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अमेजन एक ट्रिलियन डॉलर मार्केट कैप वाली दूसरी अमेरिकी कंपनी

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अमेजन 1 ट्रिलियन डॉलर (71 लाख करोड़ रुपए) मार्केट कैप वाली अमेरिका की दूसरी और दुनिया की तीसरी कंपनी बन गई। इसका शेयर मंगलवार को 2% तेजी के साथ 2050.50 डॉलर पर पहुंच गया। इस बढ़त से मार्केट वैल्यू में इजाफा हुआ।

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एपल दो अगस्त को 1 ट्रिलियन डॉलर की पहली अमेरिकी कंपनी बनी थी। अमेजन का मार्केट कैप एपल से 9900 करोड़ डॉलर कम है। एपल से पहले 2007 में शंघाई के शेयर बाजार में पेट्रोचाइना का मार्केट वैल्यूएशन 1 ट्रिलियन डॉलर के आंकड़े पर पहुंचा था।

दुनिया की टॉप-3 मार्केट कैप वाली कंपनियां

कंपनी मार्केट कैप (डॉलर)
एपल 1099 अरब
अमेजन 1000 अरब
माइक्रोसॉफ्ट 856 अरब

एक साल में शेयर 100% से ज्यादा चढ़ा: पिछले 12 महीने में अमेजन के शेयर ने 108% रिटर्न दिया। इस साल जनवरी से अब तक इसमें 74% तेजी आई। पिछले तीन महीने में निवेशकों को 20% और एक महीने में करीब 12% मुनाफा दिया।

21 साल में शेयर प्राइस बढ़कर 114 गुना: 15 मई 1997 को 18 डॉलर पर अमेजन के शेयर की लिस्टिंग हुई। मंगलवार की तेजी के बाद शेयर 2050 के ऊपर चला गया। आईपीओ में 1000 डॉलर के निवेश की वैल्यू अब 13 लाख 41 हजार डॉलर से भी ज्यादा हो गई।

तारीख शेयर प्राइस
15 मई 1997 18 डॉलर
23 अक्टूबर 2009 100 डॉलर
27 अक्टूबर 2017 1000 डॉलर
30 अगस्त 2018 2000 डॉलर

जेफ बेजोस दुनिया में सबसे अमीर: अमेजन के फाउंडर और सीईओ लंबे समय से दुनिया के अमीरों की लिस्ट में टॉप पर बने हुए हैं। ब्लूमबर्ग बिलेनियर इंडेक्स में 166 अरब डॉलर नेटवर्थ के साथ बेजोस नंबर-1 हैं। शेयर में तेजी से इस साल उनकी दौलत में 66.5 अरब डॉलर का इजाफा हुआ। बिलेनियर इंडेक्स में 98.1 अरब डॉलर नेटवर्थ के साथ बिल गेट्स दूसरे नंबर पर हैं। एशिया के सबसे अमीर मुकेश अंबानी 47.7 अरब डॉलर के साथ 12वें नंबर पर हैं।

 

अमेजन का सफर

1994 किताब बेचने से शुरुआत
मई 1997 अमेरिकी शेयर बाजार में लिस्टिंग
जून 1998 आईएमडीबी का अधिग्रहण

ऑनलाइन म्यूजिक स्टोर की शुरुआत

दिसंबर 2000 कैमरा, फोटो स्टोर शुरू किया

अमेजन मार्केटप्लेस लॉन्च

फरवरी 2005 अमेजन प्राइम लॉन्च
नवंबर 2007 अमेजन किंडल, अमेजन म्यूजिक शुरू
सितंबर 2011 किंडल फायर, किंडल टच, किंडल टच 3जी बाजार में उतारे
दिसंबर 2016 अमेजन वीडियो लॉन्च

ड्रोन सर्विस प्राइम एयर से पहली डिलीवरी

अगस्त 2017 13 अरब डॉलर में होल फूड्स का अधिग्रहण
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वर्ल्‍ड ट्रेड वार में भारत ने भी दिया अमेरिका को उसकी ही भाषा में जवाब

गौरतलब है कि पिछले दिनों अमेरिकी कारोबार प्रतिनिधि (यूएसटीआर) रॉबर्ट लाइटहाइजर के कार्यालय ने भारत सरकार द्वारा वस्तुओं के निर्यात को लेकर चलाई जाने वाली योजनाओं तथा निर्यात से जुड़ी इकाइयों की योजनाओं व अन्य ऐसी योजनाओं को लेकर विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में भारत के खिलाफ कारोबारी विवाद आपत्तियों के निपटारे हेतु कठोर आवेदन प्रस्तुत किया था। अमेरिका की इन आपत्तियों पर भारत सरकार ने दलील दी कि उसके द्वारा दी जा रही विभिन्न राहत और सुविधाएं डब्ल्यूटीओ के नियमों के तहत ही हैं। लेकिन अमेरिका अनुचित और अन्यायपूर्ण ढंग से भारत पर व्यापार प्रतिबंध बढ़ाते हुए दिखाई दे रहा है। ऐसे में भारत ने विगत 18 मई को डब्ल्यूटीओ को अमेरिका से आयातित 30 उत्पादों की सूची सौंपी थी, जिन पर वह आयात शुल्क बढ़ाना चाहता था। अब भारत ने इनमें से 29 वस्तुओं पर आयात शुल्क बढ़ा दिया है।

वर्ल्‍ड ट्रेड वॉर
इससे यही लगता है कि बीते कुछ दिनों से वर्ल्‍ड ट्रेड वॉर यानी वैश्विक व्यापार युद्ध को लेकर जो आशंका जताई जा रही थी, वह सही साबित होने लगी है। यह सही है कि अमेरिका ने द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद कोई सात दशक तक वैश्विक व्यापार, पूंजी प्रवाह और कुशल श्रमिकों के लिए न्यायसंगत आर्थिक व्यवस्था के निर्माण और पोषण में उल्लेखनीय योगदान दिया है, लेकिन अब वही वैश्विक व्यवस्था मौजूदा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कदमों से जोखिम में है। इस साल अमेरिका ने चीन, मैक्सिको, कनाडा, ब्राजील, अर्जेटीना, जापान, दक्षिण कोरिया व यूरोपीय संघ के विभिन्न देशों के साथ-साथ भारत की कई वस्तुओं पर आयात शुल्क बढ़ाए हैं। जैसे-जैसे अमेरिका विभिन्न देशों के आयातों पर शुल्क बढ़ा रहा है, जवाब में वे देश भी वैसा ही कर रहे हैं। इसका दुष्प्रभाव भी भारत के वैश्विक कारोबार पर पड़ रहा है। गौरतलब है कि 19 जून को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चीन के 200 अरब डॉलर के आयात पर 10 फीसद शुल्क लगाने की चेतावना दी।

