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मुझे जेल में डालने के लिए कैसी-कैसी साजिशें नहीं की गईं : पीएम मोदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस पार्टी और उसके नेतृत्व को विकास एवं गुजरात विरोधी करार देते हुए कहा कि बीजेपी के लिए चुनाव विकासवाद की जंग है, जबकि कांग्रेस के लिए यह वंशवाद की जंग है. पीएम मोदी ने कहा, जब मैं गुजरात का मुख्यमंत्री था, तब मुझे जेल में डालने के लिए मेरे खिलाफ कैसी-कैसी साजिशें नहीं की गईं. लेकिन आज देखें कि हम कहां है और वो कहां हैं. प्रधानमंत्री ने कहा कि जब-जब गुजरात में चुनाव आता है, उनको (कांग्रेस) जरा ज्यादा बुखार आता है, तकलीफ ज्यादा बढ़ जाती है. इस पार्टी और परिवार को गुजरात आंखों में चुभता रहा है.
मामले से जुड़ी अहम जानकारियां :
  1. गुजरात गौरव महासम्मेलन को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने कहा, ‘कांग्रेस पार्टी ने हमेशा कुर्सी का खेल खेला, वंशवाद को कैसे सलामत रखना है, इस पार्टी ने हमेशा इसकी चिंता की. उनको न देश की चिंता है और न समाज की.
  2. पीएम मोदी ने कहा, ये जहर, गुजरातियों के प्रति द्वेष… इसी का परिणाम था कि पंडित नेहरू ने नर्मदा परियोजना का शिलान्यास किया, लेकिन वह आंखों में इसलिए चुभती थी, क्योंकि इसकी संकल्पना सरदार पटेल ने की थी, इसलिए पूरा नहीं होने दिया. कोई कल्पना कर सकता है कि 40 साल तक यह अटकी रही.
  3. प्रधानमंत्री ने कहा, कांग्रेस ने विकास के मुद्दे पर कभी चुनाव लड़ने की हिम्मत नहीं दिखाई. मैं एक बार फिर से कांग्रेस पार्टी को चुनौती देता हूं कि वे विकासवाद के मुद्दे पर चुनाव लड़ें और लोगों को भ्रमित करने का काम छोड़ें.
  4. राहुल और सोनिया गांधी का नाम लिए बिना पीएम मोदी ने कहा कि जो जेल की सजा काटे हैं, उनके साथ ये कंधे से कंधा मिलाकर खड़े होते हैं.
  5. पीएम मोदी ने कहा कि इनको गुजरात से नफरत है, जनसंघ से नफरत है, भाजपा से नफरत है. इन लोगों और पार्टी ने कभी हमें गांधी का हत्यारा कहा, कभी दलित विरोधी कहा. आज सबसे ज्यादा दलित सासंद बीजेपी के हैं.
  6. पीएम मोदी ने कहा, इनका विकास से कोई नाता नहीं है. उनको एक ही चीज की आदत लगी है और उनके नेता, पार्टी और परिवार भ्रष्टाचार में डूबी रही है.
  7. प्रधानमंत्री ने कहा कि लोकतंत्र में चुनाव एक यज्ञ होता है. चुनाव के यज्ञ में लोकतंत्र के सभी सिपाही, सभी मतदाता और अधिक अच्छा करने के भाव से हर कोई जुटता है। लेकिन सतयुग से, रामायण-महाभारत के काल से ऐसा होता आया है कि जब-जब यज्ञ होता है रुकावट डालने वाले इसमें रुकावट डालते हैं
  8. लोगों ने बहुत सरकारें देखी हैं, धनबल और बाहुबल से चलने वाली पार्टियां, वंशवाद से चलने वाली पार्टियां हैं, लेकिन लोकतांत्रिक तरीके से चलने वाली भाजपा इकलौती पार्टी है.
  9. प्रधानमंत्री ने कहा कि कांग्रेस की इतनी सरकारें आईं, लेकिन सिंचाई से जु़ड़ी तमाम योजनाएं अटकी पड़ी रहीं, क्योंकि कांग्रेस को विकास में कोई रुचि नहीं है. 12 लाख करोड़ के प्रोजेक्ट अटके पड़े थे, हमने उन्हें आगे बढ़ाने का काम किया.
  10. नरेंद्र मोदी ने कहा, मैं पूछना चाहता हूं कि क्या कारण है कि चुनाव से पहले कांग्रेस के 25 प्रतिशत विधायकों ने उस पार्टी को छोड़ दिया… ऐसा इसलिए क्योंकि राजनेता हवा का रुख भांप लेते हैं.
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भारत में नहीं चलेगी लोन वुल्फ अटैक की चाल, NSG कमांडोज ले रहे खास ट्रेनिंग

पूरी दुनिया में आतंकवादी संगठनों ने आतंकवादी वारदात की जो लोन वुल्फ अटैक की नई रणनीति अपनाई है, वह भारत में कामयाब नहीं होगी. क्योंकि हमारे NSG कमांडोज आतंकवाद की इस नई चुनौती से निपटने की तैयारी में जुट चुके हैं.

पश्चिमी देशों में किसी एक आतंकवादी द्वारा वाहन को भरी भीड़ पर चढ़ा देना या चाकू से हमला कर लोगों को मार देने जैसे आतंकवादी वारदात तेज हो गए हैं. जिसे देखते हुए भारत में इस तरह के आतंकवादी हमलों से निपटने के लिए NSG कमांडोज को विशेष ट्रेनिंग दी जा रही है.

सेना के सूत्रों का भी कहना है कि किसी अकेले आतंकवादी द्वारा बिना ज्यादा पैसा खर्च किए किसी भीड़-भाड़ भरी जगह में इस तरह का लोन वुल्फ अटैक कहीं अधिक खतरनाक है.

फ्रांस के नीस में हाल ही में इसी तरह के आतंकी वारदात को अंजाम दिया गया, जब एक आतंकवादी ने भीड़ से भरे बाजार में छुट्टियां मना रहे लोगों पर ट्रक चढ़ा दी. इस आतंकी हमले में 86 लोगों की मौत हो गई थी, जबकि 100 से अधिक घायल हुए थे.

