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भाग्यशाली लोगों को मिलती हैं इन चार गुणों वाली पत्नियां

बहुत भाग्यशाली लोगों को मिलती हैं इन चार गुणों वाली पत्नियां
घर अगर रथ है तो पति, पत्नी उसके दोनों पहिए. अगर एक पहिया ठीक से ना चले तो घर नहीं चल पाता है. हिंदू घर्म में स्त्रियों को देवी माना जाता है. शास्त्रों के अनुसार

पत्नी

को विशेष महत्व दिया जाना चाहिए.

पत्नी

को अर्धांगिनी यूं ही नहीं कहा जाता है. इसका अर्थ होता है आधा अंग. अर्थात पुरुष

पत्नी

के बिना अधूरा है. पति का आधा अंग पत्नी है.

बहुत भाग्यशाली लोगों को मिलती हैं इन चार गुणों वाली पत्नियां

गरुण पुराण में पत्नी के गुणों को भलीभांति एक श्लोक के माध्यम से बताया गया है. इसमें कहा गया है कि जिस पुरुष के पास इन गुणों वाली स्त्री है उसे खुद को भाग्यशाली समझना चाहिए

आइए जानते हैं क्या है वह श्लोक.

बहुत भाग्यशाली लोगों को मिलती हैं इन चार गुणों वाली पत्नियां

गरुण पुराण में लिखा गया है कि- ‘सा भार्या या गृहे दक्षा सा भार्या या प्रियंवदा। सा भार्या या पतिप्राणा सा भार्या या पतिव्रता।।’ आइए जानते हैं इसका अर्थ-

गृहे दक्षा- गृह कार्य में दक्ष वे स्त्री जो घर के सभी काम जैसे- भोजन बनाना, साफ-सफाई करना, घर को सजाना, कपड़े-बर्तन आदि साफ करना, बच्चों की जिम्मेदारी ठीक से निभाना, घर आए अतिथियों का मान-सम्मान करना, कम संसाधनों में ही गृहस्थी चलाना आदि कार्यों में दक्ष होती है. उसे पति का भरपूर प्रेम मिलता है और घर भी तरक्की करता है.

प्रियंवदा- प्रियंवदा अर्थात वह स्त्री जो बहुत मधुर बोलती है सदैव और बड़ों से संयमित भाषा में ही बात करती है सबकी प्रिय होती है.

पतिप्राणा- अर्थात पतिपरायणा स्त्री. जो स्त्री अपने पति की बातों को सुनती है और उसका पालन करती है. इसके अवाला पति के मन को चोट पहुंचाने वाली कोई बात नहीं करती है ऐसी स्त्री के लिए पति कुछ भी करने को तैयार रहते हैं.

पतिव्रता- वह स्त्री जो अपने पति के अलावा किसी अन्य पुरुष के बारे में नहीं सोचती. धर्मग्रंथों में ऐसी ही पत्नी को पतिव्रता कहा गया है. गरुड़ पुराण के अनुसार, ऐसी पत्नियां पति को बल देती हैं और अंत में चलकर सुख भोगती हैं.

ऊपर बताए गए इन चार गुणों से परिपूर्ण स्त्री जिसके पास हो उसे स्वयं को इंद्र से कम नहीं समझना चाहिए. ऐसे पुरुष बहुत भाग्यशाली होते हैं.

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‘बहुत ज़्यादा सवाल करते थे स्टीफ़न हॉकिंग’

दुनिया के मशहूर वैज्ञानिक स्टीफ़न हॉकिंग का 76 वर्ष की उम्र में निधन हो गया है.

भारत के प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉक्टर जयंत विष्णु नारलीकर ने कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में स्टीफ़न हॉकिंग के साथ पढ़ाई की थी.

