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भारतीय कंपनियों ने अमेरिका में 1.13 लाख नौकरियों का सृजन किया: भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई)

भारतीय कंपनियों ने अमेरिका में 1,13,000 रोजगार के अवसरों का सृजन किया है और वहां करीब 18 अरब डॉलर का निवेश किया है। भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) की एक रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई है। इंडियन रुट्स, अमेरिकन सॉयल शीर्षक वाली यह रिपोर्ट सीआईआई ने मंगलवार को जारी की।

इसमें बताया गया कि भारतीय कंपनियों ने अमेरिका में कॉर्पोरेट सामाजिक दायित्व में 14.7 करोड़ डॉलर का योगदान दिया। इसके अलावा भारतीय कंपनियों ने यहां शोध और विकास गतिविधियों पर 58.8 करोड़ डॉलर खर्च किए। इस वार्षिक रिपोर्ट में अमेरिका और प्यूर्टो रिको में कारोबार कर रही 100 भारतीय कंपनियों के निवेश और रोजगार सृजन का ब्योरा दिया गया है।

करीब 50 राज्यों में इन कंपनियों ने 1,13,423 लोगों को रोजगार दिया है। भारतीय कंपनियों ने सबसे ज्यादा 8,572 नौकरियां न्यूजर्सी में दी हैं। टेक्सास में भारतीय कंपनियों ने 7,271, कैलिफोर्निया में 6,749, न्यू यॉर्क में 5,135 और जॉर्जिया में 4,554 नौकरियां दी हैं। जहां तक भारतीय कंपनियों द्वारा किए गए निवेश का सवाल है तो सबसे ज्यादा निवेश न्यू यॉर्क में 1.57 अरब डॉलर का किया गया है।

न्यू जर्सी में 1.56 अरब डॉलर, मैसाचुसेट्स में 93.1 करोड डॉलर, कैलिफोर्निया में 54.2 करोड़ डॉलर और व्योमिंग में 43.5 करोड़ डॉलर का निवेश भारतीय कंपनियों द्वारा किया गया है। सीआईआई के महानिदेशक चंद्रजीत बनर्जी ने कहा कि अमेरिका में भारतीय कंपनियों के निवेश की कहानी से दोनों देशों द्वारा एक दूसरे की सफलता में दिए गए योगदान का पता चलता है।

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इंदौर के शख्स ने सूडान-मिस्र के बीच बनाया देश, पिता को बताया प्रधानमंत्री

अफ्रीकी देशों सूडान और मिस्र के बीच 2072 स्क्वेयर किमी का एरिया ऐसा है, जिस पर दोनों में से किसी देश का मालिकाना हक नहीं है। इंदौर के सुयश दीक्षित इस जगह पर पहुंच गए और अपना झंडा लगा दिया। सुयश कहते हैं कि ये किंगडम ऑफ दीक्षित है और मैं सुयश दीक्षित यहां का राजा हूं। सुयश ने यूएन से अपील भी कर दी कि वो इस नए देश को मान्यता दे और सुयश को इसका मालिकाना हक भी दिया जाए। हालांकि, यूएन की तरफ से अभी तक कोई रिएक्शन नहीं आया है।

सुयशपुर होगी कैपिटल

– सुयश ने अपने देश किंगडम ऑफ दीक्षित के लिए एक झंडा भी तय कर दिया है, जिसके साथ उन्होंने अपनी फोटो सोशल मीडिया पर पोस्ट की। इस किंगडम की राजधानी सुयशपुर होगी।
– सुयश ने किंगडम का प्रधानमंत्री और मिलिट्री हेड अपने पिता को बनाया है। उन्होंने छिपकली को देश का राष्ट्रीय पशु चुना है।
– सुयश ने अपने फेसबुक अकाउंट पर एक पोस्ट में लिखा- “आज से मेरा नाम किंग सुयश दीक्षित है और मैं किंगडम ऑफ दीक्षित का पहला दावेदार हूं।
– “मैं इस 2072 स्क्वेयर किलोमीटर की जमीन पर अपनी दावेदारी पेश करता हूं। यहां आने के लिए मैंने रेतीले स्थानों पर 319 किमी का सफर तय किया है।”
और क्या बोले सुयश
– फेसबुक पोस्ट में सुयश ये भी लिखते हैं, “मैं कुछ आतंकवाद प्रभावित इलाकों से होकर यहां तक पहुंचा हूं। मुझे पता चला है कि मुझसे पहले यहां 5-10 लोग दावा कर चुके हैं।”
– “अब यहां मेरा दावा है। अगर वो इस जमीन को मुझसे वापस लेना चाहते हैं तो उन्हें मेरे साथ जंग लड़नी होगी। ये जंग कॉफी पीकर लड़ी जाएगी।”
– इंदौर के हरिकृष्ण पब्लिक स्कूल से पढ़े सुयश ने लोगों से भी कहा है कि वो इस नए देश की मान्यता लेने के लिए उनके सामने अप्लाई कर दें।
– सूडान और मिस्र के बीच इस लावारिस स्थान का नाम बीर ताविल है।
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भारतीय मूल का किशोर बना ब्रिटेन में सबसे छोटी उम्र का करोड़पति

