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आपके रोमांच को और बढ़ाएंगी भारत की ये रहस्यमय गुफाएं

आइए, जानते हैं भारत की रहस्यमय गुफाओं के बारे में,

बोरा गुफाएं

जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के विलियम किंग जॉर्ज ने 1807 में आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम जिले में अराकू वैली के पास अनंतगिरी की पहाडि़यों में खोजी थी। यहां कार्स्टिक चूना पत्थर से बनी हुई सबसे गहरी गुफा है। इसकी गहराई 80 मीटर है। ये भारत की सबसे गहरी गुफाओं में से एक है।

भीमबेटका रॉक शेल्‍टर

मध्‍य प्रदेश के रायसेन जिले में रतापानी वाइल्‍ड लाइफ सैंक्चुअरी के अंदर भीमबेटका गुफाएं हैं। ये गुफाएं पाषाण काल की बनी हुई हैं। गुफा की दीवारों पर इंसान और जानवरों की पेंटिंग उकेरी गई हैं। मानव सभ्‍यता की ये सबसे पुराने चिह्नों में से एक हैं। 2003 में इसे वर्ल्‍ड हैरिटेज साइट घोषित कर दिया गया था। ये गुफा लगभग 30 हजार साल पुरानी है। यहां पांच सौ से ज्‍यादा प्राकृतिक गुफाएं बनी हुई हैं। भीमबेटका में युद्ध की पेंटिंग दीवारों पर बनाई गई है। 1958 में इस पेंटिंग की खोज की गई थी।

अमरनाथ गुफा

अमरनाथ गुफा भारतीय आस्‍था का केंद्र है। यहां बर्फ से भगवान के शिवलिंग का निर्माण होता है। हजारों की संख्‍या में भक्‍त यहां आते हैं। ये भारत के सबसे पूज्‍यनीय तीर्थ स्‍थलों में से एक है। जम्‍मू कश्‍मीर में बनी यह गुफा हिमालय की पहाडि़यों से घिरी हुई है। ये गुफा ज्‍यादातर बर्फ से ढकी रहती है।

अंडावल्‍ली गुफा

यह गुफा प्रचीन काल का सबसे बेहतरीन नमूना है। इसे विश्‍वकर्मा स्‍थापथीस कहा जाता है। आंध्र प्रदेश में यह गुफा विजयवाड़ा से सिर्फ 6 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इन गुफाएं चौथी-पांचवी शताब्‍दी की प्रतीत होती हैं। यह गुफाएं पत्‍थरों से निर्मित हैं। यह एक जैन गुफा थी। यह उदयगिरि और खांडगिरि के आर्कीटेक्‍चर का नमूना है। इसमें से प्रमुख गुफा गुप्‍त काल के आर्कीटेक्‍चर का नमूना है।

वैष्‍णो देवी

जम्‍मू कश्‍मीर में स्थित वैष्‍णो देवी मंदिर भारत की सबसे प्रचीन गुफाओं में से एक है। ये प्रमुख हिन्‍दू मंदिरों और शक्ति के 52 पीठों में से एक है। यह त्रिकूट पहाडि़यों पर स्थित है। यहां हर साल लाखों की संख्‍या में भक्‍त आते हैं।

उदयगिरि और खांडगिरि गुफा

उड़ीसा में बनी उदयगिरि और खांडगिरि गुफा प्रकृति और मानव निर्मित गुफा का अद्भुत नमूना है। इस आर्कियोलॉजिकल और हिस्‍टॉरिकल गुफा का अपना ही धार्मिक महत्‍व है। यह गुफा भुवनेश्‍वर के पास स्थित है। यहां की ज्‍यादातर गुफाएं जैन मॉंक का घर रहीं हैं। उदयगिरि का अर्थ होता है सूर्योदय गुफा। यहां 18 खांडगिरि गुफाएं भी है। जिनका अर्थ होता है टूटी हुई पहाडि़यां। जैन गुफाएं भारत में प्राचीन काल से हैं।

एलीफेंटा गुफाएं

महाराष्‍ट्र के एलीफेंटा आईसलैंड पर बनी ये गुफाएं मानव निर्मित गुफाओं का नेटवर्क है। इसे सिटी ऑफ केव्‍स भी कहा जाता है। ये मुंबई में हार्बॉर पर स्थित हैं। ये आइसलैंड दो गुफाओं का घर है। यहां दो ग्रुपो में पहली पांच हिन्‍दू गुफाएं है और छोटे ग्रुप में दो बुद्धिस्‍ट गुफाएं हैं। पहाड़ों को काट कर इन गुफाओं का निर्माण किया गया है।