इसके बाद साइंस से संबंधित कई ग्लोबल सम्मेलनों में दोनों की मुलाक़ात होती रही. डॉक्टर नारलीकर के अनुसार, कॉलेज के दिनों में वो स्टीफ़न हॉकिंग के साथ टेबल टेनिस के मैच भी खेल चुके हैं.

कॉलेज की उन यादों पर डॉक्टर जयंत विष्णु नारलीकर ने बीबीसी से बात की. पढ़िए, उन्होंने क्या-क्या बताया:

स्टीफ़न हॉकिंग और भारतीय वैज्ञानिक डॉक्टर जयंत विष्णु नारलीकर
Image captionस्टीफ़न हॉकिंग और भारतीय वैज्ञानिक डॉक्टर जयंत विष्णु नारलीकर

मैं और स्टीफ़न हॉकिंग कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में साथ पढ़ते थे. वो मुझसे साल दो साल जूनियर ही थे. वो बाक़ी आम स्टूडेंट्स की तरह ही थे. उस वक़्त कोई उनकी प्रतिभा के बारे में नहीं जानता था.

लेकिन कुछ सालों के भीतर ही लोगों को ये अंदाज़ा हो गया था कि स्टीफ़न में कुछ ख़ास बात है.

मुझे याद है कि ब्रिटेन की रॉयल ग्रीनविच शोध विद्यालय ने साल 1961 में एक साइंस सम्मेलन आयोजित किया था. वहां स्टीफ़न हॉकिंग से पहली बार मेरी सीधी मुलाक़ात हुई थी.

स्टीफ़न हॉकिंगइमेज कॉपीरइटJIM WATSON/GETTY IMAGES

उस वक़्त वो ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे थे. मैं एक छात्र ही था, लेकिन मुझे वहां एक लेक्चर देने के लिए बुलाया गया था.

लेक्चर शुरू होने के कुछ देर बाद ही मैंने पाया कि एक स्टूडेंट है जो बहुत ज़्यादा सवाल कर रहा है. वो थे स्टीफ़न हॉकिंग.

उन्होंने मानो मुझपर सवालों की बौछार कर दी थी. वो ब्रह्मांड के विस्तार के बारे में जानना चाहते थे. वो जानना चाहते थे कि बिग बैंग थियोरी है क्या?

स्टीफ़न हॉकिंगइमेज कॉपीरइटHAWKING.ORG.UK

मैंने उनके सभी सवालों के जवाब देने की पूरी कोशिश की. लेकिन ब्रह्मांड से जुड़े उनके सवाल पैने होते चले गए. वो वाक़ई इस विषय पर गंभीर थे.

बहरहाल, सम्मेलन ख़त्म होने के बाद हम दोनों ने टेबल टेनिस खेला. हमारे बीच दो मैच हुए और दोनों ही मैच मैं जीता!

स्टीफ़न पीएचडी करने के लिए कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी गए थे. उस वक़्त तक लोगों को समझ आ चुका था कि हॉकिंग के मस्तिष्क की क्षमता कितनी है.

स्टीफ़न हॉकिंगइमेज कॉपीरइटSTR/GETTY IMAGES

सच कहूं तो पहली बार मुझे लगा था कि स्टीफ़न हॉकिंग सिर्फ़ ज़्यादा सवाल करते हैं. उन्हें उनके जवाबों से कोई लेनादेना नहीं.

लेकिन उनकी पीएचडी की थीसिस पढ़कर सब हैरान रह गए थे. क्योंकि अपनी थीसिस में ब्रह्मांड के विस्तार के बारे में उन्होंने कई बेहद दिलचस्प बातें लिखी थीं.

उन्होंने कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में बतौर प्रोफ़ेसर क़रीब 30 साल काम किया. ब्लैक होल पर उनकी रिसर्च को सबसे ज़्यादा पहचान मिली.

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साइंस की दुनिया के हिसाब के कहूं तो ब्लैक होल के नियमों को स्टीफ़न ने ही स्थापित किया.