भारतीय मूल का एक किशोर ब्रिटेन में सबसे छोटी उम्र के करोड़पतियों में शुमार हो गया है। एक साल से कुछ ज्यादा समय में उसकी ऑनलाइन एस्टेट एजेंसी के कारोबार की कीमत 1.20 करोड़ पौंड (करीब 103 करोड़ रुपये) आंकी गई है।

अक्षय रूपारेलिया सिर्फ 19 साल के हैं। वह स्कूल में पढ़ते हैं। इस हफ्ते उनकी ‘डोरस्टेप्स. सीओ.यूके’ ब्रिटेन में 18वीं सबसे बड़ी एस्टेट एजेंसी बन गई है। सिर्फ 16 महीने पहले उन्होंने इस वेबसाइट को लांच किया था। अक्षय का दावा है कि इस अवधि में वह 10 करोड़ पौंड (करीब 860 करोड़ रुपये) कीमत की संपत्तियां बेच चुके हैं। अक्षय ने बताया कि अपनी कंपनी शुरू करने के लिए उन्होंने रिश्तेदारों से सात हजार पौंड (करीब 6 लाख रुपये) उधार लिए थे। अब उनकी कंपनी में दर्जनभर लोग कार्य करते हैं। उनकी कंपनी संपत्ति बेचने के लिए ब्रिटेन भर में स्वरोजगार माताओं की मदद लेती है। खास बात यह है कि संपत्ति बेचने के लिए हजारों पौंड वसूलने की बजाय उनकी कंपनी बहुत कम धनराशि लेती है।

अक्षय के पिता कौशिक (57) और मां रेणुका (51) दोनों ही सुन सकने में असमर्थ हैं। अक्षय को ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र और गणित पढ़ने का प्रस्ताव मिला है, लेकिन उन्होंने फिलहाल कारोबार पर ही ध्यान देने का फैसला किया है।

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इंडेक्स में भारत की हालत उत्तर कोरिया से भी बुरी

ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत की स्थिति, उत्तर कोरिया, म्यांमार, श्रीलंका और बांग्लादेश से भी ख़राब है.

दुनियाभर के विकासशील देशों में भुखमरी की समस्या पर इंटरनेशनल फ़ूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट की ओर से हर साल जारी की जाने वाली रिपोर्ट में 119 देशों में भारत 100वें पायदान पर है.

एशिया में वो सिर्फ अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान से आगे है. पिछले साल वो 97वें पायदान पर था. रिपोर्ट में कहा गया है कि बाल कुपोषण ने इस स्थिति को और बढ़ाया है.

हंगर इंडेक्स अलग-अलग देशों में लोगों को खाने की चीज़ें कैसी और कितनी मिलती हैं यह उसे दिखाने का साधन है.

‘ग्लोबल हंगर इंडेक्स’ का सूचकांक हर साल ताज़ा आंकड़ों के साथ जारी किया जाता है. इस सूचकांक के ज़रिए विश्व भर में भूख के ख़िलाफ़ चल रहे अभियान की उपलब्धियों और नाकामियों को दर्शाया जाता है.