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आज भी देशभर में मनाया जा रहा महाशिवरात्रि का पर्व, ऐसे करें भोलेनाथ को खुश

देशभर में आज भी धूमधाम से महाशिवरात्रि का पर्व मना रहे हैं। शिवालयों में सुबह से भक्तों का तांता लगा हुआ है। महाशिवरात्रि के अवसर पर मंदिरों को फूल-मालाओं से सजाया गया है। शिव भक्त मंदिरों में बेलपत्र और कच्चे दूध से भगवान भोलेनाथ का जलाभिषेक करने सुबह से ही लाइन में लगे हुए है। महाशिवरात्रि को भगवान शिव की पूजा करने का सबसे बड़ा दिन माना जा रहा है। इस बार भोलनाथ की पूजा अर्चना करने का दो दिन अवसर मिला है। कई जगहों पर मंगलवार को भी महाशिवरात्रि मनाई गई, कई जगहों पर आज हर्षोल्लास के साथ यह पर्व मनाया जा रहा है। दरअसल, 13 फरवरी को रात 10 बजकर 35 मिनट पर चतुर्दशी तिथि शुरू हो गई थी। वहीं 14 फरवरी की रात 12 बजकर 46 मिनट तक चतुर्दशी रहेगी। ऐसे में आज भी भोलेनाथ का जलाभिषेक किया जा रहा है। दूध, दही, गुलाब जल, चंदन, शहद पानी जैसी विभिन्न सामग्रियों से शिवलिंग का जलाभिषेक हो रहा है।

आज के दिन है दोहरा संयोग

14 फरवरी को महाशिवरात्रि पर शुभ संयोग है। आज महाशिवरात्रि का व्रत-उपवास करने वालों को तिथि और तारीख का अद्भुत और दुर्लभ संयोग मिलेगा। आज तिथि भी 14 होगी और तारीख भी। साथ ही 14 फरवरी को यानी आज भगवान शिव का प्रिय नक्षत्र श्रावणी भी है। इस नक्षत्र में शिव की पूजा शुभ फलदायी मानी गई है। 14 फरवरी को महाशिवरात्रि का व्रत करने वालों को संक्रांति का शुभ फल भी प्राप्त होगा। इस दिन बुध कुंभ राशि में आएंगे और सूर्य से मिलेंगे। जिन्होंने आज व्रत रखा है उन्हें शाम को ही चतुर्दशी तिथि में व्रत का पारण करना होगा। महाशिवरात्रि को भगवान शिव पर पर बेलपत्र के अलावा गंगाजल, गन्ने के रस, पंचामृत और कुशा के जल से भगवान का अभिषेक किए जाने की भी परंपरा है।

क्या है महाशिवरात्रि मनाने की मान्यता?

महाशिवरात्रि हिंदुओं का प्रमुख त्यौहार है। सालभर भक्त इस दिन का इंतजार करते हैं। कहा जाता है कि इस दिन भगवान शिव का मां पार्वती के साथ विवाह हुआ था। महाशिवरात्रि फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी तिथि को मनाई जाती है। यही कारण है कि इस बार दो दिन महाशिवरात्रि मनाई जाएगी। आज देर रात से चतुर्थी तिथि लग रही है।

ऐसे भोलेनाथ को करें खुश

भगवान शिव के 12 ज्योर्तिलिंग हैं। कहा जाता है कि महाशिवरात्रि के दिन इन ज्योर्तिलिंगों के दर्शन बहुत भाग्यशाली और शुभ होता है। इस दिन शिवभक्त जल और कच्चे दूध से भगवान भोलेनाथ का अभिषेक करते हैं। जिसके बाद चंदन, फूल, बेलपत्र से शिवलिंग की पूजा-अर्चना करते हैं। भगवान शिव को सफेद फूल चढ़ाए जाते हैं, कहते हैं कि इससे वे जल्दी प्रसन्न होते हैं। शिवजी का जलाभिषेक केवल तांबे या पीतल के लोटे से ही करें। महाशिवरात्रि के अवसर पर कई जगहों पर तो आज के दिन भोलेनाथ की बारात निकालने की भी परंपरा है