स्टीफ़न की सबसे अच्छी बात थी कि वो डायलॉग में विश्वास करते थे. बहस करना उनकी आदत में शामिल नहीं था.

कैम्ब्रिज में उनके साथ मैंने विज्ञान के कई सिद्धांतों पर कई बार चर्चा की. लेकिन कभी हमारे बीच गर्म बहस नहीं हुई. हमने हमेशा एक दूसरे से सीखा ही.

अपनी बीमारी की वजह से बीते कई सालों से स्टीफ़न लेक्चर नहीं दे पा रहे थे. लेकिन लोगों की जिज्ञासाओं और उनके सवालों के जवाब वो कई माध्यमों से देते रहे.

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मुझे याद है जब पहली बार स्टीफ़न ने कहा था कि दुनिया किसी ईश्वर के इशारे पर नहीं चलती. भगवान कुछ नहीं है. और संभावना है कि इस विश्व के अलावा भी कोई दुनिया हो.

लोगों को हमेशा ये उनकी कल्पना ही लगी. स्टीफ़न के पास भी इसे साबित करने के लिए कोई पुख़्ता सबूत नहीं थे. लेकिन उन्होंने मरते दम तक इसे साबित करने की कोशिश की और उनकी इस ललक का सम्मान किया जाना चाहिए.

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खुशी मिलेगी हरिद्वार घूमकर, इन जगहों पर जरूर जाएं

भारत देश की धार्मिक आस्थाओं में हरिद्वार नगर का विशेष महत्व है। महादेव की नगरी हरिद्वार धार्मिक आस्था का केंद्र तो है ही पर्यटकों के बीच भी खासा आकर्षण रखता है। यहां की हरियाली, कलकल बहती गंगा नदी, शांत और मनोहर घाट पर्यटकों को बरबस ही आकर्षित करते हैं। अगर आप भी देव भूमि हरिद्वार जाने का प्लान बना रहे हैं तो आपको इन जगहों पर जरूर जाना चाहिए। आपका मन प्रसन्न हो जाएगा…

हर की पैड़ी हो पहला पड़ाव
हरिद्वार आएं और हर पैड़ी न जाएं तो आपकी यात्रा एकदम अधूरी है। स्टेशन से करीब 2 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है हर की पैड़ी। सबसे पहले यहां जाकर आप पावन-निर्मल गंगा में स्नान करें। आप चाहें तो यहां होनेवाली आरती में भी शामिल हो सकते हैं। आपका दिन बन जाएगा। इसके बाद हरिद्वार स्टेशन से करीब 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है भारत माता मंदिर। यह 8 मंजिला मंदिर है और इसका हर फ्लोर भारत देश की सुंदरता और भारत माता की महानता को समर्पित है।

ये पर्वत हैं माता के निवास स्थान
स्टेशन से करीब 3.5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित पर्वत पर मां मंसा देवी विराजमान हैं। इनके दर्शनों के लिए आप चाहें तो उड़न खटोले से जा सकते हैं। आप अगर पहाड़ों पर चहलकदमी का मज़ा लेना चाहते हैं तो सड़क के रास्ते पैदल भी जा सकते हैं। वहीं, हिमालय की दक्षिण पर्वत माला के नील पर्वत के ऊपर स्थित है चंडी माता मंदिर। इस मंदिर की मुख्य मूर्ति की स्थापना 8वीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य ने की थी। जबकि मंदिर का निर्माण राजा सुचात सिंह ने 1929 में कराया। स्टेशन से इस मंदिर की दूरी करीब 5 किलोमीटर है।

यहां देखें, रात की आरती का मनोहर दृश्य
आप बह्मकुंड पर गंगा आरती के मनोहर दृश्य को देखना बिल्कुल न भूलें। गंगा आरती का दृश्य दिल में उतर जाता है। इस कुंड की हरिद्वार स्टेशन से दूरी 2 किलोमीटर है। साथ ही इंडिया टेंपल में आप भारतीय आस्था और संस्कृति से सुंदर नजारों को दर्शन कर सकते हैं। स्टेशन से इसकी दूरी करीब 6 किलोमीटर है।

मां आनंदमयी आश्रम और दक्ष प्रजापति मंदिर, कनखल
माता सती के पिता राजा दक्ष प्रजापति के नाम पर बना है दक्ष प्रजापति मंदिर। पौराणिक कथाओं के अनुसार, कनखल स्थित यही वह स्थान है जहां राजा दक्ष ने भव्य यज्ञ का आयोजन किया और भगवान भोलेनाथ को नहीं बुलाया। इसी जगह पर माता सती ने कुंड में कूदकर प्राण त्याग दिए थे। हरिद्वार स्टेशन से करीब 5 किलोमीटर दूर स्थित है मां आनंदमयी आश्रम। यहां प्रसिद्ध संत मां आनंदमयी ने समाधि ली थी। यह बहुत सुंदर और शांत जगह है।

ऋषिकेश में सबसे महत्वपूर्ण
ऋषिकेश स्थित त्रिवेणी घाट की सुंदरता आपको मोह लेगी। यह घाट सुकून से कुछ पल बैठने के लिए बेहद प्यारी जगह है। शिव-पार्वती और गंगा के चरणों में बैठकर कुछ देर जरूर रहें। साथ ही ऋषिकेष स्थित नीलकंठ महादेव का मंदिर देवभूमि पर स्थित वह स्थान है, जहां भगवान शिव ने समुद्र मंथन में निकला विष पिया था। हरिद्वार स्टेशन से यहां की दूरी करीब 30 किलोमीटर है।

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प्राचीनतम चिकित्सा पद्धति है मर्म विज्ञान: ऋषिकुल आयुर्वेदिक कॉलेज

ऋषिकुल आयुर्वेदिक कॉलेज के परिसर निदेशक डॉ. सुनील जोशी ने कहा कि मर्म चिकित्सा वेदों पर आधारित प्राचीन भारतीय चिकित्सा पद्धति है जो आयुर्वेद का ही एक अंग है।

वह सोमवार को नंदीपुरम नोरंगाबाद में आयोजित मर्म विज्ञान एवं मर्म चिकित्सा की कार्यशाला को संबोधित कर रहे थे। पांच दिवसीय कार्यशाला में देश विदेश से आए चिकित्सक और जिज्ञासु भारत की प्राचीनतम चिकित्सा पद्धति की जानकारी और प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे है।

उन्होंने कहा कि जिस प्रकार संजीवनी विद्या सूर्य चिकित्सा स्वचिकित्सा, पंचमहाभूत चिकित्सा विलुप्त हो गई है। उसी प्रकार वैदिक चिकित्सा की विद्या मर्म चिकित्सा भी विलुप्त के कगार पर है। 107 मर्म बिंदुओं पर आधारित मर्म चिकित्सा दुष्प्रभाव रहित तुरन्त असर दिखाने वाली चिकित्सा पद्धति है जो सुश्रुत संहिता में निहित है। कार्यशाला के समन्वयक कनाडा से आए ज्ञानप्रकाश ने कार्यशाला में शरीर के ऊपरी भाग के मर्म बिंदुओं की जानकारी देते हुए बताया कि तल हृदय, शप्रि मर्म, मणि बंध, कूपर मर्म, अणि, उर्वी, गुल्फ, इन्द्र बस्ती, जानु मर्म को उत्प्रेरित करने से शरीर की व्याधियों का शमन किया जाता है।

मर्म चिकित्सक मयंक जोशी ने स्व मर्म चिकित्सा की जानकारी दी। कहा कि मनुष्य के शरीर में उसकी व्याधियों का निदान समाहित है। 107 मर्म बिंदुओं को उत्प्रेरित कर शरीर में छिपी हुई ऊर्जा को जाग्रत किया जाता है।