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अब हिंदी दिलाएगी आपको रोजगार, घर बैठे सिखाकर कमा सकते हैं अच्छी रकम

कई लोग जिन्हें अच्छी इंग्लिश नहीं आती है वो अपने आप को कमजोर और पिछड़ा हुआ महसूस करते हैं।

लेकिन अब आपको अपनी कमजोर इंग्लिश के लिए शरमाने और अफसोस करने की जरुरत नहीं है। अगर आपकी हिंदी मजबूत है तो आप हर घंटो 2000 रुपये तक कमा सकते हैं। जी हां, आज हम आपको बताने जा रहे हैं कि कैसे आप ऑन लाइन हिंदी की ट्यूटोरियल क्लासेज देकर हर घंटे 2000 रुपये तक कमा सकते हैं।

Italki

दुनिया की दूसरी भाषाओं को सीखने के लिए यह वेबसाइट एक अच्छा प्लेटफॉर्म है। इस पर आप अपनी पसंद की भाषा को चुन सकते हैं। इसके बाद आपको उस भाषा से जुड़े टीचर्स की प्रोफाइल लिस्ट दिखेगी। आपको इन टीचर्स के लिए शुल्क देना होगा। ये शुल्क आपको घंटे के हिसाब से देना होगा। अगर आप ट्रायल क्लास करना चाहते हैं तो आपको 30 मिनट के हिसाब से भुगतान करना होगा। ऐसे में इस वेबसाइट पर आप पैसे भी कमा सकते हैं। यहां आपको वेबसाइट पर खुद को रजिस्टर करना होगा। इसके अलावा आपको बताना होगा कि आप हर घंटे की क्लास के लिए कितनी फीस लेंगे। इसके लिए आपको अपनी क्वालिफिकेशन बतानी होगा और डेमो देना होगा।

Verbalplanet

आप इस वेबसाइट पर जाकर दुनिया की किसी भी भाषा को सीख सकते हैं। वेबसाइट आपको Skype क्लासेज की सुविधा देता है। आपको हर क्लास के लिए शुल्क देना होता है। यहां भी आपको टीचर्स की प्रोफाइल लिस्ट दिखाई देती है, जिसे आप अपनी पसंद के हिसाब से चुन सकते हैं। हालांकि यहां आपको फ्री ट्रायल क्लासेज मिलती है। ऐसे में किसी भी भाषा को सीखने के बजाए आप यहां पैसे भी कमा सकते हैं। इस वेबसाइट पर आप अपनी प्रोफाइल बनाकर पैसे कमा सकते हैं। वेबसाइट पर पढ़ाने के लिए आपको एप्लीकेशन देना होता जिसके आधार पर वेबसाइट आपके क्लास की क्वालिटी तय करती है। ध्यान रहे, जितनी अच्छी क्वालिटी होगी उतनी ही स्टूडेंट्स आएंगे और आप उतना ही पैसा कमा सकते हैं।

Verbling

ऊपर दिए वेबसाइट्स की तरह आप यहां भी अपनी पसंद की भाषा को वीडियो क्लास के जरिए सीख सकते हैं। इसके अलावा आप इन पर प्रोफाइल बना कर पैसे कमा सकते हैं। इसके लिए आपको खुद को रजिस्टर करना होगा। इस वेबसाइट पर आप 500 रुपये से लेकर 2000 रुपये तक हर घंटे कमा सकते हैं।

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Story of Success 23 साल की उम्र में बना ली करोड़ों की कंपनी, जानिये कैसे

सफलता के लिए कोई उम्र की सीमा नहीं है और ना ही कोई समय तय है. आइडिया और विजन है तो आप किसी भी उम्र में सफल हो सकते हैं. ऐसी ही एक मिसाल हैं OYO के फाउंडर और मालिक 23 साल के रितेश अग्रवाल.

रितेश के माता-पिता दरअसल चाहते थे कि वो आईआईटी में दाखिला लें और इंजीनियर बनें. रितेश भी कोटा, राजस्‍थान में रह कर आईआईटी एंट्रेस एग्‍जाम की ही तैयारियों में जुटे थे.

पर अपने आइडियाज और वीजन को पूरा होता देखने के लिए रितेश इंतजार नहीं करना चाहते थे. उन्‍होंने IIT की तैयारी छोड़कर अपने बिजनेस की तैयारी शुरू कर दी.

19 साल के रितेश अग्रवाल महीनों घूमते और बजट होटल में रुकते, ताकि वहां की तमाम चीजों के बारे में जान सकें. अपने अनुभव के बल पर रितेश ने अपने पहले स्‍टार्ट-अप यात्रा की शुरुआत की.

रितेश ने एक वेबसाइट तैयार किया, जहां वो सस्‍ते और किफायती होटल्‍स के बारे में जानकारी देते थे. इस वेबसाइट का नाम रखा ‘ओरावल’.

कुछ दिनों तक वेबसाइट चलाने के बाद रितेश को लगा कि लोग शायद नाम के चलते वेबसाइट को समझ नहीं पा रहे हैं. इसलिए उन्‍होंने साल 2013 में उसका नाम बदल कर OYO Rooms कर दिया. द न्‍यूयॉर्क टाइम्‍स की CB Insights ने OYO Rooms को उन कंपनियों में रखा, जो भविष्‍य में सफलता का परचम लहरा सकती हैं.

बता दें कि रितेश के OYO Rooms में सॉफ्टबैंक ग्रुप, ग्रीनओक्‍स, सेक्‍यूइया कैपिटल और लाइटस्‍प्रेड इंडिया जैसी कंनियों ने निवेश किया है. रितेश अग्रवाल को साल 2013 में Thiel Fellowship के ’20 अंडर 20′ के लिए चुना गया था.