 

GLOBAL HUNGER INDEX SCORES BY RANK, 1992 GHI, 2000 GHI, 2008 GHI, AND 2017 GHI

Rank Country 1992 2000 2008 2017
2017 GHI scores less than 5,
collectively ranked 1–14
Belarus <5 <5 <5
Bosnia & Herzegovina 9.8 7.0 <5
Chile 5.9 <5 <5 <5
Croatia 6.2 <5 <5
Cuba 10.5 5.3 <5 <5
Estonia 6.2 <5 <5
Kuwait 20.0 <5 <5 <5
Latvia 6.7 <5 <5
Lithuania 5.9 <5 <5
Montenegro 5.2 <5
Slovak Republic 8.0 6.4 <5
Turkey 14.3 10.4 5.6 <5
Ukraine 13.7 <5 <5
Uruguay 9.7 7.7 6.4 <5
15 Romania 9.3 8.7 6.0 5.2
16 Costa Rica 7.5 6.2 5.0 5.3
16 Macedonia, FYR 7.7 6.4 5.3
18 Argentina 7.0 6.6 5.8 5.4
18 Brazil 15.9 11.7 5.4 5.4
18 Bulgaria 7.9 8.2 7.6 5.4
21 Kazakhstan 11.3 10.9 5.8
22 Russian Federation 10.5 6.8 6.2
23 Mexico 14.0 10.8 8.4 6.5
24 Serbia 7.2 6.6
25 Jordan 13.4 10.3 6.5 6.7
26 Trinidad & Tobago 14.5 11.7 10.4 6.9
27 Saudi Arabia 14.3 12.5 11.2 7.1
28 Tunisia 15.4 10.7 8.0 7.4
29 China 25.9 15.8 11.2 7.5
30 Iran 17.5 13.6 8.7 7.6
30 Moldova 16.3 13.3 7.6
32 Armenia 18.4 11.4 7.7
32 Georgia 14.7 8.3 7.7
34 Colombia 14.6 11.3 9.4 8.0
34 Jamaica 12.0 8.4 7.6 8.0
36 Fiji 11.5 9.8 9.1 8.1
36 Lebanon 11.4 9.0 8.2 8.1
38 Peru 28.7 20.9 15.3 8.7
39 Panama 19.9 20.0 14.1 9.2
40 Kyrgyz Republic 19.7 13.4 9.3
41 Algeria 17.5 15.6 11.3 9.5
42 Azerbaijan 27.5 15.3 9.6
43 Suriname 17.0 16.0 11.4 9.9
44 Malaysia 19.8 15.5 13.7 10.2
44 Morocco 18.7 15.7 12.0 10.2
46 Thailand 25.8 18.1 12.0 10.6
47 Paraguay 16.7 14.1 12.1 11.0
48 Albania 20.8 21.6 16.5 11.1
48 El Salvador 19.5 16.2 12.7 11.1
50 Oman 20.8 13.7 10.2 11.3
51 Dominican Republic 23.8 18.4 15.4 11.6
52 Turkmenistan 21.9 16.5 12.2
53 Venezuela 15.2 15.2 9.3 13.0
54 Uzbekistan 23.8 16.1 13.1
55 South Africa 18.5 18.8 16.6 13.2
56 Mauritius 17.4 15.9 14.3 13.3
57 Mongolia 37.5 31.7 18.1 13.4
58 Nicaragua 36.1 24.7 18.2 13.6
59 Guyana 22.3 17.9 17.0 13.7
60 Gabon 24.2 20.7 17.4 13.8
61 Honduras 25.9 20.6 17.0 14.3
62 Ecuador 22.3 20.5 16.4 14.4
63 Egypt 20.1 16.4 16.6 14.7
64 Viet Nam 40.2 28.6 21.6 16.0
65 Ghana 41.9 29.2 21.9 16.2
66 Bolivia 36.7 30.3 23.9 17.2
67 Senegal 37.5 37.3 23.7 18.4
68 Philippines 30.5 25.9 20.2 20.0
69 Guatemala 28.5 27.4 22.2 20.7
70 Kenya 39.1 37.6 29.6 21.0
71 Swaziland 24.0 29.9 30.7 21.2
72 Indonesia 35.0 25.5 28.3 22.0
72 Nepal 42.5 36.8 28.9 22.0
74 Cameroon 40.0 39.6 29.5 22.1
75 Cambodia 45.8 43.6 27.1 22.2
76 Togo 45.8 39.0 28.3 22.5
77 Myanmar 55.6 43.6 30.1 22.6
78 Iraq 21.8 26.5 25.7 22.9
79 Gambia 35.2 27.5 23.8 23.2
80 Lesotho 26.5 33.2 28.4 24.1
81 Benin 44.5 37.5 31.7 24.4
81 Botswana 33.8 33.0 30.7 24.4
83 Mauritania 39.4 33.6 23.7 25.2
84 Nigeria 48.8 41.0 33.7 25.5
84 Sri Lanka 31.6 26.8 24.2 25.5
86 Congo, Rep. 39.1 36.0 31.6 25.6
87 Namibia 35.4 30.8 30.9 25.7
88 Bangladesh 53.6 37.6 32.2 26.5
88 Côte d’Ivoire 32.9 32.6 35.1 26.5
90 Malawi 58.2 44.6 31.5 27.2
91 Lao PDR 52.3 48.1 33.4 27.5
92 Burkina Faso 47.0 47.9 36.4 27.6
93 North Korea 31.9 40.3 30.7 28.2
94 Guinea 46.5 44.0 33.4 28.6
94 Mali 51.4 44.2 35.1 28.6
96 Tajikistan 41.8 32.6 28.7
97 Tanzania 42.9 42.4 33.0 28.8
98 Mozambique 63.6 48.7 37.5 30.5
99 Guinea-Bissau 44.5 43.1 31.4 30.6
100 Djibouti 60.3 46.7 35.1 31.4
100 India 46.2 38.2 35.6 31.4
100 Rwanda 53.3 56.3 36.2 31.4
103 Uganda 41.2 39.2 33.3 32.0
104 Ethiopia 56.0 40.2 32.3
105 Angola 65.8 57.5 39.7 32.5
106 Pakistan 42.7 38.2 34.7 32.6
107 Afghanistan 50.2 52.7 37.9 33.3
108 Zimbabwe 35.8 40.9 34.5 33.8
109 Haiti 51.6 42.7 42.6 34.2
110 Timor-Leste 46.8 34.3
111 Niger 66.2 52.6 37.0 34.5
112 Liberia 51.2 48.2 38.9 35.3
113 Sudan 35.5
114 Yemen 43.5 43.4 36.2 36.1
115 Zambia 48.5 52.3 45.0 38.2
116 Madagascar 43.9 43.6 36.8 38.3
117 Sierra Leone 57.2 54.7 44.5 38.5
118 Chad 62.5 51.9 50.9 43.5
119 Central African Republic 52.2 50.9 47.0 50.9

