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टोक्यो मोटर शो: गाड़ी जो स्पीड में शेप बदल ले!

जापान में टोक्यो मोटर शो का आयोजन चल रहा है। 45वें एडिशन में कई कॉन्सेप्ट कारें पेश की गई हैं।

जापान की ऑटो पार्ट मेकर टोयोडा गोसेई की ये पेशकश ‘फ्लेश्बी’ केवल एक सीट वाली है। कंपनी का दावा है कि ‘फ्लेश्बी’ ई-रबर की खूबियां लिए हुए है और हाई स्पीड में ड्राइविंग करते वक्त इसकी बॉडी ज़रूरत के मुताबिक़ अपनी शेप बदल सकती है।

तस्वीर में टोयोटा की कॉन्सेप्ट-आई जिसे 25 अक्टूबर को पेश किया गया।

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टोक्यो मोटर शो 5 नवंबर तक चलेगा। ऑटोमोबाइल सेक्टर कंपनियां की दुनिया की बड़ी कंपनियों अपने नए प्रोडक्टश इस इवेंट में पेश करती हैं। तस्वीर में सुज़ुकी मोटर्स की ई-सर्वाइवर।

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यामाहा की ये हाई टेक बाइक ‘मोटरआईडी’ भी टोक्यो मोटर शो का एक ख़ास आकर्षण रहा।

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दिखने में बाइक जैसी लगती है लेकिन इसमें ज्यादा पहिए हैं। टोक्यो मोटर शो में यामाहा की एमडब्लूसी-4।

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टोयोटा मोटर्स ने अपनी इस कॉन्सेप्ट कार को वंडर-कैप्सूल का नाम दिया है।

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AdTo पर अब किसी भी भाषा में ले सकेंगे आनंद: 15 क्षेत्रीय भाषाओँ सहित 103 भाषाओँ में अनुवाद संभव

आदतों पर अब किसी भी भाषा में ले सकेंगे आनंद: 15 क्षेत्रीय भाषाओँ सहित 103 भाषाओँ में अनुवाद संभव हो गया है। गूगल के सहयोग से अब आप किसी भी मनचाही भाषा में वेबसाइट का अनुवाद कर आनंद उठा सकते हैं। साथ ही फेसबुक पेज को भी वेबसाइट से लिंक किया गया है।

विदित हो की अभी तक हमारी वेबसाइट ने किसी भी प्रचार के उपयोग के बिना ही अपना हर कार्य सुचारु रूप से किया है। केवल सबसे पहले ही नहीं वरन सूचनाओं की गुणवत्ता और सत्यता पर हमारा विशेष जोर रहा है। हम आप तक किसी भी ऐसी सुचना या खबर से वंचित नहीं रखना चाहते जिससे आपके जीवन में सकारात्मकता आये और नई ऊर्जा का संचार हो।

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इस घटना ने एडोल्फ हिटलर को बनाया जर्मनी का नाजी तानाशाह

दुनिया को अपनी तानाशाही और क्रूरता से लोगों पर शासन करने वाले एडोल्फ हिटलर को यदि जर्मनी की सोशलिस्ट पार्टी में सदस्यता मिल गई होती तो शायद दूसरा विश्व युद्ध नहीं होता और न ही नाजीवाद का उदय हो पाता. ये दावा अबेरदीन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर थॉमस वेबर ने सोशलिस्ट पार्टी के संस्थापक हैंस जॉर्ज के बयान से जुड़े अप्रकाशित ऐतिहासिक दस्तावेजों के हवाले से किया है. ये दस्तावेज म्यूनिख स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ कंटेम्पररी हिस्ट्री में सुरक्षित रखा गया है.

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, थॉमस वेबर का दावा है कि हिटलर के तानाशाह बनने के पीछे उसे सोशलिस्ट पार्टी में जगह न मिलना सबसे बड़ी वजह है. उन्हें मिले दस्तावजों में इस बात का जिक्र है कि 1919 में जर्मन सोशलिस्ट पार्टी का गठन हुआ था. इससे प्रभावित युवा एडोल्फ पार्टी का हिस्सा बनना चाहता था. इसके लिए वो पार्टी के प्रकाशन गृह में ग्रेसिंगर से मिलने पहुंचा और पार्टी में शामिल होने के साथ ही उसके मुख्यपत्र के लिए लिखने की इच्छा जताई.