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इस खेती ने बदल दी लाखों की जिंदगी! अनेक हाथों को रोजी-रोटी मुहैया करा रहा मशरूम

मशरूम उत्पादन को कृषि और उद्योग दोनों ही क्षेत्रों में महत्व दिया गया है। भारतीय मशरूम उद्योग फिलहाल आकारा ले रहा है। बड़े अंतरराष्ट्रीय बाजार में वह अपना स्थान बनाने के संघर्षपूर्ण दौर में है। धीरे-धीरे सफलता भी मिल रही है। देश के अलग-अलग हिस्सों से सफलता की कुछ ऐसी ही प्रेरक कहानियों को बयां करतीं विकासनगर (उत्तराखंड) से राकेश खत्री, सोलन (हिमाचल प्रदेश) से आशुतोष डोगरा, पटना (बिहार) से अरविंद शर्मा और बांका से रवि वर्मा की रिपोर्ट।

हिरेशा के मशरूम की इंडोनेशिया से अमेरिका तक धमक

देहरादून, उत्तराखंड की महिला उद्यमी हिरेशा वर्मा ‘प्रोग्रेसिव मशरूम ग्रोअर’ अवार्ड पाने वाली देश की पहली महिला हैं। आज देश ही नहीं, विदेश में भी उनके मशरूम की धूम है। हाल ही में उन्हें दुबई में संपन्न कनेक्टिंग वूमेन चेंजमेकर्स समिट में अमेरिकी दूतावास की ओर से सफल महिला उद्यमी के रूप में नवाजा गया। वनस्पति विज्ञान में मास्टर्स डिग्री लेने के बाद हिरेशा ने घर से ही इसकी शुरुआत की।

दो हजार रुपये खर्च कर घर पर ही मशरूम के 25 बैग लगाए। इससे उन्हें पांच हजार रुपये की आमदनी हुई। फिर तो मशरूम उत्पादन को ही उन्होंने अपना लक्ष्य बना लिया। 2015 में यहां पछवादून के छरबा में मशरूम प्लांट लगाया। तीन वर्ष में ही प्लांट से एक हजार किलो प्रतिदिन मशरूम का उत्पादन होने लगा है। जिसका बाजार भाव 120 रुपये प्रति किलो है। आज वह स्थानीय बाजार के साथ-साथ निर्यात कर रही हैं। प्लांट में 32 लोगों को रोजगार भी मिला। नियमित मजदूरों को आठ हजार और सुपरवाइजर को 11 हजार रुपये प्रतिमाह वेतन का भुगतान किया जाता हैं।

महिलाओं ने बिहार के झिरवा को दिलाई पहचान

मशरूम उत्पादन में महिलाओं के सामूहिक प्रयास ने बांका, बिहार के झिरवा गांव को देश में अलग पहचान दिलाई है। मशरूम की खेती के बूते गांव की 400 महिलाएं आत्मनिर्भर हो चुकी हैं। शुरुआत गांव की दो महिलाओं विनीता कुमारी और रिंकू कुमारी ने की थी। स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र से प्रशिक्षण लेकर मशरूम उगाना शुरू किया और इसके बाद खुद का उद्यम तो स्थापित किया ही, साथ ही महिलाओं को भी प्रशिक्षण दिया।

गांव की रधिया देवी कहती हैं कि मशरूम की खेती से जुड़ने के बाद अब उन्हें रोजगार के लिए किसी के खेत पर काम करने नहीं जाना पड़ता है। 2013 में रिंकू-विनीता ने गन्ने के पत्ते पर मशरूम उत्पादन का सफल प्रयोग किया था। 2016 को सोसाइटी फॉर अपलिफ्टमेंट ऑफ रूलर इकोनोमी ने रिंकू को प्रोगेसिव वूमन फार्मर अवार्ड से नवाजा। दोनों को इस साल जगजीवन राम अभिनव नवाचार राष्ट्रीय पुरस्कार के लिए नामित किया गया था।

60 हजार किसानों को बनाया स्वावलंबी

राजेंद्र कृषि विवि के कृषि वैज्ञानिक डॉ. दयाराम को ‘मशरूम मैन’ कहा जाता है। उनके तीन मंत्र हैं- मशरूम उपजाइए, खाइए और बेचिए। तीन दशक से वे पिछड़े इलाके के अभावग्रस्त किसानों को मशरूम की खेती और मुनाफे का गणित समझा रहे हैं। महज दो कमरे की झोपड़ी में मशरूम उगाने की विधि समझाकर उन्होंने 60 हजार से अधिक किसानों की किस्मत बदल दी है। उनसे प्रशिक्षित किसान पुरस्कृत भी हो चुके हैं। परंपरागत खेती से पीछा छुड़ाकर किसानों और महिलाओं को नकदी फसलों के लिए प्रेरित करना दयाराम का मिशन है।

जौनपुर, उप्र के मूल निवासी दयाराम ने 1991 में प्लांट पैथोलॉजी में पीएचडी करने के बाद बिहार की राह पकड़ ली थी। तभी से मशरूम की खेती के लिए प्रयत्न करने लगे। उन्होंने साठ हजार किसानों को आर्थिक गुलामी से मुक्ति दिलाकर आत्मनिर्भर बनाया है। दयाराम ने मशरूम को सिर्फ उगाना ही नहीं सिखाया, बल्कि बिस्किट, समोसा, नमकीन और अचार के रूप में बाजार तक पहुंचाना सिखाया।