(Source: GHI)

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भारतीय राजनीति का सबसे बेबाक और बिंदास चेहरा यानी राम मनोहर लोहिया

महज चार साल में भारतीय संसद को अपने मौलिक राजनीतिक विचारों से झकझोर देने का करिश्मा राम मनोहर लोहिया ने कर दिखाया था.

चाहे वो जवाहर लाल नेहरू के प्रतिदिन 25 हज़ार रुपये खर्च करने की बात हो, या फिर इंदिरा गांधी को गूंगी गुड़िया कहने का साहस रहा हो. या फिर ये कहने के हिम्मत कि महिलाओं को सती-सीता नहीं होना चाहिए, द्रौपदी बनना चाहिए.

राम मनोहर लोहिया वो पहले राजनेता रहे जिन्होंने कांग्रेस सरकार को उखाड़ फेंकने का आह्वान करते हुए कहा था जिंदा कौमें पांच साल तक इंतज़ार नहीं करतीं.

उत्तर भारत में आज भी आप राजनीतिक रुझान रखने वाले किसी युवा से बात करें तो वे इस नारे का जिक्र ज़रूर करेगा- ‘जब जब लोहिया बोलता है, दिल्ली का तख़्ता डोलता है.’

नेहरू का विरोध

जब देश जवाहर लाल नेहरू को अपना सबसे बड़ा नेता मान रहा था, ये लोहिया ही थे जिन्होंने नेहरू को सवालों से घेरना शुरू किया था. नेहरू से उनकी तल्खी का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि उन्होंने एक बार ये भी कहा था कि बीमार देश के बीमार प्रधानमंत्री को इस्तीफ़ा दे देना चाहिए.

1962 में लोहिया फूलपुर में जवाहर लाल नेहरू के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ने चले गए. उस चुनाव में लोहिया की चुनाव प्रचार की टीम का हिस्सा रहे सतीश अग्रवाल याद करते हैं, “लोहिया जी कहते थे मैं पहाड़ से टकराने आया हूं. मैं जानता हूं कि पहाड़ से पार नहीं पा सकता लेकिन उसमें एक दरार भी कर दिया तो चुनाव लड़ना सफल हो जाएगा.”

