Posted on

जब पस्‍त हुए चिकित्‍सक, तो काम आए योगगुरु

यह सच मध्‍यप्रदेश के एक छोटे जिले मंदसौर का है। योग ने मंदसौर के 50 से अधिक बुजुर्गों को 70 और 80 की उम्र में फिर से युवा बना दिया है। दशपुर कुंज, रामटेकरी और मेघदूत नगर में प्रतिदिन सुबह योग के लिए 200 से अधिक लोग जुटते हैं। इनमें ऐसे बुजुर्ग भी हैं, जो कुछ समय पहले चलने में मोहताज थे। अब युवाओं की तरह दौड़ लगा रहे हैं। शाजापुर में तो योग से पेरालिसिस तक ठीक होने का उदाहरण सामने आया है।

1- 70 के पारिख कर रहे हैं कमाल

मध्‍यप्रदेश के मंदसौर जिले के रहने वाले दिनेशचंद्र पारिख 70 वर्ष के हैं। पारिख का कहना है कि हम योग के लाभ को शब्‍दों में बयां नहीं कर सकते । वो बताते हैं कि नौ साल पहले हम योग से जुड़े। इसके बाद योग साधना से कुछ लाभ दिखा और मेरी दिलचस्‍पी इसमें गहरी होती गई। धीरे-धीरे योग से शारीरिक और मानसिक लाभ मिला और आस्‍था पैदा होने लगी। उन्‍होंने कहा कि 2008 से मैं नियमित योग कर रहा हूं।

स्वास्थ्य विभाग से सेवानिवृत्त पारिख बताते हैं कि घुटने में तकलीफ से सीढि़यां चढ़ना दूभर हो गया था। इस परेशानी से आजिज आकर मैंने एक साल पहले ही सेवानिवत्ति का मन बना लिया था। चिकित्सकों ने घुटने बदलने की सलाह दी। ऐसे में योग गुरु सुरेंद्र जैन के संपर्क में आकर योग शुरू किया। इससे चलना-फिरना आसान हो गया। छह माह में पैर ठीक हो गया।

2- अब सीढ़ियों पर दौड़ते हैं 70 वर्षीय पामेचा

इसी जिले के निवासी 70 वर्षीय पामेचा 10 वर्ष पूर्व योग से जुड़े। उनका योग में अपार विश्‍वास है। पमोचा कहते हैं कि वह दस वर्षों से निरंतर योगाभ्‍यास कर रहे हैं। उनका यह विश्‍वास अनायास नहीं है। योग से जुड़ने से पहले पोचा चलने-फ‍िरने में मोहताज थे। आज वह योगाभ्‍यास से दौड़ सकते हैं, सीढि़यों पर चढ़ सकते हैं। पामेचा कहते हैं कि 2008 में 70 वर्ष की उम्र में योग से जुड़ा, तब घर की सी़ढ़ियां एक पैर से ही चढ़ पाता था, दूसरा पैर काम नहीं करता था। योग शुरू करते ही पैर ठीक हो गया। मंदसौर के भंवरलाल पामेचा योग को जीवन के लिए हवा और भोजन की तरह ही जरूरी मानते हैं।

3- बीमा एजेंट यशपाल शर्मा पेरालिसिस ठीक हो गया

बीमा एजेंट यशपाल शर्मा को वर्ष 2001 में हार्ट अटैक हुआ। उनके दुखों का यहीं अंत नहीं हुआ। कुछ दिनों बाद वह पेरालिसिस से भी ग्रसित हो गए। यशपाल का कहना है कि वह तीन वर्षों तक चिकित्‍सकों से इलाज कराते रहे। इलाज में करीब 10 लाख रुपये भी खर्च हो गए। लेकिन स्थिति में कोई फर्क नहीं पड़ा। हमें कोई आराम नहीं मिला। यशपाल ने कहा कि हारा मन योग की शरण जा पहुंचा। योगाभ्‍यास से धीरे-धीरे आराम मिला। और मैं सालभर में पूरी तरह स्वस्थ हो गया। यशपाल अब योग में डिप्लोमा करने के बाद लोगों को योग सिखाने का काम कर रहे हैं।