ग्रेसिंगर ने एडोल्फ को शामिल करने से यह कहते हुए इनकार कर दिया कि उसके लिए पार्टी या मुख्यपत्र में कोई जगह नहीं है. इसके बाद उन्होंने एडोल्फ को पैसे दिए और वहां से जाने के लिए कह दिया. 1920 में एडोल्फ नाजी पार्टी में शामिल हो गया, जिसका कद सोशलिस्ट पार्टी से काफी छोटा था. लेकिन 1921 में स्थिति बदली और सोशलिस्ट पार्टी को भंग कर दिया गया.

थॉमस की माने तो यदि हिटलर को सोशलिस्ट पार्टी में जगह मिल गई होती तो उसे कोई छोटा पद मिलता और वो इतना बड़ा नेता नहीं बन पाता. नाजी पार्टी से जुड़ने के बाद एक साल तक वो छोटे पद पर ही खुशी से काम करता रहा. 1921 में वो पार्टी में नेता बना, जिसके बाद उसने मुड़कर नहीं देखा.

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व्हाइट हाउस में भूतों की पार्टी, खिड़की में जालों से लटक रही थीं मकड़ियां

व्हाइट हाउस में भूतों की पार्टी

  • व्हाइट हाउस में भूतों की पार्टी, खिड़की में जालों से लटक रही थीं मकड़ियां
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    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने व्हाइट हाउस में पहला हैलोवीन आयोजित किया. हैलोवीन की पूर्व संध्या पर ट्रंप और मेलेनिया ने करीब 6000 बच्चों और वयस्कों के साथ ट्रिक और ट्रीट का गेम खेला.

  • व्हाइट हाउस में भूतों की पार्टी, खिड़की में जालों से लटक रही थीं मकड़ियां
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    इस दौरान डोनाल्ड ट्रंप अपनी ट्रेड मार्क लाल टाई में नजर आए.

  • व्हाइट हाउस में भूतों की पार्टी, खिड़की में जालों से लटक रही थीं मकड़ियां
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    व्हाइट हाउस के साउथ लॉन में हैलोवीन कार्यक्रम आयोजित किया गया.

  • व्हाइट हाउस में भूतों की पार्टी, खिड़की में जालों से लटक रही थीं मकड़ियां
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    इस कार्यक्रम में कोलंबिया, मैरीलैंड और वर्जीनिया जिलों के करीब 20 स्कूलों के बच्चों ने सैनिकों के परिवारों और अन्य लोगों के साथ हिस्सा लिया.

  • व्हाइट हाउस में भूतों की पार्टी, खिड़की में जालों से लटक रही थीं मकड़ियां
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    पूरे लॉन में भूतों वाले गाने बज रहे थे. फॉग मशीनें लगाई गई थीं.

  • व्हाइट हाउस में भूतों की पार्टी, खिड़की में जालों से लटक रही थीं मकड़ियां
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    लॉन के प्रवेश को कद्दू से सजाया गया था, जिसमें सभी पूर्व राष्ट्रपतियों के चेहरे बनाए हुए थे.

  • व्हाइट हाउस में भूतों की पार्टी, खिड़की में जालों से लटक रही थीं मकड़ियां
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    व्हाइट हाउस में चारों ओर जालों सहित काली मकड़ियां लटक रही थीं.

  • व्हाइट हाउस में भूतों की पार्टी, खिड़की में जालों से लटक रही थीं मकड़ियां
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    ट्रंप और उनकी पत्नी मेलेनिया ने हैलोवीन भोज में डायनोसोर सहित तमाम तरह के जानवरों, कंकालों, भूतों, पिशाचों का स्वागत किया.