मशहूर होता मशरूम

  • 10,000 दुनिया में मशरूम की 10,000 प्रजातियां हैं जिसमें से महज 80 प्रायोगिक तौर पर, 20 व्यावसायिक स्तर पर व 4-5 प्रजातियां औद्योगिक स्तर पर पैदा की जा रही हैं।
  • 2000 भारत में 2000 प्रजातियों की पहचान की जा चुकी है। इनमें से आयस्टर, बटन एवं पेडिस्ट्रा मशरूम अधिक पैदा की जाती है।
  • 60 पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश में भारत के कुल उत्पादन का लगभग 60 प्रतिशत मशरूम उत्पादित किया जा रहा है।
  • 14,000 देश का कुल अनुमानित उत्पादन लगभग 14,000 टन ही है, जिसका लगभग 35 प्रतिशत ही निर्यात होता है। यूरोपीय देश हैं मुख्य आयातक।
  • 500 वर्ष 1994-95 से लगभग 500 मीट्रिक टन का निर्यात भारत ने किया, जिससे 40 करोड़ की विदेशी मुद्रा प्राप्त हुई।

तैयार किया रेडी टू फ्रूट बैग

मशरूम अब रसोई में भी तैयार होगा। इसके लिए विशेष कमरे की जरूरत नहीं पड़ेगी। राष्ट्रीय मशरूम अनुसंधान केंद्र चंबाघाट, सोलन ने इसके लिए रेडी टू फ्रूट (आरटीएफ) बैग तैयार किया है। 25 से 30 रुपये की कीमत के इस बैग से लगभग 20 दिन में 800 ग्राम मशरूम का उत्पादन हो सकेगा। डॉ. वीपी शर्मा, निदेशक, मशरूम अनुसंधान केंद्र ने बताया कि जल्द ही इसे बाजार में उतारने की तैयारी है। बैग की एक खासियत यह भी है कि इसे किसी जलवायु-स्थान पर इस्तेमाल किया जा सकेगा। हां, पानी का छिड़काव कर नमी का ध्यान रखना होगा। इसमें पिंक ऑयस्टर और व्हाइट ऑयस्टर प्रजाति का मशरूम उत्पादित होगा। ऑयस्टर से आचार व सूप भी तैयार किया जा सकता है।

घर बैठे आप उत्तराखंड की वादियों में यहां के किसानों द्वारा पैदा की गयी 100% नेचुरल ऑयस्टर मशरूम पा सकते हैं। तो आर्डर कीजिए

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Teacher’s Day Special सफलता की राह दिखाते हैं Sarvepalli Radhakrishnan के ये 10 विचार

sarvepalli radha krishnan

राधाकृष्णन भारतीय संस्कृति के संवाहक, प्रख्यात शिक्षाविद और महान दार्शनिक थे. उनका कहना था कि जहां कहीं से भी कुछ सीखने को मिले उसे अपने जीवन में उतार लेना चाहिए. आज हम आपको राधाकृष्णन के 10 ऐसे विचारों के बारें में बताने जा रहे हैं, जो आपको हमेशा जीवन में प्रेरणा देते रहेंगे.

सर्वपल्ली राधाकृष्णन के 10 विचार (Teacher’s Day Quotes)

1. भगवान की पूजा नहीं होती बल्कि उन लोगों की पूजा होती है जो उनके नाम पर बोलने का दावा करते हैं.

2. शिक्षक वह नहीं जो छात्र के दिमाग में तथ्यों को जबरन ठूंसे, बल्कि वास्तविक शिक्षक तो वह है जो उसे आने वाले कल की चुनौतियों के लिए तैयार करें.

3. शिक्षा के द्वारा ही मानव मस्तिष्क का सदुपयोग किया जा सकता है. अत: विश्व को एक ही इकाई मानकर शिक्षा का प्रबंधन करना चाहिए.

4. किताबें पढ़ने से हमें एकांत में विचार करने की आदत और सच्ची खुशी मिलती है.

5. कोई भी आजादी तब तक सच्ची नहीं होती है, जब तक उसे पाने वाले लोगों को विचारों को व्यक्त करने की आजादी न दी जाये.

6. पुस्तकें वह माध्यम हैं, जिनके जरिये विभिन्न संस्कृतियों के बीच पुल का निर्माण किया जा सकता है.

7. शिक्षा का परिणाम एक मुक्त रचनात्मक व्यक्ति होना चाहिए, जो ऐतिहासिक परिस्थितियों और प्राकृतिक आपदाओं के खिलाफ लड़ सके.

8. ज्ञान के माध्यम से हमें शक्ति मिलती है. प्रेम के जरिये हमें परिपूर्णता मिलती है.

9. हमें तकनीकी ज्ञान के अलावा आत्मा की महानता को प्राप्त करना भी जरूरी है.

10. शांति राजनीतिक या आर्थिक बदलाव से नहीं आ सकती बल्कि मानवीय स्वभाव में बदलाव से आ सकती है.

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पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी जी का निधन, लंबे समय से थे बीमार

Atal bihari bajpeyi ji

पूर्व प्रधानमंत्री और भारतीय जनता पार्टी के संस्थापक भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी का निधन गुरुवार शाम 5.05 मिनट पर हो गया। वह 93 साल के थे। अटल जी लंबे समय से बीमार चल रहे थे। हमारे देश के उन चुनिंदा लोगों में अटल जी का नाम लिया जाता है जिन्होंने भारतीय राजनीती में आमूलचूल परिवर्तन किये और इसको एक नई दिशा दी। प्रधानमंत्री पद के लिए परिवारवाद की जीत को दरकिनार करने के लिए अगर किसी एक शख्स को जिम्मेदार माना जायेगा तो वो अटल जी ही हैं।

