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Congress poster spotted in Cambridge Analytica CEO Nix’s London office

Though the Congress has denied it has any links with Cambridge Analytica, the company accused of stealing Facebook data to influence elections, a documentary released last year by journalist and tech blogger Jamie Bartlett throws up an image the Congress may have hard time to explain.

The Persuasion Machine, the last of the two-part documentary series for the BBC, ‘Secrets of the SIlicon Valley’, shows Bartlett meeting Cambridge Analytica’s now-suspended CEO Alexander Nix in his London office. As Bartlett enters Nix’s room, he stands up and greets him. Right behind Nix, on the wall, is a poster showing the ‘hand’ symbol of the Congress party. Below the hand is written “Congress” in bold letters. The poster carries the slogan ‘Development for all’.

Bartlett’s documentary probes the role of technology in the election campaign of US President Donald Trump. Nix is one of the many people he interviews. Though Nix says nothing about the operations of Cambridge Analytica in India and talks about only the Trump campaign, the Congress poster on the wall behind him looks like proud showcasing of a big client.

In ‘The Persuasion Machine’, Bartlett narrates how Silicon Valley has opened a new frontier—controlling political expression and behaviour of the masses. “It was the biggest political earthquake of the century. But just how did Donald Trump defy the predictions of political pundits and pollsters?” begins Bartlett.

BJP Minister Smriti Irani shares this picture from her official Twitter handle and disclose this important news with mentioning economictimes article.

After Nix explains how the company created psychographic profiles of voters, Bartlett asks, “Where did all the information to predict voters’ personalities come from?” Nix says,”Very originally, we used a combination of telephone surveys and then we used a number of online platforms for gathering questions. As we started to gather more data, we started to look at other platforms such as Facebook, for instance.”

When Bartlett wonders if some people would find it a little bit creepy to predict a voter’s personality to persuade him, Nix says, “No, I can’t. Quite the opposite. I think that the move away from blanket advertising, the move towards ever more personalised communication is a very natural progression. I think it is only going to increase.”

Justifying the company using personal data people put in the public domain, Nix gives the example of a supermarket loyalty card where people get points and the company gathers the data on consumer behaviour. But Bartlett is puzzled. “I mean, we are talking about politics and we’re talking about shopping. Are they really the same thing?” he asks. Nix replies, “The technology is the same. In the next 10 years, the sheer volumes of data that are going to be available, that are going to be driving all sorts of things including marketing and communications, is going to be a paradigm shift from where we are now and it’s going to be a revolution, and that is the way the world is moving. And, you know, I think, whether you like it or not, it is an inevitable fact.”

For more than a week, the Congress and the Bharatiya Janata Party (BJP) have traded charges, accusing each other of having been clients of Cambridge Analytica. Christopher Wylie, the Cambridge Analytica whistleblowerat the heart of the Facebook privacy scandal, told British lawmakers yesterday that he “believes” Congress was the company’s client.

The Congress denies it has anything to do with Cambridge Analytica. However, Alexander Nix was not shy of displaying the Congress poster in his own office.

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मुरैना: खेत में बैठ कर शराब पी रहा था युवक, नशे में सांप को काटा, सांप की मौत

मध्य प्रदेश के मुरैना जिले से एक बेहद हैरतअंगेज खबर सामने आई है. सबलगढ़ तहसील के पचेर गाँव में शराब के नशे में धुत एक युवक ने एक सांप को दबोच लिया और उसे काट लिया, जिससे सांप की मौत हो गई. हाल ही में एक ऐसा मामला यूपी से भी सामने आया था.

शराबी युवक भी बाद में बेहोश होकर गिर पड़ा. जिला अस्पताल में भर्ती युवक को इलाज के बाद डिस्चार्ज कर दिया गया है.

जिला अस्पताल के चिकित्सा विशेषज्ञ डॉ राघवेंद्र यादव ने बताया कि युवक कल्याण जालिम सिंह कुशवाह अपने खेत पर शराब पी रहा था. तभी वहां एक जहरीला सांप निकला. सांप को देखते ही वह बौखला गया और उसने झपट्टा मार सांप को दबोच लिया और उसे काट लिया. सांप ने कुछ देर बाद ही दम तोड़ दिया.