    • बता दें कि कार्यक्रम में आने वाले सभी लोगों को विशेष उपहार सहित घर में बने बिस्किट और टॉफी-चॉकलेट दिए गए.
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ब्लैकबेरी ने बदली फ़ोन के इस्तेमाल की हर वजह। पेश है डॉक्टर फोन

Based on the idea of a mood ring, this futuristic cellphone integrates a keypad that changes color according to the emotional state, sensed from messages and phone calls, as the biometric ring transmits the body signals of wearer and sends data to the main device for interpretation. The goal  is to create empathy for one another and strengthen relationships.

Designer Daniel Yoon

As Daniel describes the interface:

It is of course touch based and all the user’s connections are shown graphically so you can see who is connected to whom. Each contact has an avatar that is encompassed by two colored rings. The inner colored ring shows the contact’s previous emotional state, and the outer ring represents the contact’s current emotional state. It is important to show the shift in emotions in order to see how an event has affected that contact.

Another important feature that we felt was important was the “Emotional Health Chart”. This chart would monitor the user’s emotional health through an indefinite period of time. One would be able to see how a certain event, or phone call/ message has affected the user. Obviously, if the chart shows someone is always upset, there would be a problem… If permitted, a user would be able to view other user’s charts as well.


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फिटकरी के फायदे जानकर आप दंग रह जायेंगे

हम बात करने वाले है कि फिटकरी हमारे जीवन में कैसे उपयोगी साबित हो सकती है.दोस्तों हर घर में फिटकरी जरूर रखना चाहिए. आपको बता दें फिटकरी केवल पानी ही साफ करने के काम ही नहीं आती बल्कि इसके कई हेल्थ बेनिफिट्स भी हैं. यह न केवल चोट, कटने-छिलने से हुई ब्लीडिंग रोकने में सहायक होती है बल्कि स्किन डिजीज, झुर्रियां दूर करने, खांसी, पाइल्स जैसी कई प्रॉब्लम्स में फायदेमंद होती है. फिटकरी में मैग्नीशियम सल्फेट होता है जो हमारे शरीर को हेल्दी बनता है.तो आइये जान लेते है इसके 5 बेस्ट फायदों के बारे में.

 

फिटकरी के 5 बेस्ट फायदे-

  1. फिटकरी के पाउडर को एक चम्मच ले और एक गिलास पानी में घोल लें.इसे पीने से यूरिन की जलन ठीक होती है.
  2. फिटकरी के पानी से बाल धोने से बालों की गंदगी और डैंड्रफ साफ हो जाते हैं. जुओं से भी छुटकारा मिलता है.
  3. आग में भूनी हुई फिटकरी को मिश्री के साथ लेने से अस्थमा के मरीजों को फायदा होता है.
  4. अगर हल्का बुखार है तो एक चम्मच भुनी हुई फिटकरी में दो चुटकी शक्कर मिलाकर देने से बुखार में आराम मिलता है.
  5. सांस की बदबू और दांतों में दर्द होने पर फिटकरी के पानी से गरारा करने से फायदा होता है.

नोट : दोस्तों हमारी पोस्ट पसंद आई हो तो पोस्ट को लाइक करें और अपने दोस्तों के साथ शेयर जरुर करे.

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हिजबुल के सरगना सैयद सलाहुद्दीन के बेटे को NIA ने टेरर फंडिंग केस में अरेस्ट किया