चीन ने लगाया शुल्‍क
इसके चार दिन पूर्व ही ट्रंप ने चीन से 50 अरब डॉलर मूल्य के सामान के आयात पर 25 फीसद शुल्क लगाने को मंजूरी दे दी। इसके बाद चीन ने त्वरित प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि वह भी 50 अरब डॉलर मूल्य की अमेरिकी वस्तुओं पर 25 फीसद शुल्क लगाएगा। इससे दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच ट्रेड वॉर की आशंका बढ़ गई। उल्लेखनीय है कि इसी माह कनाडा के क्यूबेक सिटी में आयोजित जी-7 देशों का दो दिवसीय शिखर सम्मेलन भी अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के बयानों और नीतियों की वजह से तमाशा बनकर रह गया। जी-7 के सदस्य देश कनाडा, जर्मनी, इटली, जापान, फ्रांस तथा ब्रिटेन जहां पहले ही ट्रंप की ट्रेड पॉलिसी को लेकर नाखुश थे, वहीं जी-7 सम्मेलन के तुरंत बाद अमेरिका ने इस समूह के विभिन्न देशों से होने वाले कुछ आयातों पर नए व्यापारिक प्रतिबंध घोषित करते हुए ग्लोबल ट्रेड वॉर की आशंका को और गहरा दिया।

डब्ल्यूटीओ की भूमिका
इस संदर्भ में डब्ल्यूटीओ की भूमिका अहम हो जाती है। डब्ल्यूटीओ एक ऐसा संगठन है, जो सदस्य देशों के बीच व्यापार तथा वाणिज्य को सहज-सुगम बनाने का उद्देश्य रखता है। यद्यपि डब्ल्यूटीओ एक जनवरी, 1995 से प्रभावी हुआ, परंतु वास्तव में यह 1947 में स्थापित एक बहुपक्षीय व्यापारिक व्यवस्था प्रशुल्क एवं व्यापार पर सामान्य समझौता (गैट) के नए एवं बहुआयामी रूप में अस्तित्व में आया। जहां गैट वार्ता वस्तुओं के व्यापार एवं बाजारों में पहुंच के लिए प्रशुल्क संबंधी कटौतियों तक सीमित रही थीं, वहीं इससे आगे बढ़कर डब्ल्यूटीओ का लक्ष्य वैश्विक व्यापारिक नियमों को अधिक कारगर बनाने के प्रयास के साथ-साथ सेवाओं एवं कृषि में व्यापार संबंधी वार्ता को व्यापक बनाने का रहा है। किंतु वैश्विक व्यापार को सरल और न्यायसंगत बनाने के 71 वर्ष बाद तथा डब्ल्यूटीओ के कार्यशील होने के 23 वर्ष बाद भारत सहित विकासशील देशों के करोड़ों लोग यह अनुभव कर रहे हैं कि डब्ल्यूटीओ के तहत विकासशील देशों का शोषण हो रहा है।

आर्थिक विशेषज्ञों की राय
ऐसे में दुनिया के आर्थिक विशेषज्ञ यही आशंका जता रहे हैं कि अमेरिका के संरक्षणवादी रवैये से वैश्विक व्यापार युद्ध की शुरुआत हो गई है। लिहाजा इस बारे में गंभीरतापूर्वक विचार करना जरूरी है कि यदि विश्व व्यापार व्यवस्था वैसे काम नहीं करती, जैसे उसे करना चाहिए तो डब्ल्यूटीओ ही एक ऐसा संगठन है, जो इसे दुरुस्त कर सकता है। यदि ऐसा नहीं हुआ तो दुनियाभर में घातक व्यापार लड़ाइयां 21वीं सदी की हकीकत बन जाएंगी। बेहतर यही होगा कि विभिन्न देश एक-दूसरे को व्यापारिक हानि पहुंचाने की होड़ में उलझने के बजाय डब्ल्यूटीओ के मंच से ही आसन्न ग्लोबल ट्रेड वॉर के नकारात्मक प्रभावों का उपयुक्त हल निकालें। यद्यपि भारत ने कुछ अमेरिकी वस्तुओं पर आयात शुल्क बढ़ा दिया है, लेकिन अब बेहतर यही होगा कि वह इस मामले में धैर्य का परिचय दे और अमेरिका के साथ द्विपक्षीय व्यापारिक हितों के व्यापक पहलुओं पर गौर करे।

सबसे बड़ा निर्यातक बाजार
यह इसलिए भी जरूरी है कि जहां भारत के लिए अमेरिका दुनिया का सबसे पहले क्रम का निर्यातक बाजार है, वहीं अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भी है। पिछले वित्त-वर्ष में भारत ने अमेरिका को 47.9 अरब डॉलर मूल्य का निर्यात किया था। हम उम्मीद करें कि भारत सरकार और भारतीय उद्यमी निर्यात की नई उभरती चुनौतियों के बीच विभिन्न देशों में विभिन्न वस्तुओं के निर्यात के नए मौके ढूंढने की डगर पर आगे बढ़ेंगे। खासकर चीन व अन्य देशों में अमेरिकी वस्तुओं पर आयात शुल्क बढ़ने के कारण अमेरिका से आयातित सोयाबीन, तंबाकू, फल, गेहूं, मक्का तथा रसायन जैसी जो कई चीजें महंगी हो गई हैं, वहां के बाजारों में ये भारतीय उत्पाद सस्ते होने के कारण सरलता से अपनी पैठ बना सकते हैं। ग्लोबल ट्रेड वॉर की स्थिति के चलते हमारे निर्यात, निवेश व आर्थिक विकास दर घटने की जो आशंकाएं बढ़ गई हैं, उनसे निपटने हेतु सरकार को पुख्ता रणनीति के साथ आगे बढ़ना होगा।