वाजपेयी जी को सांस लेने में परेशानी, यूरीन व किडनी में संक्रमण होने के कारण 11 जून को एम्स में भर्ती किया गया था। 15 अगस्‍त को उनकी तबीयत काफी बिगड़ गई थी, जिसके बाद उन्‍हें लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर रखा गया। थोड़ी देर में उनका पार्थिव शरीर उनके निवास पर लाया जाएगा, जहां उसे लोगों के दर्शनार्थ रखा जाएगा। इस संबंध में 6.30 बजे केंद्रीय कैबिनेट होगी।
एम्स के मुताबिक, बुधवार सुबह वाजपेयी जी को सांस लेने में तकलीफ हुई थी। इसके बाद उन्हें जरूरी दवाइयां दी गई थीं, लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर रखा गया। भाजपा के संस्थापकों में शामिल वाजपेयी 3 बार देश के प्रधानमंत्री रहे। वह पहले ऐसे गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री रहे, जिन्होंने अपना कार्यकाल पूरा किया। उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

वाजपेयी जी काफी दिनों से बीमार थे और वह करीब 15 साल पहले राजनीति से संन्यास ले चुके थे। अटल बिहारी वाजपेयी जी ने लाल कृष्ण आडवाणी के साथ मिलकर भाजपा की स्थापना की थी और उसे सत्ता के शिखर पहुंचाया। भारतीय राजनीति में अटल-आडवाणी की जोड़ी सुपरहिट साबित हुई। अटल बिहारी जी देश के उन चुनिन्दा राजनेताओं में से एक थे, जिन्हें दूरदर्शी माना जाता था। उन्होंने अपने राजनीतिक करियर में ऐसे कई फैसले लिए जिसने देश और उनके खुद के राजनीतिक छवि को काफी मजबूती दी। अटल जी एक उच्च कोटि के चिंतक एवं विचारक होने के साथ-साथ एक श्रेष्ठ कवि, लेखक, रणनीतिकार और राजनीतिज्ञ थे।

उनका जन्म 25 दिसंबर, 1924 को ब्रह्ममूहुर्त में शिन्दे की छावनी वाले घर में हुआ था। वैसे उनके स्कूल के सर्टिफिकेट में जन्म की तिथि 25 दिसंबर 1926 लिखी है। यह दो वर्षों का अंतर उनके पिताजी ने इसलिए कराया था कि कम आयु लिखी जाएगी तो लड़का ज्यादा दिनों तक नौकरी कर सकेगा।

इस संदर्भ का जिक्र स्वयं अटल बिहारी वाजपेयी जी ने ग्वालियर के श्री नारायण तरटे को 7 जनवरी, 1986 को लिखे एक पत्र में किया था। उन्होंने लिखा था ‘आपका पत्र मिला। बड़ी प्रसन्नता हुई। इतने संगी-साथियों में यदि किसी के स्नेह-आशीर्वाद की अभिलाषा रहती है तो वह आप ही हैं। मेरा जन्म 1924 में हुआ था। पिताजी ने स्कूल में नाम लिखाते समय 1926 लिखा दिया कि उम्र कम होगी तो नौकरी ज्यादा कर सकेगा, देर में रिटायर होगा। उन्हें क्या पता था कि मेरी वर्षगांठ मनेगी और मनाने वाले मुझे छोटा बनाकर पेश करेंगे।’

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मिलिए विजय से जिन्होने तय किया दिल्ली पुलिस के कांस्टेबल से आइपीएस तक का सफर

राजस्थान के झुंझुनूं जिले के रहने वाले विजय मूलत: एक किसान परिवार से हैं। उन्होंने प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे गरीब और अभावग्रस्त छात्रों के लिए एक ट्रस्ट भी बनाया है। ट्रस्ट के माध्यम से वह छात्रों को न सिर्फ प्रोत्साहित करते हैं बल्कि आर्थिक सहायता भी देते हैं।

दसवीं में वह महज 55 फीसद अंक से पास हुए। बारहवीं में उनके 67 फीसद अंक आए। वह किसी नौकरी की तलाश में थे। इसमें सफलता न मिलने पर वह टाइल्स का कारोबार कर रहे दोस्त के साथ व्यवसाय करने की सोच रहे थे। उनके पास व्यवसाय के लिए पैसा नहीं था।

इस कारण पिता लक्ष्मण सिंह ने नौकरी की तलाश करने को कहा। उन्होंने प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी शुरू कर दी। जून 2010 में उनका चयन दिल्ली पुलिस में कांस्टेबल के पद पर हो गया। दिल्ली आकर उन्हें पता चला कि एक आइपीएस अफसर के पास समाज सेवा के तमाम अवसर होते हैं। उन्होंने उसी दिन ठान लिया कि अब आइपीएस ही बनना है। हालांकि, इसकी तैयारी में खर्च होने वाले पैसे का इंतजाम उनके पास नहीं था। इस कारण उन्होंने पहले दारोगा की तैयारी की। कड़ी मेहनत से दिसंबर 2010 में उनका चयन दिल्ली पुलिस में दारोगा के पद पर हो गया।

इसपद पर रहते हुए उन्हें तैयारी का समय नहीं मिल रहा था। फिर भी उन्होंने एसएससी की तैयारी प्रारंभ कर दी। उनका चयन सेंट्रल एक्साइज में हो गया, लेकिन तैनाती केरल के त्रिवेंद्रम में हो गई। सिविल सेवा की तैयारी दिल्ली में चल रही थी। त्रिवेंद्रम चले जाने से उनकी तैयारी प्रभावित होने लगी। उन्होंने फिर एसएससी की परीक्षा दी। इस बार उनका चयन इनकम टैक्स विभाग में हो गया और उनकी दिल्ली में तैनाती हो गई। इनकम टैक्स की नौकरी करने के साथ ही वह सिविल सेवा की तैयारी करते रहे। 2016 उन्होंने तीसरी बार सिविल सेवा की परीक्षा दी।