4- रीतेश के जीवन में योग से फैला उजियारा

शहडोल निवासी रीतेश मिश्रा के जीवन में योग ने उजियारा फैलाया। रीतेश का कहना है कि छह साल की उम्र में ब्रेन ट्यूमर के ऑपरेशन के बाद आंखों की रोशनी चली गई थी। उन्‍होंने बताया कि मैं लगातार 14 साल तक योग कर रोशनी वापस लाने में कामयाब हुआ हूं। मुझे 80 प्रतिशत चीजें नजर आ जाती हैं। मार्कर से लिखे बड़े अक्षर पढ़ लेता हूं। मोबाइल को भी नजदीक से देखकर चला लेते हैं। रीतेश की तारीफ योग गुर बाबा रामदेव भी करते हैं। रीतेश बताते हैं कि बाबा रामदेव से मेरी पहली मुलाकात रीवा में 2008 में हुई थी। इसके बाद योग के प्रति लगाव पैदा हुआ।

रीतेश ने कहा पहले माता-पिता (सीमा मिश्रा व देवानंद मिश्रा) टीवी पर आसन देखकर योग कराते थे। मेरे माता-पिता मुझे लेकर काफी चिंतित थे। खासकर मेरी शिक्षा को लेकर। लेकिन समस्‍याओं के बावजूद रीतेश ने उच्‍च शिक्षा पूरी की। अब वह लोगों को योग सिखा रहे हैं। हाई प्रोफाइल लोगों की योग कक्षा पुलिस लाइन में सुबह साढ़े पांच बजे से शुरू हो जाती है। वेलफेयर फंड से इन्हें कुछ राशि बतौर मेहनताना मिलती है। इनकी योग कक्षा में शामिल रहने वालों में पुलिस अफसर, जज, डॉक्टर, सीए, इंजीनियर्स शामिल हैं।

बता दें कि 21 जून का पूरी दुनिया अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मना रही है। इसके अलावा 150 से अधिक देशों में योग दिवस मनाया जा रहा है। पूरे देश में अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाने के लिए करीब 5000 आयोजन हो रहे हैं।

Posted on

मेरे पास ज्यादा बड़ा और पावरफुल न्यूक्लियर बटन: नॉर्थ कोरिया की धमकी पर ट्रम्प

यूएस प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रम्प ने नॉर्थ कोरिया के तानाशाह की एटमी जंग की धमकी का जवाब उसी के अंदाज में दिया है। ट्रम्प ने एक ट्वीट में कहा- मेरे पास ज्यादा बड़ा और ताकतवर न्यूक्लियर बटन है। और ये काम भी करता है। बता दें कि नए साल पर किम जोंग उन ने अमेरिका को धमकी देते हुए कहा था कि एटमी हथियार लॉन्च करने का बटन हमेशा उनकी टेबल पर रहता है और वो इसके जरिए पूरे अमेरिका को तबाह कर सकते हैं। किम की धमकी का जवाब डोनाल्ड ट्रम्प ने दो दिन बाद दिया।

क्या कहा था नए साल पर किम जोंग ने?

– बता दें कि किम जोंग ने नए साल के मौके पर अपने देश को टीवी पर आकर संबोधित किया था। इस दौरान उसने अमेरिका को एटमी हथियारों से तबाह कर देने की धमकी दी थी। हालांकि, ये पहली बार नहीं था। किम जोंग उन पहले भी अमेरिका और उसके सहयोगियों की इस तरह की धमकी दे चुका है।
– किम जोंग उन ने कहा था- अमेरिका अब कभी भी हमारे खिलाफ जंग शुरू नहीं कर सकता, क्योंकि हमारे एटमी हथियार उसको तबाह कर देंगे। पूरा अमेरिका हमारे न्यूक्लियर वेपन्स की रेंज में है। इन हथियारों का बटन हमेशा मेरी टेबल पर रहता है। और यह एक सच्चाई है, इसे धमकी नहीं समझा जाना चाहिए।

ट्रम्प ने तंज कसते हुए दिया जवाब

– डोनाल्ड ट्रम्प ने बुधवार को एक ट्वीट के जरिए किम जोंग उन को उसी के अंदाज में जवाब दिया। इसमें तंज भी था। शायद ट्रम्प ये बताना चाहते थे कि नॉर्थ कोरिया के एटमी हथियार दिखावे के हैं। लेकिन, अमेरिका के हथियार हकीकत में काम करते हैं।
– ट्रम्प ने अपने ट्वीट में कहा- क्या कोई भुखमरी से जूझ रहे देश में उसे (किम जोंग उन को) ये बताएगा कि मेरे पास भी न्यूक्लियर बटन है। लेकिन, ये उनसे कहीं ज्यादा बड़ा और ज्यादा ताकतवर है। और मेरा बटन काम करता है।
– ‘मेरा बटन काम करता है’- किम जोंग उन की धमकी पर ट्रम्प की तरफ से किया गया तंज माना जा रहा है।
– व्हाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी सराह सैंडर्स ने बाद में कहा- नॉर्थ कोरिया को लेकर अमेरिका की सोच बदली नहीं है। हम उसे दुनिया के लिए खतरा मानते हैं।