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दुनिया की 10 सबसे ताकतवर हस्तियों में शुमार हुए नरेंद्र मोदी, No. 1 पर चिनफिंग

प्रतिष्ठित फोर्ब्‍स की लिस्‍ट में पीएम नरेंद्र मोदी दुनिया के 10 सबसे शक्तिशाली नेताओं की सूची में शुमार हो गए हैं. फोर्ब्‍स की लिस्‍ट में पीएम मोदी नौवें स्‍थान पर काबिज हैं. इस सूची में चीनी राष्‍ट्रपति शी जिनपिंग पहली बार पहले स्‍थान पर काबिज हुए हैं. वह रूसी नेता व्‍लादिमीर पुतिन को हटाकर पहले स्‍थान पर पहुंचे हैं. फोर्ब्‍स 2018 लिस्‍ट में दुनिया को चलाने वाले सबसे ताकतवर 75 नामों को शामिल किया गया है. फोर्ब्‍स ने लिस्‍ट जारी करते हुए कहा, ”दुनिया में करीब 7.5 अरब लोग हैं लेकिन ये 75 लोग दुनिया को चलाते हैं. फोर्ब्‍स की वार्षिक रैंकिंग में हर एक अरब में से एक ऐसे व्‍यक्ति को चुना जाता है जिनके एक्‍शन सबसे ज्‍यादा मायने रखते हैं.”

पीएम नरेंद्र मोदी
फोर्ब्स ने कहा कि पीएम मोदी दुनिया के दूसरे सबसे अधिक आबादी वाले देश (भारत) में “बेहद लोकप्रिय बने हुए हैं.” इसमें मनी लॉन्ड्रिंग और भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए मोदी सरकार के नवंबर 2016 के नोटबंदी के फैसले का हवाला दिया गया है. हाल के वर्षों में पीएम मोदी ने आधिकारिक यात्रा के दौरान डोनाल्‍ड ट्रंप और शी जिनपिंग के साथ मुलाकात की और वैश्विक नेता के रूप में अपनी पहचान बढ़ाई है. इसके अलावा वह जलवायु परिवर्तन से निपटने के अंतरराष्ट्रीय प्रयास में एक प्रमुख व्यक्ति के रूप में उभरे हैं.

mukesh ambani
PM मोदी के अलावा मुकेश अंबानी लिस्‍ट में शामिल होने वाले एकमात्र भारतीय हैं.(फाइल फोटो)

मुकेश अंबानी
रिलांयस इडस्ट्रीज के चेयरमैन मुकेश अंबानी इस सूची में पीएम मोदी के अलावा स्थान पाने वाले एकमात्र भारतीय हैं. वहीं, माइफ्रोसॉफ्ट के सीईओ भारतीय मूल के सत्या नाडेला को 40वें पायदान पर रखा गया है. अंबानी पर फोर्ब्स ने कहा कि अरबपति उद्योगपति ने 2016 में भारत के अति-प्रतिस्‍पर्द्धी बाजार में 4-G सेवा जियो शुरू करके कीमत की जंग छेड़ दी.

शी जिनपिंग
जिनपिंग ने पिछले लगातार चार वर्ष तक इस सूची में शीर्ष पर चले आ रहे पुतिन को दूसरे स्थान पर धकेल दिया है. सूची में तीसरे पायदान पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, चौथे पर जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल और पांचवें पर अमेजन प्रमुख जैफ बेजोस हैं. पीएम मोदी के बाद फेसबुक के सीईओ मार्क जुकरबर्ग(13वें), ब्रिटेन की प्रधानमंत्री थेरेसा मे(14), चीन के प्रधानमंत्री ली क्विंग(15), एपल के सीईओ टिम कुक(24) को रखा गया है. इस वर्ष सूची में 17 नए नामों को शामिल किया गया है, इसमें सऊदी अरब के शहजादे मोहम्मद बिन सलमान अल सऊद (8वें ) भी हैं. सूची में पोप फ्रांसिस(6), बिल गेट्स(7), फ्रांस के राष्ट्रपति एमैनुएल मैक्रों(12), अलीबाबा के प्रमुख जैक मा(21) भी शामिल हैं.

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पीएम मोदी ने पाकिस्तान को कहा आतंकवाद की फैक्ट्री, तो बचाव में उतरा चीन

चीन ने शुक्रवार को प्रधानमंत्री मोदी द्वारा इस्लामाबाद को आंतकवाद का निर्यात करने वाली फैक्ट्री बाताए जाने वाले बयान पर पाकिस्तान का बचाव किया। चीन ने इस संबंध में कहा कि पाकिस्तान की आंतकवाद से लड़ने में मदद किए जाने की जरूरत है।

लंदन में पीएम मोदी ने पाक पर निशाना साधते हुए कहा था कि भारत आतंकवाद को निर्यात करने वालों को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करेगा। मोदी ने आगे कहा कि यहां आतंकवाद की फैक्ट्री लगा रही है और सीधे युद्ध में सामना न कर पाने की ताकत न होने के कारण पीठ पर वार करते हैं। ऐसी स्थिति में हमे पता है कि कैसे जबाव देना है। जाहिर तौर पर मोदी का इशारा पाकिस्तान की ओर था।

मोदी के इस बयान पर चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता हु आ चुनयिंग ने कहा कि आतंकवाद सभी का दुश्मन है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सभी देशों को मिलकर आतंकवाद से लड़ने की जरूरत है। साथ ही सभी देशों को पाकिस्तान की आतंकवाद से लड़ने में मदद करनी चाहिए।

इस बयान के साथ चीन ने इशारा किया है कि शंघाई कॉरपोरेशन ऑर्गेनाइजेशन(एससीओ) में आतंकवाद भी एक बड़ा मुद्दा होगा। पिछले साल एससीओ में भारत और पाकिस्तान दोनों शामिल थे। एससीओ का वार्षिक सम्मेलन अब जून में चीन के किंगदाओ शहर में होना है।

विदेश मंत्रियों के इस सम्मेलन में आतंकवाद पर चर्चा के सवाल पर चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि मेरा मानना है कि एससीओ का उद्देश आतंकवाद के मुद्दे पर साथ मिलकर काम करने की दिशा में आगे बढ़ना है।