डॉ यादव ने बताया कि सांप का जहर जैविक प्रोटीन होता है. बॉडी में इंजेक्ट होने और खून में मिलने के बाद ही इसका असर होता है. युवक को ज़हर का असर नहीं हुआ. वह अधिक शराब पीने और घबराहट की वजह से बेहोश हो गया था. होश में आने के बाद उसे डिस्चार्ज कर दिया गया.

यूपी के हरदोई में भी हुआ था ऐसा मामला

उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले में किसान सोनेलाल (40) अपने जानवरों के लिए खेत से चारा लेने गए थे. चारा बीनते समय झाड़ियों में छुपे सांप ने सोनेलाल को काट लिया. सांप के काटने के बाद सोनेलाल ने बिना डरे उसे पकड़ लिया और सांप के फन को दांत से काटकर खा गया, और गांव लेकर आ गया.

गांव के लोगों ने उसे समझाया मगर उसका गुस्सा शांत नहीं हुआ. जब गुस्सा शांत हुआ तो उसने सांप को फेंक दिया. किसान के इस काम को देखकर लोग हैरत में पड़ गए. परिजनों ने सीएचसी में उसे भर्ती कराया जहां उसे प्राथमिक उपचार के बाद छुट्टी दे दी गयी. अब उसकी हालत ठीक है लेकिन चिकित्सक भी इस घटना को लेकर हैरान है.

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हिमयुग की शुरुआत : दुनिया के सबसे गर्म रेगिस्तान में 40 सालों में तीसरी बार बर्फ


  • दुनिया के सबसे गर्म रेगिस्तान में 40 सालों में तीसरी बार बर्फबारी हुई है. सहारा रेगिस्तान का प्रवेश द्वार माने जाने वाले उत्तरी अल्जीरिया के ऐन सफेरा में लाल रेत पर सफेद बर्फ की चादर गिरी है. रविवार को यहां 16 इंच तक बर्फबारी दर्ज की गई है. करीब 38 साल पहले फरवरी 1979 में यहां कुछ घंटे तक बर्फबारी हुई थी. पिछले साल दिसंबर में भी हल्की बर्फबारी हुई थी. लेकिन, इस बार यहां पूरे दिन बर्फबारी हुई. आइए देखते हैं दुनिया के अन्य शहरों में हुई बर्फबारी की PHOTOS…

  • PICS: दुनिया के सबसे गर्म रेगिस्तान में 40 सालों में तीसरी बार बर्फ
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    एलटल माउंटेन से घिरा अल्जीरिया का ये इलाका समुद्र तल से करीब 1000 मीटर ऊंचा है. गर्मियों में यहां का तापमान 48 डिग्री सेल्‍सियस तक चला जाता है. वहीं मौसम के बदलते मिजाज को देखते हुए वैज्ञानिकों के इस अनुमान को बल मिला है कि अगले करीब 15 हजार सालों में सहारा रेगिस्तान फिर से हरा भरा हो जाएगा.

  • PICS: दुनिया के सबसे गर्म रेगिस्तान में 40 सालों में तीसरी बार बर्फ
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    दूसरी ओर दुनिया के अन्य शहरों में भी बर्फबारी देखने को मिल रही है. बता दें कि अमेरिका के न्यूयॉर्क, शिकागो समेत कई बड़े शहर डीप फ्रीजर में तब्दील हो गए हैं. वहीं चीन में जमीन से लेकर ऊंची इमारतों तक बर्फ का कब्जा है. (फोटो- कनाडा के ओटावा की है)

  • PICS: दुनिया के सबसे गर्म रेगिस्तान में 40 सालों में तीसरी बार बर्फ
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    इटली में भी बर्फबारी हो रही है. ये तस्वीर सेस्त्रियेर नाम के इलाके की है.

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    यह तस्वीर कनाडा के ओन्टरियो के नियाग्रा फॉल्स की है. कनाडा में काफी संख्या में पर्यटक बर्फबारी का लुत्फ उठाने पहुंचे हैं.

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    ये तस्वीर स्विटजरलैंड के जरमैट की है. यहां इतनी बर्फबारी हुई है कि सड़क मार्ग बंद हो गया है. सिर्फ हवाई सफर से ही टूरिस्ट यहां आ सकते हैं.

  • PICS: दुनिया के सबसे गर्म रेगिस्तान में 40 सालों में तीसरी बार बर्फ
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    यह तस्वीर इटली की है. इटली में भारी बर्फबारी की चेतावनी जारी की गई है. कई गांवों का संपर्क शहर से कट गया है.


