडी’ डिस्प्ले पर ज्यादा अच्छा मिलेगा।
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जानें- क्या है BSF और सेना में अंतर, सैलरी-सुविधाएं भी होती है अलग

जानें- क्या है BSF और सेना में अंतर, सैलरी-सुविधाएं भी होती है अलग

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भारतीय सेना और अन्य सुरक्षा बल भारत की सुरक्षा के लिए तत्पर रहते हैं. देश की आंतरिक सुरक्षा और सीमा सुरक्षा में भारतीय सेना के साथ सीआरपीएफ, बीएसफ, आईटीबीपी, सीआईएसएफ, एसएसबी का अहम योगदान होता है. लेकिन क्या आप जानते हैं ये सुरक्षा बल, भारतीय सेना से अलग होते हैं और इन्हें मिलने वाली सुविधाएं भी काफी अलग होती है. आइए जानते हैं पैरा मिलिट्री फोर्सेज और सेना में क्या अंतर होता है…
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बता दें कि सेंट्रल आर्म्ड पुलिस फोर्स और भारतीय सेना में काफी अंतर होता है. कई सुरक्षा बल गृह मंत्रालय के अधीन आते हैं, जिसमें सीआरपीएफ, आईटीबीपी, बीएसएफ, आसाम राइफल्स और एसएसबी शामिल है. वहीं सेना में भारतीय सेना, वायु सेना और नौसेना आते हैं.

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अर्धसैनिक बल देश में रहकर या सीमा पर देश की सुरक्षा करते हैं और अर्धसैनिक बल पूरे देश में आतंकवाद औऱ नक्सलवाद विरोधी अभियानों में भी लगे हुए हैं. वहीं वीआईपी सिक्योरिटी में भी मुख्यतौर पर अर्धसैनिक बलों के जवान ही होते हैं. सुविधाओं के नाम पर जो सहूलियतें भारतीय सेना को मिलती हैं, वैसी सुविधाएं अर्धसैनिक बलों को नहीं मिलती है.

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बीएसएफ पीस-टाइम के दौरान तैनात की जाती है, जबकि सेना युद्ध के दौरान मोर्चा संभालती है. बीएसएफ के जवानों को हमेशा सीमा की सुरक्षा के लिए तैयार रहना पड़ता है.

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बीएसएफ के जवानों को सीमा पर तैनात किया जाता है, जबकि भारतीय सेना के जवान सीमा से दूर रहते हैं और युद्ध के लिए खुद को तैयार करते हैं. साथ ही यह क्रॉस बोर्डर ऑपरेशन भी करती है.

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भारतीय सेना के जवानों को बीएसएफ के जवानों से ज्यादा सुविधा मिलती है, इसमें कैंटीन, आर्मी स्कूल आदि की सेवाएं शामिल है.

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भारतीय सेना रक्षा मंत्रालय के अधीन आती है, जबकि बीएसएफ गृह मंत्रालय के अधीन होती है.

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भारतीय सेना में रैंक लेफ्टिनेंट, मेजर, कर्नल, ब्रिगेडियर, मेजर जर्नल आदि होती है, लेकिन बीएसएफ में पोस्ट कांस्टेबल, हैड कांस्टेबल, एएसआई, डीएआई, आईजी आदि होती है.

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भारतीय सेना में अधिकारी एनडीए और सीडीएस के माध्यम से चुने जाते हैं और इस परीक्षा का चयन यूपीएससी की ओर से किया जाता है. वहीं बीएसएफ में एसआई तक के उम्मीदवार एसएससी की ओर से चुने जाते हैं. वहीं बीएसएफ के डीजी आईपीएस बनते हैं.

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भारत की पहली शीशे की छत वाली ट्रेन हुई शुरू, मुंबई से गोवा का सफर होगा दिलचस्प

किसी जगह की ट्रिप का मजा और भी दुगुना हो जाता है, जब सफर सुकूनभरा होता है. पिछले एक दशक से यात्रियों के सफर को सुकूनभरा बनाने के लिए सरकार काफी कदम उठा रही है. देश भर के शहरों को छोटे कस्बे और गांवों से जोड़ने का काम तेजी से हो रहा है. होली और दिवाली जैसे कई त्योहारों पर स्पेशल ट्रेन और बस चलाई जाती है. इसी तरह अब मुंबई से गोवा का सफर और भी दिलचस्प हो जाएगा. 18 सितंबर से दादर और मडगांव के बीच चलने वाली जन शताब्दीट एक्सलप्रेस में एक विस्टािडोम (ग्लास-टॉप) कोच शुरू किया जाएगा.

जानें क्या है खास बातें

एसी विस्टाडोम ट्रेन में यात्रा करने वाले यात्री इस विशेष कोच में रोटेटेबल कुर्सियों पर बैठेंगे. साथ ही इसमें मनोरंजन के लिए हैंगिंग एलसीडी टीवी भी है. 40 सीटों वाले इस कोच की लागत 3.38 करोड़ रुपये है. इस ट्रेन में 360 डिग्री पर घूमने वाली चौड़ी सीटें हैं, जिससे सफर में बाहर के नजारों का बेहतरीन अनुभव मिलेगा.

कितने दिन चलेगी ट्रेन?

इस खास कोच को सितंबर के पहले हफ्ते में केंद्रीय रेलवे ने अपने मुख्यालय छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनल पर रिसीव किया था. जानकारी के अनुसार मॉनसून में यह ट्रेन सप्तामह में तीन दिन चलेगी और मॉनसून खत्म होने के बाद सप्ताह में पांच दिन चलेगी. जन शताब्दी एक्सप्रेस के दादर से चलने का समय सुबह 5.25 बजे है और यह उसी दिन शाम 4 बजे तक मडगांव पहुंच जाती है.

एक्जीक्यूटिव क्लास जितना किराया

विस्टाडोम कोचों को चेन्नई की द इंटीग्रल कोच फैक्ट्री में बनाया गया है. इन कोचों का किराया शताब्दी एक्सप्रेस के एक्जीयक्यूटिव क्लास जितना होगा. मूल किराए के अतिरिक्त रिजर्वेशन चार्ज, जीएसटी और कोई अन्य‍ चार्ज जोड़ा जा सकता है. उन्होंने कहा, ‘इसमें कोई कंसेशन (छूट) नहीं मिलेगा और सभी यात्रियों को पूरा किराया देना होगा. इसकी न्यूनतम यात्रा दूरी 50 किलोमीटर होगी.’

पर्यटन को बढ़ाने के लिए उठाया गया कदम

विस्टाडोम कोच देश में पहली बार पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए लॉन्च किए जा रहे हैं. जिससे मुंबई या गोवा घूमने के अलावा लोग इस ट्रेन का सफर भी यात्रियों को दिलचस्प लग सके.