किम ने पिछले साल भी दी थी धमकी

– पिछले साल की शुरुआत में किम ने कहा था- नॉर्थ कोरिया उस स्टेज में पहुंच गया है, जहां से वो इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल बना सकता है और उन्हें लॉन्च भी कर सकता है। उसने ऐसी 15 मिसाइल तैयार करने का दावा किया था।
– साउथ कोरिया की न्यूज एजेंसी योन्हेप के मुताबिक, नॉर्थ कोरिया दुनिया को तबाह करने में सक्षम हथियारों को बड़े पैमाने पर तैयार कर रहा है।
– किम की धमकी के बाद यूनाइटेड नेशन्स में अमेरिकी मिशन के स्पोक्सपर्सन जोनाथन वाशेल का बयान आया था। उन्होंने कहा था- अगर ऐसी कोई जंग हुई तो किम जोंग उन ही इसका पहला शिकार बनेंगे।

गद्दाफी और सद्दाम हुसैन जैसा होगा हश्र

– अमेरिकी न्यूज हेडक्वॉर्टर के होस्ट कैली राइट ने कहा था- अगर किम जोंग अमेरिका पर हमले की प्लानिंग करते हैं तो उनका हश्र भी लीबिया के तानाशाह मुअम्मर गद्दाफी या फिर इराक के तानाशाह सद्दाम हुसैन जैसा ही होगा।
– वहीं, वाशेल ने कहा था कि रूस और चीन कभी नहीं चाहेंगे कि उनके आसपास कोई न्यूक्लियर ताकत मौजूद रहे। वैसे, अमेरिका और उसके सहयोगी देश किसी भी हालात से निपटने के लिए तैयार हैं।

सतर्क रहे अमेरिका

– यूएस आर्मी के पूर्व चीफ ऑफ स्टाप माइक मुलेन एक टीवी शो में अमेरिका को नॉर्थ कोरिया से सतर्क रहने की हिदायद दे चुके हैं। मुलेन ने कहा था- अमेरिका नॉर्थ कोरिया से जंग के करीब पहुंचता जा रहा है। अब डिप्लोमैटिक तरीके से मामला हल करने की गुंजाइश काफी कम बची है।
– मुलेन ने कहा था – मेरे हिसाब से हालात अब काफी खतरनाक हो चुके हैं। मुझे समझ नहीं आ रहा है कि इसका अंत किस तरह होगा। मुझे लगता है कि हम नॉर्थ कोरिया से एटमी जंग के काफी करीब आ गए हैं।

Posted on

काबुल के शिया कल्चरल सेंटर पर आत्मघाती हमला; 40 की मौत, 30 से ज्यादा जख्मी

यहां के पश्चिमी इलाके में स्थित शिया कल्चरल एंड रिलीजियस ऑर्गनाइजेशन पर एक आत्मघाती हमले की खबर है। इसमें कम से कम 40 लोग मारे गए और 30 जख्मी हो गए। इस हमले की जिम्मेदारी अभी तक किसी भी आतंकी गुट ने नहीं ली है। मौके पर मौजूद लोगों ने बताया कि इस हमले में मरने वालों की तादाद बढ़ सकती है। स्थानीय मीडिया के मुताबिक, हमला उस वक्त किया गया जब ऑर्गनाइजेशन के ऑफिस में मीडिया ग्रुप के मेंबर्स चर्चा कर रहे थे।

– स्थानीय तोलो न्यूज ने विदेश मंत्रालय के हवाले से 40 लोगों की मौत और 30 लोगों के जख्मी होने की पुष्टि की है।

– अफगानिस्तान के अफसरों के मुताबिक, मारे गए लोगों में ज्यादातर महिलाएं, बच्चे और जर्नलिस्ट शामिल हैं।

एक ही परिवार के तीन लोगों की मौत

– तोला न्यूज के मुताबिक, इस हमले में एक ही परिवार के तीन लोगों की मौत हो गई है। परिवार वाले शवों के बीच में अपनों की तलाश करते रहे।