भारत में अमूमन इस तरह के हमलों से निपटने के लिए ब्लैक कैट कमांडोज को ट्रेन किया जाता है. इस आतंकवाद-रोधी फोर्स के जवानों को कई देशों की सेनाएं ट्रेनिंग देती हैं.

सूत्रों ने बताया कि सुरक्षाबलों ने फ्रांस और जर्मनी में हाल के दिन में हुए इस तरह की लोन वुल्फ अटैक घटनाओं और लंदन ट्यूब में विस्फोटक रखे जाने की घटनाओं का अध्ययन किया.

NSG के एक सीनियर ऑफिसर ने बताया, “अकेले आतंकवादी द्वारा चाकू से हमला करना या ट्रक चढ़ा देने जैसे आतंकवादी हमलों की गंभार संभावनाएं हैं, क्योंकि पूरी दुनिया में यह तेजी से हो रहा है. हम इससे निपटने के लिए अपनी तकनीक खुद इजाद कर रहे हैं, साथ ही दूसरे देशों के सुरक्षाबलों की भी मदद ले रहे हैं कि कैसे इस तरह के हमले से बेहतर तरीके से निपटा जा सके.”

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ऑस्ट्रिया में यूरोपीय संघ के सबसे युवा नेता कुर्ज की जीत तय, करिश्माई है ये शख्स

ऑस्ट्रिया में मध्यावधि चुनाव के लिए मतदान हो चुका है. इसमें दक्षिणपंथी नेता 31 साल के सेबस्टियन कुर्ज  की जीत की संभावना प्रबल मानी जा रही है. यूरोपीय संघ के करीब 87.50 लाख की आबादी वाले इस सदस्य देश के दक्षिणपंथ की ओर झुकाव से ब्रसेल्स के लिए नई मुसीबतें खड़ी हो जाएंगी. वह ब्रिटेन के संघ छोड़ने और जर्मनी, हंगरी, पोलैंड और अन्य सदस्य देशों में राष्ट्रवादियों के उदय को लेकर पहले से संघर्ष कर रहा है.

हालांकि सभी संकेत इस ओर इशारा कर रहे हैं कि ऑस्ट्रिया के लोग शरण की मांग करने वाले लोगों की संख्या में रिकार्ड वृद्धि से तंग आ चुके हैं और मध्यमार्गी सरकार की बजाय अधिक सख्त सरकार के पक्ष में मतदान का मन बना चुके हैं. द पीपुल्स पार्टी ने करीब 30 प्रतिशत मतदाताओं को लुभाने के लिए अप्रवासियों पर सख्ती दिखाने और कर में ढील देने की घोषणा की है. कुर्ज ने इसे ‘निजी अभियान’ के तौर पर पेश किया.

कुर्ज 27 साल में ही बन गए विदेश मंत्री  

दरअसल, कुर्ज 2013 में उस समय चर्चा में आए जब वह मात्र 27 साल के थे और दुनिया के सबसे युवा विदेश मंत्री बने.  अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन कैरी और इरान के जावद जरीफ के साथ उनकी तस्वीरों ने खूब सुर्खियां बटोरीं. उनका राजनीतिक सफर स्कूल में ही शुरू हो गया था जब वह ए लेवल की पढ़ाई कर रहे थे. उन्होंने कंजरवेटिव ऑस्ट्रियन पीपल्स पार्टी के यूथ विंग की सदस्यता ली.

विएना में विवादास्पद और ध्रुवीकरण वाले स्थानीय चुनाव के दौरान कुर्ज ने पार्टी को एक तबके में बेहद मजबूत बनाया. उनके इस योगदान को देखते हुए पार्टी ने उन्हें 2011 में स्टेट सेक्रेटरी बनाया. चार साल पहले सोशल डेमोक्रेटिक-पीपल्स पार्टी की गठबंधन सरकार बनने पर कुर्ज को विदेश मंत्री बनाया गया. इस तरह वह यूरोप के सबसे युवा कूटनीतिज्ञ बने.

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दिवाली की 10 धमाकेदार फिल्में, बॉक्स ऑफिस पर बने थे ऐसे रिकॉर्ड

दिवाली की 10 धमाकेदार फिल्में, बॉक्स ऑफिस पर बने थे ऐसे रिकॉर्ड

  • दिवाली की 10 धमाकेदार फिल्में, बॉक्स ऑफिस पर बने थे ऐसे रिकॉर्ड
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    बॉक्स ऑफिस पर फेस्टिवल सीजन के दौरान फिल्में रिलीज करने का पुराना ट्रेंड रहा है. हर फिल्ममेकर दिवाली, होली और क्रिसमस के दौरान फिल्म की सफलता भुनाने की फिराक में रहता है. फेस्टिवल सीजन में अक्सर ही बॉक्स ऑफिस क्लैश देखने को मिलता है. बॉलीवुड के खान तिगड़ी की फिल्में त्योहारों पर रिलीज के लिए पहले से बुक हो जाती हैं. इस बार आमिर की सीक्रेट सुपरस्टार और अजय देवगन की गोलमाल अगेन में टक्कर है. चलिए एक नजर डालते हैं दिवाली पर रिलीज हुई सुपरहिट फिल्मों की लिस्ट पर.

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    कृष-3: भारतीय सुपर होरो पर बनी रितिक रोशन की कृष-3 ‘कोई मिल गया’ सीरीज का तीसरा पार्ट है. कृष बने रितिक को स्वदेशी सुपरहोरो भी कहा जाता है. जबरदस्त एक्शन से भरपूर कृष सीरीज का बच्चों और बड़ों दोनों में ही क्रेज देखने को मिलता है. रितिक के मास्क अवतार को देखने के लिए मूवी हॉल कई दिनों तक दर्शकों से पैक्ड रहे थे.

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    गोलमाल-3: रोहित शेट्टी निर्देशित फिल्म गोलमाल 3 बॉक्स ऑफिस पर जबरदस्त हिट हुई थी. इसने 100 करोड़ के क्लब में एंट्री की थी. अजय, तुषार , करीना, अरशद वारसी, कुणाल खेमू, श्रेयस तलपड़े की कॉमेडी ने दर्शकों का खूब मनोरंजन किया.

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    फैशन: मधुर भंडारकर की फिल्म फैशन ने सिनेप्रेमियों को खूब इंप्रेस किया था. कंगना और प्रियंका का फैशन बॉक्स ऑफिस पर सुपरहिट साबित हुआ. फिल्म ने क्रिटिक्स और दर्शकों की वाहवाही बटोरी.