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गगनशक्ति 2018: वायुसेना का बड़ा शक्ति प्रदर्शन, एयरचीफ मार्शल बोले- आसमान को हिलाने का है माद्दा

पिछले तीन दशक में भारतीय वायुसेना के सबसे बड़े अभ्यास ‘गगन शक्ति-2018’ में पिछले तीन दिनों के अंदर करीब 1100 विमानों ने हिस्सा लिया। जिनमें करीब आधा लड़ाकू विमान थे। वायुसेनाध्यक्ष बी.एस. धनोवा ने सोमवार को कहा कि पाकिस्तान बेहद करीब से इस ऑपरेशन पर नज़र रख रहा था जो “आसमान को हिला रहा है और धरती को चीर रहा है।”

अब वायुसेना अपना अभ्यास वेस्टर्न सेक्टर से ईस्टर्न सेक्टर में करने जा रही है। धनोवा ने कहा कि सभी तरह के प्रशिक्षण को 22 अप्रैल तक दो चरणों में चलनेवाले अभ्यास के चलते सस्पेंड किया जा रहा है। अमूमन यह युद्ध के समय में ऐसा होता है जब सेना की तरफ से सभी गतिविधियों को रोक दिया जाता है।

वायुसेना ने आकाश से दुश्मन के खात्मे का दम दिखाया
भारतीय वायुसेना का युद्धाभ्यास ‘गगन शक्ति 2018’ पिछले एक सप्ताह से पश्चिमी क्षेत्र में जारी है। पैराशुट ब्रिगेड की बटालियन के साथ वायुसेना ने आकाश से दुश्मन की धरती पर निशाना साधने का अभ्यास किया। वहीं पश्चिम बंगाल के खड़गपुर स्थित कलाईकुंडा एयरबेस से उड़े सुखाई 30 लड़ाकू विमानों ने भी दुश्मन को नेस्तेनाबूत करने का दम दिखाया। इस दौरान लक्षद्वीप तक की उड़ान के दौरान दो बार आकाश में ही सुखोई से सुखोई में ईंधन भरा गया।

वायुसेना ने तैयारी और दमखम को दो हिस्सों में परखा है। पहला पश्चिमी सीमा में और दूसरा उत्तरी सीमा पर। पश्चिमी सीमा के लिए पाकिस्तान सरकार को पूर्व सूचना दी गई। इस चरण में भारतीय सेना पाकिस्तान की हरकतों का मुंहतोड़ जवाब देने के लिए दम दिखाया। दूसरे चरण में तिब्बत की ओर से चीन की सेना के खिलाफ मोर्चा खोलने के लिए अभ्यास किया।

जैसलमेर, जोधपुर, खड़गपुर में सैन्य विमानों ने हिस्सा लिया
लड़ाकू विमान तेजस वायुसेना में शामिल होने के बाद पहली बार गगन शक्ति युद्धाभ्यास में हिस्सा ले रहा है। सुखोई-30 एमकेआई, मिग-21, मिग-29, मिग 27, जगुआर व मिराज जैसे 600 लड़ाकू विमान शामिल हैं। बड़े परिवहन विमान सी-17 ग्लोब मास्टर, सी-130 जे सुपर हरक्यूलिस और अटैक हेलिकॉप्टर एमआई 35, एमआई 17 वी 5, एमआई 17, एएलएच ध्रुव, एएलएच भी शामिल हैं।

अड्डों पर धुआंधार गोलीबारी की गई
जैसलमेर में वायुसेना के विमानों ने विभिन्न ठिकानों को निशाना बनाकर युद्धाभ्यास किया।
‘गगन शक्ति 2018’ युद्धाभ्यास में पहली बार महिला फाईटर पायलट हिस्सा ले रही हैं। युद्धाभ्यास के दौरान स्वदेशी लड़ाकू विमान तेजस की पूरी स्कवाड्रन ताकत दिखा रही है।

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चीन की हर चाल का जवाब देने के लिए भारत भी कर चुका है पूरी तैयारी

चीन एक बार फिर से भारत से लगती सीमा पर तनाव बढ़ाने की तैयारी कर रहा है। इसको देखते हुए भारत ने सीमाओं पर अपने जवानों की संख्‍या बढ़ा दी है। दरअसल यह कवायद चीन की उस नापाक चाल के बाद की जा रही है जिसके तहत वह भारत की सीमा से सटे तिब्बती इलाके में तेजी से ढांचों का निर्माण करने में लगा है। इसके अलावा एक दिन पहले ही चीन द्वारा अरुणाचल प्रदेश के किबिथू में लोहित घाटी के दूसरी और चीन की तरफ से टावर खड़ा करने और सैन्‍य गतिविधियों के लिए पक्‍का निर्माण करने की बात सामने आई है। लिहाजा यह जरूरी हो गया है कि भारत भी इन इलाकों में सड़कों का नेटवर्क बढ़ाए, जिससे सेना की शीघ्रता के साथ आवाजाही हो सके।

सीमा के नजदीक एक्‍सप्रेस वे

चीन की नापाक चाल को सफल होने से रोकने के लिए भारत भी अपनी तैयारी कर रहा है, लेकिन भारत की तैयारियों से पहले हम आपको बता दें कि चीन भारत से लगती सीमाओं पर क्‍या कुछ अब तक कर चुका है। सितंबर 2017 में तिब्‍बत से नेपाल को जोड़ने वाला हाईवे खोलने के बाद चीन ने अरुणाचल प्रदेश के करीब एक और एक्‍सप्रेसवे खोला जो तिब्‍बत की राजधानी ल्‍हासा और निंगची को जोड़ता है। यह एक्‍सप्रेसवे 5.8 अरब डॉलर की लागत से तैयार हुआ है और इसकी लंबाई करीब 409 किमी है। निंगची अरुणाचल प्रदेश की सीमा के नजदीक है। इस एक्‍सप्रेस वे के जरिए ल्हासा और निंगची के बीच की दूरी महज पांच घंटों में पूरी की जा सकती है। पहले इसमें करीब आठ घंटे का समय लगता था। यह एक्‍सप्रेस वे इस तरह से बनाया गया है कि समय आने पर सैन्‍य साजोसामान तेजी से सीमा तक ले जाया जा सके।