– प्रेसिडेंट अशरफ गनी ने इस हमले की निंदा की है और इसे इंसानियत के खिलाफ किया गया गुनाह बताया है।

मई में हुए अटैक में मारे गए थे 90 लोग

– बता दें कि इसी साल मई में काबुल स्थित इंडियन एंबेसी के पास भी ऐसा ही अटैक किया गया था, जिसमें कम से कम 90 लोगों की मौत हो गई थी। 300 से ज्यादा लोग जख्मी हुए थे।

जुलाई में कार ब्लास्ट में मारे गए थे 24 लोग

– गुलाई दावा खाना इलाके में 24 जुलाई को फिदायीन अटैक किया था। इसमें 24 लोगाें की मौत हो गई थी। 42 लोग जख्मी हुए थे।

हमलों में सबसे ज्यादा पिछले साल हताहत हुए
– यूनाइटेड नेशंस असिस्टेंस मिशन इन अफगानिस्तान (UNAMA) की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले साल अफगानिस्तान में हमलों में 3498 आम लोगों की मौत हुई थी। 7920 लोग घायल हुए। यानी 11418 लोग हताहत हुए। पिछले आठ सालों में यह आंकड़ा सबसे ज्यादा था। 2015 की तुलना में इसमें 2% का इजाफा हुआ था।
– UNAMA की रिपोर्ट के मुताबिक इस साल मार्च तक अफगानिस्तान में एयर स्ट्राइक और आतंकी हमलों में 715 लोगों की मौत हुई थी। 1466 लोग घायल हुए थे।

अमेरिकी फौज आने के बाद बढ़ रहीं मुश्किलें

– आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में अमेरिकी और विदेशी सेनाएं अफगानिस्तानी फोर्स की मदद करती रही हैं।

– फिलहाल यहां 8400 अमेरिकी सैनिक और 5000 नाटो सैनिक हैं। इनका मुख्य काम सलाहकार के रूप में काम करना है।

– छह साल पहले तक यहां एक लाख से ज्यादा अमेरिकी सैनिक थे। 2011 से 2013 के बीच अमेरिकी फौज की वापसी के बाद यहां आतंकी हमलों में तेजी आई है।

Posted on

मोदी ने किया मनसुख काका का जिक्र: बोले- बधाई, उन्होंने मनमोहन को सच्चाई बता दी

नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ राजकोट में हुई घटना का जिक्र किया। दरअसल, राजकोट में मनसुख भाई नाम के एक बुजुर्ग शख्स ने मनमोहन को रोककर उन्हें यूपीए सरकार के दौरान हुए करप्शन की एक किताब थमा दी थी। मनसुख ने मनमोहन से सवाल किया- आप अपनी सरकार के दौरान हुए घोटालों पर क्यों नहीं बोलते? मोदी ने बनासकांठा के भाबर में इस घटना का जिक्र किया। कहा- मनसुख काका को बधाई। उन्होंने मनमोहन को सच्चाई बता दी। बता दें कि मनसुख के सवाल पर मनमोहन ने बिना कोई जवाब दिए बस हाथ जोड़ लिए थे।

मोदी ने क्या कहा?

– मोदी ने कहा- आप जानते हैं राजकोट में क्या हुआ? डॉक्टर मनमोहन सिंह मीडिया से मिले और इसके बाद एक बुजुर्ग शख्स मनसुख काका उनसे मिलने पहुंच गए। उन्होंने मनमोहन सिंह को यूपीए सरकार के दौरान हुए घोटालों की एक किताब सौंप दी। मैं मनसुख काका को बधाई देता हूं। उन्होंने सच्चाई और ईमानदार सरकार के लिए आवाज उठाई।

– पूर्व पीएम मनमोहन सिंह राजकोट में थे। वह सभास्थल से लौट रहे थे, तभी बुजुर्ग मनसुखभाई ने उन्हें आवाज लगाई। मनमोहन रुके तो मनसुख ने उन्हें एक किताब दिखाकर कहा कि आपके शासन में करोड़ों रुपए के घोटाले हुए, आप उन पर क्यों नहीं बोले? इस पर मनमोहन ने हाथ जोड़ लिए।

