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मिलिए विजय से जिन्होने तय किया दिल्ली पुलिस के कांस्टेबल से आइपीएस तक का सफर

राजस्थान के झुंझुनूं जिले के रहने वाले विजय मूलत: एक किसान परिवार से हैं। उन्होंने प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे गरीब और अभावग्रस्त छात्रों के लिए एक ट्रस्ट भी बनाया है। ट्रस्ट के माध्यम से वह छात्रों को न सिर्फ प्रोत्साहित करते हैं बल्कि आर्थिक सहायता भी देते हैं।

दसवीं में वह महज 55 फीसद अंक से पास हुए। बारहवीं में उनके 67 फीसद अंक आए। वह किसी नौकरी की तलाश में थे। इसमें सफलता न मिलने पर वह टाइल्स का कारोबार कर रहे दोस्त के साथ व्यवसाय करने की सोच रहे थे। उनके पास व्यवसाय के लिए पैसा नहीं था।

इस कारण पिता लक्ष्मण सिंह ने नौकरी की तलाश करने को कहा। उन्होंने प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी शुरू कर दी। जून 2010 में उनका चयन दिल्ली पुलिस में कांस्टेबल के पद पर हो गया। दिल्ली आकर उन्हें पता चला कि एक आइपीएस अफसर के पास समाज सेवा के तमाम अवसर होते हैं। उन्होंने उसी दिन ठान लिया कि अब आइपीएस ही बनना है। हालांकि, इसकी तैयारी में खर्च होने वाले पैसे का इंतजाम उनके पास नहीं था। इस कारण उन्होंने पहले दारोगा की तैयारी की। कड़ी मेहनत से दिसंबर 2010 में उनका चयन दिल्ली पुलिस में दारोगा के पद पर हो गया।

इसपद पर रहते हुए उन्हें तैयारी का समय नहीं मिल रहा था। फिर भी उन्होंने एसएससी की तैयारी प्रारंभ कर दी। उनका चयन सेंट्रल एक्साइज में हो गया, लेकिन तैनाती केरल के त्रिवेंद्रम में हो गई। सिविल सेवा की तैयारी दिल्ली में चल रही थी। त्रिवेंद्रम चले जाने से उनकी तैयारी प्रभावित होने लगी। उन्होंने फिर एसएससी की परीक्षा दी। इस बार उनका चयन इनकम टैक्स विभाग में हो गया और उनकी दिल्ली में तैनाती हो गई। इनकम टैक्स की नौकरी करने के साथ ही वह सिविल सेवा की तैयारी करते रहे। 2016 उन्होंने तीसरी बार सिविल सेवा की परीक्षा दी।

संस्कृत जैसे कठिन विषय से मुख्य परीक्षा देने के बाद भी उनका साक्षात्कार के लिए चयन हो गया। वह साक्षात्कार तक पहुंचे, लेकिन आठ अंक कम होने के कारण उनका चयन न हो सका। इसके बाद भी विजय हार नहीं माने। वह लगातार 10 घंटे की पढ़ाई नौकरी के साथ करते रहे। जिसका नतीजा है कि पांचवें प्रयास में 2018 में उनका चयन आइपीएस के लिए हुआ। उनकी इस सफलता ने न सिर्फ परिवार का बल्कि पूरे गुर्जर समाज का नाम रोशन कर दिया। रविवार को नोएडा के इंदिरा गांधी कला केंद्र में गुर्जर समाज के सफल युवाओं के लिए आयोजित कार्यक्रम में विजय गुर्जर को सम्मानित कर समाज खुद को गौरवान्वित महसूस कर रहा था।

अभाव व कम संसाधन कभी विजय रथ को रोक नहीं सकते। यह जरूर है कि अभाव के कारण सफलता पाने में समय लग जाता है। मेरी मां चंदा देवी और पत्नी सुनीता लगातार मेरा मनोबल बढ़ाती रहीं। अब मैं पत्नी सुनीता को सिविल सेवा की तैयारी करा रहा हूं। मैं सिपाही भी रहा हूं। इस कारण मुझे उनका दर्द पता है।