कश्मीर में कई आतंकी घटनाओं के लिए जिम्मेदार हिजबुल मुजाहिदीन के चीफ सैयद सलाहुद्दीन के बेटे सैयद शाहिद यूसुफ को नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (NIA) ने मंगलवार को अरेस्ट कर लिया। यूसुफ की गिरफ्तारी 2011 के टेरर फंडिंग केस में हुई है। यूसुफ जम्मू-कश्मीर सरकार के एग्रीकल्चर डिपार्टमेंट में काम करता है। उसे पहले हिरासत में लिया गया था। इसके अलावा, NIA आतंकी गतिविधियों के लिए हवाला चैनल के जरिए टेरर फंडिंग से जुड़े दूसरे कई मामलों की जांच कर रही है। जांच एजेंसी ने अब तक इन केस में करीब 7 से ज्यादा अलगाववादी नेताओं को अरेस्ट किया है।
क्या आरोप हैं सैयद शाहिद यूसुफ पर…
– सलाहुद्दीन के आदेश पर सीरिया में मौजूद गुलाम मोहम्मद बट नाम के संदिग्ध ने यूसुफ को कुछ पैसे भेजे थे। यह पैसा 2011 से 2014 के बीच भेजा गया। यह पैसा कश्मीर घाटी में आतंकी गतिविधियों में इस्तेमाल हुआ था।
– एनआईए के एक अफसर ने न्यूज एजेंसी को बताया- “इस बात के भी सबूत हैं कि सऊदी अरब से भी पैसे भेजे गए। हमारे पास पैसा ट्रांसफर किए जाने के डॉक्यूमेंट्स और कॉल रिकॉर्ड भी हैं। इन पुख्ता सबूतों के आधार पर ही हमने युसूफ को अरेस्ट करने का फैसला लिया।”

कौन-कौन है सलाहुद्दीन के परिवार में ?

– सैयद सलाहुद्दीन के 4 बेटे और 2 बेटियां हैं। 4 बेटे और एक बेटी सरकारी नौकरी में हैं। फरवरी में पम्पोर में हुए लश्कर के एक आतंकी हमले में सेना ने सलाउद्दीन के 31 साल के बेटे सैयद मुईद को भी बचाया था।
– सलाहुद्दीन का बेटा वाहिद यूसुफ शेर-ए-कश्मीर हॉस्पिटल में डॉक्टर है। दूसरा भाई शकील अहमद मेडिकल असिस्टेंट है। जावेद यूसुफ एजुकेशन ऑफिस में कम्प्यूटर ऑपरेटर है। शाहिद यूसुफ एग्रीकल्चर डिपार्टमेंट में है।
– आतंकी सरगना की एक बेटी सरकारी टीचर है। दूसरी बेटी आर्ट की टीचर है। 71 साल का सलाउद्दीन पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में रहता है। हिजबुल के अलावा वह यूनाइटेड जिहाद काउंसिल भी चलाता है। पठानकोट एयरबेस स्टेशन पर हमले की जिम्मेदारी यूनाइडेट जिहाद काउंसिल ने ली थी।

कश्मीर में इलेक्शन लड़ चुका है सैयद सलाहुद्दीन

– सलाहुद्दीन ने यूनिवर्सिटी ऑफ कश्मीर से पॉलिटकल साइंस की पढ़ाई की और इसी दौरान वो जमीयत-ए-इस्लामी के संपर्क में आया। यूनिवर्सिटी में रहने के दौरान ही सलाहुद्दीन ने पाकिस्तान के सपोर्ट की बात शुरू कर दी। पढ़ाई पूरी करने के बाद वो मदरसे में टीचर बन गया। सलाहुद्दीन ने 1987 में श्रीनगर की अमीराकदाल विधानसभा सीट से चुनाव भी लड़ा, लेकिन हार गया। 1989 में अपनी गिरफ्तारी और रिहाई के दौरान हुई हिंसा और प्रदर्शनों के बाद उसने हिजबुल मुजाहिद्दीन ज्वाइन किया।

टेरर फंडिंग में एनआईए ने कार्रवाई कब से शुरू की?

– एक न्यूज चैनल ने 16 मई को एक स्टिंग ऑपरेशन ब्रॉडकास्ट किया था। जिसमें कश्मीर के अलगाववादियों को पाकिस्तान के आतंकी गुटों से पैसे मिलने की बात का खुलासा हुआ था। इसके बाद 19 मई को एनआईए ने इन अलगाववादी नेताओं के खिलाफ मामला दर्ज किया था और प्रिलिमिनरी इन्क्वायरी शुरू की थी। हुर्रियत नेता नईम खान को स्टिंग ऑपरेशन में लश्कर से पैसे लेने की बात कबूल करते दिखाया गया था। खान रिपोर्टर से यह कहते नजर आए थे कि पाकिस्तान से आने वाला पैसा सैकड़ों करोड़ से ज्यादा है, लेकिन हम और ज्यादा की उम्मीद करते हैं। हालांकि बाद में खान ने स्टिंग को फर्जी करार दिया था।
– एनआईए की तरफ से कार्रवाई शुरू होने के बाद हुर्रियत कॉन्फ्रेंस ने नईम खान को सस्पेंड कर दिया था।

क्या हैं आरोप?