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छलावा न हों कोरिया से आ रहे सकारत्मक बयान: ट्रंप

अमरीका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम छोड़ने को लेकर बातचीत की इच्छा जाहिर करने पर सतर्क प्रतिक्रिया दी है.

ट्रंप ने कहा कि ‘दक्षिण कोरिया और उत्तर कोरिया से आ रहे बयान काफ़ी सकारात्मक हैं’ लेकिन साथ ही कहा कि ये ‘झूठी उम्मीद’ भी हो सकती है.

दक्षिण कोरिया ने जानकारी दी थी कि सोमवार को जब उसके अधिकारी उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग उन से मिले थे तो ये मुद्दा उठाया गया था.

दक्षिण कोरिया के मुताबिक किम जोंग उन अमरीका से बातचीत के लिए तैयार हैं और हथियारों के परीक्षण पर भी रोक लगा सकते हैं.

अमरीका-उत्तर कोरियाइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

हालांकि, पूर्व में उत्तर कोरिया से हुई बातचीत में कुछ हासिल नहीं हुआ है. अमरीका और उत्तर कोरिया के कुछ अधिकारियों की राय है कि उत्तर कोरिया इसके जरिए हथियार विकसित करने के कार्यक्रम के लिए वक्त हासिल करने की कोशिश में हो सकता है. ये कड़े प्रतिबंधों से राहत पाने की कोशिश भी हो सकती है.

उत्तर कोरिया की ओर से हाल फिलहाल इस बारे में कोई टिप्पणी समाने नहीं आई है.

दक्षिण कोरिया की ओर से उत्तर कोरिया गए प्रतिनिधिमंडल के नेता चुंग इयू योंग ने ही जानकारी दी थी कि दोनों देशों के नेता अगले महीने एक शिखर सम्मेलन में मिलने के लिए सहमत हुए हैं

एक दशक से ज्यादा वक्त के दौरान ये ऐसी पहली मीटिंग होगी. किम जोंग उन साल 2011 से सत्ता में हैं. उनके उत्तर कोरिया का नेता बनने के बाद से ऐसी कोई मीटिंग नहीं हुई है.

फरवरी में दक्षिण कोरिया में हुए विंटर ओलिंपिक के दौरान दोनों देशों के बीच गर्माहट दिखी. यहां तक कि उत्तर कोरिया के खिलाड़ी ने दक्षिण कोरिया के खिलाड़ियों के साथ एक टीम में खेले.

उत्तर कोरिया, अमेरिका से बातचीत के लिए तैयार है: दक्षिण कोरिया

अमरीका-उत्तर कोरियाइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

ट्रंप ने क्या कहा

वाशिंगटन में मीडिया से बात करते हुए ट्रंप ने कहा ‘उत्तर कोरिया के मामले में यकीनन हमने एक लंबा रास्ता तय किया है.’

‘दक्षिण कोरिया और उत्तर कोरिया से आ रहे बयान सकारात्मक हैं. पूरी दुनिया के लिए ये बड़ी बात होगी.’

ट्रंप ने दक्षिण कोरिया में हुए ओलिंपिक में हिस्सा लेने के लिए उत्तर कोरिया की तारीफ़ भी की.

लेकिन इससे पहले उन्होंने एक चेताने वाला ट्वीट भी किया था जिसमें कहा गया था कि ये एक ‘झूठी उम्मीद’ भी हो सकती है.

इस बीच अमरीका के उपराष्ट्रपति माइक पेंस ने कहा कि उत्तर कोरिया के साथ बातचीत चाहे जिस दिशा में जाए, हमारा निश्चय दृढ़ है.

उन्होंने कहा, “सभी विकल्प मौजूद हैं और हमारा रूख उत्तर कोरिया के लिए तब तक नहीं बदलेगा जब तक हम उनका परमाणु कार्यक्रमों को बंद करने की तरफ़ कोई ठोस कदम न देख लें.”

ऐसी उम्मीद है कि उत्तर कोरिया से हुई बातचीत की जानकारी देने के लिए दक्षिण कोरिया की टीम हफ्ते के आखिर में अमरीका जा सकती है.

अमरीका-उत्तर कोरियाइमेज कॉपीरइटREUTERS

उत्तर कोरिया ने क्या कहा?

मंगलवार को दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति दफ्तर से एक बयान जारी किया गया जिसमें बताया गया, “उत्तर कोरिया ने कोरियाई प्रायद्वीप से परमाणु हथियार हटाने की इच्छा जताई है. अगर उत्तर कोरिया पर सैन्य कार्रवाई का खतरा कम हुआ और सरकार बने रहने की गांरटी दी गई तो उत्तर कोरिया का कहना है कि परमाणु हथियारों को बनाए रखने की उसे कोई वजह नज़र नहीं आती.”

हालांकि आलोचक उत्तर कोरिया की मंशा पर शक जताते हैं. अतीत में भी उत्तर कोरिया अपनी कही बातों से मुकरा है. 2005 में हथियार घटाने का समझौता उनमें से एक है.

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UN टीम को हाफिज सईद-आतंकी संगठनों की सीधी जांच नहीं करने देगा PAK

मुंबई हमलों के मास्टरमाइंड हाफिज सईद और उसके आतंकी संगठनों की जांच के लिए पाकिस्तान आ रही UN की जांच टीम की राह में पहले ही रोढ़े अटका दिए गए हैं। पाकिस्तान ने कहा है कि UN की स्पेशल जांच टीम को सईद और उसके संगठनों की सीधी जांच नहीं करने दी जाएगी। ये टीम 25 और 26 जनवरी को पाकिस्तान में रहेगी। इस टीम की पाकिस्तान विजिट इसलिए भी खास हो जाती है कि क्योंकि पिछले ही हफ्ते पाकिस्तान के पीएम शाहिद खकान अब्बासी ने कहा था कि पाकिस्तान में हाफिज सईद के खिलाफ कोई केस नहीं है, लिहाजा उसके खिलाफ कोई कार्रवाई भी नहीं की जा सकती।

सईद तक सीधी पहुंच मुमकिन नहीं

– पाकिस्तान के अखबार ‘द नेशन’ ने यूएन टीम की जांच के बारे में एक रिपोर्ट पब्लिश की। इसमें पाकिस्तान सरकार के सूत्रों के हवाले से कई अहम जानकारियां दी गई हैं।
– इन सूत्रों के मुताबिक, यूएन सिक्युरिटी काउंसिल की sanctions monitoring team टीम को हाफिज सईद या जमात-उद-दावा के अलावा इससे जुड़े बाकी संगठनों तक सीधी पहुंच (direct access) नहीं दी जाएगी।
– एक और रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान सरकार ने तय किया है कि हाफिज सईद के मामले में वो दबाव में नहीं आएगी।