सीमा के नजदीक एयरपोर्ट

इसके अलावा पिछले वर्ष ही चीन ने अरुणाचल प्रदेश से लगती सीमा के नजदीक तिब्‍बत का दूसरा सबसे बड़ा एयरपोर्ट भी खोला है। भारतीय सीमा के नजदीक स्थित यह एयरपोर्ट टर्मिनल 10300 वर्ग मीटर में फैला हुआ है। 2020 तक यह सालाना 750000 यात्रियों और 3 हजार टन माल संभालने लायक हो जाएगा। नया टर्मिनल तिब्बत में खुला छठा टर्मिनल है जो न्यिंगची मेनलिंग एयरपोर्ट पर स्थित है। चीन के इन कदमों ने भारत की चिंता को बढ़ा दिया है।

क्यूटीएस-11 सिस्टम से लैस चीन की वेस्टर्न थियेटर कमान

इन सभी के अलावा चीन ने इसी वर्ष फरवरी में भारत से लगती सीमा पर वेस्टर्न थियेटर कमान को क्यूटीएस-11 सिस्टम से लैस किया है। यह सब अमेरिकी फौज की तैयारियों की तर्ज पर किया गया है। आपको बता दें कि वेस्टर्न थियेटर कमान भारत से लगती 3,488 किलोमीटर लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा की जिम्मेदारी संभालती है। क्यूटीएस-11 दरअसल, अमेरिकी सैनिकों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली प्रणाली की तरह है। इसके अलावा यह सभी तरह के फायरआर्म्‍स पर काबू पाने में सक्षम है। इसके अलावा यह एक पूरी तरह से डिजिटलीकृत समेकित व्यक्तिगत सैनिक लड़ाकू प्रणाली भी है। राइफल और 20 मिलीमीटर ग्रेनेड लांचर वाली यह प्रणाली लक्ष्य के अंदर के सैन्यकर्मियों को नष्ट करने में सक्षम है।

चीन ने सीमा पर तैनात किए हैं फाइटर जेट

भारतीय सीमा से सटे इलाकों में अपने सेना के जमावड़े के साथ-साथ चीन ने इसी वर्ष तिब्‍बत से लगती भारतीय सीमा के निकट स्थित अपने वायुसेना के ठिकानों पर फाइटर जेट्स की संख्या 47 से बढ़ाकर 51 कर दी है। ल्हासा-गोंगका में चीन ने आठ फाइटर जेट्स तैनात किए हैं। इसके अलावा एयर मिसाइल सिस्टम्स समेत 22 एमआई-17 हेलिकॉप्टर्स सहित कई अन्य हथियार भी तैनात हैं। होपिंग-रिकाजे में चीनी वायु सेना के 18 एयरक्राफ्ट्स तैनात हैं। इसके अलावा 11 एमआई-17 अनमैन्ड एरियल वीकल्स भी शामिल हैं। यही नहीं चीन ने तिब्बत में भारत से लगती सीमा में जमीन से हवा पर मार करने वाली मिसाइलों को भी तैनात कर दिया है।

चीन को देखते हुए भारत की तैयारी

चीन की इस रणनीति ने भारत की चिंता बढ़ा दी है। लिहाजा भारत ने चीन सीमा पर सेना की तैनाती बढ़ा दी है। बीजिंग की हर चाल पर पैनी नजर रखने के लिए सामरिक रूप से महत्वूपर्ण अरुणाचल प्रदेश के सीमावर्ती पहाड़ी क्षेत्रों दिबांग, दाउ देलाई और लोहित घाटी में सैनिकों की संख्या बढ़ाने के साथ ही गश्त भी तेज कर दी गई है। सैन्य अधिकारियों के अनुसार, भारत ने तिब्बत के सीमावर्ती इलाकों में चीन की हर चाल पर पैनी नजर रखने के लिए अपने निगरानी तंत्र को भी बेहद चाकचौबंद कर लिया है। इन क्षेत्रों की टोह लेने के लिए नियमित रूप से हेलीकॉप्टरों से भी गश्त की जा रही है। भारत दिबांग, दाउ देलाई और लोहित घाटी जैसे दुर्गम इलाकों में अपना ध्यान केंद्रित किए हुए है। इन इलाकों में 17 हजार फीट ऊंची बर्फीली पहाड़ियां और नदियां हैं। इन क्षेत्रों से लगती सीमाओं पर चीन के बढ़ते सैन्य दबाव की काट के तौर पर भारत ने यह रणनीति अपनाई है।

अहम सामरिक इलाकों पर भी ध्यान

चीन के तिब्बती क्षेत्र से लगते अरुणाचल के गांव किबिथू में तैनात सेना के एक अधिकारी का कहना है, ‘डोकलाम के बाद हमने सीमा पर अपनी गतिविधियां बढ़ा दी हैं। हम किसी भी चुनौती से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। भारत, चीन और म्यांमार के ट्राई जंक्शन समेत अहम सामरिक इलाकों में सेना की तैनाती बढ़ाने पर ध्यान दिया जा रहा है।’ उन्होंने कहा कि सेना अब अपनी लंबी दूरी की गश्त (लांग रेंज पेट्रोल्स) को बढ़ा रही है। इसमें छोटी-छोटी टुकड़ियां 15 से 30 दिनों के लिए गश्त पर भेजी जाती है।

टी 72 से लेकर सुखोई तक तैनात

भारत ने पूर्वी लद्दाख और सिक्किम में टी-72 टैंकों की तैनाती की है, जबकि अरुणाचल में ब्रह्मोस और होवित्जर मिसाइलों की तैनाती करके चीन के सामने शक्ति प्रदर्शन किया है। इसके अलावा पूर्वोत्तर में सुखोई-30 एमकेआई स्क्वेड्रन्स को भी उतारा गया है। अकेले अरुणाचल प्रदेश की रक्षा के लिए चार इंफेंटरी माउंटेन डिविजन लगाई गई हैं जिसमें 3 कॉर्प्स (दीमापुर) और 4 कॉर्प्स (तेजपुर) की हैं और दो कॉर्प्स को रिजर्व में रखा गया है। हर डिवीजन में करीब 1200 जवान तैनात हैं। तवांग जिसपर कि चीन दक्षिणी तिब्बत का हिस्सा होने का दावा करता रहा है वहां भी सैनिकों की संख्या ज्यादा है जो किसी भी तरह की नापाक हरकत को विफल कर सकती हैं।

