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खोजी गई दुनिया की सबसे लंबी सुरंग, अब सामने आएंगे प्राचीन दुनिया के कई राज!

दुनिया अपने अंदर तमाम रहस्य समेटे हुए है। हमने कई लंबी सुरंगों के बारे में पढ़ा है जिनमें कई प्राकृतिक तो कई मानव निर्मित हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि कोई सुरंग सैकड़ों किलोमीटर लंबी हो सकती है? गोताखोरों के एक समूह ने पूर्वी मेक्सिको में दुनिया की सबसे लंबी जलमग्न सुरंग खोज निकाली है जिसकी लंबाई 347 किलोमीटर है। इस खोज के बाद मेक्सिको के आसपास के क्षेत्रों में विकसित हुई प्राचीन माया सभ्यता के बारे में और जानकारी प्राप्त हो सकती है।

दक्षिण-पूर्वी मेक्सिको में स्थित युकाटन प्रायद्वीप में पानी के नीचे स्थित सुरंग ढूंढने के लिए ग्रैन एक्युफेरो माया (GAM) अभियान चलाया जा रहा था। इस सुरंग को सैक एकटन नाम दिया गया है। शुरुआत में इस सुरंग की लंबाई 263 किलोमीटर मापी गई थी। तुलुम स्थित जलमग्न सुरंगों की श्रृंखला डॉस ओजोस से जोड़ने पर इसकी लंबाई करीब 347 किमी हो गई। यह सुरंग लगभग 12 हजार साल पुरानी है। सबसे बड़ी बात तो यह कि इस सुरंग में  कब्र भी मिली हैं, जिनमें मानव अस्थियां संग्रहित हैं।

GAM के निदेशक गुलेरमो डी एंडा ने कहा, ‘यह बड़ी खोज है। स्पेन के कब्जे में आने से पहले माया सभ्यता कैसी थी, इस बारे में यह सुरंग कई राज खोल सकती है। इसके अतिरिक्त उस काल में बसाई गई बस्तियों और तीर्थस्थलों की जानकारी भी मिल सकती है।’ ऐसा माना जा रहा है कि उस काल में बसाई गई बस्तियों और तीर्थस्थल यहां हुआ करते होंगे। कुछ पुरातत्ववादियों का मानना है कि माया सभ्यता का प्राचीन मंदिर सुरंग से जुड़ा हुआ था। मालूम हो कि माया सभ्यता के सबसे अधिक अवशेष युकाटन प्रायद्वीप में ही पाए गए हैं।

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जाक दुबोशे, जोआखिम फ्रैंक और रिचर्ड हेंडर्सन को रसायन का नोबेल

सूक्ष्म और ठंड से जमे हुए अणुओं की तस्वीर उतारने के लिए एक आसान और बेहतर पद्धति क्रायो- इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कॉपी विकसित करने को लेकर तीन वैज्ञानिकों जेक्स डबशेट, जोशीम फ्रैंक और रिचर्ड हेंडरसन को रसायन विज्ञान के नोबेल पुरस्कार के लिए चुना गया है। इन वैज्ञानिकों की टीम की नई पद्धति से शोधकर्ता अब नियमित रूप से बायॉ-मोलेक्युल का त्रिआयामी (3डी) ढांचा बना सकते हैं।

बायॉ – मोलेक्युल जीवों के संभरण और उपापचय प्रक्रिया में शामिल होता है। इस पद्धति में कोशिकाओं के हिस्सों की तस्वीर उतारने के लिए इलेक्ट्रॉन बीम इस्तेमाल की गई। नोबेल कमेटी ने कहा कि शोधकर्ता अब बीच में ही बायॉ-मोलेक्युल को जमा सकते हैं और प्रक्रिया को दृश्य रूप दे सकते हैं जो वे पहले कभी नहीं कर सकते थे। यह चीज जीवन को समझने और दवाइयों के विकास के लिए महत्वपूर्ण है।

यह पद्धति बायो-मोलेक्युल को प्राकृतिक अवस्था में जमी हुई अवस्था (ठंड से) में रखने में मदद करेगा। कोशिका के ढांचों, विषाणुओं और प्रोटीन के सूक्ष्मतम ब्योरे का अध्ययन करने में इसका इस्तेमाल किया गया। कमेटी ने कहा कि शोधकर्ताओं को जब संदेह हुआ कि जीका विषाणु ब्राजील में नवजात शिशुओं के मस्तिष्क को नुकसान पहुंचा कर महामारी फैला रहा है तब उन्होंने विषाणु को चित्रात्मक रूप देने के लिए क्रायो इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी का रुख किया। पुरस्कार के तौर पर 11 लाख डॉलर दिया जाएगा।