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विदेश व्यापार में इजाफे का जरिया बनी भारत की बदली रणनीति, बढ़ रहा निर्यात

साल 2014 में सत्ता में आने के बाद ही भारत के सभी विदेशी दूतावासों और राजदूतों व उच्चायुक्तों को उन देशों में भारतीय वस्तुओं/उत्पादों की संभावनाएं तलाशने का निर्देश दिया था। यहां तक कि द्विपक्षीय संबंधों के लिए होने वाली बातचीत में भी आपसी कारोबार को बढ़ाने के उपायों को शामिल करने पर जोर दिया गया। पूर्वी यूरोप के एक देश में रह चुके एक राजदूत के मुताबिक सरकार का यह स्पष्ट संदेश था कि भारतीय निर्यात की संभावनाओं को सदैव ध्यान में रखा जाए।

बीते चार साल में सरकार को तमाम दूतावासों से विदेश व्यापार को लेकर तमाम सूचनाएं प्राप्त हुई हैं। सभी दूतावासों से यह जानकारी मांगी गई थी कि उन देशों में किन भारतीय उत्पादों की मांग की संभावना है। सरकार ने अपने दूतावासों की मदद से बीते चार साल में काफी जानकारी जुटाई है। कुछ उत्पादों के संबंध में मसलन इंजीनियरिंग व इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों के मामले में तो वाणिज्य मंत्रालय ने तत्काल कदम उठाए हैं जिनका असर निर्यात पर दिखा भी है। बीते छह महीने में निर्यात में वृद्धि का जो सिलसिला शुरू हुआ है, इसमें दूतावासों की तरफ से प्राप्त सूचनाओं का भी योगदान है।

इस पूरी एक्सरसाइज का सबसे बड़ा लाभ यह हुआ है कि सरकार को भविष्य के लिए अपनी निर्यात रणनीति तैयार करने में काफी मदद मिल रही है। वाणिज्य मंत्रालय के एक अधिकारी के मुताबिक इन सूचनाओं के आधार पर एक मैट्रिक्स तैयार किया जा रहा है। इसके तहत जिस देश में जिस वस्तु या उत्पादों की मांग सामने आई है वहां उसके निर्यात को प्रोत्साहित किया जाएगा। यह मैट्रिक्स विभिन्न देशों के आधार के साथ साथ दुनिया के विभिन्न जोनों में उत्पादों की मांग के आधार पर तैयार किया जा रहा है।

दूतावासों की सूचना के आधार पर इस मैट्रिक्स में कई ऐसे देशों के नाम भी जोड़े जा रहे हैं जो अभी तक भारत की निर्यात सूची में प्राथमिकता पर नहीं थे। लेकिन वहां से भी भारतीय वस्तुओं की मांग की सूचना मिली है। इन सूचनाओं के आधार पर ही सरकार निर्यातकों और उनके संगठनों को जानकारी उपलब्ध करा रही है ताकि भारतीय निर्यात को तेज वृद्धि की राह पर लाया जा सके। वाणिज्य मंत्री सुरेश प्रभु की निर्यात संगठनों के साथ हुई बातचीत में भी यह मुद्दा चर्चा में आया है।

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सरकार ने चीनी पर खत्म की एक्सपोर्ट ड्यूटी, इंडस्ट्री को मिली राहत

सरकार ने डॉमेस्टिक मार्केट में चीनी की गिरती कीमतों को थामने के लिए उस पर 20 फीसदी एक्सपोर्ट ड्यूटी हटा दी है। सरकार के इस फैसले से शुगर इंडस्ट्री को खासी राहत मिली है, जो इस समय मुश्किल दौर से गुजर रही है। इस संबंध में सरकार ने नोटिफिकेशन जारी कर दिया है। सरकार ने कहा कि ड्यूटी खत्म होने से सरकार को मौजूदा एक्सपोर्ट वॉल्यूम पर सालाना 75 करोड़ रुपए का नुकसान होगा।

 

इंडस्ट्री ने की थी डिमांड
इंडस्ट्री ने डॉमेस्टिक सप्लाई को थामने और इस सीजन रिकॉर्ड आउटपुट को देखते हुए कीमतों को सही लेवल पर बनाए रखने में मदद करने के लिए ड्यूटी हटाने की मांग की थी। चीनी पर एक्सपोर्ट ड्यूटी को हटाने की मांग को लेकर खाद्य मंत्रालय ने दो बार अपनी सिफारिश वित्त मंत्रालय को भेजी थी। चीनी मिलों के ऑर्गनाइजेशन ने भी  सरकार से एक्सपोर्ट ड्यूटी हटाने का अनुरोध किया था।
केंद्रीय खाद्य मंत्री रामविलास पासवान ने कुछ दिन पहले कहा था कि रिकॉर्ड प्रोडक्शन को देखते हुए उन्होंने फरवरी में चीनी का निर्यात शुल्क घटाने की अपनी सिफारिश वित्त मंत्रालय को भेजी है।

 

इस साल चीनी के रिकॉर्ड प्रोडक्शन की उम्मीद
चीनी मिलों के संगठन इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन (इस्मा) के मुताबिक देश में इस साल चीनी का उत्पादन 2.95 करोड़ टन होने की उम्मीद है, जो गत साल से 92 लाख टन ज्यादा है। चीनी के तीन प्रमुख उत्पादक राज्य महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक में क्रमश: 93.8 लाख टन, 84.3 लाख टन और 35.1 लाख टन चीनी का प्रोडक्शन हुआ है। पिछले शुगर सीजन 2016-17 (अक्टूबर-सितंबर) में देश में 2.03 करोड़ टन चीनी का उत्पादन हुआ था।

 

किसानों का बकाया हुआ 20 हजार करोड़ रु
इस्मा ने कहा कि चीनी का स्टॉक बढ़ने से घरेलू बाजार में इसकी कीमत घटकर काफी कम हो गई है जिससे मिलों का घाटा लगातार बढ़ रहा है। इस्मा के मुताबिक, जनवरी तक गन्ने की बकाया राशि बढ़कर 14,000 करोड़ रुपए थी जो इस महीने के अंत तक बढ़कर 20 हजार करोड़ रुपए से अधिक हो सकती है।