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बख्तरबंद ट्रेन से बीजिंग आए तानाशाह किम, पूरी दुनिया की लगी रही निगाह, चीन रहा चुप

उत्तर कोरिया से चीन की राजधानी बीजिंग पहुंची एक खास ट्रेन पर कई देशों की नजर लगी हुई है। लेकिन इसको लेकर अब तक चीन ने असमंजस बरकरार रखा हुआ है। इस ट्रेन को लेकर चीन के विदेश मंत्रालय ने यहां तक कहा है कि इस ट्रेन से बीजिंग कौन आया इसकी कोई जानकारी उन्‍हें नहीं है। चीन ने इस ट्रेन को लेकर जिस किस्‍म की खामोशी बरती है उसको जानने के लिए हर कोई उत्‍सुक है। अमेरिकी मीडिया ने फिलहाल इस ट्रेन के बीजिंग से वापस होने की भी खबर दी है। इसके बाद भी चीन अपने बयान पर कायम है।

किम की बीजिंग यात्रा

माना जा रहा है कि इस ट्रेन से उत्तर कोरिया के प्रमुख किम जोंग उन अपने लाव-लश्‍कर के साथ बीजिंग पहुंचे हैं। मीडिया में आई खबरों के मुताबिक ऐसी अटकलें लगाई गई हैं कि कथित तौर पर इस ट्रेन में बीजिंग पहुंचे किम यहां पर अमेरिका से होने वाली अहम वार्ता से पहले कुछ खास रणनीति बनाने पहुंचे हैं। बहरहाल, चीन, उत्तर और दक्षिण कोरिया समेत अमेरिका ने भी अभी तक इस बात की कोई पुष्टि नहीं की है कि इस खास ट्रेन से किम ही बीजिंग पहुंचे हैं। इसको लेकर चल रही अटकलों के पीछे सबसे बड़ी वजह यह बताई गई है कि इसी ट्रेन से उत्तर कोरिया के पूर्व प्रमुख और किम के पिता किम जोंग इल और उनके दादा भी बीजिंग गए थे।

जवाब मिलना काफी मुश्किल 

बहरहाल, हमारी खबर सिर्फ इसको लेकर ही नहीं है बल्कि इससे आगे की है। प्‍योंगयोंग से बीजिंग पहुंची ट्रेन को लेकर जितने सवाल उठ रहे हैं उनके जवाब मिलना काफी मुश्किल है। इसकी वजह ये है कि चीन की मी‍डिया पर खास ट्रेन से आए मेहमान को लेकर पूरी तरह से खामोश है। यहां पर ये भी जानना बेहद दिलचस्‍प है कि आखिर जहां विश्‍व के तमाम नेता अपनी विदेश यात्रा के लिए विमान का इस्‍तेमाल करते हैं वहीं किम ने इस हाईप्रोफाइल बैठक के लिए ट्रेन को क्‍यों चुना है। खास ट्रेन से बीजिंग पहुंचे इस मेहमान के लिए बीजिंग में खास सुरक्षा व्‍यवस्‍था भी की गई है। कुछ खबरों में यहां तक कहा गया है कि किम को बीजिंग में गार्ड ऑफ ऑनर भी दिया जाएगा। अटकलों के बीच बीजिंग में कई प्रमुख सड़कों को आम लोगों के लिए बंद कर दिया गया है।

बीजिंग की सड़कें सुनसान

सबसे पहले आपको बता दें कि किम की इस कथित यात्रा के बाद बीजिंग की सड़कें सुनसान हो गई हैं। चप्‍पे-चप्‍पे पर जवानों को तैनात किया गया है। बीजिंग में कई प्रमुख सड़कों को आम लोगों के लिए बंद कर दिया गया है। त्यानआनमेन स्‍क्‍वायर पर भी अभू‍तपूर्व सुरक्षा व्‍यवस्‍था है। इसके अलावा बीजिंग के दिओयोयुतई स्‍टेट गेस्‍ट हाउस की तरफ आने वाली सभी गाडि़यों की जांच की जा रही है। इस ओर हर गाड़ी को आने की इजाजत भी नहीं दी गई है। इस ओर आने वाले मार्ग पर भी केवल खास गाडि़यां ही आ रही हैं। यहां आने वाले खास मेहमान पर यहां के लोगों की भी निगाहें लगी हुई हैं।

जापान के निप्‍पो टीवी नेटवर्क ने दोनों देशों के बीच बने फ्रेंडशिप ब्रिज से गुजरती हुई इस ट्रेन का वीडियो भी जारी किया है। इसके अलावा एक दूसरे वीडियो में स्‍टेशन के बाहर बाहरी सुरक्षा घेरे में लिमोजिन गाड़ी के अंदर जाने और बाहर आने का भी वीडियो सामने आया है। एक तीसरे वीडियो में सुरक्षा घेरे के बीच में एक लिमोजिन गाड़ी को चौराहे से गुजरते हुए भी दिखाया गया है।

किम की ट्रेन है बेहद खास

किम और उनकी खास ट्रेन को लेकर जिस तरह से अटकलों का बाजार गर्म है उसके बारे में आपको बेहद कम ही जानकारी होगी। आपको बता दें कि बीजिंग में प्‍योंगयोंग से पहुंची खास ट्रेन से वर्ष 2011 में किम के पिता किम जोंग इल ने भी बीजिंग की यात्रा की थी। उनसे पहले किम इल संग जो कि मौजूदा तानाशाह के दादा थे, ने भी इसी खास ट्रेन से बीजिंग और रूस की यात्रा की थी। लेकिन आपकी जानकारी के लिए बता दें कि यह महज एक ट्रेन ही नहीं है बल्कि एक चलता फिरती हाईटैक वैपंस से सुसज्जित वाहन है, जिसको खास किम परिवार के लिए ही तैयार किया गया है। यही वजह है कि किम के पिता और दादा ने विमान से यात्रा करने से ज्‍यादा इस खास ट्रेन पर ही भरोसा किया है। आपको यहां पर ये भी बता दें कि अपने निधन से कुछ पहले अगस्‍त 2011 में किम जोंग इल ने इसी खास ट्रेन से मास्‍को की यात्रा की थी। इस दौरान उन्‍होंने वहां पर रूसी राष्‍ट्रपति दमित्री मेडवेडेव से मुलाकात की थी।