विजय गुर्जर, आइपीएस

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अच्छी खबर करिश्माई खेती की: डेढ़ लाख लगाकर इस किसान ने 70 दिन में कमाए 21 लाख रुपये

गुजरात के बनासकांठा जिले में एक सातवीं पास किसान सुर्खियों में छाया हुआ है. दरअसल, उसने फसल उगाने की ऐसी तरकीब अपनाई कि महज 70 दिन में 21 लाख रुपये का मुनाफा कमा लिया.

इस किसान का नाम है खेताजी सोलंकी. उसने अपने सात बीघा के खेत में आलू की जगह खरबूजे की फसल बोने का फैसला किया, लेकिन इसमें उन्होंने आधुनिक तकनीकों की मदद ली.

खेताजी सोलंकी ने बेहतर बीज, टपक सिंचाई और सोलर वॉटर पंप का इस्तेमाल किया. उनके खेत में 140 टन खरबूजा पैदा हुए. उन्होंने 1.21 लाख रुपये खर्च किए थे. पैदावार इतनी अच्छी थी कि उन्हें उसे बेचने के लिए कहीं जाना भी नहीं पड़ा बल्कि दूसरे राज्यों से व्यापारी उनके पास आकर खरबूजा खरीदकर ले गए. उन्हें इसके काफी अच्छे पैसे मिले. फरवरी में लगाई फसल अप्रैल में तैयार हो गई और 70 दिन में उन्होंने 21 लाख रुपये कमा लिए.

 

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कुली का कमाल: स्‍टेशन के फ्री वाई फाई की मदद से पास की UPSC की परीक्षा

सपने पूरे करने के लिए हौंसला चाहिए सुविधा नहीं इस सच को सुनाती है इस कुली कीकहानी जो स्‍टेशन के फ्री वाईफाई की मदद से सिविल सेवा परीक्षा में पास हुआ।

केरल में एर्नाकुलम स्टेशन पर कुली का काम करने वाले श्रीनाथ के. की कहानी कुछ अनोखी है, जिन्होंने रेलवे स्टेशन पर उपलब्ध मुफ्त वाईफाई सुविधा के सहारे इंटरनेट के जरिये पढ़ाई की और केरल पब्लिक सर्विस कमीशन, केपीएससी की लिखित परीक्षा पास की। सबसे बड़ी बात ये है कि तैयारी के दौरान वह किताबों में नहीं डूबे रहे बल्‍कि अपना काम करते हुए स्मार्ट फोन और ईयरफोन के सहारे पढ़ाई करते रहे। अब अगर श्रीनाथ साक्षात्‍कार में सफल हो जाते हैं तो वह भूमि राजस्व विभाग के तहत विलेज फील्ड असिस्टेंट के पद पर नियुक्‍त्‍त हो जायेंगे।

तीसरे प्रयास में मिली सफलता

श्रीनाथ पिछले पांच वर्ष से कुली के रूप में काम कर रहे हैं और उनका सिविल परीक्षा के इम्‍तिहान में बैठने का ये तीसरा प्रयास था। उनका कहना है कि यह पहला मौका था, जब उन्‍होंने स्टेशन पर उपलब्ध वाईफाई सुविधा का इस्तेमाल किया। उन्‍होंने ये भी बताया कि कुली का काम करने के दौरान वे हमेशा ईयरफोन कान में लगाए रखते थे और इंटरनेट पर अपने संबंधित विषयों पर लेक्चर सुना करते थे। उसे मन ही मन दोहराते भी रहते थे और रात को मौका मिलते ही फिर रिवाइज कर लेते थे। इसी वाईफाई की मदद से उन्‍होंने ऑनलाइन अपना परीक्षा फार्म भरा और देश दुनिया की ताजा जानकारियों से खुद को अपडेट किया साथ ही अपने विषयों की जम कर तैयारी की।