जवाहर लाल नेहरू- महात्मा गांधीइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

बिहार में समाजवादी राजनीति का अहम चेहरा माने जाने वाले शिवानंद तिवारी को राम मनोहर लोहिया को करीब से देखने का मौका मिला था. 1967 में भोजपुर के शाहपुर विधानसभा सीट से शिवानंद तिवारी के पिता रामानंद तिवारी चुनाव लड़ रहे थे, उनके चुनाव प्रचार में लोहिया गए थे.

शिवानंद तिवारी कहते हैं, “मुझे उनके साथ चार सभाओं में जाने का मौका मिला था. वे एक भविष्यवक्ता के भांति बोल रहे थे. उन्होंने लोगों से कहा था कि आप ये सोचकर वोट दीजिए कि आप जिसे चुन रहे हैं वो मंत्री बनने वाला है या वो मंत्री बनाने वाला है.”

लोहिया की राजनीतिक विरासत

शिवानंद तिवारी के मुताबिक जब 1967 में जब हर तरफ कांग्रेस का जलवा था, तब राम मनोहर लोहिया इकलौते ऐसे शख़्स थे जिन्होंने कहा था कि कांग्रेस के दिन जाने वाले हैं और नए लोगों का जमाना आ रहा है. नौ राज्यों में कांग्रेस हार गई थी.

राम मनोहर लोहिया
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Image captionजर्मनी में डॉक्टरेट की पढ़ाई करने के दौरान लोहिया की तस्वीर

लोहिया की मौत के बाद उनकी विरासत और उनके नाम की राजनीति ख़ूब देखने को मिली. कम से कम उत्तर प्रदेश और बिहार में. मुलायम सिंह यादव तो अपनी पार्टी को लोहिया की विरासत को मानने वाली पार्टी के तौर पर देखते रहे हैं.

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव कहते हैं, “लोहिया जी हमारे पार्टी के सबसे बड़े आदर्श हैं. 1967 में पहली बार उन्होंने ही नेताजी को टिकट दिया था. जसवंत नगर विधानसभा सीट से. लोहिया समाज में गरीब गुरबों की आवाज़ उठाना चाहते थे, वे पिछड़ों को सत्ता में भागीदारी देना चाहते थे. उनका सपना था सौ में पावें पिछड़े साठ.”

मुलायम की राजनीतिक क्षमता को सबसे पहले लोहिया जी ने ही देखा था. मुलायम सिंह यादव ने जल्दी ही प्रकाशित होने वाली अपनी राजनीतिक जीवनी द सोशलिस्ट में याद किया है, “1963 में फर्रूख़ाबाद सीट से उपलोकसभा चुनाव में मैं अपने साथियों के साथ उनके प्रचार में जुटा था. विधुना विधानसभा में उन्होंने मुझसे पूछा था कि प्रचार के दौरान क्या खाते हो, कहां रहते हो. मैं ने कहा कि लैइया चना रखते हैं, लोग भी खिला देते हैं और जहां रात होती है उसी गांव में सो जाते हैं. उन्होंने मेरे कुर्ते की जेब में सौ रूपये का नोट रख दिया था.”

राम मनोहर लोहिया के साथ मुलायम की तस्वीरइमेज कॉपीरइटALAMY

हालांकि मुलायम को बाद में शिवानंद तिवारी से बहुत ज्यादा मिलने जुलने का मौका नहीं मिला, लेकिन परिवारवाद के पहलू को छोड़कर लोहिया के राजनीतिक विरासत पर मुलायम लगातार अपना दावा जताते रहे.

समाजवादी राजनीति को शिवानंद तिवारी लंबे समय से देख रहे हैं. लोहिया की राजनीति के असली वारिस की बात होने पर शिवानंद तिवारी कहते हैं, “लोहिया जिस तरह की राजनीति की बात करते थे, उसके ठीक ठीक अपनाने वाले तो केवल किशन पटनायक ही हो पाए. हालांकि उनको वो सम्मान नहीं मिला. बिहार की राजनीति में लोहिया को जिन्होंने काफी हद तक अपने जीवन में उतारा वो लालू ही रहे हैं.”

हिंदी के हिमायती रहे लोहिया

शिवानंद तिवारी आगे कहते हैं, “अगर आप 1990 से 1995 के बीच के लालू के भाषणों को देखें तो उनमें लोहिया की झलक मिलती थी. हालांकि बाद में उनके क़दम डगमगाए और उनमें उतना बड़ा विजन भी विकसित नहीं हो पाया. लालू लोहिया के जितने करीब पहुंच सकते थे, वहां तक पहुंचने में वो चूक गए.”