अभी मंजूरी नहीं मांगी गई

– रिपोर्ट में पाकिस्तान सरकार के एक बड़े अफसर के हवाले से कहा गया- उन्होंने (UNSC टीम) ने फिलहाल, हमसे हाफिज सईद तक सीधी पहुंच की मंजूरी नहीं मांगी है। लेकिन, वो इसकी इजाजत मांगते भी हैं तो उन्हें ये नहीं दी जाएगी। हम उनसे बातचीत कर रहे हैं।
– एक और अफसर ने कहा- ये टीम पाकिस्तान के अफसरों से मिलेगी और बैन किए गए संगठनों की लिस्ट मांगेगी। हमने यूएन के ऑर्डर फॉलो किए हैं। इसलिए, इस मामले में परेशान होने की कोई जरूरत नहीं है।

किन संगठनों पर बैन

– यूएन ने पाकिस्तान में कई संगठनों को बैन किया है। इनमें जमात-उद-दावा, तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान, लश्कर-ए-झांगवी, फलाह-ए-इंसानियत फाउंडेशन और लश्कर-ए-तैयबा शामिल हैं। इनके अलावा इन संगठनों के सरगनाओं जिनमें हाफिज सईद भी शामिल को भी बैन किया गया है।

पाकिस्तान सरकार के दावों पर भरोसा नहीं

– पाकिस्तान सरकार ने दावा किया था कि उसने हाफिज सईद के जमात-उद-दावा और फलाह-ए-इंसानियत फाउंडेशन के चंदा लगाने और पब्लिक प्रोग्राम करने पर रोक लगा दी है। हालांकि, उसके इन दावों की हकीकत पर सवाल उठते रहे।
– पाकिस्तान के ही कुछ सांसदों ने हाफिज सईद को देश के लिए खतरा बताया। मीडिया रिपोर्ट्स में भी दावा किया गया कि सईद पर किसी तरह की कोई बंदिशें नहीं हैं और वो अपने संगठनों के नाम बदलकर काम कर रहा है।
– खतरा तब और बढ़ता नजर आया है जब पता लगा कि पाकिस्तान के स्टॉक मार्केट में फलाह-ए-इंसानियत फाउंडेशन को रजिस्टर कराने की कोशिश खुद पाकिस्तान सरकार कर रही है। इसके बाद भारत और अमेरिका ने पाकिस्तान पर दबाव बढ़ा दिया।

 अमेरिका की पाकिस्तान को दो टूक

– शुक्रवार को अमेरिका के स्टेट डिपार्टमेंट ने पाकिस्तान से दो टूक कहा कि हाफिज सईद एक आतंकवादी है और उसके खिलाफ पूरी तरह कार्रवाई होनी चाहिए।
– अमेरिका का यह बयान पाकिस्तान के पीएम द्वारा सईद को क्लीन चिट देने के बाद आया। अब्बासी ने कहा था कि सईद के खिलाफ कानूनी तौर पर कोई केस दर्ज नहीं है और इसलिए उसके खिलाफ कार्रवाई नहीं की जा सकती।
– सईद को 9 महीने हाउस अरेस्ट में रखने के बाद पिछले साल नवंबर में ही रिहा किया गया था। जमात-उद-दावा को 2014 में आतंकी संगठन घोषित किया गया था।

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सऊदी अरब और ईरान के बीच अगर युद्ध हुआ तो क्या होगा?

मंगलवार को सऊदी अरब की राजधानी रियाद पर एक मिसाइल दागी गई. इस मिसाइल के निशाने पर था सऊदी अरब का राजमहल. जहां पर सऊदी किंग सलमान बजट पेश करने वाले थे. मिसाइल अपने निशाने तक पहुंचती, उससे पहले ही इसे हवा में मार गिराया गया.

यूं तो ये मिसाइल सऊदी अरब के पड़ोसी देश यमन के बाग़ी हूथियों ने दागी थी, मगर सऊदी अरब को यक़ीन है कि इसका रिमोट यमन से दूर ईरान की राजधानी तेहरान में था. ईरान, जो कई दशकों से सऊदी अरब का सबसे बड़ा दुश्मन है.

सऊदी अरब समेत दुनिया के कई देश मानते हैं कि यमन के शिया हूथी विद्रोहियों की पुश्त पर ईरान का हाथ है. रियाद पर दागी गई ये मिसाइल, सऊदी अरब और ईरान के बीच क़रीब एक सदी से जारी तनातनी की सबसे ताज़ा मिसाल है. इस साल ये तीसरा मौक़ा था जब हूथी विद्रोहियों ने सऊदी अरब पर मिसाइल फेंकी थी.

 

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सियासी और सामरिक ताक़त

इन दिनों पश्चिमी एशिया में हालात कुछ यूं हैं कि मानो सऊदी अरब और ईरान में जंग छिड़ने वाली हो. तो, अगर सऊदी अरब और ईरान के बीच युद्ध हुआ, तो क्या होगा?बीबीसी की रेडियो सिरीज़ द इंक्वॉयरी में इस सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश की गई है.

सऊदी अरब और ईरान पश्चिमी एशिया की दो बड़ी सियासी और सामरिक ताक़तें हैं. दोनों बड़े तेल उत्पादक देश हैं. अगर दोनों के बीच युद्ध हुआ, तो इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा. ब्रिटेन के माइकल नाइट अरब मामलों के जानकार हैं. वो ब्रिटिश सरकार के अरब मामलों के सलाहकार रहे थे.

नाइट बताते हैं, “ईरान, ऐतिहासिक रूप से बहुत असरदार देश रहा है. कई सदियों तक उसने अरब देशों पर राज किया. तब इसे पर्शिया के नाम से जाना जाता है. वहीं, सऊदी अरब और दूसरे अरब देशों ने पिछली एक सदी में तेल की वजह से काफ़ी तरक़्क़ी की है. इस दौरान ये अरब देश ताक़तवर बनकर उभरे हैं. इस वजह से ईरान का असर इन इलाक़ों पर कम होता गया है.”

 

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ताकि विरोधी पर दबदबा क़ायम कर सकें

माइकल नाइट कहते हैं, “सऊदी अरब और ईरान के बीच तनातनी की बड़ी वजह मज़हबी भी है. सऊदी अरब एक सुन्नी देश है. वहीं ईरान, इस्लाम के शिया फ़िरक़े को मानने वाला. दोनों ही देश, अपने धार्मिक साथियों को दूसरे देशों में भी बढ़ावा देते रहे हैं, ताकि विरोधी पर दबदबा क़ायम कर सकें. ये भी ईरान और सऊदी अरब के बीच कड़वाहट की बड़ी वजह है.”