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    ओम शांति ओम: दीपिका पादुकोण की यह शाहरुख के अपोजिट डेब्यू फिल्म थी. फराह खान के डायरेक्शन में बनी इस फिल्म ने ऋषि कपूर की कर्ज की याद दिलाई. यह फिल्म ब्लॉकबस्टर हिट हुई थी.

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    डॉन: ‘डॉन को पकड़ना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है’ बोलते बोलते शाहरुख कब बॉक्स ऑफिस के सरताज बन गए पता भी नहीं चला. रोमांस के किंग को दर्शकों ने डॉन के अवतार में काफी पंसद किया. दिवाली के मौके पर रिलीज हुई शाहरुख की इस फिल्म ने सिनेप्रेमियों की दिवाली रोशन की.

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    वीर जारा: यश चोपड़ा के निर्देशन में बनी यह फिल्म आज भी लोगों को खूब पसंद आती है. प्रीति और शाहरुख की गजब की केमिस्ट्री और लता दीदी की आवाज में पिरोए गीतों ने दर्शकों का दिल जीत लिया था. इसने बॉक्स ऑफिस पर बेहतरीन बिजनेस किया था.

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    हम साथ-साथ हैं: सूरज बड़जात्या की फिल्म हम साथ-साथ हैं साल की सबसे बड़ी एटंरटेनर साबित हुई थी. इस फैमिली मूवी ने दर्शकों को लंबे समय पर सिनेमाघरों में जोड़े रखा था.

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      कुछ कुछ होता है: काजोल-रानी और शाहरुख की दोस्ती और प्रेम कहानी पर बनी यह फिल्म आज भी लोगों के जहन में जिंदा है. इन तीनों के प्यार और तकरार पर बनी यह फिल्म जबरदस्त हिट हुई

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    दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे: DDLJ भारतीय सिनेमा की सबसे ज्यादा पसंद की गई फिल्म है. लोगों में इसके प्रति दीवानगी का अंदाजा इस बात से ही लगता है कि यह मुंबई के मराठा मंदिर में 1000 हफ्तों तक चली थी. यह इंडियन सिनेमा की सबसे ज्यादा सक्सेसफुल फिल्मों में से एक है.

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    दिल तो पागल है: 1997 की यश चोपड़ा निर्देशित फिल्म दिल तो पागल है ब्लॉकबस्टर हिट हुई थी. शाहरुख, माधुरी और करिश्मा के लव ट्रायंगल पर आधारित इस फिल्म ने लोगों को झूमने पर मजबूर कर दिया था.

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ताजमहल पर संगीत सोम के विवादित बयान से बवाल, ओवैसी ने उठाया सवाल

बीजेपी विधायक संगीत सोम ने ताजमहल को देश के इतिहास का हिस्सा मानने पर आपत्ति जताई है. मेरठ में एक सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, ”कैसा इतिहास? उसको बनाने वाला हिंदुओं को मिटाना चाहता था.”

संगीत सोम कहते हैं, ”कुछ लोगों को दर्द हुआ कि आगरा का ताजमहल ऐतिहासिक स्थलों में से निकाल दिया गया है. कैसा इतिहास, कहां का इतिहास कौन सा इतिहास. उसको बनाने वाला हिंदुओं का सफाया करना चाहता था.”

उन्होंने कहा, ”ऐसे लोगों का नाम अगर इतिहास में होगा तो ये दुर्भाग्य की बात है. मैं गारंटी के साथ आपसे कहता हूं इतिहास बदला जाएगा. इतिहास बदल रहा है. पिछले बहुत सालों में देश और उत्तर प्रदेश में जो इतिहास बिगाड़ने का काम हुआ है, आज हिन्दुस्तान और उत्तर प्रदेश की सरकार उस इतिहास को किताबों में लाने का काम कर रही है.”

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बीजेपी विधायक ने कहा, ”हमारी सरकार राम से लेकर महाराणा प्रताप और शिवाजी तक का इतिहास किताबों में लाने का काम कर रही है. और जो कलंक कथा किताबों में लिखी गई है, वो चाहे अकबर के बारे में हो, औरंगजेब के बारे में हो, चाहे बाबर हो उनके इतिहास को निकालने का काम कर रही है सरकार.”

ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तिहादुल मुसलमीन (एआईएमआईएम) के नेता और सांसद असदउद्दीन ओवैसी ने संगीत सोम के बयान पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है.

ताजमहल
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उन्होंने ट्वीट किया, ”उन्हीं ‘देशद्रोहियों’ ने लाल किला भी बनवाया था. क्या (प्रधानमंत्री नरेंद्र) मोदी वहां से तिरंगा फहराना भी छोड़ देंगे? क्या मोदी और योगी (आदित्यनाथ) घरेलू और विदेशी पर्यटकों को ताज महल ना घूमने का हुक़्म दे सकते हैं?”

ओवैसी ने ये भी लिखा, ”दिल्ली में हैदराबाद हाउस भी ‘देशद्रोही’ ने बनवाया था. क्या मोदी वहां विदेशी मेहमानों की मेज़बानी करना छोड़ देंगे.”

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संगीत सोम के बयान को लेकर लोगों सोशल मीडिया पर खूब प्रतिक्रियाएं दी हैं. ट्विटर और फ़ेसबुक पर लोगों ने बीजेपी विधायक के बयान पर अलग-अलग अंदाज़ में तंज भी कसे.