चाहे मुलायम हों या फिर लालू या शरद या राम विलास पासवान, इन सब पर लोहिया का असर दिखा ज़रूर लेकिन ये सब उस जातिवादी राजनीति के दायरे से नहीं निकल पाए, जिसका लोहिया आजीवन विरोध करते रहे.

शिवानंद तिवारी के मुताबिक लोहिया होने आसान नहीं हैं क्योंकि लोहिया को देश और दुनिया के राजनीति की जितनी समझ थी, उससे ज्यादा वे भारतीय परंपराओं और भारतीय समाज को जानते बूझते थे, वे लगातार पढ़ने लिखने वाले राजनेता थे.

राम मनोहर लोहियाइमेज कॉपीरइटLOHIA TRUST

ये कम ही लोग जानते होंगे कि लोहिया ने जर्मनी से डॉक्टरेट की डिग्री हासिल की थी. वे अंग्रेजी, जर्मन, फ्रेंच, मराठी और बांग्ला धड़ल्ले से बोल सकते थे, लेकिन वे हमेशा हिंदी में बोलते थे, ताकि आम लोगों तक उनकी बात ज्यादा से ज्यादा पहुंचे.

लोहिया ने चाहे आम लोगों के हितों की बात की हो, या समाज में महिलाओं की बराबरी देने की बात कही हो, ऐसे लगता है कि वे भारतीय राजनीति के सबसे दूरदर्शी नेताओं में शामिल थे, लेकिन उनके अंदर एक आग हमेशा धधकती रहती थी.

लोहिया की जीवनीकार श्रीमति इंदू केलकर ने लोहिया की रामधारी सिंह दिनकर से एक मुलाकात का जिक्र किया है, वे लिखती हैं, “निधन से एक महीने पहले ही दिनकर लोहिया से मिले थे और कहा था कि क्रोध कम कीजिए, देश आपसे बहुत प्रसन्न है, कहीं ऐसा न हो कि भार जब आपके कंधों पर आए तब आपका अतीत आपकी राह का कांटा बन जाए. लोहिया बोले थे- आपको लगता है तब तक मैं जी पाऊंगा?”

लोहिया का निजी जीवन भी कम दिलचस्प नहीं था. लोहिया अपनी ज़िंदगी में किसी का दख़ल भी बर्दाश्त नहीं करते थे. हालांकि महात्मा गांधी ने उनके निजी जीवन में दख़ल देते हुए उनसे सिगरेट पीना छोड़ देने को कहा था. लोहिया ने बापू को कहा था कि सोच कर बताऊंगा. और तीन महीने के बाद उनसे कहा कि मैंने सिगरेट छोड़ दी.

बिंदास जीवन था लोहिया का

लोहिया जीवन भर रमा मित्रा के साथ लिव इन रिलेशनशिप में रहे. रमा मित्रा दिल्ली के मिरांडा हाउस में प्रोफेसर रहीं. दोनों के एक दूसरे को लिखे पत्रों की किताब भी प्रकाशित हुई. शिवानंद तिवारी बताते हैं, “लोहिया ने अपने संबंध को कोई छिपाकर नहीं रखा था. लोग जानते थे, लेकिन उस दौर में निजता का सम्मान किया जाता था. लोहिया जी ने जीवन भर अपने संबंध को निभाया और रमा जी ने उसे आगे तक निभाया.”

राम मनोहर लोहियाइमेज कॉपीरइटLOHIA TRUST

50-60 के दशक में भारत में आम लोगों की राजनीति करने वाला कोई नेता अपने निजी जीवन में इतना बिंदास हो सकता है, इसकी कल्पना आज भी मुश्किल ही है. लोहिया महिलाओं को समान अधिकार दिए जाने की वकालत करते हुए कहते थे कि देश की सती-सीता की ज़रूरत नहीं बल्कि द्रौपदी की ज़रूरत है जो संघर्ष कर सके, सवाल पूछ सके.

1962 के आम चुनाव में लोहिया का फूलपुर में चुनाव प्रचार में हिस्सा ले चुके सतीश अग्रवाल बताते हैं, “लोहिया किस हद तक बिंदास थे, इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि एक बार तारकेश्वरी सिन्हा ने उनसे कहा कि आप महिलाओं और उनके अधिकारों के बारे में काफ़ी बात करते हैं लेकिन आपने तो शादी नहीं की. लोहिया ने तत्काल जवाब दे दिया- भई तुमने तो मौका ही नहीं दिया.”