इनसे करें भोलेनाथ का जलाभिषेक

भोलेनाथ के अभिषेक में दूध, गुलाब जल, चंदन, दही, शहद, चीनी और पानी जैसी विभिन्न सामग्रियों का प्रयोग किया जाता है। शिवलिंग पर जलाभिषेक के बाद बेल पत्र अर्पित की जाती हैं, जिन्हें शुभ माना जाता है। भगवान शिव का सबसे प्रिय धतूरा होता है, इसे अर्पित करना सबसे ज्यादा लाभकारी बताया गया है। शिवपुराण के अनुसार शिव का अभिषेक गंगाजल या दूध से किया जाता है।

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स्वामी रामदास 12 साल की उम्र में घर त्यागकर बने थे संत, हनुमान अवतार के रूप में होती है पूजा

9 फरवरी को स्वामी रामदास की जयंती है. स्वामी रामदास महाराष्ट्र के प्रसिद्ध सन्त थे. दक्षिण भारत में हनुमानजी के अवतार के रूप में उनकी पूजा की जाती है. वे छत्रपति शिवाजी के भी गुरु थे. उन्होंने मराठी भाषा में एक ग्रन्थ ‘दासबोध’ की रचना की थी. स्वामी रामदास को समर्थ रामदास के नाम से भी जाना जाता है. उनका जन्म 9 फरवरी, 1608 में हुआ था. उनके पिता का नाम सूर्याय पंत था. पिता सूर्यदेव के उपासक थे और प्रतिदिन ‘आदित्यह्रदय’ स्तोत्र का पाठ करते थे. उनकी माता का नाम राणुबाई था. माता भी सूर्य नारायण की उपासिका थीं. स्वामी रामदास के बड़े भाई का नाम गंगाधर था और वे भी अध्यात्मिक पुरुष थे.

मां की बात दिल से लग गई और बन गए संत
कहा जाता है कि मां की एक बात को उन्होंने दिल से लगा लिया. उसके बाद वे नारायण से संत बन गए. स्वामी रामदास के बचपन का नाम नारायण था. वे बहुत शरारती किया करते थे. गांव के लोग उनके शरारत की शिकायत किया करते थे. कहा जाता है कि एक दिन उनकी मां ने कहा कि नाराणय तुम पूरा दिन शरारत करते हो और तुम्हारे बड़े भाई घर परिवार की चिंता करते हैं. तुम्हें किसी की परवाह नहीं रहती. मां की यह बात सुनकर वे घर के एक कमरे में ध्यान लगाकर बैठ गए. पूरे दिन जब वह अपनी को दिखाई नहीं दिए तो शाम को उनकी खोज की जाने लगी. मां ने उन्हें एक कमरे में ध्यानमग्न अवस्था में देखा. इस पर उनकी मां ने पूछा कि यह क्या कर रहे हो तो उन्होंने जवाब दिया कि मैं पूरी दुनिया की चिंता कर रहा हूं.

12 साल की उम्र में घर को त्याग दिया था
स्वामी रामदास 12 साल की उम्र में घर को त्यागकर नासिक के टाकली गांव में आ गए. यहां पर उन्होंने कठोर तप शुरू किया. वे हर रोज सुबह उठकर 1200 सूर्यनमस्कार करते थे. उसके बाद गोदावरी नदी में खड़े होकर राम नाम और गायत्री मंत्र का जाप करते थे. कठोर तप के दौरान ही उन्होंने एक रामायण लिखा जो ‘करुणाष्टक’ नाम से प्रसिद्ध है. वे 12 साल तक कठोर तप करते रहे. 24 साल की उम्र में उन्हें आत्म साक्षात्कार हुआ.

राम नाम का जप करते हुए छोड़ दिया शरीर
स्वामी रामदास अपने जीवन के अंतिम समय में सतारा के पास एक किले पर थे. इस किले को सज्जनगढ़ के नाम से जाना जाता है. तमिलनाडू के एक कारीगर ने प्रभु श्री रामचंद्र, माता सीता और लक्ष्मण की मूर्ति बनाकर सज्जनगढ़ को भेज दी. इसी मूर्ति के सामने स्वामी रामदास ने अपने जीवन के अंतिम पांच दिन निर्जल उपवास किया. फिर रामनाम जाप करते हुए पद्मासन में बैठकर ब्रह्मलीन हो गए. यहीं पर उनकी समाधि है. उनका समाधी दिवस ‘दासनवमी’ के नाम से जाना जाता हैं.