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History Created: WWE ने पहली बार किसी भारतीय महिला को साइन किया

WWE पिछले कुछ समय से भारत में अपनी लोकप्रियता बढ़ाने की कोशिश में है और दिसंबर में देश में लाइव इवेंट भी रखा है। जिंदर महल को काफी प्रोमोट किया जा रहा है और अब कंपनी ने पहली बार किसी भारतीय महिला पहलवान के साथ समझौता किया है। उन्होंने पूर्व वेट लिफ्टर कविता देवी को साइन किया है और इस बात की घोषणा नई दिल्ली दौरे के दौरान चैंपियन जिंदर महल ने की।

दक्षिण एशियाई खेलों में जीता था स्वर्ण पदक
बता दें कि कविता WWE द्वारा आयोजित माए यंग क्लासिक टूर्नामेंट का हिस्सा रह चुकी हैं और उन्होंने रिंग के दांव पेंच पूर्व वर्ल्ड हैवीवेट चैंपियन द ग्रेट खली से सीखे हैं। वह भारत की एक प्रशिक्षित भारोत्तोलकर हैं तथा उन्होंने साल 2016 में दक्षिण एशियाई खेलों में भारत के लिए स्वर्ण पदक जीता था।  बताया जा रहा है कि वो जनवरी में अमेरिका के फ्लोरिडा में स्थित WWE परफॉर्मेंस सेंटर में ट्रेनिंग शुरू कर देंगी।

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यह उपलब्धि हासिल करने के बाद कविता देवी ने कहा, “WWE के रिंग में पहुंचने वाली पहली भारतीय महिला बनना मेरे लिए सम्मान की बात है। माए यंग क्लासिक टूर्नामेंट में दुनिय़ा की सर्वश्रेष्ठ महिलाओं के साथ कंपीट करने का अनुभव बेहतरीन रहा। अब मैं आगे भारत के लिए WWE विमेंस चैंपियनशिप का खिताब जीतना चाहती हूं।”

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चार थैलों में चिल्लर भरकर बाइक खरीदने पहुंचा युवक, फिर हुआ कुछ ऐसा

मप्र के रायसेन में बचत का एक बेहद अनोखा और बड़ा उदाहरण देखने को मिला है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बचत करने के संदेश से प्रभावित होकर रायसेन के एक परिवार ने बचत के रूप में सिक्कों को जोड़ना शुरू कर दिया. धीरे-धीरे उन्होंने 57 हजार रुपए जमा कर लिए. दीपावली के उत्साह के बीच त्यौहार पर मिलने वाली छूट का लाभ उठाने के लिए परिवार का युवक जब अपने सपनों की बाइक खरीदने सिक्के लेकर शोरूम पहुंच गया.

रायसेन के एक बाइक शो रूम पर एक युवक चार थैलों में 57 हजार रुपए की चिल्लर लेकर बाइक खरीदने पहुंच गया. पहले तो शोरूम संचालक ने इतने ज्यादा सिक्के देखकर गाड़ी देने से मना कर दिया. लेकिन युवक की इच्छा को ध्यान में रखकर वाहन विक्रेता ने बैंक प्रबंधन से उक्त सिक्के जमा होने का अाश्वासन मिलने पर उसे बाइक उपलब्ध करवा दी. उक्त युवक की किराना दुकान है. इस दुकान पर आने वाले सिक्कों को बचत के रूप में उसके परिवार ने जोड़ना शुरू कर दिया था. तीन साल में उसके पास बाइक खरीदने लायक सिक्के एकत्रित हो गए, तो वह उन्हें चार थैलों में भरकर रायसेन के सागर रोड स्थित एक बाइक शो रूम पर पहुंच गया.

हालांकि युवक जो सिक्के लेकर आया था, उन सिक्कों को गिनने में शोरूम के कर्मचारियों को तीन घंटे का समय लग गया. कुणाल का कहना है कि अब वह यह सिक्के बाजार में जरूरत मंद व्यापारियों को देने के बाद बचे हुए सिक्के बैंक में जमा करा देंगे.

जानकारी के अनुसार उक्त युवक एक-एक रुपए के 14 हजार 600 सिक्के, दो-दो रुपए के 15 हजार 645 सिक्के, 5-5 रुपए के 1458 सिक्के और 10-10 रुपए के 322 सिक्के लेकर आया था. इस तरह युवक ने 57 हजार रुपए बाइक खरीदने के लिए चिल्लर के सिक्के शोरूम पर जमा कराई.

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आतंक रोधी अभियानों के लिए चीन ने नयी ‘लेजर गन’ विकसित की

  चीन ने एक नयी लेजर गन विकसित की है जो एक सेकंड के भीतर ही 200 मीटर के लक्ष्य पर निशाना साधने में सक्षम है. इसका इस्तेमाल आतंक रोधी अभियानों के लिए किया जाएगा. मीडिया में आई एक रिपोर्ट में गुरुवार को यह जानकारी दी गई. चीन के हुनान प्रांत में हाल में आतंकवाद रोधी एक अभ्यास के दौरान इस बंदूक का प्रदर्शन किया गया. इस बंदूक में निशाना लगाने के लिए एक हैंडसेट है और एक बैक पैक है जिसमें इसे संचालित करने संबंधी चीजें हैं. चाइना एरोस्पेस साइंस एंड इंडस्ट्री कॉरपोरेशन (सीएएसआईसी) से संबद्ध कंपनी होंगफेंग ने इस गन का प्रदर्शन किया.आतंक रोधी अभियानों के लिए चीन ने नयी 'लेजर गन' विकसित की

यह बंदूक अन्य हथियारों की तुलना में अधिक तेजी से और सही निशाना लगाने में सक्षम है. इस गन का विकास करने वाले इंजीनियरों में शामिल रहे यान आजहे ने ग्लोबल टाइम्स को बताया कि इस बंदूक को चलाने के दौरान यह आवाज नहीं करती और इससे रोशनी नहीं निकलती है. यान ने कहा कि इसको चलाना आसान है क्योंकि यह पीछे की तरफ धक्का भी नहीं मारती और इसका रखरखाव भी महंगा नहीं है.

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भारतीय राजनीति का सबसे बेबाक और बिंदास चेहरा यानी राम मनोहर लोहिया

महज चार साल में भारतीय संसद को अपने मौलिक राजनीतिक विचारों से झकझोर देने का करिश्मा राम मनोहर लोहिया ने कर दिखाया था.

चाहे वो जवाहर लाल नेहरू के प्रतिदिन 25 हज़ार रुपये खर्च करने की बात हो, या फिर इंदिरा गांधी को गूंगी गुड़िया कहने का साहस रहा हो. या फिर ये कहने के हिम्मत कि महिलाओं को सती-सीता नहीं होना चाहिए, द्रौपदी बनना चाहिए.

राम मनोहर लोहिया वो पहले राजनेता रहे जिन्होंने कांग्रेस सरकार को उखाड़ फेंकने का आह्वान करते हुए कहा था जिंदा कौमें पांच साल तक इंतज़ार नहीं करतीं.