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सऊदी अरब और ईरान के बीच अगर युद्ध हुआ तो क्या होगा?

मंगलवार को सऊदी अरब की राजधानी रियाद पर एक मिसाइल दागी गई. इस मिसाइल के निशाने पर था सऊदी अरब का राजमहल. जहां पर सऊदी किंग सलमान बजट पेश करने वाले थे. मिसाइल अपने निशाने तक पहुंचती, उससे पहले ही इसे हवा में मार गिराया गया.

यूं तो ये मिसाइल सऊदी अरब के पड़ोसी देश यमन के बाग़ी हूथियों ने दागी थी, मगर सऊदी अरब को यक़ीन है कि इसका रिमोट यमन से दूर ईरान की राजधानी तेहरान में था. ईरान, जो कई दशकों से सऊदी अरब का सबसे बड़ा दुश्मन है.

सऊदी अरब समेत दुनिया के कई देश मानते हैं कि यमन के शिया हूथी विद्रोहियों की पुश्त पर ईरान का हाथ है. रियाद पर दागी गई ये मिसाइल, सऊदी अरब और ईरान के बीच क़रीब एक सदी से जारी तनातनी की सबसे ताज़ा मिसाल है. इस साल ये तीसरा मौक़ा था जब हूथी विद्रोहियों ने सऊदी अरब पर मिसाइल फेंकी थी.


अगर सऊदी अरब और ईरान के बीच युद्ध हुआ तो?इमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

सियासी और सामरिक ताक़त

इन दिनों पश्चिमी एशिया में हालात कुछ यूं हैं कि मानो सऊदी अरब और ईरान में जंग छिड़ने वाली हो. तो, अगर सऊदी अरब और ईरान के बीच युद्ध हुआ, तो क्या होगा?बीबीसी की रेडियो सिरीज़ द इंक्वॉयरी में इस सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश की गई है.

सऊदी अरब और ईरान पश्चिमी एशिया की दो बड़ी सियासी और सामरिक ताक़तें हैं. दोनों बड़े तेल उत्पादक देश हैं. अगर दोनों के बीच युद्ध हुआ, तो इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा. ब्रिटेन के माइकल नाइट अरब मामलों के जानकार हैं. वो ब्रिटिश सरकार के अरब मामलों के सलाहकार रहे थे.

नाइट बताते हैं, “ईरान, ऐतिहासिक रूप से बहुत असरदार देश रहा है. कई सदियों तक उसने अरब देशों पर राज किया. तब इसे पर्शिया के नाम से जाना जाता है. वहीं, सऊदी अरब और दूसरे अरब देशों ने पिछली एक सदी में तेल की वजह से काफ़ी तरक़्क़ी की है. इस दौरान ये अरब देश ताक़तवर बनकर उभरे हैं. इस वजह से ईरान का असर इन इलाक़ों पर कम होता गया है.”


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ताकि विरोधी पर दबदबा क़ायम कर सकें

माइकल नाइट कहते हैं, “सऊदी अरब और ईरान के बीच तनातनी की बड़ी वजह मज़हबी भी है. सऊदी अरब एक सुन्नी देश है. वहीं ईरान, इस्लाम के शिया फ़िरक़े को मानने वाला. दोनों ही देश, अपने धार्मिक साथियों को दूसरे देशों में भी बढ़ावा देते रहे हैं, ताकि विरोधी पर दबदबा क़ायम कर सकें. ये भी ईरान और सऊदी अरब के बीच कड़वाहट की बड़ी वजह है.”

पिछले कुछ सालों में ईरान, सऊदी अरब पर भारी पड़ता दिख रहा है. कई अरब देशों पर उसका दबदबा बढ़ रहा है. ईरान ने इराक़ में अपना असर बढ़ा लिया है. सीरिया और लेबनान में भी उसके प्यादे काफ़ी ताक़तवर हैं. वहीं, यमन में वो हूथी विद्रोहियों को हथियार और ट्रेनिंग मुहैया करा कर सऊदी अरब की नाक में दम किए हुए है.

माइकल नाइट का कहना है, “इसमें ईरानी फौज का इंक़लाबी दस्ता यानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स का बड़ा हाथ रहा है.” नाइट के मुताबिक़ रिवोल्यूशनरी गार्ड्स, ईरान का सबसे ताक़तवर हथियार हैं. इनका ख़ौफ़ अरब देशों पर तारी है. ये बेहद पेशेवर दस्ता है. जिसने कई मोर्चों पर अपनी ताक़त दिखाई है.