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बोला बीजेपी पर हमला

1) आर्थिक नीतियों की आलोचना की
– मनमोहन सिंह ने राजकोट में मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों की आलोचना की। खासकर नोटबंदी और जीएसटी को गलत बताया।
– उन्होंने कहा- “नरेंद्र मोदी ने गुजरातियों के भरोसे को तोड़ने के साथ उन्हें धोखा भी दिया है। गुजरात की जनता ने नोटबंदी के मोदी जी के फैसले का यह सोच का समर्थन किया कि उनके त्याग से शायद देश को फायदा हो जाए पर ऐसा नहीं हुआ। उनकी उम्मीदें और भरोसा टूट गया। 99% पुराने नोट बैंक में आ गए और काले धन को सफेद बना लिया गया।”
– “इससे छोटे और मझोले उद्योगों को सबसे तगड़ी चोट लगी और लाखों नौकरियां चली गईं, जबकि नई नौकरियों के मौके नहीं बन रहे।”

2) मोदी करप्शन पर कार्रवाई करें
– मनमोहन ने कहा- “उनकी यूपीए सरकार के दौरान करप्शन के आरोपियों पर सख्त कार्रवाई होती थी और अगर मोदी जी भी भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के दावे करते हैं तो उन्हें बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के बेटे की कंपनी पर लगे आरोपों समेत अन्य आरोपों की जांच करानी चाहिए।”

3) राम मंदिर पर कुछ भी कहने से इनकार किया
– मनमोहन सिंह ने राम मंदिर से जुड़े एक सवाल पर केवल यही कहा कि यह मामला सुप्रीम कोर्ट में है। इसलिए वह इस पर वह कुछ नहीं कहना चाहते। कोर्ट का जो भी फैसला होगा, वह मान्य होगा।

4) नर्मदा प्रोजेक्ट को लेकर मोदी मुझसे कभी नहीं मिले
– सिंह ने कहा- जहां तक मुझे ध्यान है, नर्मदा प्रोजेक्ट को लेकर मोदी मुझसे प्रधानमंत्री रहते कभी नहीं मिले।

Posted on

भारतीय राजनीति का सबसे बेबाक और बिंदास चेहरा यानी राम मनोहर लोहिया

महज चार साल में भारतीय संसद को अपने मौलिक राजनीतिक विचारों से झकझोर देने का करिश्मा राम मनोहर लोहिया ने कर दिखाया था.

चाहे वो जवाहर लाल नेहरू के प्रतिदिन 25 हज़ार रुपये खर्च करने की बात हो, या फिर इंदिरा गांधी को गूंगी गुड़िया कहने का साहस रहा हो. या फिर ये कहने के हिम्मत कि महिलाओं को सती-सीता नहीं होना चाहिए, द्रौपदी बनना चाहिए.

राम मनोहर लोहिया वो पहले राजनेता रहे जिन्होंने कांग्रेस सरकार को उखाड़ फेंकने का आह्वान करते हुए कहा था जिंदा कौमें पांच साल तक इंतज़ार नहीं करतीं.

उत्तर भारत में आज भी आप राजनीतिक रुझान रखने वाले किसी युवा से बात करें तो वे इस नारे का जिक्र ज़रूर करेगा- ‘जब जब लोहिया बोलता है, दिल्ली का तख़्ता डोलता है.’

नेहरू का विरोध

जब देश जवाहर लाल नेहरू को अपना सबसे बड़ा नेता मान रहा था, ये लोहिया ही थे जिन्होंने नेहरू को सवालों से घेरना शुरू किया था. नेहरू से उनकी तल्खी का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि उन्होंने एक बार ये भी कहा था कि बीमार देश के बीमार प्रधानमंत्री को इस्तीफ़ा दे देना चाहिए.

1962 में लोहिया फूलपुर में जवाहर लाल नेहरू के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ने चले गए. उस चुनाव में लोहिया की चुनाव प्रचार की टीम का हिस्सा रहे सतीश अग्रवाल याद करते हैं, “लोहिया जी कहते थे मैं पहाड़ से टकराने आया हूं. मैं जानता हूं कि पहाड़ से पार नहीं पा सकता लेकिन उसमें एक दरार भी कर दिया तो चुनाव लड़ना सफल हो जाएगा.”

जवाहर लाल नेहरू- महात्मा गांधीइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

बिहार में समाजवादी राजनीति का अहम चेहरा माने जाने वाले शिवानंद तिवारी को राम मनोहर लोहिया को करीब से देखने का मौका मिला था. 1967 में भोजपुर के शाहपुर विधानसभा सीट से शिवानंद तिवारी के पिता रामानंद तिवारी चुनाव लड़ रहे थे, उनके चुनाव प्रचार में लोहिया गए थे.