संस्कृत जैसे कठिन विषय से मुख्य परीक्षा देने के बाद भी उनका साक्षात्कार के लिए चयन हो गया। वह साक्षात्कार तक पहुंचे, लेकिन आठ अंक कम होने के कारण उनका चयन न हो सका। इसके बाद भी विजय हार नहीं माने। वह लगातार 10 घंटे की पढ़ाई नौकरी के साथ करते रहे। जिसका नतीजा है कि पांचवें प्रयास में 2018 में उनका चयन आइपीएस के लिए हुआ। उनकी इस सफलता ने न सिर्फ परिवार का बल्कि पूरे गुर्जर समाज का नाम रोशन कर दिया। रविवार को नोएडा के इंदिरा गांधी कला केंद्र में गुर्जर समाज के सफल युवाओं के लिए आयोजित कार्यक्रम में विजय गुर्जर को सम्मानित कर समाज खुद को गौरवान्वित महसूस कर रहा था।

अभाव व कम संसाधन कभी विजय रथ को रोक नहीं सकते। यह जरूर है कि अभाव के कारण सफलता पाने में समय लग जाता है। मेरी मां चंदा देवी और पत्नी सुनीता लगातार मेरा मनोबल बढ़ाती रहीं। अब मैं पत्नी सुनीता को सिविल सेवा की तैयारी करा रहा हूं। मैं सिपाही भी रहा हूं। इस कारण मुझे उनका दर्द पता है।

विजय गुर्जर, आइपीएस

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थानेदार के 14 साल के लड़के ने बनाए ये 3 एप, गूगल ने बताया शानदार, कमाई कर दी गरीबों को दान

14 वर्ष का आर्यन राज नौवीं कक्षा का छात्र है। आर्यन मार्च-अप्रैल में स्कूल की छुट्टी के समय तीन एप मोबाइल शॉर्ट कट, कम्प्यूटर शॉर्ट कट और वाट्सएप क्लीनर लाइट तैयार किया। तीनों एप को गूगल प्ले स्टोर पर अपलोड करने के लिए भेज दिया। उसके बाद वह अपनी पढ़ाई में व्यस्त हो गया। उधर, गूगल ने उसके तीनों एप की जांच की। रिसर्च किया। पाया गया कि अच्छे और कारगर एप हैं। गूगल ने तीनों एप को अप्रैल में अपने प्ले स्टोर में अपलोड कर दिया है। एक माह में प्ले स्टोर से आर्यन के एप को दस हजार लोगों ने डाउनलोड किया है।

क्या खासियत है एप की

– मोबाइल और कंप्यूटर शॉर्टकट एप : ये दोनों एप इंटरनेट के माध्यम से किसी तरह के मॉलवेयर और वायरस का प्रवेश रोकता है।

– वाट्सएप क्लीनर लाइट एप : यह वाट्सएप के बैकग्राउंड का रंग बदल देता है। साथ ही फोटो और वीडियो के माध्यम से किसी प्रकार के वायरस का प्रवेश रोकता है।

कंप्यूटर इंजीनियर बनना चाहता है पटना के थानेदार का बेटा

पत्रकार नगर थानाध्यक्ष संजीत सिन्हा का बेटा है आर्यन राज। कक्षा दो से ही वह कंप्यूटर फ्रेंडली हो गया। वह सेंट माइकल दीघा में नौंवी का छात्र है। संजीत सिन्हा कहते हैं कि बेटा इंजीनियर बनना चाहता है। पूर्व में आर्यन ने बिहार पुलिस को लेकर एक एक एप बनाया था, जो सफल नहीं हो सका।

एप बनाने से भी एक बड़ा काम आर्यन ने किया है। उसने पुरस्कार की राशि स्वीकार करने से मना कर दिया। गूगल को बैंक अकाउंट नंबर न देकर यह आग्रह किया है कि इस राशि को उन बच्चों की शिक्षा पर खर्च किया जाए, जो अभाव की वजह से पढ़ाई नहीं पूरी कर पा रहे। पटना के एक थानेदार के बेटे की मेधा और बड़प्पन की खूब चर्चा हो रही।

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दुर्लभ बीमारी का इलाज करवा रहे अभिनेता इरफान खान ने यह भावपूर्ण पत्र और कुछ खूबसूरत तस्वीरें साझा कीं। जरूर देखें!

जिंदगी कई बार ऐसे मोड़ पर ले आती है जब अनिश्चित ही निश्चित जान पड़ता है. मिजाज से योद्धा इरफ़ान की मानसिक अवस्था और अहसास को हम उनकी लिखी इन पंक्तियों में महसूस कर सकते हैं. हम उसे यहां अविकल रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं…

कुछ महीने पहले अचानक मुझे पता चला था कि मैं न्यूरोएन्डोक्राइन कैंसर से ग्रस्त हूं, मैंने पहली बार यह शब्द सुना था. खोजने पर मैंने पाया कि मेरे इस बीमारी पर बहुत ज्यादा शोध नहीं हुए हैं, क्योंकि यह एक दुर्लभ शारीरिक अवस्था का नाम है और इस वजह से इसके उपचार की अनिश्चितता ज्यादा है.

अभी तक अपने सफ़र में मैं तेज़-मंद गति से चलता चला जा रहा था. मेरे साथ मेरी योजनायें, आकांक्षाएं, सपने और मंजिलें थीं. मैं इनमें लीन बढ़ा जा रहा था कि अचानक टीसी ने पीठ पर टैप किया, “आप का स्टेशन आ रहा है, प्लीज उतर जाएं.’