उत्तर भारत में आज भी आप राजनीतिक रुझान रखने वाले किसी युवा से बात करें तो वे इस नारे का जिक्र ज़रूर करेगा- ‘जब जब लोहिया बोलता है, दिल्ली का तख़्ता डोलता है.’

नेहरू का विरोध

जब देश जवाहर लाल नेहरू को अपना सबसे बड़ा नेता मान रहा था, ये लोहिया ही थे जिन्होंने नेहरू को सवालों से घेरना शुरू किया था. नेहरू से उनकी तल्खी का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि उन्होंने एक बार ये भी कहा था कि बीमार देश के बीमार प्रधानमंत्री को इस्तीफ़ा दे देना चाहिए.

1962 में लोहिया फूलपुर में जवाहर लाल नेहरू के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ने चले गए. उस चुनाव में लोहिया की चुनाव प्रचार की टीम का हिस्सा रहे सतीश अग्रवाल याद करते हैं, “लोहिया जी कहते थे मैं पहाड़ से टकराने आया हूं. मैं जानता हूं कि पहाड़ से पार नहीं पा सकता लेकिन उसमें एक दरार भी कर दिया तो चुनाव लड़ना सफल हो जाएगा.”

जवाहर लाल नेहरू- महात्मा गांधीइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

बिहार में समाजवादी राजनीति का अहम चेहरा माने जाने वाले शिवानंद तिवारी को राम मनोहर लोहिया को करीब से देखने का मौका मिला था. 1967 में भोजपुर के शाहपुर विधानसभा सीट से शिवानंद तिवारी के पिता रामानंद तिवारी चुनाव लड़ रहे थे, उनके चुनाव प्रचार में लोहिया गए थे.

शिवानंद तिवारी कहते हैं, “मुझे उनके साथ चार सभाओं में जाने का मौका मिला था. वे एक भविष्यवक्ता के भांति बोल रहे थे. उन्होंने लोगों से कहा था कि आप ये सोचकर वोट दीजिए कि आप जिसे चुन रहे हैं वो मंत्री बनने वाला है या वो मंत्री बनाने वाला है.”

लोहिया की राजनीतिक विरासत

शिवानंद तिवारी के मुताबिक जब 1967 में जब हर तरफ कांग्रेस का जलवा था, तब राम मनोहर लोहिया इकलौते ऐसे शख़्स थे जिन्होंने कहा था कि कांग्रेस के दिन जाने वाले हैं और नए लोगों का जमाना आ रहा है. नौ राज्यों में कांग्रेस हार गई थी.

राम मनोहर लोहिया
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Image captionजर्मनी में डॉक्टरेट की पढ़ाई करने के दौरान लोहिया की तस्वीर

लोहिया की मौत के बाद उनकी विरासत और उनके नाम की राजनीति ख़ूब देखने को मिली. कम से कम उत्तर प्रदेश और बिहार में. मुलायम सिंह यादव तो अपनी पार्टी को लोहिया की विरासत को मानने वाली पार्टी के तौर पर देखते रहे हैं.

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव कहते हैं, “लोहिया जी हमारे पार्टी के सबसे बड़े आदर्श हैं. 1967 में पहली बार उन्होंने ही नेताजी को टिकट दिया था. जसवंत नगर विधानसभा सीट से. लोहिया समाज में गरीब गुरबों की आवाज़ उठाना चाहते थे, वे पिछड़ों को सत्ता में भागीदारी देना चाहते थे. उनका सपना था सौ में पावें पिछड़े साठ.”

मुलायम की राजनीतिक क्षमता को सबसे पहले लोहिया जी ने ही देखा था. मुलायम सिंह यादव ने जल्दी ही प्रकाशित होने वाली अपनी राजनीतिक जीवनी द सोशलिस्ट में याद किया है, “1963 में फर्रूख़ाबाद सीट से उपलोकसभा चुनाव में मैं अपने साथियों के साथ उनके प्रचार में जुटा था. विधुना विधानसभा में उन्होंने मुझसे पूछा था कि प्रचार के दौरान क्या खाते हो, कहां रहते हो. मैं ने कहा कि लैइया चना रखते हैं, लोग भी खिला देते हैं और जहां रात होती है उसी गांव में सो जाते हैं. उन्होंने मेरे कुर्ते की जेब में सौ रूपये का नोट रख दिया था.”

राम मनोहर लोहिया के साथ मुलायम की तस्वीरइमेज कॉपीरइटALAMY

हालांकि मुलायम को बाद में शिवानंद तिवारी से बहुत ज्यादा मिलने जुलने का मौका नहीं मिला, लेकिन परिवारवाद के पहलू को छोड़कर लोहिया के राजनीतिक विरासत पर मुलायम लगातार अपना दावा जताते रहे.

समाजवादी राजनीति को शिवानंद तिवारी लंबे समय से देख रहे हैं. लोहिया की राजनीति के असली वारिस की बात होने पर शिवानंद तिवारी कहते हैं, “लोहिया जिस तरह की राजनीति की बात करते थे, उसके ठीक ठीक अपनाने वाले तो केवल किशन पटनायक ही हो पाए. हालांकि उनको वो सम्मान नहीं मिला. बिहार की राजनीति में लोहिया को जिन्होंने काफी हद तक अपने जीवन में उतारा वो लालू ही रहे हैं.”

हिंदी के हिमायती रहे लोहिया

शिवानंद तिवारी आगे कहते हैं, “अगर आप 1990 से 1995 के बीच के लालू के भाषणों को देखें तो उनमें लोहिया की झलक मिलती थी. हालांकि बाद में उनके क़दम डगमगाए और उनमें उतना बड़ा विजन भी विकसित नहीं हो पाया. लालू लोहिया के जितने करीब पहुंच सकते थे, वहां तक पहुंचने में वो चूक गए.”

चाहे मुलायम हों या फिर लालू या शरद या राम विलास पासवान, इन सब पर लोहिया का असर दिखा ज़रूर लेकिन ये सब उस जातिवादी राजनीति के दायरे से नहीं निकल पाए, जिसका लोहिया आजीवन विरोध करते रहे.