शिवानंद तिवारी कहते हैं, “मुझे उनके साथ चार सभाओं में जाने का मौका मिला था. वे एक भविष्यवक्ता के भांति बोल रहे थे. उन्होंने लोगों से कहा था कि आप ये सोचकर वोट दीजिए कि आप जिसे चुन रहे हैं वो मंत्री बनने वाला है या वो मंत्री बनाने वाला है.”

लोहिया की राजनीतिक विरासत

शिवानंद तिवारी के मुताबिक जब 1967 में जब हर तरफ कांग्रेस का जलवा था, तब राम मनोहर लोहिया इकलौते ऐसे शख़्स थे जिन्होंने कहा था कि कांग्रेस के दिन जाने वाले हैं और नए लोगों का जमाना आ रहा है. नौ राज्यों में कांग्रेस हार गई थी.

राम मनोहर लोहिया
इमेज कॉपीरइटWWW.IAAW.HU-BERLIN.DE
Image captionजर्मनी में डॉक्टरेट की पढ़ाई करने के दौरान लोहिया की तस्वीर

लोहिया की मौत के बाद उनकी विरासत और उनके नाम की राजनीति ख़ूब देखने को मिली. कम से कम उत्तर प्रदेश और बिहार में. मुलायम सिंह यादव तो अपनी पार्टी को लोहिया की विरासत को मानने वाली पार्टी के तौर पर देखते रहे हैं.

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव कहते हैं, “लोहिया जी हमारे पार्टी के सबसे बड़े आदर्श हैं. 1967 में पहली बार उन्होंने ही नेताजी को टिकट दिया था. जसवंत नगर विधानसभा सीट से. लोहिया समाज में गरीब गुरबों की आवाज़ उठाना चाहते थे, वे पिछड़ों को सत्ता में भागीदारी देना चाहते थे. उनका सपना था सौ में पावें पिछड़े साठ.”

मुलायम की राजनीतिक क्षमता को सबसे पहले लोहिया जी ने ही देखा था. मुलायम सिंह यादव ने जल्दी ही प्रकाशित होने वाली अपनी राजनीतिक जीवनी द सोशलिस्ट में याद किया है, “1963 में फर्रूख़ाबाद सीट से उपलोकसभा चुनाव में मैं अपने साथियों के साथ उनके प्रचार में जुटा था. विधुना विधानसभा में उन्होंने मुझसे पूछा था कि प्रचार के दौरान क्या खाते हो, कहां रहते हो. मैं ने कहा कि लैइया चना रखते हैं, लोग भी खिला देते हैं और जहां रात होती है उसी गांव में सो जाते हैं. उन्होंने मेरे कुर्ते की जेब में सौ रूपये का नोट रख दिया था.”

राम मनोहर लोहिया के साथ मुलायम की तस्वीरइमेज कॉपीरइटALAMY

हालांकि मुलायम को बाद में शिवानंद तिवारी से बहुत ज्यादा मिलने जुलने का मौका नहीं मिला, लेकिन परिवारवाद के पहलू को छोड़कर लोहिया के राजनीतिक विरासत पर मुलायम लगातार अपना दावा जताते रहे.

समाजवादी राजनीति को शिवानंद तिवारी लंबे समय से देख रहे हैं. लोहिया की राजनीति के असली वारिस की बात होने पर शिवानंद तिवारी कहते हैं, “लोहिया जिस तरह की राजनीति की बात करते थे, उसके ठीक ठीक अपनाने वाले तो केवल किशन पटनायक ही हो पाए. हालांकि उनको वो सम्मान नहीं मिला. बिहार की राजनीति में लोहिया को जिन्होंने काफी हद तक अपने जीवन में उतारा वो लालू ही रहे हैं.”

हिंदी के हिमायती रहे लोहिया

शिवानंद तिवारी आगे कहते हैं, “अगर आप 1990 से 1995 के बीच के लालू के भाषणों को देखें तो उनमें लोहिया की झलक मिलती थी. हालांकि बाद में उनके क़दम डगमगाए और उनमें उतना बड़ा विजन भी विकसित नहीं हो पाया. लालू लोहिया के जितने करीब पहुंच सकते थे, वहां तक पहुंचने में वो चूक गए.”

चाहे मुलायम हों या फिर लालू या शरद या राम विलास पासवान, इन सब पर लोहिया का असर दिखा ज़रूर लेकिन ये सब उस जातिवादी राजनीति के दायरे से नहीं निकल पाए, जिसका लोहिया आजीवन विरोध करते रहे.