मेरी समझ में नहीं आया, “ना ना मेरा स्टेशन अभी नहीं आया है.’

जवाब मिला, ‘अगले किसी भी स्टाप पर आपको उतरना होगा, आपका गन्तव्य आ गया.

अचानक एहसास होता है कि आप किसी ढक्कन (कॉर्क) की तरह अनजान सागर में, अप्रत्याशित लहरों पर बह रहे हैं… लहरों को क़ाबू कर लेने की ग़लतफ़हमी लिए.

इस हड़बोंग, सहम और डर में घबरा कर मैं अपने बेटे से कहता हूं, “आज की इस हालत में मैं केवल इतना ही चाहता हूं… मैं इस मानसिक स्थिति को हड़बड़ाहट, डर, बदहवासी की हालत में नहीं जीना चाहता. मुझे किसी भी सूरत में मेरे पैर चाहिए, जिन पर खड़ा होकर अपनी हालत को तटस्थ हो कर जी पाऊं. मैं खड़ा होना चाहता हूं.”

ऐसी मेरी मंशा थी, मेरा इरादा था…

कुछ हफ़्तों के बाद मैं एक अस्पताल में भर्ती हो गया. बेइंतहा दर्द हो रहा है. यह तो मालूम था कि दर्द होगा, लेकिन ऐसा दर्द… अब दर्द की तीव्रता समझ में आ रही है. कुछ भी काम नहीं कर रहा है. ना कोई सांत्वना, ना कोई दिलासा. पूरी कायनात उस दर्द के पल में सिमट आई थी. दर्द खुदा से भी बड़ा और विशाल महसूस हुआ.

मैं जिस अस्पताल में भर्ती हूं, उसमें बालकनी भी है. बाहर का नज़ारा दिखता है. कोमा वार्ड ठीक मेरे ऊपर है. सड़क की एक तरफ मेरा अस्पताल है और दूसरी तरफ लॉर्ड्स स्टेडियम है… वहां विवियन रिचर्ड्स का मुस्कुराता पोस्टर है. मेरे बचपन के ख्वाबों का मक्का, उसे देखने पर पहली नज़र में मुझे कोई एहसास ही नहीं हुआ. मानो वह दुनिया कभी मेरी थी ही नहीं.

मैं दर्द की गिरफ्त में हूं.

और फिर एक दिन यह अहसास हुआ… जैसे मैं किसी ऐसी चीज का हिस्सा नहीं हूं, जो निश्चित होने का दावा करे. ना अस्पताल और ना स्टेडियम. मेरे अंदर जो शेष था, वह वास्तव में कायनात की असीम शक्ति और बुद्धि का प्रभाव था. मेरे अस्पताल का वहां होना था. मन ने कहा. केवल अनिश्चितता ही निश्चित है.

इस अहसास ने मुझे समर्पण और भरोसे के लिए तैयार किया. अब चाहे जो भी नतीजा हो, यह चाहे जहां ले जाये, आज से आठ महीनों के बाद, या आज से चार महीनों के बाद या फिर दो साल. चिंता दरकिनार हुई और फिर विलीन होने लगी और फिर मेरे दिमाग से जीने-मरने का हिसाब निकल गया.

पहली बार मुझे शब्द ‘आज़ादी‘ का एहसास हुआ, सही अर्थ में! एक उपलब्धि का अहसास.

इस कायनात की करनी में मेरा विश्वास ही पूर्ण सत्य बन गया. उसके बाद लगा कि वह विश्वास मेरी एक एक कोशिका में पैठ गया. वक़्त ही बताएगा कि वह ठहरता है या नहीं. फ़िलहाल मैं यही महसूस कर रहा हूं.

इस सफ़र में सारी दुनिया के लोग… सभी मेरे सेहतमंद होने की दुआ कर रहे हैं, प्रार्थना कर रहे हैं, मैं जिन्हें जानता हूं और जिन्हें नहीं जानता, वे सभी अलग-अलग जगहों और टाइम जोन से मेरे लिए प्रार्थना कर रहे हैं. मुझे लगता है कि उनकी प्रार्थनाएं मिल कर एक हो गयी हैं, एक बड़ी शक्ति. तीव्र जीवन धारा बन कर मेरे स्पाइन से मुझमें प्रवेश कर सिर के ऊपर कपाल से अंकुरित हो रही हैं.

अंकुरित होकर यह कभी कली, कभी पत्ती, कभी टहनी और कभी शाखा बन जाती है. मैं खुश होकर इन्हें देखता हूं. लोगों की सामूहिक प्रार्थना से उपजी हर टहनी, हर पत्ती, हर फूल मुझे एक नई दुनिया दिखाती हैं. अहसास होता है कि ज़रूरी नहीं कि लहरों पर ढक्कन (कॉर्क) का नियंत्रण हो.

जैसे आप क़ुदरत के पालने में झूल रहे हों!