खास ट्रेन को लेकर वीडियो वायरल 

बीजिंग में इस खास ट्रेन को लेकर एक वीडियो भी वायरल हो गया है। कहा जा रहा है इससे आए मेहमानों को बीजिंग के खास गेस्‍ट हाउस में ठहराया जाएगा। इस ट्रेन में किम की सुविधा और सुरक्षा के लिए खास इंतजाम किए गए हैं। पूर्व रशियन डिप्‍लोमेटिक ने वर्ष 2001 में हुई किम की यात्रा को याद और इस ट्रेन के बारे में बताया था कि यह वास्‍तव में बेहद खास है। उनके मुताबिक यह ट्रेन बाहर और अंदर से बेहद सुंदर है और इसमें उनकी सुख-सुविधा के अलावा सुरक्षा के भी बेहतरीन उपाय किए गए हैं। इसके अंदर लेडी कंडक्‍टर हैं। इन सभी के अलावा ट्रेन में किम के परिवार के लिए दुनिया की बेहतरीन शराब का इंतजाम किया जाता है। पीली पट्टी वाली हरे रंग की यह ट्रेन में सोमवार दोपहर को बीजिंग पहुंची थी।

साथ चलती हैं दो और ट्रेन 

डिप्‍लोमेट के मुताबिक किम के मास्‍को आगमन पर वहां उनकी शान में कोरियाई और रूसी भाषा में गीत प्रस्‍तुत किए गए थे। यहां पर एक खास बात यह भी है कि जब कभी भी मौजूदा किम जोंग उन या उनके पिता और दादा ने इस ट्रेन की सवारी की तब-तब इस ट्रेन के साथ दो और ट्रेन चलती हैं। यह ट्रेन किम की सुरक्षा के लिए साथ चलती थी। हालांकि जिस ट्रेन में किम सफर करते हैं उस ट्रेन में भी उनकी सुरक्षा की पुख्‍ता व्‍यवस्‍था होती है। किम की ट्रेन में कांफ्रेंस रूम के अलावा ऑडियेंस चैंबर, बैडरूम, सैटेलाइट फोन, अलग से टीवी रूम की भी सुविधा मौजूद है।

सत्ता संभालने के बाद कभी देश से बाहर नहीं गए किम

आपको यहां पर ये भी बता दें कि जब से किम ने सत्ता संभाली है तब से वह कभी देश के बाहर नहीं गए हैं। ऐसे में उनका ट्रेन से बीजिंग जाना वह भी ऐसे समय जब ट्रंप से उनकी वार्ता होनी है कई तरह के सवाल खडे करता है। यहां ये भी जानना जरूरी है कि चीन उत्तर कोरिया का सबसे बड़ा व्‍यापारिक साझेदार है। उत्तर कोरिया का करीब 90 फीसद कारोबार महज चीन से होता है बाकि दस फीसद में पूरा विश्‍व समाया हुआ है। हालांकि अमेरिका और यूएन द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के बाद चीन ने भी उत्तर कोरिया को भेजे जाने वाले सामान की आपूर्ति रोक दी थी। इन सभी के बीच जापान और अमेरिका की तरफ से यह भी आरोप लगाया गया था कि चीन और रूस चोरी छिपे उत्तर कोरिया को चीजों की आपूर्ति करने में लगे हैं। दोनों देशों ने इसको लेकर सुबूत भी मुहैया करवाए थे।

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चीन का अमेरिका को जवाब, 100 से ज्यादा अमेरिकी उत्पादों पर बढ़ायेगा शुल्क

अमेरिका के इस्पात एवं एल्युमीनियम पर शुल्क का जवाब देने के लिए चीन ने शुक्रवार को सूअर के मांस (पोर्क) और पाइप सहित अन्य अमेरिकी उत्पादों पर उच्च शुल्क लागू करने की योजना जारी की. चीन के वाणिज्य मंत्रालय ने इसकी जानकारी दी. चीन के वाणिज्य मंत्रालय ने बयान में कहा कि इस कदम के तहत सूअर के मांस, वाइन (शराब) और स्टील की पाइपों समेत 128 अमेरिकी उत्पादों से शुल्क रियायतें हटायी जायेंगी.

मंत्रालय के मुताबिक, इन उपायों में फल, अखरोट, वाइन (शराब) और इस्पात की पाइपों समेत अन्य उत्पादों पर 15 प्रतिशत शुल्क एवं सूअर के मांस तथा पुनरावर्तित एल्युमीनियम उत्पादों पर 25 प्रतिशत शुल्क शामिल होगा. ये उपाय दो चरणों में लागू किये जायेंगे.

सरकारी समचार एजेंसी शिन्हुआ ने मंत्रालय के हवाले से कहा कि यदि दोनों देश तय समय के भीतर व्यापार से जुड़े मामलों पर समझौता नहीं करते हैं तो पहले चरण में 15 प्रतिशत शुल्क लगाया जायेगा. वहीं, दूसरे चरण में, अमेरिकी नीतियों के प्रभाव का मूल्यांकन करने के बाद 25 प्रतिशत आयात शुल्क लगाया जायेगा.

चीन का यह कदम अमेरिका के उस निर्णय का पलटवार माना जा रहा है, जिसमें उसने इस्पात आयात पर 25 प्रतिशत और एल्युमीनियम आयात पर 10 प्रतिशत का शुल्क लगाया है. इस फैसले से कनाडा और मेक्सिको को शुरुआती छूट मिली है. चीन के वाणिज्य मंत्रालय ने कल कहा था कि वह अपने हितों और अधिकारों के बचाव के लिए ‘सभी आवश्यक कदम’ उठायेगा.