– अलगाववादी नेताओं पर आरोप है कि इन्हें कश्मीर में सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने, स्कूलों और अन्य सरकारी इमारतों को नुकसान पहुंचाने के लिए लश्कर चीफ हाफिज सईद से पैसा मिलता है। घाटी में सिक्युरिटी फोर्सेस पर पत्थर बरसाने के लिए हुर्रियत नेताओं को पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठनों और पाक खुफिया एजेंसी ISI दोनों से फंडिंग होती है।

एनआईए ने कब-कब छापे डाले

– एनआईए ने इस मामले में सबसे पहले 3 जून को देश में 24 जगहों पर छापे मारे थे। कश्मीर में 14, दिल्ली में 8 और हरियाणा के सोनीपत में 2 जगहों पर छापे मारे गए थे। इस दौरान अलगाववादी नेताओं के घरों, ऑफिस और उनके कमर्शियल ठिकानों पर कार्रवाई की गई। दिल्ली में 8 हवाला डीलर्स और ट्रेडर्स के खिलाफ भी कार्रवाई की गई थी।
– इसके बाद सितंबर में कश्मीर और दिल्ली में 16 ठिकानों पर NIA ने छापे मारे।

कश्मीर में अब तक कितने लोग अरेस्ट

– बिट्टा कराटे, नईम खान, अल्ताफ अहमद शाह (अल्ताफ फंटूश), अयाज अकबर, टी. सैफुल्लाह, मेराज कलवल और शहीद-उल-इस्लाम शामिल हैं। अल्ताफ हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के प्रमुख सैयद अली शाह गिलानी का दामाद है।
– अब सैयद शाहिद यूसुफ को अरेस्ट किया गया है।
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लखनऊ-आगरा एक्सप्रेस-वे बना Battlefield, जमीन से लेकर आसमान तक हुई भयंकर गर्जन

आगरा एक्सप्रेस-वे आज कुछ देर के लिए रणक्षेत्र में तब्दील हो गया जहां वायु सेना के लड़ाकू विमानों के बेड़े की रीढ़ माने जाने वाले प्रमुख विमानों और विशालकाय हरक्यूलिस विमान ने अपने जौहर तथा हैरतअंगेज कौशल का नमूना पेश करते हुए देशवासियों को आश्वस्त किया कि वे युद्ध तथा शांति के समय में किसी भी तरह की आपात स्थिति से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। वायुसेना के जगुआर, मिराज और सुखोई जैसे लड़ाकू विमानों तथा विशाल मालवाहक विमान सी-130 ने लखनऊ-आगरा एक्सप्रेस-वे पर उन्नाव के बांगरमऊ के पास तीन किलोमीटर हिस्से का हवाई पट्टी के तौर पर इस्तेमाल करते हुए इस पर ‘लैंडिंग तथा टेक ऑफ’ कर वायु सेना की तैयारियों का नमूना पेश किया।

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15 लड़ाकू विमानों ने दिखाए करतब
उत्तर प्रदेश सरकार और वायु सेना के इस संयुक्त अभियान के तहत 15 लड़ाकू विमानों तथा एक हरक्यूलिस विमान ने अपने करतब दिखाए जिससे एक्सप्रेस-वे का यह हिस्सा जमीन से लेकर आसमान तक थर्रा उठा। एक्सप्रेस-वे के 3.3 किमी़ लंबे तथा 33 मीटर चौड़े हिस्से को खासतौर पर तैयार किया गया था। विशाल हरक्यूलिस विमान सी-130 ने अभियान की शुरुआत करते हुए वायु सेना के जांबाज दस्ते गरूड़ के कमांडो तथा उनके वाहनों को एक्सप्रेस-वे पर उतारा। कमांडो ने पलक झपकते ही दुश्मन के खिलाफ एक्सप्रेस-वे के दोनों ओर अपने मोर्चे संभाल लिए और स्थिति को काबू में करते हुए घेराबंदी कर ली।