इरफान ने इस पत्र के साथ कुछ तस्वीरें भी साझा की हैं:

(1)

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जब पस्‍त हुए चिकित्‍सक, तो काम आए योगगुरु

यह सच मध्‍यप्रदेश के एक छोटे जिले मंदसौर का है। योग ने मंदसौर के 50 से अधिक बुजुर्गों को 70 और 80 की उम्र में फिर से युवा बना दिया है। दशपुर कुंज, रामटेकरी और मेघदूत नगर में प्रतिदिन सुबह योग के लिए 200 से अधिक लोग जुटते हैं। इनमें ऐसे बुजुर्ग भी हैं, जो कुछ समय पहले चलने में मोहताज थे। अब युवाओं की तरह दौड़ लगा रहे हैं। शाजापुर में तो योग से पेरालिसिस तक ठीक होने का उदाहरण सामने आया है।

1- 70 के पारिख कर रहे हैं कमाल

मध्‍यप्रदेश के मंदसौर जिले के रहने वाले दिनेशचंद्र पारिख 70 वर्ष के हैं। पारिख का कहना है कि हम योग के लाभ को शब्‍दों में बयां नहीं कर सकते । वो बताते हैं कि नौ साल पहले हम योग से जुड़े। इसके बाद योग साधना से कुछ लाभ दिखा और मेरी दिलचस्‍पी इसमें गहरी होती गई। धीरे-धीरे योग से शारीरिक और मानसिक लाभ मिला और आस्‍था पैदा होने लगी। उन्‍होंने कहा कि 2008 से मैं नियमित योग कर रहा हूं।

स्वास्थ्य विभाग से सेवानिवृत्त पारिख बताते हैं कि घुटने में तकलीफ से सीढि़यां चढ़ना दूभर हो गया था। इस परेशानी से आजिज आकर मैंने एक साल पहले ही सेवानिवत्ति का मन बना लिया था। चिकित्सकों ने घुटने बदलने की सलाह दी। ऐसे में योग गुरु सुरेंद्र जैन के संपर्क में आकर योग शुरू किया। इससे चलना-फिरना आसान हो गया। छह माह में पैर ठीक हो गया।

2- अब सीढ़ियों पर दौड़ते हैं 70 वर्षीय पामेचा

इसी जिले के निवासी 70 वर्षीय पामेचा 10 वर्ष पूर्व योग से जुड़े। उनका योग में अपार विश्‍वास है। पमोचा कहते हैं कि वह दस वर्षों से निरंतर योगाभ्‍यास कर रहे हैं। उनका यह विश्‍वास अनायास नहीं है। योग से जुड़ने से पहले पोचा चलने-फ‍िरने में मोहताज थे। आज वह योगाभ्‍यास से दौड़ सकते हैं, सीढि़यों पर चढ़ सकते हैं। पामेचा कहते हैं कि 2008 में 70 वर्ष की उम्र में योग से जुड़ा, तब घर की सी़ढ़ियां एक पैर से ही चढ़ पाता था, दूसरा पैर काम नहीं करता था। योग शुरू करते ही पैर ठीक हो गया। मंदसौर के भंवरलाल पामेचा योग को जीवन के लिए हवा और भोजन की तरह ही जरूरी मानते हैं।

3- बीमा एजेंट यशपाल शर्मा पेरालिसिस ठीक हो गया

बीमा एजेंट यशपाल शर्मा को वर्ष 2001 में हार्ट अटैक हुआ। उनके दुखों का यहीं अंत नहीं हुआ। कुछ दिनों बाद वह पेरालिसिस से भी ग्रसित हो गए। यशपाल का कहना है कि वह तीन वर्षों तक चिकित्‍सकों से इलाज कराते रहे। इलाज में करीब 10 लाख रुपये भी खर्च हो गए। लेकिन स्थिति में कोई फर्क नहीं पड़ा। हमें कोई आराम नहीं मिला। यशपाल ने कहा कि हारा मन योग की शरण जा पहुंचा। योगाभ्‍यास से धीरे-धीरे आराम मिला। और मैं सालभर में पूरी तरह स्वस्थ हो गया। यशपाल अब योग में डिप्लोमा करने के बाद लोगों को योग सिखाने का काम कर रहे हैं।

4- रीतेश के जीवन में योग से फैला उजियारा

शहडोल निवासी रीतेश मिश्रा के जीवन में योग ने उजियारा फैलाया। रीतेश का कहना है कि छह साल की उम्र में ब्रेन ट्यूमर के ऑपरेशन के बाद आंखों की रोशनी चली गई थी। उन्‍होंने बताया कि मैं लगातार 14 साल तक योग कर रोशनी वापस लाने में कामयाब हुआ हूं। मुझे 80 प्रतिशत चीजें नजर आ जाती हैं। मार्कर से लिखे बड़े अक्षर पढ़ लेता हूं। मोबाइल को भी नजदीक से देखकर चला लेते हैं। रीतेश की तारीफ योग गुर बाबा रामदेव भी करते हैं। रीतेश बताते हैं कि बाबा रामदेव से मेरी पहली मुलाकात रीवा में 2008 में हुई थी। इसके बाद योग के प्रति लगाव पैदा हुआ।

रीतेश ने कहा पहले माता-पिता (सीमा मिश्रा व देवानंद मिश्रा) टीवी पर आसन देखकर योग कराते थे। मेरे माता-पिता मुझे लेकर काफी चिंतित थे। खासकर मेरी शिक्षा को लेकर। लेकिन समस्‍याओं के बावजूद रीतेश ने उच्‍च शिक्षा पूरी की। अब वह लोगों को योग सिखा रहे हैं। हाई प्रोफाइल लोगों की योग कक्षा पुलिस लाइन में सुबह साढ़े पांच बजे से शुरू हो जाती है। वेलफेयर फंड से इन्हें कुछ राशि बतौर मेहनताना मिलती है। इनकी योग कक्षा में शामिल रहने वालों में पुलिस अफसर, जज, डॉक्टर, सीए, इंजीनियर्स शामिल हैं।

बता दें कि 21 जून का पूरी दुनिया अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मना रही है। इसके अलावा 150 से अधिक देशों में योग दिवस मनाया जा रहा है। पूरे देश में अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाने के लिए करीब 5000 आयोजन हो रहे हैं।

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Three Keys That Elon Musk Can Teach You About Getting Funding for Your Startup

If there’s one person who embodies the idea of “entrepreneur,” it’s Elon Musk.