शिवानंद तिवारी के मुताबिक लोहिया होने आसान नहीं हैं क्योंकि लोहिया को देश और दुनिया के राजनीति की जितनी समझ थी, उससे ज्यादा वे भारतीय परंपराओं और भारतीय समाज को जानते बूझते थे, वे लगातार पढ़ने लिखने वाले राजनेता थे.

राम मनोहर लोहियाइमेज कॉपीरइटLOHIA TRUST

ये कम ही लोग जानते होंगे कि लोहिया ने जर्मनी से डॉक्टरेट की डिग्री हासिल की थी. वे अंग्रेजी, जर्मन, फ्रेंच, मराठी और बांग्ला धड़ल्ले से बोल सकते थे, लेकिन वे हमेशा हिंदी में बोलते थे, ताकि आम लोगों तक उनकी बात ज्यादा से ज्यादा पहुंचे.

लोहिया ने चाहे आम लोगों के हितों की बात की हो, या समाज में महिलाओं की बराबरी देने की बात कही हो, ऐसे लगता है कि वे भारतीय राजनीति के सबसे दूरदर्शी नेताओं में शामिल थे, लेकिन उनके अंदर एक आग हमेशा धधकती रहती थी.

लोहिया की जीवनीकार श्रीमति इंदू केलकर ने लोहिया की रामधारी सिंह दिनकर से एक मुलाकात का जिक्र किया है, वे लिखती हैं, “निधन से एक महीने पहले ही दिनकर लोहिया से मिले थे और कहा था कि क्रोध कम कीजिए, देश आपसे बहुत प्रसन्न है, कहीं ऐसा न हो कि भार जब आपके कंधों पर आए तब आपका अतीत आपकी राह का कांटा बन जाए. लोहिया बोले थे- आपको लगता है तब तक मैं जी पाऊंगा?”

लोहिया का निजी जीवन भी कम दिलचस्प नहीं था. लोहिया अपनी ज़िंदगी में किसी का दख़ल भी बर्दाश्त नहीं करते थे. हालांकि महात्मा गांधी ने उनके निजी जीवन में दख़ल देते हुए उनसे सिगरेट पीना छोड़ देने को कहा था. लोहिया ने बापू को कहा था कि सोच कर बताऊंगा. और तीन महीने के बाद उनसे कहा कि मैंने सिगरेट छोड़ दी.

बिंदास जीवन था लोहिया का

लोहिया जीवन भर रमा मित्रा के साथ लिव इन रिलेशनशिप में रहे. रमा मित्रा दिल्ली के मिरांडा हाउस में प्रोफेसर रहीं. दोनों के एक दूसरे को लिखे पत्रों की किताब भी प्रकाशित हुई. शिवानंद तिवारी बताते हैं, “लोहिया ने अपने संबंध को कोई छिपाकर नहीं रखा था. लोग जानते थे, लेकिन उस दौर में निजता का सम्मान किया जाता था. लोहिया जी ने जीवन भर अपने संबंध को निभाया और रमा जी ने उसे आगे तक निभाया.”

राम मनोहर लोहियाइमेज कॉपीरइटLOHIA TRUST

50-60 के दशक में भारत में आम लोगों की राजनीति करने वाला कोई नेता अपने निजी जीवन में इतना बिंदास हो सकता है, इसकी कल्पना आज भी मुश्किल ही है. लोहिया महिलाओं को समान अधिकार दिए जाने की वकालत करते हुए कहते थे कि देश की सती-सीता की ज़रूरत नहीं बल्कि द्रौपदी की ज़रूरत है जो संघर्ष कर सके, सवाल पूछ सके.

1962 के आम चुनाव में लोहिया का फूलपुर में चुनाव प्रचार में हिस्सा ले चुके सतीश अग्रवाल बताते हैं, “लोहिया किस हद तक बिंदास थे, इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि एक बार तारकेश्वरी सिन्हा ने उनसे कहा कि आप महिलाओं और उनके अधिकारों के बारे में काफ़ी बात करते हैं लेकिन आपने तो शादी नहीं की. लोहिया ने तत्काल जवाब दे दिया- भई तुमने तो मौका ही नहीं दिया.”