हुसेन की पेंटिंग- लोहिया- नेहरू
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राम मनोहर लोहिया ऐसे राजनेता थे जो अमरीका जा कर वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन से समाजवाद पर बहस कर सकते थे और मक़बूल फ़िदा हुसेन जैसे कलाकार की कला को भी राह दिखा सकते थे. दिल्ली के एक रेस्टोरेंट में लोहिया ने ही मक़बूल फ़िदा हुसेन को कहा था, “ये जो तुम बिरला और टाटा के ड्राइंग रूम में लटकने वाली तस्वीरों से घिरे हो, उससे बाहर निकलो. रामायण को पेंट करो.”

अस्पताल की लापरवाही के चलते मौत

लोहिया की मौत भी कम विवादास्पद नहीं रही. उनका प्रोस्टेट ग्लैंड्स बढ़ गया था और इसका ऑपरेशन दिल्ली के सरकारी विलिंग्डन अस्पताल में किया गया था.

उनकी मौत के बारे में वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर ने अपनी ऑटो बायोग्राफी बियांड द लाइन्स में भी किया है. इसमें उन्होंने लिखा है, “मैं राम मनोहर लोहिया से अस्पताल में मिलने गया था. उन्होंने मुझसे कहा कुलदीप मैं इन डॉक्टरों के चलते मर रहा हूं.”

कुलदीप आगे लिखते हैं कि लोहिया की बात सच ही निकली क्योंकि डॉक्टरों ने उनकी बीमारी का गलत इलाज कर दिया था. उनकी मौत के बाद सरकार ने दिल्ली के सभी सरकारी अस्पतालों के निरीक्षण करवाने हेतु एक समिति नियुक्त की गई थी. आज यही अस्पताल राम मनोहर लोहिया अस्पताल के रूप में जाना जाता है.

लोहिया अस्पतालइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

इस समिति की रिपोर्ट का एक हिस्सा 26 जनवरी, 1968 को टाइम्स ऑफ़ इंडिया में प्रकाशित हुआ था, इसमें समिति ने दावा किया था, “अगर अस्पताल के अधिकारी आवश्यक और अनिवार्य सावधानी से काम लेते तो लोहिया का दुखद निधन नहीं होता.”

शिवानंद तिवारी याद करते हैं कि तब वो बड़ा मुद्दा बना था लेकिन बाद वो बात दबा दी गई. 1977 में केंद्र सरकार में राजनारायण स्वास्थ्य मंत्री बने तो उन्होंने लोहिया की मौत के कारणों की जांच करने के लिए विशेषज्ञों की समिति नियुक्त या, लेकिन अस्पताल में तब सारे कागज़ ग़ायब थे.

पैनी नज़र थी लोहिया की

लोहिया के जीवन और उनके विचारों को संजोने की कोशिश उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद के समाजिक कार्यकर्ता नितेश अग्रवाल जैन कर रहे हैं. उन्होंने लोहिया पर करीब 90 मिनट की डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म बनाने का जोख़िम उठाया है.

लोहिया के जीवन पर फ़िल्मइमेज कॉपीरइटNITESH JAIN

वे कहते हैं, “उनके विचारों को पढ़ने के बाद मुझे लगा कि इनकी बात आम लोगों तक पहुंचनी चाहिए. मेरी फ़िल्म एंबैसडर ऑफ सोशलिज्म डॉक्टर राम मनोहर लोहिया लगभग तैयार है. उनके जन्म दिन पर अगले साल रिलीज करेंगे ताकि उनका संदेश देश दुनिया के कोने कोने तक पहुंचे.”

लोहिया की राजनीतिक दृष्टि जितनी पैनी थी, उतनी ही सामाजिक दृष्टिकोण. उन्होंने मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड में सुधार की बात हो या फिर गंगा की सफ़ाई का मुद्दा हो या फिर हिंदु मुस्लिम सांप्रदायिकता की बात हो, इन सब मुद्दों पर बेबाकी से अपनी बात रखी थी. वो भी पचास साल पहले.

हालांकि कुछ राजनीतिक विश्लेषक लोहिया पर जनसंघ को बढ़ावा देने का आरोप लगाते हैं हालांकि ये समझना मुश्किल नहीं कि कांग्रेस के विरोध के लिए दूसरे तमाम लोगों को एक साथ लाना पड़ा. अखिलेश यादव कहते हैं, “लोहिया के जमाने में कांग्रेस की जो स्थिति थी वही अब बीजेपी की है. बीजेपी के ख़िलाफ़ हमने भी कांग्रेस को साथ लिया है.”