शिवानंद तिवारी के मुताबिक लोहिया होने आसान नहीं हैं क्योंकि लोहिया को देश और दुनिया के राजनीति की जितनी समझ थी, उससे ज्यादा वे भारतीय परंपराओं और भारतीय समाज को जानते बूझते थे, वे लगातार पढ़ने लिखने वाले राजनेता थे.

राम मनोहर लोहियाइमेज कॉपीरइटLOHIA TRUST

ये कम ही लोग जानते होंगे कि लोहिया ने जर्मनी से डॉक्टरेट की डिग्री हासिल की थी. वे अंग्रेजी, जर्मन, फ्रेंच, मराठी और बांग्ला धड़ल्ले से बोल सकते थे, लेकिन वे हमेशा हिंदी में बोलते थे, ताकि आम लोगों तक उनकी बात ज्यादा से ज्यादा पहुंचे.

लोहिया ने चाहे आम लोगों के हितों की बात की हो, या समाज में महिलाओं की बराबरी देने की बात कही हो, ऐसे लगता है कि वे भारतीय राजनीति के सबसे दूरदर्शी नेताओं में शामिल थे, लेकिन उनके अंदर एक आग हमेशा धधकती रहती थी.

लोहिया की जीवनीकार श्रीमति इंदू केलकर ने लोहिया की रामधारी सिंह दिनकर से एक मुलाकात का जिक्र किया है, वे लिखती हैं, “निधन से एक महीने पहले ही दिनकर लोहिया से मिले थे और कहा था कि क्रोध कम कीजिए, देश आपसे बहुत प्रसन्न है, कहीं ऐसा न हो कि भार जब आपके कंधों पर आए तब आपका अतीत आपकी राह का कांटा बन जाए. लोहिया बोले थे- आपको लगता है तब तक मैं जी पाऊंगा?”

लोहिया का निजी जीवन भी कम दिलचस्प नहीं था. लोहिया अपनी ज़िंदगी में किसी का दख़ल भी बर्दाश्त नहीं करते थे. हालांकि महात्मा गांधी ने उनके निजी जीवन में दख़ल देते हुए उनसे सिगरेट पीना छोड़ देने को कहा था. लोहिया ने बापू को कहा था कि सोच कर बताऊंगा. और तीन महीने के बाद उनसे कहा कि मैंने सिगरेट छोड़ दी.

बिंदास जीवन था लोहिया का

लोहिया जीवन भर रमा मित्रा के साथ लिव इन रिलेशनशिप में रहे. रमा मित्रा दिल्ली के मिरांडा हाउस में प्रोफेसर रहीं. दोनों के एक दूसरे को लिखे पत्रों की किताब भी प्रकाशित हुई. शिवानंद तिवारी बताते हैं, “लोहिया ने अपने संबंध को कोई छिपाकर नहीं रखा था. लोग जानते थे, लेकिन उस दौर में निजता का सम्मान किया जाता था. लोहिया जी ने जीवन भर अपने संबंध को निभाया और रमा जी ने उसे आगे तक निभाया.”

राम मनोहर लोहियाइमेज कॉपीरइटLOHIA TRUST

50-60 के दशक में भारत में आम लोगों की राजनीति करने वाला कोई नेता अपने निजी जीवन में इतना बिंदास हो सकता है, इसकी कल्पना आज भी मुश्किल ही है. लोहिया महिलाओं को समान अधिकार दिए जाने की वकालत करते हुए कहते थे कि देश की सती-सीता की ज़रूरत नहीं बल्कि द्रौपदी की ज़रूरत है जो संघर्ष कर सके, सवाल पूछ सके.

1962 के आम चुनाव में लोहिया का फूलपुर में चुनाव प्रचार में हिस्सा ले चुके सतीश अग्रवाल बताते हैं, “लोहिया किस हद तक बिंदास थे, इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि एक बार तारकेश्वरी सिन्हा ने उनसे कहा कि आप महिलाओं और उनके अधिकारों के बारे में काफ़ी बात करते हैं लेकिन आपने तो शादी नहीं की. लोहिया ने तत्काल जवाब दे दिया- भई तुमने तो मौका ही नहीं दिया.”

हुसेन की पेंटिंग- लोहिया- नेहरू
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राम मनोहर लोहिया ऐसे राजनेता थे जो अमरीका जा कर वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन से समाजवाद पर बहस कर सकते थे और मक़बूल फ़िदा हुसेन जैसे कलाकार की कला को भी राह दिखा सकते थे. दिल्ली के एक रेस्टोरेंट में लोहिया ने ही मक़बूल फ़िदा हुसेन को कहा था, “ये जो तुम बिरला और टाटा के ड्राइंग रूम में लटकने वाली तस्वीरों से घिरे हो, उससे बाहर निकलो. रामायण को पेंट करो.”

अस्पताल की लापरवाही के चलते मौत

लोहिया की मौत भी कम विवादास्पद नहीं रही. उनका प्रोस्टेट ग्लैंड्स बढ़ गया था और इसका ऑपरेशन दिल्ली के सरकारी विलिंग्डन अस्पताल में किया गया था.

उनकी मौत के बारे में वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर ने अपनी ऑटो बायोग्राफी बियांड द लाइन्स में भी किया है. इसमें उन्होंने लिखा है, “मैं राम मनोहर लोहिया से अस्पताल में मिलने गया था. उन्होंने मुझसे कहा कुलदीप मैं इन डॉक्टरों के चलते मर रहा हूं.”

कुलदीप आगे लिखते हैं कि लोहिया की बात सच ही निकली क्योंकि डॉक्टरों ने उनकी बीमारी का गलत इलाज कर दिया था. उनकी मौत के बाद सरकार ने दिल्ली के सभी सरकारी अस्पतालों के निरीक्षण करवाने हेतु एक समिति नियुक्त की गई थी. आज यही अस्पताल राम मनोहर लोहिया अस्पताल के रूप में जाना जाता है.

लोहिया अस्पतालइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

इस समिति की रिपोर्ट का एक हिस्सा 26 जनवरी, 1968 को टाइम्स ऑफ़ इंडिया में प्रकाशित हुआ था, इसमें समिति ने दावा किया था, “अगर अस्पताल के अधिकारी आवश्यक और अनिवार्य सावधानी से काम लेते तो लोहिया का दुखद निधन नहीं होता.”