He has been responsible for the development of a large number of high-profile technology companies, which include Zip2, X.com (later merged with Confinity to form PayPal), SpaceX, SolarCity, Tesla and many others.

What’s remarkable about Musk is the way he funded his startups, especially SpaceX and Tesla. While he has relied on external funding, he nonetheless had to face many setbacks that almost brought his companies to an early end.

As an entrepreneur, Musk can teach you a great deal about how to get funding for your startup. Here are the three most important learnings you can get from his experience.

Convince investors with your commitment.

The mid-nineties remind us of an era of unprecedented economic growth and a feeling of prosperity toward the country’s future, something that stands in sharp contrast with our present.

The context in which Musk raised venture capital to fund his first startup represents another drastic difference with the present. In 1995, there was slightly over $ 8 billion available in the global VC market, a small piece of the current $ 155 billion that was raised last year. His beginnings were humble. Musk, his brother Kimbal, and a small sales team pitched the new company door to door for the first months.

Due to their lack of funding, Musk and his brother had to live on the little money they had, sleeping on futons at their office and using the showers of the YMCA that was located a few blocks away. To convince their investors, Musk and his brother relied on a creative trick: They built an elaborate casement around the computer that worked as Zip2’s server and put it on a large, wheeled base that made it look like “a mini-supercomputer.”

This trick, together with the frugality in which the Musk brothers lived, helped them become profitable soon. Their early profitability helped them raise money from a small group of angel investors, which would eventually lead to a $3-million investment from Mohr Davidow Ventures, and finally, a $307-million acquisition by Compaq.

The passion and commitment Musk showed goes beyond the funny tricks and futon nights. Musk didn’t waste the $22 million he got from Zip2’s sale on expensive cars and luxurious mansions. He reinvested — and risked — everything to build his second company, X.com, which would lead to PayPal. The sale of PayPal to eBay would net Musk $180 million, which he would then use to fund SpaceX, Tesla and SolarCity.

If there’s one thing the beginnings of Musk’s journey show, it’s that he’s the kind of entrepreneur who works for the long run. When he’s involved with a company, he goes all in. He invests everything he has, putting all his energies into building them.

It’s hard for a venture capitalist to reject an entrepreneur with such a hard-working spirit. You don’t need to shower in a YMCA to show the sacrifice you are willing to make for your company (unless you are truly broke, like the Musk brothers were back then). Rather, you need to show you live and breath your company, and that you are willing to do anything to make your vision happen.

Don’t give up control too soon.

A hard fact about the tech world is that few startups get to grow to billions of dollars in valuation without any VC funding, something that leads to one problem: dilution of equity and loss of control of the company.

Most startup founders need to live with that situation, and many get to keep control thanks to the high trust VCs have for the founder and executive team. The case of Mark Zuckerberg, who owned 28.4 percent of Facebook’s shares at the time of its IPO, is a good example of such case.

Yet, in some other cases, founders lose excessive control too soon, leaving them powerless against the more professional and experienced VCs. This is something Musk learned early in his career.

Musk’s career in Zip2 had an abrupt and sad ending: The first funding round deeply diluted his equity, which left him powerless after his board of directors decided to bring on a new CEO and make Musk the CTO. While Musk was still on the executive team, he couldn’t tolerate the lack of control and the way the new CEO, Rich Sorkin, ran the company.

Musk met a similar fate with his second startup, X.com. After Musk merged X.com with one of its competitors, Confinity, he ended up being the CEO of the new company, PayPal. Unfortunately, he was ousted from the CEO position after a rather trivial fight over the technology platform PayPal used.

The lack of control he had over his two companies had a significant impact on his future ventures. Nowadays, Musk prefers to start by investing as much money as he can (as you just saw), making sure he always has the upper hand in his company’s decisions. His obsession over equity control explains why while he was going through Tesla’s funding, he maintained his ownership percentage.

The lessons for you are clear: Before you focus on raising as much money as you can, remember to leave some equity for your own (particularly if you are an inexperienced CEO). If you care about your company’s vision, you need to make sure you can carry it out. It’s hard to achieve such feat if you hold little voting control over your company. Becoming profitable as early as possible can help you overcome this issue, especially if you get creative, like you are about to see below.

Be resourceful.

Lack of resources isn’t a something that sits well with Musk. As you have seen so far, he has been willing to do whatever he has to do to have his companies prosper. What’s remarkable about Musk is that whenever he’s got all the odds against him, he turns the situation around by being resourceful.

To help you understand what I mean by this, let’s take a look at what he did with his latest venture, The Boring Company. Despite the fact he funded the company with his own money (as usual), the mission to build underground tunnels seems like an expensive task, making the company strapped for cash.

Being resourceful is an attitude shared by almost all successful tech entrepreneurs, like the case of the founders of Airbnb. According to the author Leigh Gallagher, author of the book The Airbnb Story, when the founders were on the verge of bankruptcy, they decided to sell cereal prior to 2008’s Presidential election. Thanks to their PR-fueled campaign, not only were they able to extend the life of the company (which today is worth $31 billion), they were able to get accepted into Y Combinator, the famous tech accelerator, which would lead to their first funding round and the growth of the company. As Paul Graham, the co-founder of Y Combinator said, “If you can convince people to pay $40 for a $4 box of cereal, you can probably convince people to sleep in other people’s airbeds.”

The lesson you can learn from Musk shows you that if you lack funding (or any other thing that is essential to the existence of your company), it’s your job to do whatever it takes to get it. Life isn’t fair for risk-averse entrepreneurs, yet Musk has been able to make his companies work by getting creative, thinking on his feet and showing commitment right from the start.