पिछले कुछ सालों में ईरान, सऊदी अरब पर भारी पड़ता दिख रहा है. कई अरब देशों पर उसका दबदबा बढ़ रहा है. ईरान ने इराक़ में अपना असर बढ़ा लिया है. सीरिया और लेबनान में भी उसके प्यादे काफ़ी ताक़तवर हैं. वहीं, यमन में वो हूथी विद्रोहियों को हथियार और ट्रेनिंग मुहैया करा कर सऊदी अरब की नाक में दम किए हुए है.

माइकल नाइट का कहना है, “इसमें ईरानी फौज का इंक़लाबी दस्ता यानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स का बड़ा हाथ रहा है.” नाइट के मुताबिक़ रिवोल्यूशनरी गार्ड्स, ईरान का सबसे ताक़तवर हथियार हैं. इनका ख़ौफ़ अरब देशों पर तारी है. ये बेहद पेशेवर दस्ता है. जिसने कई मोर्चों पर अपनी ताक़त दिखाई है.

 

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Image captionरिवोल्यूशनरी गार्ड्स

शिया, सुन्नी और रिवोल्यूशनरी गार्ड्स

अरब देशों में शिया, रिवोल्यूशनरी गार्ड्स को अपनी फौज मानते हैं. वहीं सुन्नी अरब इससे डरते हैं.

माइकल नाइट के मुताबिक़, “सऊदी अरब और ईरान के बीच औपचारिक जंग भले न छिड़ी हो. मगर, दोनों ही देश कई मोर्चों पर लड़ रहे हैं. इसकी सबसे बड़ी मिसाल है यमन. जहां पर सऊदी अरब की अगुवाई में कई देशों की सेनाएं, हूथी विद्रोहियों से लड़ाई लड़ रही हैं. वहीं हूथियों को ईरान की सरपरस्ती हासिल है. सऊदी अरब, यमन पर लगातार हवाई हमले कर रहा है. मगर, वो निर्णायक जीत हासिल करने में नाकाम रहा है. सऊदी अरब की नज़र में उसकी जीत की राह में ईरान सबसे बड़ा रोड़ा है.”

यमन के अलावा, सीरिया में भी सऊदी अरब और ईरान, अलग-अलग गुटों के साथ हैं. ईरान, जहां राष्ट्रपति बशर अल असद का समर्थन कर रहा है. वहीं, सऊदी अरब, असद के ख़िलाफ़ बग़ावत करने वालों का साथ दे रहा है.

 

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Image caption1980-88 ईरान इराक के बीच युद्ध के दौरान प्रदर्शित मिसाइलें

शीत युद्ध की स्थिति

लेबनान में ईरान समर्थित हिज़बुल्लाह गुट ताक़तवर है. वहीं सऊदी अरब भी वहां के सुन्नियों का साथ देता है. इराक़ में भी ईरान और सऊदी अरब के बीच दबदबा बढ़ाने की होड़ लगी है. इराक़ की सरकार ने इस्लामिक स्टेट पर जीत हासिल की, तो इसमें ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स का बड़ा हाथ माना जाता है.

इसी तरह, एक छोटे से मुल्क़ बहरीन में भी सऊदी अरब और ईरान आमने-सामने हैं. बहरीन एक शिया बहुल मुल्क़ है. मगर यहां का शेख़ सुन्नी है. सऊदी अरब यहां के राजा के साथ है. वहीं, ईरान, बहरीन में सरकार विरोधी शिया गुरिल्ला संगठनों के साथ है.

माइकल नाइट कहते हैं कि अभी सऊदी अरब और ईरान के बीच कई देशों में शीत युद्ध सा चल रहा है. लेकिन ये कभी भी असल जंग का रूप ले सकता है.

एंथनी कोडिसमन अमरीका और नैटो के अरब मामलों के सलाहकार रहे हैं. वो मानते हैं कि ईरान और सऊदी अरब के बीच जंग एक छोटी सी चिंगारी के तौर पर शुरू हो सकती है. जो आगे चलकर बड़ी जंग बन सकती है. एंथनी मानते हैं कि ये जंग लंबे वक़्त तक चल सकती है.

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सऊदी अरब के पास F-15, F-16 और ब्लैक टॉरनेडो

हालांकि एंथनी को लगता है कि ज़मीनी मोर्चे पर तो दोनों देशों की सेनाएं शायद ही आमने-सामने आएं. हां, हवाई जंग ज़रूर भयंकर हो सकती है. एंथनी के मुताबिक़, “हवाई ताक़त में सऊदी अरब फ़िलहाल ईरान पर भारी दिखता है.”

वो कहते हैं, “ईरान के पास सत्तर और अस्सी के दशक के लड़ाकू विमान हैं. ईरान ने इनका रख-रखाव बड़े अच्छे तरीक़े से कर रखा है. साथ ही ईरान ने रूस से भी कुछ लड़ाकू विमान अस्सी के दशक में ख़रीदे थे. यही विमान ईरान की एयरफ़ोर्स की प्रमुख ताक़त हैं.”

वहीं, सऊदी अरब की वायुसेना के पास अमरीकी लड़ाकू विमान जैसे F-15 और F-16 हैं. ब्लैक टॉरनेडो है. यानी हवाई मोर्चे पर सऊदी अरब ज़्यादा ताक़तवर दिखता है. हालांकि ईरान के पास, सऊदी अरब से ज़्यादा बेहतर मिसाइलें और ड्रोन हैं. ये सऊदी अरब के अहम शहरी ठिकानों को निशाना बना सकती हैं.

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Image captionब्लैक टॉरनेडो

इसराइल भी ईरान के ख़िलाफ़!

एंथनी कहते हैं कि जंग छिड़ी तो ईरान, सऊदी अरब के बुनियादी ढांचे को तबाह कर सकता है. ईरान की मिसाइलें, सऊदी अरब के पानी साफ़ करने के प्लांट और बिजलीघरों को निशाना बना सकता है. इससे सऊदी अरब बुरी तरह तबाह हो सकता है. सऊदी अरब के शहरों को पानी और बिजली की सप्लाई ठप हो जाएगी.

इसके बदले में सऊदी अरब अपने लड़ाकू विमानों से ईरान में बिजली सप्लाई करने वाले ठिकानों, पानी साफ़ करने वाले संयंत्रों पर हमला कर सकता है. इसके अलावा सऊदी अरब, ईरान के तेल के ठिकानों और रिफ़ाइनरी पर हवाई हमले कर सकता है.

एंथनी मानते हैं, “ईरान और सऊदी अरब की जंग बड़ी आर्थिक तबाही का बायस बन सकती है. वो इसकी तुलना शतरंज के त्रिकोणीय मुक़ाबले से करते हैं. सऊदी अरब के साथ जहां संयुक्त अरब अमीरात, मिस्र, ओमान, जॉर्डन, अमरीका, ब्रिटेन और फ्रांस खड़े नज़र आते हैं. वहीं ईरान के खेमे में सीरिया, रूस और इराक़ जैसे देश हैं.”