शिवानंद तिवारी याद करते हैं कि तब वो बड़ा मुद्दा बना था लेकिन बाद वो बात दबा दी गई. 1977 में केंद्र सरकार में राजनारायण स्वास्थ्य मंत्री बने तो उन्होंने लोहिया की मौत के कारणों की जांच करने के लिए विशेषज्ञों की समिति नियुक्त या, लेकिन अस्पताल में तब सारे कागज़ ग़ायब थे.

पैनी नज़र थी लोहिया की

लोहिया के जीवन और उनके विचारों को संजोने की कोशिश उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद के समाजिक कार्यकर्ता नितेश अग्रवाल जैन कर रहे हैं. उन्होंने लोहिया पर करीब 90 मिनट की डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म बनाने का जोख़िम उठाया है.

लोहिया के जीवन पर फ़िल्मइमेज कॉपीरइटNITESH JAIN

वे कहते हैं, “उनके विचारों को पढ़ने के बाद मुझे लगा कि इनकी बात आम लोगों तक पहुंचनी चाहिए. मेरी फ़िल्म एंबैसडर ऑफ सोशलिज्म डॉक्टर राम मनोहर लोहिया लगभग तैयार है. उनके जन्म दिन पर अगले साल रिलीज करेंगे ताकि उनका संदेश देश दुनिया के कोने कोने तक पहुंचे.”

लोहिया की राजनीतिक दृष्टि जितनी पैनी थी, उतनी ही सामाजिक दृष्टिकोण. उन्होंने मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड में सुधार की बात हो या फिर गंगा की सफ़ाई का मुद्दा हो या फिर हिंदु मुस्लिम सांप्रदायिकता की बात हो, इन सब मुद्दों पर बेबाकी से अपनी बात रखी थी. वो भी पचास साल पहले.

हालांकि कुछ राजनीतिक विश्लेषक लोहिया पर जनसंघ को बढ़ावा देने का आरोप लगाते हैं हालांकि ये समझना मुश्किल नहीं कि कांग्रेस के विरोध के लिए दूसरे तमाम लोगों को एक साथ लाना पड़ा. अखिलेश यादव कहते हैं, “लोहिया के जमाने में कांग्रेस की जो स्थिति थी वही अब बीजेपी की है. बीजेपी के ख़िलाफ़ हमने भी कांग्रेस को साथ लिया है.”

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जन्म शताब्दी विशेष: हर कोई नहीं बन सकता नाना जी देशमुख

“मैं अपने लिए नहीं अपनों के लिए हूं”, इस ध्येय वाक्य पर चलते हुए महाराष्ट्र के एक समाजसेवी ने भारत के उन कई गाँवों की तस्वीर बदल दी, जहां यदि वे महान विभूति न होते तो शायद आज भी विकास की लहर कोसों दूर होती। त्याग तपस्या परिश्रम करुणा भेदभाव से रहित दबे पिछड़े लोगों के विकास को प्रतिबद्ध इस महान सामाजिक निर्माता की दूर दृष्टि सोच ने विकास को एक नया आयाम दिया है। ऐसे थे प्रख्यात समाजसेवी नानाजी देशमुख। नानाजी ने वैसे तो पूरे भारत के कई राज्यों में गांवो की तकदीर व् तस्वीर बदल दी, लेकिन उन्होंने अपनी कर्मभूमि का केंद्र बनाया भगवान राम की तपोस्थली चित्रकूट को। नानाजी का मानना था कि जब अपने वनवासकाल के प्रवास के दौरान भगवान राम चित्रकूट में आदिवासियों तथा दलितों के उत्थान का कार्य कर सकते हैं, तो वे क्यों नहीं। अतः नानाजी चित्रकूट में ही जब पहली बार 1989 में आए तो यहीं बस गए और बदल डाली गांवों की तस्वीर।
प्रख्यात समाजसेवी नानाजी देशमुख का जन्म महाराष्ट्र के परभणी जिले में 11 अक्टूबर सन् 1916 को एक ब्राम्हण परिवार में हुआ था। बाल्यकाल से किशोरावस्था के रथ पर सवार होने तक उनके मन में भारत के गाँवों की दुर्दशा की चिंता अपना आशियाना बना चुकी थी, जिसको लेकर नानाजी प्रायः फिक्रमन्द रहने लगे। चूंकि नानाजी का बचपन काफी अभावों में बीता था, इसलिए उनके अंदर दबे पिछड़े गरीब लोगों के प्रति दया का सागर हिलोरें मारता। शिक्षा प्राप्त करने के लिए नानाजी ने सब्जी बेंचकर पैसे जुटाए।
आरएसएस से सम्पर्क
आरएसएस के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार से नानाजी के पारिवारिक सम्बन्ध थे। नानाजी की उभरती सामाजिक प्रतिभा को पहचानते हुए हेडगेवार ने उन्हें संघ की शाखा में आने के लिए कहा। सने 1940 में हेडगेवार के निधन के बाद आरएसएस को खड़ा करने की ज़िम्मेदारी नानाजी पर आ गई और इस संघर्ष को अपने जीवन का मूल उद्देश्य बनाते हुए नानाजी ने अपना पूरा जीवन आरएसएस के नाम कर दिया। उन्होंने महाराष्ट्र सहित देश के विभिन राज्यों में घूम घूम कर युवाओं को आरएसएस से जुड़ने के लिए प्रेरित किया तथा इस कार्य में वे काफी हद तक सफल भी हुए।
आरएसएस प्रचारक के रूप में पहली बार आगरा प्रवास पर आए नानाजी देशमुख की मुलाकात पण्डित दीनदयाल उपाध्याय से हुई. आगरा के बाद नानाजी गोरखपुर गए और वहां दिनरात मेहनत करते हुए आरएसएस की शाखाएं खड़ी कीं. यहां तक कि नानाजी को गोरखपुर में ठहरने हेतु( संघ के पास उस समय संगठन संचालन के लिए पर्याप्त धन नहीं था) आश्रम संचालक बाबा राघवदास के लिए भोजन तक बनाना पड़ा. आज देश भर में शिक्षा के केंद्रबिंदु में समाहित सरस्वती शिशु मन्दिर नामक शिक्षण संस्था की स्थापना नानाजी ने सर्वप्रथम गोरखपुर में ही की थी। 1947 में आरएसएस ने पाञ्चजन्य नामक दो साप्ताहिक व् स्वदेश हिंदी समाचार पत्र निकालने की शुरुआत की। अटल बिहारी बाजपेयी को सम्पादन दीनदयाल उपाध्याय को मार्गदर्शन और नानाजी को प्रबंध निदेशक की जिम्मेदारी सौंपी गई। 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद आरएसएस पर प्रतिबंध लगा दिया गया, फिर भी भूमिगत होकर इन पत्र पत्रिकाओं का प्रकाशन कार्य जारी रहा।
राजनीतिक जीवन
आरएसएस से प्रतिबंध हटने के बाद भारतीय जनसंघ की स्थापना का निर्णय हुआ, जिसके विस्तार के लिए नानाजी को उत्तर प्रदेश भेजा गया। अपनी सांगठनिक कौशल की मिसाल कायम करते हुए नानाजी ने सन् 1957 तक उत्तर प्रदेश के हर जिले में जनसंघ की इकाइयां स्थापित कर दीं गई। जनसंघ उत्तर प्रदेश की प्रमुख राजनीतिक शक्ति का केंद्रबिंदु बन गया। नानाजी ने राम मनोहर लोहिया की मुलाकात दीनदयाल उपाध्याय से करवाई जिसके बाद जनसंघ और समाजवादी विचारधारा ने कांग्रेस के लिए मुश्किल खड़ी कर दी। उत्तर प्रदेश की पहली गैर कॉंग्रेसी सरकार के गठन में विभिन्न राजनीतिक दलों को एकजुट करने में नानाजी का महत्वपूर्ण योगदान रहा। जेपी आंदोलन के समय जब लोकनायक जयप्रकाश नारायण के ऊपर पुलिस का लाठीचार्ज हुआ तब नानाजी ने साहस का परिचय देते हुए जयप्रकाश नारायण (जेपी) को सुरक्षित बाहर निकाल लिया। जनता पार्टी के संस्थापकों में नानाजी प्रमुख थे। कांग्रेस को सत्ता से मुक्त कर अस्तित्व में आई जनता पार्टी। आपातकाल हटने के बाद जब चुनाव हुआ तो नानाजी देशमुख यूपी के बलरामपुर से लोकसभा सांसद चुने गए और उन्हें मोरारजी मन्त्रीमण्डल में शामिल होने का न्योता दिया गया, लेकिन नानाजी देशमुख ने यह कह कर प्रस्ताव ठुकरा दिया कि 60 वर्ष की उम्र के बाद सांसद राजनीति से दूर रहकर सामाजिक व् सांगठनिक कार्य करें।
सामाजिक जीवन
1960 में लगभग 60 वर्ष की उम्र में नानाजी ने राजनीतिक जीवन से सन्यास लेते हुए सामाजिक जीवन में पदार्पण किया। वे आश्रमों में रहकर सामाजिक कार्य (खासतौर पर गाँवों में) करते रहे परन्तु कभी अपना प्रचार नहीं किया। नानाजी ने दीनदयाल उपाध्याय के निधन के बाद शोकग्रस्त न होते हुए दीनदयाल के दर्शन एकात्म मानववाद को साकार किया तथा दिल्ली में खुद के दम पर दीनदयाल शोध संस्थान की स्थापना की। नानाजी ने उत्तर प्रदेश के उस समय के सबसे पिछड़े जिले गोंडा और महाराष्ट्र के बीड में कई सामाजिक कार्य किए। नानाजी द्वारा चलाई गई परियोजना का उद्देश्य था हर हांथ को काम और हर खेत को पानी।
 