हुसेन की पेंटिंग- लोहिया- नेहरू
इमेज कॉपीरइटMF HUSSIAN

राम मनोहर लोहिया ऐसे राजनेता थे जो अमरीका जा कर वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन से समाजवाद पर बहस कर सकते थे और मक़बूल फ़िदा हुसेन जैसे कलाकार की कला को भी राह दिखा सकते थे. दिल्ली के एक रेस्टोरेंट में लोहिया ने ही मक़बूल फ़िदा हुसेन को कहा था, “ये जो तुम बिरला और टाटा के ड्राइंग रूम में लटकने वाली तस्वीरों से घिरे हो, उससे बाहर निकलो. रामायण को पेंट करो.”

अस्पताल की लापरवाही के चलते मौत

लोहिया की मौत भी कम विवादास्पद नहीं रही. उनका प्रोस्टेट ग्लैंड्स बढ़ गया था और इसका ऑपरेशन दिल्ली के सरकारी विलिंग्डन अस्पताल में किया गया था.

उनकी मौत के बारे में वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर ने अपनी ऑटो बायोग्राफी बियांड द लाइन्स में भी किया है. इसमें उन्होंने लिखा है, “मैं राम मनोहर लोहिया से अस्पताल में मिलने गया था. उन्होंने मुझसे कहा कुलदीप मैं इन डॉक्टरों के चलते मर रहा हूं.”

कुलदीप आगे लिखते हैं कि लोहिया की बात सच ही निकली क्योंकि डॉक्टरों ने उनकी बीमारी का गलत इलाज कर दिया था. उनकी मौत के बाद सरकार ने दिल्ली के सभी सरकारी अस्पतालों के निरीक्षण करवाने हेतु एक समिति नियुक्त की गई थी. आज यही अस्पताल राम मनोहर लोहिया अस्पताल के रूप में जाना जाता है.

लोहिया अस्पतालइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

इस समिति की रिपोर्ट का एक हिस्सा 26 जनवरी, 1968 को टाइम्स ऑफ़ इंडिया में प्रकाशित हुआ था, इसमें समिति ने दावा किया था, “अगर अस्पताल के अधिकारी आवश्यक और अनिवार्य सावधानी से काम लेते तो लोहिया का दुखद निधन नहीं होता.”

शिवानंद तिवारी याद करते हैं कि तब वो बड़ा मुद्दा बना था लेकिन बाद वो बात दबा दी गई. 1977 में केंद्र सरकार में राजनारायण स्वास्थ्य मंत्री बने तो उन्होंने लोहिया की मौत के कारणों की जांच करने के लिए विशेषज्ञों की समिति नियुक्त या, लेकिन अस्पताल में तब सारे कागज़ ग़ायब थे.

पैनी नज़र थी लोहिया की

लोहिया के जीवन और उनके विचारों को संजोने की कोशिश उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद के समाजिक कार्यकर्ता नितेश अग्रवाल जैन कर रहे हैं. उन्होंने लोहिया पर करीब 90 मिनट की डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म बनाने का जोख़िम उठाया है.

लोहिया के जीवन पर फ़िल्मइमेज कॉपीरइटNITESH JAIN

वे कहते हैं, “उनके विचारों को पढ़ने के बाद मुझे लगा कि इनकी बात आम लोगों तक पहुंचनी चाहिए. मेरी फ़िल्म एंबैसडर ऑफ सोशलिज्म डॉक्टर राम मनोहर लोहिया लगभग तैयार है. उनके जन्म दिन पर अगले साल रिलीज करेंगे ताकि उनका संदेश देश दुनिया के कोने कोने तक पहुंचे.”

लोहिया की राजनीतिक दृष्टि जितनी पैनी थी, उतनी ही सामाजिक दृष्टिकोण. उन्होंने मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड में सुधार की बात हो या फिर गंगा की सफ़ाई का मुद्दा हो या फिर हिंदु मुस्लिम सांप्रदायिकता की बात हो, इन सब मुद्दों पर बेबाकी से अपनी बात रखी थी. वो भी पचास साल पहले.

हालांकि कुछ राजनीतिक विश्लेषक लोहिया पर जनसंघ को बढ़ावा देने का आरोप लगाते हैं हालांकि ये समझना मुश्किल नहीं कि कांग्रेस के विरोध के लिए दूसरे तमाम लोगों को एक साथ लाना पड़ा. अखिलेश यादव कहते हैं, “लोहिया के जमाने में कांग्रेस की जो स्थिति थी वही अब बीजेपी की है. बीजेपी के ख़िलाफ़ हमने भी कांग्रेस को साथ लिया है.”