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Image captionरिवोल्यूशनरी गार्ड्स

शिया, सुन्नी और रिवोल्यूशनरी गार्ड्स

अरब देशों में शिया, रिवोल्यूशनरी गार्ड्स को अपनी फौज मानते हैं. वहीं सुन्नी अरब इससे डरते हैं.

माइकल नाइट के मुताबिक़, “सऊदी अरब और ईरान के बीच औपचारिक जंग भले न छिड़ी हो. मगर, दोनों ही देश कई मोर्चों पर लड़ रहे हैं. इसकी सबसे बड़ी मिसाल है यमन. जहां पर सऊदी अरब की अगुवाई में कई देशों की सेनाएं, हूथी विद्रोहियों से लड़ाई लड़ रही हैं. वहीं हूथियों को ईरान की सरपरस्ती हासिल है. सऊदी अरब, यमन पर लगातार हवाई हमले कर रहा है. मगर, वो निर्णायक जीत हासिल करने में नाकाम रहा है. सऊदी अरब की नज़र में उसकी जीत की राह में ईरान सबसे बड़ा रोड़ा है.”

यमन के अलावा, सीरिया में भी सऊदी अरब और ईरान, अलग-अलग गुटों के साथ हैं. ईरान, जहां राष्ट्रपति बशर अल असद का समर्थन कर रहा है. वहीं, सऊदी अरब, असद के ख़िलाफ़ बग़ावत करने वालों का साथ दे रहा है.


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Image caption1980-88 ईरान इराक के बीच युद्ध के दौरान प्रदर्शित मिसाइलें

शीत युद्ध की स्थिति

लेबनान में ईरान समर्थित हिज़बुल्लाह गुट ताक़तवर है. वहीं सऊदी अरब भी वहां के सुन्नियों का साथ देता है. इराक़ में भी ईरान और सऊदी अरब के बीच दबदबा बढ़ाने की होड़ लगी है. इराक़ की सरकार ने इस्लामिक स्टेट पर जीत हासिल की, तो इसमें ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स का बड़ा हाथ माना जाता है.

इसी तरह, एक छोटे से मुल्क़ बहरीन में भी सऊदी अरब और ईरान आमने-सामने हैं. बहरीन एक शिया बहुल मुल्क़ है. मगर यहां का शेख़ सुन्नी है. सऊदी अरब यहां के राजा के साथ है. वहीं, ईरान, बहरीन में सरकार विरोधी शिया गुरिल्ला संगठनों के साथ है.

माइकल नाइट कहते हैं कि अभी सऊदी अरब और ईरान के बीच कई देशों में शीत युद्ध सा चल रहा है. लेकिन ये कभी भी असल जंग का रूप ले सकता है.

एंथनी कोडिसमन अमरीका और नैटो के अरब मामलों के सलाहकार रहे हैं. वो मानते हैं कि ईरान और सऊदी अरब के बीच जंग एक छोटी सी चिंगारी के तौर पर शुरू हो सकती है. जो आगे चलकर बड़ी जंग बन सकती है. एंथनी मानते हैं कि ये जंग लंबे वक़्त तक चल सकती है.

सऊदी अरब और ईरान के बीच युद्ध हुआ तो क्या होगा?इमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

सऊदी अरब के पास F-15, F-16 और ब्लैक टॉरनेडो

हालांकि एंथनी को लगता है कि ज़मीनी मोर्चे पर तो दोनों देशों की सेनाएं शायद ही आमने-सामने आएं. हां, हवाई जंग ज़रूर भयंकर हो सकती है. एंथनी के मुताबिक़, “हवाई ताक़त में सऊदी अरब फ़िलहाल ईरान पर भारी दिखता है.”

वो कहते हैं, “ईरान के पास सत्तर और अस्सी के दशक के लड़ाकू विमान हैं. ईरान ने इनका रख-रखाव बड़े अच्छे तरीक़े से कर रखा है. साथ ही ईरान ने रूस से भी कुछ लड़ाकू विमान अस्सी के दशक में ख़रीदे थे. यही विमान ईरान की एयरफ़ोर्स की प्रमुख ताक़त हैं.”