तेल सप्लाईइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

युद्ध हुआ तो तेल सप्लाई ठप

एंथनी मानते हैं कि जंग की सूरत में इसराइल भी ईरान के ख़िलाफ़ गठबंधन में शामिल हो सकता है. साफ़ है कि ईरान और सऊदी अरब के बीच युद्ध की सूरत में अमरीका और रूस जैसे देशों का रोल ज़्यादा बड़ा होगा. अमरीका फ़िलहाल सऊदी अरब के साथ खड़ा है.

मैरी कॉलिंस, अमरीका की जॉन हॉपकिंस इंस्टीट्यूट से जुड़ी हैं. उन्होंने कई बरस अमरीकी रक्षा मंत्रालय के साथ काम किया है.

मैरी मानती हैं कि ईरान और सऊदी अरब के बीच युद्ध में अमरीका यक़ीनी तौर पर दखल देगा. फारस की खाड़ी स्थित होर्मुज़ जलसंधि से दुनिया के तेल कारोबार का एक बड़ा हिस्सा गुज़रता है. युद्ध हुआ तो ये सप्लाई ठप हो सकती है. इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा.

आधुनिक लड़ाकू विमान

अमरीका क़तई नहीं चाहेगा कि दुनिया को तेल की सप्लाई पर असर पड़े. इसीलिए, ईरान और सऊदी अरब के बीच युद्ध की सूरत में अमरीका का शामिल होना तय है.

मैरी कॉलिंस कहती हैं कि होर्मुज़ में ईरान समुद्र में बारूदी सुरंगे बिछा सकता है. इससे उस इलाक़े से गुज़रने वाले जहाज़ तबाह होने का ख़तरा हो सकता है. ऐसी तबाही होने से रोकने के लिए अमरीका युद्ध होने के एक घंटे के भीतर शामिल हो जाएगा.

कॉलिंस कहती हैं कि खाड़ी देशों में अमरीका के 35 हज़ार से ज़्यादा सैनिक तैनात हैं. अमरीका वायुसेना के F-22 जैसे अति आधुनिक लड़ाकू विमान भी यहां पर तैनात हैं. एक बेड़ा हमेशा फ़ारस की खाड़ी में मौजूद रहता है.

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एक ही दिन में तबाही

कॉलिंस के मुताबिक़ ईरान और सऊदी अरब के युद्ध शुरू होने पर अमरीका सेनाएं फ़ौरन सक्रिय हो जाएंगी. और ये एक दिन में ईरान की पूरी की पूरी नौसेना को बर्बाद कर सकती हैं. वो नब्बे के दशक की एक मिसाल देती हैं. तब अमरीका का एक जहाज़ बारूदी सुरंग की वजह से तबाह हो गया था.

इसके बदले में एक दिन में ही अमरीका ने ईरान की पूरी नौसैनिक ताक़त को तबाह कर दिया था. अमरीकी दखल की वजह से ईरान और सऊदी अरब के बीच जंग कुछ दिनों में ही ख़त्म हो जाएगी. तो, क्या युद्ध के साथ ईरान और सऊदी अरब के बीच झगड़ा हमेशा के लिए ख़त्म हो जाएगा? क्या इस इलाक़े में शांति बहाल हो सकेगी?

ईरानी मूल के अली वाइज़ अमरीका में रहते हैं. वो इंटरनेशन क्राइसिस ग्रुप के लिए काम करते हैं. इस संगठन का काम जंग को रोकना है. अली वाइज़ का बचपन अस्सी के दशक के ईरान-इराक़ युद्ध के दौरान ईरान में गुज़रा था.

दुनिया की अर्थव्यवस्था

ली वाइज़ मानते हैं कि ईरान और सऊदी अरब के युद्ध से दोनों देशों की अर्थव्यवस्था तबाह हो जाएगी. क्योंकि ज़्यादा से ज़्यादा नुक़सान पहुंचाने के लिए दोनों ही देश एक-दूसरे के तेल के ठिकानों, रिफाइनरी, पानी सप्लाई करने वाले प्लांट और बिजली घरों को निशाना बनाएंगे.

युद्ध हुआ तो कच्चे तेल का उत्पादन ठप हो सकता है. इसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा. ईरान और सऊदी अरब के बीच कुछ दिनों की जंग भी हुई, तो तेल के दाम आसमान पर पहुंच जाएंगे. अली मानते हैं कि सऊदी अरब और ईरान के बीच युद्ध की वजह से पूरे इलाक़े में शियाओं और सुन्नियों के बीच तनातनी बढ़ जाएगी.

यानी, ईरान-सऊदी अरब के युद्ध को तो अमरीका अपने दखल से कुछ दिनों में ही ख़त्म कर देगा. मगर इसके बाद, पूरे पश्चिमी एशिया में ईरान और सऊदी अरब के बीच शीत युद्ध का नया दौर शुरू होगा. ताक़त बढ़ाने के नए मोर्चे खुलेंगे. इराक़, सीरिया, यमन जैसे झगड़े दूसरे देशों में पांव पसारेंगे.

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दशकों तक महसूस किएजाएंगे ज़ख़्म

क्योंकि अमरीका के हमले से ईरान की सेनाएं तो तबाह हो जाएंगी. मगर ईरान, सऊदी अरब के सुन्नी साथी देशों का विरोध करने वालों को समर्थन बढ़ा देगा. जैसे कि इराक़ में शिया और सुन्नी हथियारबंद गुटों के बीच झगड़े बढ़ जाएंगे. लेबनान में हिज़्बुल्लाह और सऊदी समर्थित गुटों की भिड़ंत बढ़ जाएगी.

यही हालात सीरिया और जॉर्डन में दिख सकते हैं. अली वाइज़ बताते हैं कि ईरान और सऊदी अरब के बीच न तो कारोबारी रिश्ते हैं, न सामाजिक और सांस्कृतिक संबंध हैं. ऐसे में युद्ध के ज़ख़्म आने वाले कई दशक तक महसूस किए जाते रहेंगे. कुल मिलाकर ये कहें कि अगर सऊदी अरब और ईरान के बीच युद्ध हुआ, तो ये हवाई जंग होगी.

दोनों देशों के बीच नौसैनिक युद्ध भी होगा. अमरीका, सऊदी अरब की तरफ़ से दखल देकर ईरान को कुछ दिनों में ही हरा देगा. मगर, ईरान सऊदी अरब के लिए छोटी-छोटी जंगों के दूसरे मोर्चे खोल देगा. युद्ध के ज़ख़्म भरेंगे नहीं. बल्कि दोनों देशों के बीच तनातनी का असर दूसरे देश झेलेंगे. इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा.