चित्रकूट से लगाव
1989 में भारत भ्रमण के दौरान नानाजी पहली बार भगवान राम की तपोभूमि चित्रकूट आए और अंतिम रूप से यहीं बस गए।अशिक्षा पानी व् दस्यु समस्या से जूझते चित्रकूट की दुर्दशा देख नानाजी द्रवित हो उठे और उन्होंने चित्रकूट के गाँवों की दशा व् दिशा बदलने का निश्चय किया। चित्रकूट के सुरम्य प्राकृतिक वातावरण को नानाजी ने अपने सामाजिक कार्य का केंद्र बनाकर समाज के गरीब व्यक्तियों की सेवा शुरू की। नानाजी को जानने वाले लोग बताते हैं कि नानाजी कहा करते थे कि उन्हें राजा राम से अधिक प्रिय वनवासी राम लगते हैं क्योंकि वनवासी राम से समाजसेवा की प्रेरणा मिलती है। ग्रामीण परिवेश के छात्रों के उचित शिक्षा व्यवस्था के लिए नानाजी देशमुख ने चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय की स्थापना की।
इसके आलावा चित्रकूट के जंगलों में पाई जाने वाली जड़ीबूटियों की उपयोगिता जन जन तक पहुंचाने के लिए नानाजी द्वारा आरोग्यधाम की स्थापना की गई जहां विभिन आयुर्वेदिक चिकित्सा व् औषधियों का निर्माण होता है। कोल आदिवासी बाहुल्य चित्रकूट के बीहड़ में बसे गाँवों में नानाजी ने शिक्षा के कई प्रकल्प चलाए और कई गाँवों में शिक्षा की अलख जगाई यही नहीं जनजातीय बच्चों को भी नानाजी के प्रकल्पों के माध्यम से शिक्षित व् आत्मनिर्भर बनाया जा रहा है। लघु व् कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए नानाजी ने ग्रामीण परिवेश के कई छोटे मोटे कार्यों को पहचान दिलाई जिससे लोग आत्मनिर्भर तथा स्वावलम्बी बन सकें। सन् 2010 में 27 फरवरी को इस महान आत्मा का इस मृत्युलोक से प्रस्थान हुआ।
प्रशंसा और सम्मान भी छोटे
1999 में नानाजी को पद्मविभूषण से सम्मानित किया गया। तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम भी नानाजी की समाजसेवा के कायल थे। 95 वर्ष की उम्र में 27 फरवरी सन् 2010 को नानाजी ने चित्रकूट में अंतिम सांस ली। नानाजी ने अपने मृत शरीर को मेडिकल शोध हेतु दान करने का वसीयतनामा निधन से काफी पहले 1997 में ही लिखकर दे दिया था।निधन के बाद नानाजी का शव अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान को सौंप दिया गया।