वहीं, सऊदी अरब की वायुसेना के पास अमरीकी लड़ाकू विमान जैसे F-15 और F-16 हैं. ब्लैक टॉरनेडो है. यानी हवाई मोर्चे पर सऊदी अरब ज़्यादा ताक़तवर दिखता है. हालांकि ईरान के पास, सऊदी अरब से ज़्यादा बेहतर मिसाइलें और ड्रोन हैं. ये सऊदी अरब के अहम शहरी ठिकानों को निशाना बना सकती हैं.

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Image captionब्लैक टॉरनेडो

इसराइल भी ईरान के ख़िलाफ़!

एंथनी कहते हैं कि जंग छिड़ी तो ईरान, सऊदी अरब के बुनियादी ढांचे को तबाह कर सकता है. ईरान की मिसाइलें, सऊदी अरब के पानी साफ़ करने के प्लांट और बिजलीघरों को निशाना बना सकता है. इससे सऊदी अरब बुरी तरह तबाह हो सकता है. सऊदी अरब के शहरों को पानी और बिजली की सप्लाई ठप हो जाएगी.

इसके बदले में सऊदी अरब अपने लड़ाकू विमानों से ईरान में बिजली सप्लाई करने वाले ठिकानों, पानी साफ़ करने वाले संयंत्रों पर हमला कर सकता है. इसके अलावा सऊदी अरब, ईरान के तेल के ठिकानों और रिफ़ाइनरी पर हवाई हमले कर सकता है.

एंथनी मानते हैं, “ईरान और सऊदी अरब की जंग बड़ी आर्थिक तबाही का बायस बन सकती है. वो इसकी तुलना शतरंज के त्रिकोणीय मुक़ाबले से करते हैं. सऊदी अरब के साथ जहां संयुक्त अरब अमीरात, मिस्र, ओमान, जॉर्डन, अमरीका, ब्रिटेन और फ्रांस खड़े नज़र आते हैं. वहीं ईरान के खेमे में सीरिया, रूस और इराक़ जैसे देश हैं.”

तेल सप्लाईइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

युद्ध हुआ तो तेल सप्लाई ठप

एंथनी मानते हैं कि जंग की सूरत में इसराइल भी ईरान के ख़िलाफ़ गठबंधन में शामिल हो सकता है. साफ़ है कि ईरान और सऊदी अरब के बीच युद्ध की सूरत में अमरीका और रूस जैसे देशों का रोल ज़्यादा बड़ा होगा. अमरीका फ़िलहाल सऊदी अरब के साथ खड़ा है.

मैरी कॉलिंस, अमरीका की जॉन हॉपकिंस इंस्टीट्यूट से जुड़ी हैं. उन्होंने कई बरस अमरीकी रक्षा मंत्रालय के साथ काम किया है.

मैरी मानती हैं कि ईरान और सऊदी अरब के बीच युद्ध में अमरीका यक़ीनी तौर पर दखल देगा. फारस की खाड़ी स्थित होर्मुज़ जलसंधि से दुनिया के तेल कारोबार का एक बड़ा हिस्सा गुज़रता है. युद्ध हुआ तो ये सप्लाई ठप हो सकती है. इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा.

आधुनिक लड़ाकू विमान

अमरीका क़तई नहीं चाहेगा कि दुनिया को तेल की सप्लाई पर असर पड़े. इसीलिए, ईरान और सऊदी अरब के बीच युद्ध की सूरत में अमरीका का शामिल होना तय है.

मैरी कॉलिंस कहती हैं कि होर्मुज़ में ईरान समुद्र में बारूदी सुरंगे बिछा सकता है. इससे उस इलाक़े से गुज़रने वाले जहाज़ तबाह होने का ख़तरा हो सकता है. ऐसी तबाही होने से रोकने के लिए अमरीका युद्ध होने के एक घंटे के भीतर शामिल हो जाएगा.

कॉलिंस कहती हैं कि खाड़ी देशों में अमरीका के 35 हज़ार से ज़्यादा सैनिक तैनात हैं. अमरीका वायुसेना के F-22 जैसे अति आधुनिक लड़ाकू विमान भी यहां पर तैनात हैं. एक बेड़ा हमेशा फ़ारस की खाड़ी में मौजूद रहता है.