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शहीद भगत सिंह की 110वीं वर्षगांठ पर नमन करें उनकी शहादत को

 

The date of Singh’s birth is subject to dispute. Commonly thought to be born on either 27 or 28 September 1907, some biographers believe that the evidence points to 19 October 1907. His family disclose the date 28 on the occasion of his sister’s death, that was his 107th birth anniversary.

 

तेरा वैभव अमर रहे माँ।

हम दिन चार रहे न रहें।।

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टॉप -10 अमीरों की सूची में पतंजलि के बालकृष्ण, मुकेश अंबानी पहले नंबर पर

बाबा रामदेव के सहयोगी आचार्य बालकृष्ण और डी-मार्ट के राधाकिशन दमनी का नाम भारत के अमीरों की सूची में शामिल हो गया है. उद्योगपति मुकेश अंबानी अब भी सबसे अमीर भारतीय बने हुए हैं.पिछले छह साल से अमीरों की सूची तैयार कर रही शोध इकाई हुरन ने बयान में कहा, एफएमसीजी कंपनी पतंजलि के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) बालकृष्ण अब देश के शीर्ष 10 अमीरों में शामिल हो गये हैं. रिटेल सेक्टर के नये सितारे दमनी सबसे लंबी छलांग लगाने वाले अमीर रहे. उनकी संपत्ति में 320 प्रतिशत का इजाफा हुआ. एवेन्यू सुपरमार्ट्स की शानदार सूचीबद्धता से अमीरों की सूची में आठ नये लोगों को जगह मिली.

बालकृष्ण पिछले साल 25वें स्थान पर थे जबकि इस बार वह आठवें स्थान पर पहुंच गये हैं. उनकी संपत्ति 173 प्रतिशत बढ़कर 70 हजार करोड़ रुपये हो गयी है. पिछले वित्त वर्ष में पतंजलि का कारोबार 10,561 करोड रुपये पर पहुंच गया. वह कई विदेशी ब्रांडों को टक्कर दे रही है. मुकेश अंबानी सबसे अमीर भारतीय बने रहे. वैश्विक स्तर पर वह पहली बार शीर्ष 15 में जगह बनाने में कामयाब रहे. शेयर बाजार में आये उछाल से रिलायंस के शेयर बढ़ गये. इससे अंबानी की संपत्ति 58 प्रतिशत बढकर 2,570 अरब रुपये पर पहुंच गयी है. उनकी यह संपत्ति यमन देश की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) से 50 प्रतिशत अधिक है.

कौन हैं आचार्य  बालकृ्ष्ण
आचार्य बालकृष्ण पतंजलि आयुर्वेद के एमडी है. बालकृष्ण के नेतृत्व में पतंजलि देश के शीर्ष एफएमसीजी सेक्टर में शामिल हो गया है.मूल रूप से नेपाल के रहने वाले बालकृ्ष्ण को शुरू से ही आयुर्वेद में रूचि थी. उन्होंने सम्पूर्णानंद विश्वविद्यालय बनारस से आचार्य की डिग्री भी ली है. पतंजलि का प्रमुख चेहरा भले ही रामदेव हो लेकिन सारे कामकाज में बालकृष्ण की भूमिका अहम होती है.
बता दें कि बाबा रामदेव का पतंजलि कंपनी में बालकृ्ष्ण की 94 प्रतिशत हिस्सेदारी है. 10 साल पहले 50 -60 करोड़ के बैंक कर्ज से शुरू होने वाली यह कंपनी हिन्दुस्तान यूनीलीवर जैसी कंपनियों की सबसे बड़ी प्रतिस्पर्धी कंपनी बन गयी है. 15 घंटा हर दिन काम करने वाले बालकृ्ष्ण किसी बिजनेस कॉलेज से एमबीए नहीं हैं और धोती – कुर्ता पहनते हैं. बाबा रामदेव जहां मीडिया में खुलकर अपनी बात रखने के लिए जाने जाते हैं. वहीं बालकृ्ष्ण अकसर पर्दे के पीछे रहकर काम करना पसंद करते हैं. दोनों की मुलाकात 30 साल पहले हरियाणा के गुरूकुल में हुई थी. जहां वे एक दूसरे के दोस्त बने.