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इंदौर के शख्स ने सूडान-मिस्र के बीच बनाया देश, पिता को बताया प्रधानमंत्री

अफ्रीकी देशों सूडान और मिस्र के बीच 2072 स्क्वेयर किमी का एरिया ऐसा है, जिस पर दोनों में से किसी देश का मालिकाना हक नहीं है। इंदौर के सुयश दीक्षित इस जगह पर पहुंच गए और अपना झंडा लगा दिया। सुयश कहते हैं कि ये किंगडम ऑफ दीक्षित है और मैं सुयश दीक्षित यहां का राजा हूं। सुयश ने यूएन से अपील भी कर दी कि वो इस नए देश को मान्यता दे और सुयश को इसका मालिकाना हक भी दिया जाए। हालांकि, यूएन की तरफ से अभी तक कोई रिएक्शन नहीं आया है।

सुयशपुर होगी कैपिटल

– सुयश ने अपने देश किंगडम ऑफ दीक्षित के लिए एक झंडा भी तय कर दिया है, जिसके साथ उन्होंने अपनी फोटो सोशल मीडिया पर पोस्ट की। इस किंगडम की राजधानी सुयशपुर होगी।
– सुयश ने किंगडम का प्रधानमंत्री और मिलिट्री हेड अपने पिता को बनाया है। उन्होंने छिपकली को देश का राष्ट्रीय पशु चुना है।
– सुयश ने अपने फेसबुक अकाउंट पर एक पोस्ट में लिखा- “आज से मेरा नाम किंग सुयश दीक्षित है और मैं किंगडम ऑफ दीक्षित का पहला दावेदार हूं।
– “मैं इस 2072 स्क्वेयर किलोमीटर की जमीन पर अपनी दावेदारी पेश करता हूं। यहां आने के लिए मैंने रेतीले स्थानों पर 319 किमी का सफर तय किया है।”
और क्या बोले सुयश
– फेसबुक पोस्ट में सुयश ये भी लिखते हैं, “मैं कुछ आतंकवाद प्रभावित इलाकों से होकर यहां तक पहुंचा हूं। मुझे पता चला है कि मुझसे पहले यहां 5-10 लोग दावा कर चुके हैं।”
– “अब यहां मेरा दावा है। अगर वो इस जमीन को मुझसे वापस लेना चाहते हैं तो उन्हें मेरे साथ जंग लड़नी होगी। ये जंग कॉफी पीकर लड़ी जाएगी।”
– इंदौर के हरिकृष्ण पब्लिक स्कूल से पढ़े सुयश ने लोगों से भी कहा है कि वो इस नए देश की मान्यता लेने के लिए उनके सामने अप्लाई कर दें।
– सूडान और मिस्र के बीच इस लावारिस स्थान का नाम बीर ताविल है।
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अंतरिक्ष की जंग: जिसे शुरू रूस ने किया और अंजाम अमेरिका ने

रहस्य से आश्चर्य पैदा होता है. इंसान के अंदर जो समझने की ललक पैदा होती है, उसे पैदा करने वाला ये आश्चर्य ही है.

                                                                                      – नील आर्मस्ट्रॉन्ग (चांद पर कदम रखने के बाद)


 

जो पंछी हर साल एक मौसम के बाद गायब हो जाते हैं, वो दरअसल चांद चले जाते हैं. फिर वहां से लौटकर धरती वापस आते हैं.

                                                                                       – चार्ल्स मॉर्टन, ब्रिटिश वैज्ञानिक, 17वीं सदी

चांद सदियों तक लोगों के लिए पहेली बना रहा. किसी को उसमें अपनी माशूका का चेहरा नजर आता. कभी चरखा कातती बुढ़िया. किसी को लगता, वहां परियां रहती हैं. किसी को कलंक नजर आता. कभी उसकी पूजा हुई. कभी उससे डर लगा. लोग तरह-तरह की बातें करते चांद के बारे में. चार्ल्स मॉर्टन की भी अपनी थिअरी थी. उनको लगता है, माइगेट्री पंछी चांद चले जाते हैं. तभी साल के बाकी महीने नहीं दिखते. इन सबका दिल टूट गया. उस दिन जब नील आर्मस्ट्रॉन्ग नाम का एक शख्स चांद पर उतरा. उसने बताया, चांद तो उजाड़ है. चांद के इस सफर की शुरुआत हुई थी 4 अक्टूबर, 1957 को. बस चांद की ही क्यों? हम जो किसी दिन सूरज पर जा पहुंचे, उसकी शुरुआत भी इसी दिन में छुपी हुई है.


 

चाहे चांद पर इंसान के पहुंचने की कहानी हो, या मंगल का मिशन, या फिर भविष्य की तमाम योजनाएं और सफलताएं, उन सबकी शुरुआत इसी 4 अक्टूबर की तारीख में छुपी है.

60 साल पहले शुरू हुआ था ये सफर, जो अब सूरज पहुंचने की तैयारी में है
4 अक्टूबर, 1957, 60 साल, इस दिन सोवियत संघ ने पहला कृत्रिम उपग्रह छोड़ा था, अंतरिक्ष में. सैटेलाइट का नाम था स्पूतनिक. रूसी भाषा में यात्री के लिए ये ही शब्द है. इंसानों के हाथों बनी पहली ऐसी कृत्रिम चीज, जिसे पृथ्वी की कक्षा में स्थापित किया गया था. इस तारीख ने यूं ही नहीं इतिहास बनाया. स्पूतनिक की लॉन्चिंग के साथ ही एक स्पेस ऐज शुरू हुआ. अंतरिक्ष युग. अमेरिका और सोवियत के बीच. स्पूतनिक की लॉन्चिंग की खबर सुनकर दुनिया भौंचक्की रह गई. अमेरिका को तो झटका लग गया. दोनों के बीच एक जंग जमीन पर चल रही थी. स्पूतनिक के बाद ये जंग अंतरिक्ष में पहुंच गई. होड़ लग गई दोनों में. आगे निकलने की. आज NASA का नाम कितनी मुहब्बत से लेते हैं हम. ये NASA भी इसी स्पेज ऐज की पैदाइश है. अमेरिका की महत्वाकांक्षी औलाद. बड़ी उम्मीदों से पैदा किया गया था इसे. NASA ने भी उम्मीदों को साबित किया. बड़ी लायक औलाद निकला.

पश्चिमी जर्मनी की एक बच्ची बर्लिन वॉल को तोड़ने की कोशिश करती हुई. दूसरे विश्व युद्ध के बाद सोवियत और अमेरिका में जो कोल्ड वॉर शुरू हुआ, वो सोवियत के बिखरने पर ही खत्म हुआ.

सोवियत और अमेरिका, दोनों एक-दूसरे से ऑब्सेस्ड थे
दूसरा विश्व युद्ध खत्म हो गया था. धरती पर दो छोर हैं. उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव. अमेरिका और सोवियत भी ऐसे ही हो गए थे. पूंजीवादी अमेरिका. वामपंथी सोवियत. विचारधारा का अंतर तो था ही. एक-दूसरे से आगे निकलने की गलाकाट होड़ भी थी. ये वो दौर था, जब लगता था दुनिया में बस दो देश हैं. मेन हीरो. बाकी सारे देश सपोर्टिंग भूमिका में थे. जिंदगी का कोई ऐसा हिस्सा नहीं बाकी रहा, जहां सोवियत और अमेरिका में होड़ नहीं थी. हथियार की होड़. परमाणु शक्ति की होड़. सेना की होड़. कारोबार की होड़. अर्थव्यवस्था की होड़. जासूसी की होड़. कोवर्ट ऑपरेशन की होड़. धमकियों की होड़. अपना दबदबा बढ़ाने की होड़. अपने-अपनी विचारधारा को बेहतर साबित करने की होड़. दोनों पक्ष खुद को सवा शेर साबित करना चाहते थे.

स्पेस एजेंसी नासा उसी धक्कामुक्की के दौर की निशानी है. इसपर अमेरिका को रेस में आगे ले जाने की जिम्मेदारी थी.

फिर आया स्पूतनिक, इस सरप्राइज से बौखला गया अमेरिका
स्पूतनिक की लॉन्चिंग सरप्राइज जैसी थी. 18,000 मील प्रति घंटे की रफ्तार थी इसकी. दूरबीन लगाकर देखने से दिखता था. सूरज उगने से पहले और सूरज डूबने के बाद. ये सैटेलाइट धरती पर रेडियो सिग्नल भेजता था. इतने मजबूत सिग्नल कि नए सीखे रेडियो ऑपरेटर भी कैच कर लेते थे. अमेरिका में जिनके पास ऐसे उपकरण थे, वो बड़े दंग थे. ये सैटेलाइट एक घंटे और 36 मिनट में धरती की एक बार परिक्रमा करता. अमेरिका भी तो इसी धरती पर है. सोवियत का ये सैटेलाइट रोजाना कई बार अमेरिका के ऊपर से भी गुजरता. बुरी तरह से कुढ़ गई थी अमेरिकी सरकार. सोवियत उनसे पहले अंतरिक्ष में जो पहुंच गया था. स्पूतनिक का काम तय था. इसके माध्यम से धरती और सौर मंडल पर अध्ययन किया जा रहा था. शक अजीब मर्ज है लेकिन. अमेरिकियों को लगता था कि सोवियत की साजिश है ये. सैटेलाइट के बहाने कुछ तो साजिश रची जा रही है.

स्पूतनिक औचक से आया. किसी ने उम्मीद नहीं की थी कि सोवियत इतनी जल्दी और यकायक इतना आगे बढ़ जाएगा. 4 अक्टूबर, 1957 की ये तारीख ऐतिहासिक थी.

पहली दौड़ तो बेशक सोवियत ने ही जीती थी
अमेरिका ने जिस पहले उपग्रह की योजना बनाई थी, उससे करीब 10 गुना बड़ा था स्पूतनिक. उसे भी 1958 में लॉन्च होना था. सोवियत की जीत तो हुई थी. उसने खबर तक नहीं लगने दी अपने इरादों की. चुपचाप काम करता रहा. सोवियत की इस तकनीकी श्रेष्ठता से अमेरिकी सरकार, सेना और वैज्ञानिकों की बहुत किरकिरी हुई. इसे दिल पर ले लिया उन्होंने. कसम खाई, सोवियत से पहले चांद पर पहुंचेंगे. सेना, सरकार और वैज्ञानिकों ने मिलकर सोवियत को हराने की रेस शुरू की. इसके साथ ही आगाज हुआ अंतरिक्ष की इस दौड़ का.

लाइका. ये ही कुत्ता था, जिसे स्पूतनिक 2 पर अंतरिक्ष में भेजा गया था.

दूसरी रेस भी सोवियत ने ही जीती
3 नवंबर, 1957. सोवियत ने अपना दूसरा उपग्रह छोड़ा. स्पूतनिक 2. बैक-टू-बैक. एक महीने से भी कम समय में दो सैटेलाइट. ये कोई साधारण उपग्रह नहीं था. सोवियत ने इसके साथ एक कुत्ते को भी भेजा था. मैं जब कभी इसके बारे में पढ़ती हूं, मन मसोस जाता है. लाइका नाम था उस कुत्ते का. उसे वन-वे सफर पर भेजा गया था. मालूम था, जिंदा नहीं लौटेगा. लाइका पहला जीव था, जिसने अंतरिक्ष से पृथ्वी की परिक्रमा की. कहते हैं, लाइका को कोई तकलीफ नहीं हुई होगी मरते समय. जो भी हो. मिशन पर भेजे जाने की अनुमति तो किसी ने नहीं ली होगी उससे.

जब स्पूतनिक 2 लाइका को लेकर अंतरिक्ष गया, तो दुनिया में जैसे तहलका मच गया. पहला मौका था जब किसी जीव ने स्पेसक्राफ्ट में धरती की परिक्रमा की. अखबार में छपी ये खबर उसी मौके की है.

1958 में अमेरिका ने छोड़ा अपना पहला उपग्रह
31 जनवरी, 1958. वो तारीख जब अमेरिका ने अपना पहला सैटेलाइट छोड़ा. एक्सप्लोरर. जब तक अमेरिका ने अपना पहला कदम रखा, सोवियत आगे बढ़ गया था. ये जख्म पर मिर्च छिड़कने जैसी स्थिति थी.

बचपन में पढ़ा है कई बार. अंतरिक्ष में जाने वाले पहले शख्स का नाम यूरी गागरिन था. चांद पर कदम रखने वाले पहले शख्स का नाम नील आर्मस्ट्रॉन्ग था. इन दोनों के बीच का जो फासला था, वो स्पेस रेस का चरम है.

पहली-पहली बार करने के कई रेकॉर्ड तो सोवियत के ही नाम हैं
सोवियत का सिक्का जम गया था. उसे जैसे जुनून सवार था. पहली-पहली बार हासिल करने का. ऐसी कई उपलब्धियां सोवियत के नाम हैं. जिन्हें बचपन से ही हम सब सामान्य ज्ञान की किताबों में रटते आ रहे हैं.

अंतरिक्ष में जाने वाला पहला इंसान: यूरी गागरिन (रूस)
अंतरिक्ष में जाने वाली पहली महिला: वेलेंतिका तेरेशकोवा (रूस)
अंतरिक्ष में पहली बार चलने वाला शख्स: ऐलेक्सी लियोनोव (रूस)
चांद पर जाने वाला पहला अंतरिक्षयान: लूना 2
शुक्र की सतह पर भेजा गया पहला स्पेसक्राफ्ट:वेनेरा 3

इंसान भले ही अब अंतरिक्ष में काफी आगे निकल गया हो, लेकिन चांद पर पहला कदम रखने का अनुभव सबसे यादगार रहेगा.

फिर आया अमेरिका का दौर, सौ सोनार की और एक लोहार की
1960 के आखिरी सालों में अमेरिका ने बड़ा कदम बढ़ाया. राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी ने कहा था. दशक खत्म होने से पहले इंसान को चांद पर उतारेंगे. 1962 में जॉन ग्लेन पहले ऐसे अमेरिकी व्यक्ति बने, जिन्होंने स्पेसक्राफ्ट में धरती की परिक्रमा की. फिर आया NASA का ऐतिहासिक अपोलो मिशन. 1961 से 1964 के बीच अमेरिकी सरकार ने NASA का बजट करीब 500 फीसद बढ़ा दिया. चांद के मिशन के लिए NASA में करीब 34,000 कर्मचारी काम कर रहे थे. कॉन्ट्रैक्ट पर करीब पौने चार लाख लोग भी काम में लगाए गए थे. 1967 में अपोलो मिशन को झटका लगा. तीन अंतरिक्षयात्री मारे गए. सोवियत का लूनर मिशन उतना तेज नहीं था. सोवियत में इसे लेकर बहस थी. इसकी जरूरत है या नहीं, इसे लेकर. फिर सोवियत स्पेस प्रोग्राम के मुख्य इंजीनियर सेरेगी कोरोलोव की असमय मौत होने से भी सोवियत को धक्का लगा.

न वेकल सोवियत और अमेरिका की सरकारें, बल्कि दोनों देशों के लोग और मीडिया भी इस जंग का हिस्सा बन चुके थे. दोनों को एक-दूसरे से पिछड़ना किसी भी सूरत में मंजूर नहीं था.

ऐतिहासिक था वो दौर, पहली बार चांद पर उतरा था इंसान
दिसबंर 1968. इंसानों को लेकर पहला स्पेसक्राफ्ट चांद के लिए रवाना हुआ. इसे चांद की परिक्रमा करनी थी. 16 जुलाई, 1969. अपोलो 11 मिशन की रवानगी हुई. इसमें थे नील आर्मस्ट्रॉन्ग, ऐडविन अल्ड्रिन और माइकल कोलिन्स. 20 जुलाई को ये अंतरिक्षयान चांद की सतह पर पहुंचा. नील आर्मस्ट्रॉन्ग चांद की सतह पर कदम रखने वाले पहले इंसान बने. ये इतिहास था. सदियों से हम इंसान चांद को सिर उठाकर देखते आए थे. जाने कैसी-कैसी कल्पना करते थे. कविताओं में, कहानियों में, जाने कितने तरह की उपमाएं जोड़ते थे चांद के नाम पर. उसी चांद पर इंसानों ने कदम रखा. जब भी इंसानों की सबसे बड़ी उपलब्धियों की बात होगी, इस तारीख का जिक्र किया जाएगा. नील आर्मस्ट्रॉन्ग की वो तस्वीर पूरी इंसानी सभ्यता के सबसे यादगार पलों में से एक है.

सोवियत ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया, लेकिन चांद पर उतरने की उसकी कोशिशें लगातार नाकाम होती गईं.

चांद पर क्या पहुंचा अमेरिका, लगा दौड़ खत्म हो गई
स्पूतनिक के साथ दौड़ शुरू हुई. अपोलो ने इसे अंजाम पर पहुंचाया. वो कहते हैं ना, तुमने शुरू किया है लेकिन खत्म मैं करूंगा. वैसे ही. सोवियत में रेस में बने रहने की पुरजोर कोशिश की. 1969 से 1972 के बीच चार बार कोशिश की. चांद की सतह पर स्पेसक्राफ्ट लैंड करने की. हर बार नाकामयाबी हाथ लगी. जुलाई 1969 में लॉन्चिंग के वक्त जोरदार धमाका हुआ. सोवियत ने बहुत हाथ-पैर मारे आगे आने के लिए. कामयाब नहीं हो सका पर. एक बार जो पिछड़ा, तो पिछड़ ही गया. ऐस्ट्रोनॉट्स हीरो बन गए. लोग उन जैसा बनना चाहते थे. अमेरिकी जनता और अमेरिकी मीडिया शुरू से ही लगातार इस पूरी स्पेस रेस में बेहद दिलचस्पी ले रही थी. सरकार पर दबाव बना रही थी. सोवियत की हर उपलब्धि पर वहां सवाल होते थे. सरकार को जवाब देना पड़ता था. जमीन पर सोवियत और अमेरिका की तल्खियां चरम पर थीं. अंतरिक्ष में भी कुछ राहत नहीं थी. इन दोनों देशों ने हर मोर्चे पर जमकर दुश्मनी निभाई. दोनों एक-दूसरे से ऑब्सेस्ड थे. ये प्रतिस्पर्धा नहीं थी. ये दुश्मनी थी. दांत काटे की दुश्मनी.

बाईं ओर हैं अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज एच डब्ल्यु बुश और दाहिनी ओर सोवियत संघ के राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाचेव. ये तस्वीर 1991 में ली गई. मॉस्को में हाथ मिलाते हुए दोनों नेताओं की ये तस्वीर शीत युद्ध की सबसे प्रभावी तस्वीरों में से एक है.

हाथ मिलाया और रेस खत्म
साल 1975. अमेरिका और सोवियत का जॉइंट मिशन. अपोलो-सोयुज मिशन. अपोलो का स्पेसक्राफ्ट. सोवियत में बना सोयुज. दोनों यानों के अधिकारियों ने एक-दूसरे का अभिवादन किया. हाथ मिलाया. धरती की दुश्मनी को अंतरिक्ष में तिलांजलि दी गई. धरती पर दुश्मनी खत्म नहीं हुई थी. बराबर निभाई जा रही थी. उसे खत्म होने में वक्त लगा. बर्लिन की दीवार टूटी. सोवियत संघ टूटा. शीत युद्ध खत्म हुआ. स्पेस रेस में लोग अक्सर सोवियत को हारा हुआ खिलाड़ी बताते हैं. ऐसा नहीं है. कई अहम उपलब्धियां सोवियत के नाम हैं. पहली-पहली बार कई चीजें तो उसने ही की. शायद सोवियत को पीछे छोड़ने की ललक ही थी, जिसने अमेरिका को इतनी तेजी से पैर पसारने को मजबूर किया. बिना सोवियत के शायद ये सब मुमकिन नहीं हो पाता. सोवियत और अमेरिका की इस धक्कामुक्की में दुनिया को बहुत फायदा हुआ. अंतरिक्ष विज्ञान में इतनी तरक्की की इंसानों ने. देखा जाए, तो फायदा पूरी दुनिया का हुआ.

(सौजन्य: लल्लनटोप)