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एक ही दिन में तबाही

कॉलिंस के मुताबिक़ ईरान और सऊदी अरब के युद्ध शुरू होने पर अमरीका सेनाएं फ़ौरन सक्रिय हो जाएंगी. और ये एक दिन में ईरान की पूरी की पूरी नौसेना को बर्बाद कर सकती हैं. वो नब्बे के दशक की एक मिसाल देती हैं. तब अमरीका का एक जहाज़ बारूदी सुरंग की वजह से तबाह हो गया था.

इसके बदले में एक दिन में ही अमरीका ने ईरान की पूरी नौसैनिक ताक़त को तबाह कर दिया था. अमरीकी दखल की वजह से ईरान और सऊदी अरब के बीच जंग कुछ दिनों में ही ख़त्म हो जाएगी. तो, क्या युद्ध के साथ ईरान और सऊदी अरब के बीच झगड़ा हमेशा के लिए ख़त्म हो जाएगा? क्या इस इलाक़े में शांति बहाल हो सकेगी?

ईरानी मूल के अली वाइज़ अमरीका में रहते हैं. वो इंटरनेशन क्राइसिस ग्रुप के लिए काम करते हैं. इस संगठन का काम जंग को रोकना है. अली वाइज़ का बचपन अस्सी के दशक के ईरान-इराक़ युद्ध के दौरान ईरान में गुज़रा था.

दुनिया की अर्थव्यवस्था

ली वाइज़ मानते हैं कि ईरान और सऊदी अरब के युद्ध से दोनों देशों की अर्थव्यवस्था तबाह हो जाएगी. क्योंकि ज़्यादा से ज़्यादा नुक़सान पहुंचाने के लिए दोनों ही देश एक-दूसरे के तेल के ठिकानों, रिफाइनरी, पानी सप्लाई करने वाले प्लांट और बिजली घरों को निशाना बनाएंगे.

युद्ध हुआ तो कच्चे तेल का उत्पादन ठप हो सकता है. इसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा. ईरान और सऊदी अरब के बीच कुछ दिनों की जंग भी हुई, तो तेल के दाम आसमान पर पहुंच जाएंगे. अली मानते हैं कि सऊदी अरब और ईरान के बीच युद्ध की वजह से पूरे इलाक़े में शियाओं और सुन्नियों के बीच तनातनी बढ़ जाएगी.

यानी, ईरान-सऊदी अरब के युद्ध को तो अमरीका अपने दखल से कुछ दिनों में ही ख़त्म कर देगा. मगर इसके बाद, पूरे पश्चिमी एशिया में ईरान और सऊदी अरब के बीच शीत युद्ध का नया दौर शुरू होगा. ताक़त बढ़ाने के नए मोर्चे खुलेंगे. इराक़, सीरिया, यमन जैसे झगड़े दूसरे देशों में पांव पसारेंगे.

अगर सऊदी अरब और ईरान के बीच युद्ध हुआ तो?इमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

दशकों तक महसूस किएजाएंगे ज़ख़्म

क्योंकि अमरीका के हमले से ईरान की सेनाएं तो तबाह हो जाएंगी. मगर ईरान, सऊदी अरब के सुन्नी साथी देशों का विरोध करने वालों को समर्थन बढ़ा देगा. जैसे कि इराक़ में शिया और सुन्नी हथियारबंद गुटों के बीच झगड़े बढ़ जाएंगे. लेबनान में हिज़्बुल्लाह और सऊदी समर्थित गुटों की भिड़ंत बढ़ जाएगी.

यही हालात सीरिया और जॉर्डन में दिख सकते हैं. अली वाइज़ बताते हैं कि ईरान और सऊदी अरब के बीच न तो कारोबारी रिश्ते हैं, न सामाजिक और सांस्कृतिक संबंध हैं. ऐसे में युद्ध के ज़ख़्म आने वाले कई दशक तक महसूस किए जाते रहेंगे. कुल मिलाकर ये कहें कि अगर सऊदी अरब और ईरान के बीच युद्ध हुआ, तो ये हवाई जंग होगी.

दोनों देशों के बीच नौसैनिक युद्ध भी होगा. अमरीका, सऊदी अरब की तरफ़ से दखल देकर ईरान को कुछ दिनों में ही हरा देगा. मगर, ईरान सऊदी अरब के लिए छोटी-छोटी जंगों के दूसरे मोर्चे खोल देगा. युद्ध के ज़ख़्म भरेंगे नहीं. बल्कि दोनों देशों के बीच तनातनी का असर दूसरे देश झेलेंगे. इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा.