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एक मुलाकात लिटिल ऐप डेवलपर आदित्य चौबे से

खबर है कि महज़ 9 साल की उम्र से एप डेवलप कर रहे आदित्य आज ऑनलाइन ‘आदि” कंपनी के मालिक भी हैं. ये कारनामा है जबलपुर के जॉय सीनियर सेकेंडरी स्कूल में 8वीं में पढ़ने वाले आदित्य चौबे का जो आजकल जावा लैंग्वेज की ऑनलाइन ट्यूशन दे रहे है जिस लैंग्वेज का नाम 2 साल पहले तक सुना भी नहीं था .
एक मुलाकात लिटिल ऐप डेवलपर आदित्य चौबे से

12 साल की उम्र में गूगल प्ले स्टोर में अपने बनाये हुए एप को लेकर चर्चा में आये आदित्य चौबे ने बताया की उनकी यह शुरुआत तब हुई जब एक दिन वो लैपटॉप के नोटपैड पर कुछ काम कर रहे थे जिसमे error आने पर उन्होंने उसे ओपन किया तो जावा लैंग्वेज से पहली बार उनका सामना हुआ था. जिज्ञासु प्रवृति के आदित्य ने उसके बाद से ही लगातार जावा के बारे में पढ़कर कई एप भी बनाये है जिसमे से कुछ खास एप ये है –
1 – कोडरेड बटन एप
2 – लोकेशन लाइट एप
3 – लिसिन ट्यूब एप
4 – चैट बुक एप

आदित्य के पिता धर्मेन्द्र चौबे ऑर्डिनेंस फैक्टरी खमरिया में जूनियर वर्क्स मैनेजर और मां अमिता निजी स्कूल में साइंस टीचर हैं. आदी की बड़ी बहन 12वीं की छात्रा हैं.आदित्य ने अपने पिता की लिए एक स्पेशल कैलकुलेटर एप भी बनाया है जिसमे अनलिमिटेड नंबर्स तक कैलकुलेशन किया जा सकता है . फ़िलहाल आदित्य के 48 एप अभी गूगल प्ले स्टोर व एप्टॉयड पर लोड होने के लिए वेरीफिकेशन मोड पर है जो जल्दी ही प्ले स्टोर पर देखे जा सकते है .

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हर रोज कम हो रही धरती की रफ्तार , 2018 में खूब डोलेगी धरती

यूनिवर्सिटी ऑफ कोलोरैडो के रोजर बिल्हम और यूनिवर्सिटी ऑफ मोंटाना की रेबेका बेंडिक के नये शोध के अनुसार, अगले साल यानी 2018 और उसके बाद दुनिया के कई हिस्सों में बड़े भूकंप आ सकते हैं. वैज्ञानिकों ने इसके लिए पृथ्वी की गति में हो रहे परिवर्तन को जिम्मेदार ठहराया हैं. उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा है कि गति परिवर्तन के नतीजे हमेशा से बड़े भूकंपों के रूप में सामने आये हैं.

रेबेका और रोजर ने कहा कि पिछली सदी में पांच बार ऐसा हुआ है जब सात तीव्रता के भूकंप आये हैं. भूकंप के बाद उसके कारणों का अध्ययन करने पर हर बार इन भूकंप का संबंध पृथ्वी के घूमने की रफ्तार से जुड़ा पाया गया. हालांकि, कई बार पृथ्वी पर दिन के छोटे होने पर इनमें कमी भी देखी गयी है. इन वैज्ञानिकों के मुताबिक, पृथ्वी के किनारों में होने वाले छोटे-छोटे बदलाव भी भूकंप से जुड़े हो सकते हैं.

रोजर और रेबेका ने जियोलॉजिकल सोसायटी ऑफ अमेरिका को इसकी पूरी जानकारी भेज दी है. हालांकि, इस रिपोर्ट में साफ तौर पर यह नहीं बताया गया है कि ये भूकंप किन क्षेत्रों में आ सकते हैं. इसके लिए उन्होंने रिपोर्ट में सभी देशों से एडवांस वार्निंग सिस्टम विकसित करने और आपदा प्रबंधन को लगातार दुरूस्त रखने को कहा है.

हर रोज कम हो रही धरती की रफ्तार
भूवैज्ञानिक पृथ्वी की गति में होने वाले मिली सेकेंड के परिवर्तन को भी मापने में सक्षम हो गये हैं. इसी परिवर्तन को आधार बनाकर भूवैज्ञानिकों की एक शोध टीम ने वर्ष 1900 के बाद आये ऐसे हर भूकंप का विश्लेषण किया जिसकी तीव्रता रिक्टर पैमाने पर सात से ज्यादा थी. उन्होंने पाया कि लगभग हर 32 साल के अंतराल पर दुनिया भर में भूकंपों की संख्या में काफी बढ़ोतरी हो रही थी. हैरानी होने पर जब उन्होंने और गहन पड़ताल की तो पता चला कि यह बढ़ोतरी उसी दौरान हुई है जब धरती के घूमने की रफ्तार में कमी आयी थी. वैज्ञानिकों ने पाया कि हर 25-30 साल बाद यह रफ्तार कम हुई.

पहले 10 घंटे में लगाती थी एक चक्कर

पृथ्वी 23 घंटे 56 मिनट 4.09 सेकंड में अपनी धुरी पर पूरी तरह घूम जाती है. लेकिन, अब से 4.8 अरब साल पहले धरती अपनी धुरी पर लगभग 10 घंटे में एक चक्कर लगा लेती थी. तब दिन और रात आज के मुकाबले काफी छोटे होते थे. वैज्ञानिकों का आकलन है कि सौ साल में धरती के घूमने की गति में करीब तीस सेकेंड का इजाफा हो रहा है. इससे धीरे-धीरे साल के दिनों की संख्या भी कम होती जायेगी. तकरीबन 60 करोड़ साल पहले 455 दिन का एक साल होता था. एक शोध में यह बात सामने आयी है कि पृथ्वी के कोर में हो रही उथल-पुथल दिनों की लंबाई को प्रभावित करती है.