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भारत दुनिया में सबसे ज्यादा हथियार खरीदने वाला देश, चार साल में हमारी 12% हिस्सेदारी: रिपोर्ट

हथियार खरीदने के मामले में भारत दुनिया में टॉप पर बना हुआ है। यह खुलासा सोमवार को स्टॉकहोम के थिंक टैंक इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट की एक रिपोर्ट में हुआ है। सोमवार को जारी इस रिपोर्ट के मुताबिक, भारत ने 2013-2017 के दौरान दुनिया में सबसे ज्यादा हथियार खरीदे हैं। इस मामले में दुनिया में उसकी हिस्सेदारी 12% है।रिपोर्ट के मुताबिक, 2008 से 2013 की तुलना में भारत ने 2013 से 2017 के बीच 24% ज्यादा हथियार खरीदे हैं।

सऊदी अरब दूसरे नंबर पर
– इस रिपोर्ट में भारत के बाद सबसे ज्यादा हथियार खरीदने वालों में सऊदी अरब, मिस्र, यूएई, चीन, ऑस्ट्रेलिया, अल्जीरिया, इराक, पाकिस्तान और इंडोनेशिया हैं।

 

भारत ने रूस से सबसे ज्यादा हथियार खरीदे
– भारत ने 2013 से 2017 तक सबसे ज्यादा हथियार रूस से खरीदे। कुल खरीदे गए हथियारों में रूस की हिस्सेदारी 62% है।

– इसके बाद भारत ने अमेरिका से 15% और इजरायल से 11% हथियार खरीदे हैं।

 

चीन से मुकाबले के लिए अमेरिका से बेहतर रिश्ते कर रहा भारत

– एशिया में चीन का दबदबा कम करने के लिए अमेरिका भारत के साथ दे रहा है। जिसका नतीजा है कि 2008 से 2012 की तुलना में 2013 से 2017 तक में भारत ने अमेरिका से काफी हथियार खरीदे हैं। इस दौरान अमेरिका से भारत के हथियारों की खरीद में लगभग 557% की बढ़ोत्तरी हुई है।

 

सबसे ज्यादा हथियार बेच रहा अमेरिका

– हथियार बेचने वाले देशों में अमेरिका टॉप पर है। इसके बाद रूस, फ्रांस और जर्मनी हैं। चीन पांचवे नंबर पर है। चीन सबसे ज्यादा हथियार पाकिस्तान को बेचता है।

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मालदीव में ‘महाभारत’ और भारत का धर्मसंकट

मालदीव के राष्ट्रपति अब्दुल्ला यमीन ने देश के भीतर बढ़ते राजनीतिक गतिरोध के बीच 15 दिनों के आपातकाल की घोषणा की है.

देश के सुप्रीम कोर्ट ने ये आदेश दिया था कि सभी राजनीतिक क़ैदियों को रिहा किया जाए, राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट के इसा आदेश को मानने से इंकार कर दिया था.

जब से सुप्रीम कोर्ट का आदेश आया, तभी से मालदीव के राष्ट्रपति एक तरह से झिड़का हुआ महसूस कर रहे थे.

वे काफी समय से लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमज़ोर करने और सत्ता की ताकत पूरी तरह से अपनी तरफ़ करने की कोशिशें कर रहे थे.

उन्होंने अपने विपक्षियों को जेल में डाल दिया था और फिर धीरे-धीरे सत्ता का केंद्रीकरण होने लगा था, ऐसे में उन्हें लग रहा था कि अब ताकत पूरी तरह उनके हाथों में है.

लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद उन्हें यह महसूस हुआ कि उन्हें अपने फ़ैसले बदलने पड़ेंगे!

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सेना की भूमिका अहम

आपातकाल की घोषणा करने के बाद ऐसा लगता है कि वे अपना आखिरी दांव खेल रहे हैं और इसके अलावा उनके पास कोई दूसरा चारा नहीं बचा था.

पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद ने इस फैसले की आलोचना करते हुए इसे तख्तापलट की तरह बताया है.

अबदुल्ला यमीन के पास दरअसल इसके अलावा कोई दूसरा रास्ता बचा ही नहीं था.

अगर वे सत्ता दोबारा नशीद के हाथों में सौंप देते तो ज़ाहिर सी बात है कि उनके ख़िलाफ़ कार्यवाही होती.

लेकिन अब ऐसा लगता है कि सेना की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो गई है.

इसके साथ ही विपक्षी नेता किस तरह एकजुट होते हैं और उनका समर्थन कर रहे अन्य कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर क्या कदम उठाते हैं, ये देखने वाली बात होगी.

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भारत की भूमिका

मालदीव के भीतर चल रही इस राजनीतिक उठापटक में भारत की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है.

मौजूदा वक्त में नशीद और यमीन के बीच जब रस्साकशी चल रही थी तब भारत पीछे से अपनी भूमिका निभा रहा था.

कई लोगों ने इसकी आलोचना भी की थी कि जब लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई नशीद सरकार को हटाया गया था तो उस समय भारत को खुलकर उनका समर्थन करना चाहिए था और लोकतांत्रिक ताकतों के बचाव के लिए भारत और अधिक मुखर होकर सामने आना चाहिए था.

लेकिन ये समझना चाहिए कि भारत के अपने भी कई हित हैं, जैसे भारत कभी भी ये नहीं चाहेगा कि मालदीव पूरी तरह चीन की तरफ चला जाए.

लेकिन अब हालात ऐसे बन रहे हैं कि भारत को अपना रुख स्पष्ट करना ही पड़ेगा हालांकि भारत के पास कई दूसरे रास्ते अभी मौजूद हैं.

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क्या चीन देगा यामीन का साथ?

आपातकाल लगाने के बाद अब अब्दुल्ला यामीन के पास कौन से रास्ते बाकी हैं. इस मसले मे अब ये देखना होगा कि बाहरी दबावों से वे किस तरह निपटते हैं.

यामीन ये भी सोच रहे होंगे कि उन्होंने चीन के साथ अपनी घनिष्टता बढ़ाई है तो चीन उनका पक्षधर बनेगा और जब पश्चिमी देशों और भारत की तरफ से उन पर दबाव बनाया जाएगा तब चीन उनका साथ देगा.

लेकिन शायद वो चीन की रणनीति को थोड़ा गलत समझ रहे हैं क्योंकि ऐसा कभी नहीं हुआ जब सभी वैश्विक ताकतों के ख़िलाफ़ चीन अलग से किसी का अकेले समर्थन करने आया हो, इसलिए फिलहाल तो यामीन के पास बहुत कम विकल्प नजर आते हैं.