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मिराज ने दिखाई बाज जैसी फुर्ती
रक्षा-एक्सप्रेस-वे लड़ाकू विमान दो अंतिम उन्नाव इसके बाद वायु सेना के 15 घातक लड़ाकू विमानों ने एक्सप्रेस वे पर आपात स्थिति में उतरने तथा उड़ान भरने के असाधारण कौशल का प्रदर्शन किया। सबसे पहले छह मिराज लड़ाकू विमानों ने बाज जैसी फुर्ती के साथ लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए एक्सप्रेस-वे को छुआ और पलक झपकते ही उड़ान भर हैरतअंगेज कारनामा किया। इसके बाद तीन-तीन के समूह में छह सुखोई विमानों और तीन जगुआर विमानों ने इस रोंगटे खड़े कर देने वाले करतब का अछ्वुत नजारा पेश किया। विमानों ने हवा में मार करने वाले अंदाज में आक्रामक रूख अपनाते हुए जमीन से लेकर आसमान तक भयंकर गर्जन किया।

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हरक्यूलिस-हिंडन ने भरी उड़ान
वायु सेना के हरक्यूलिस विमान ने हिंडन एयरबेस गाजियाबाद, मिराज ने ग्वालियर, जगुआर ने गोरखपुर और सुखोई ने बरेली एयरबेस से उड़ान भरी। अभियान में हिस्सा लेने वाले गरुड़ कमांडो वायुसेना के आगरा एयरबेस से आए थे। यह समूचा अभियान वायुसेना की मध्य कमान की देखरेख में हुआ और इसका नेतृत्व एयर मार्शल ए़ एस़ बुटौला ने किया। एयर मार्शल बुटौला ने कहा कि इस अभ्यास का मुख्य उद्देश्य वायुसेना की क्षमता और रणकौशल को बढाना है। उन्होंने कहा कि एक्सप्रेस-वे के एक हिस्से को हवाई पट्टी के रुप में विकसित करना बहुत अच्छी पहल है। इससे वायुसेना को कम लागत में सामरिक महत्व की जगहों पर सस्ती और टिकाऊ हवाई पट्टी मिलती हैं। जिनका युद्ध और शांति के समय किसी भी आपात स्थिति में इस्तेमाल किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि सरकार की भविष्य में अन्य एक्सप्रेस-वे पर भी इस तरह की हवाई पट्टियां बनाने की योजना है और इसे केवल युद्ध की दृष्टि से देखा जाना सही नहीं है। इस अभ्यास को एक साथ दो मोर्चों पर लड़ाई की आशंका के मद्देनजर किसी भी आकस्मिक स्थिति से निपटने की वायु सेना की तैयारियों के रूप में भी देखा जा रहा है। साथ ही इसका उद्देश्य मानवीय सहायता या आपदा राहत जैसी स्थितियों में वायु सेना की तैयारियों को कसौटी पर परखने का भी है।

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आपात लैडिंग के लिए 12 राजमार्गों पर मिली मंजूरी
सरकार ने विभिन्न आपात परिस्थितियों से निपटने की रणनीति के तहत लगभग 12 राजमार्गों में वायुसेना के विमानों की लैंडिंग के लिए मंजूरी दी थी लेकिन अभी तक केवल दो में इसका परीक्षण किया गया है। गौरतलब है कि पाकिस्तान, चीन और स्विटजरलैंड जैसे देश युद्ध और आपात स्थितियों में हवाई आपरेशन सुनिश्चित करने के लिए इस तरह के अभ्यास करते रहे हैं। सबसे पहले यह अभ्यास मिराज-2000 लड़ाकू विमान ने मई 2015 में यमुना एक्सप्रेस-वे पर किया। इसके बाद नवंबर 2016 में सुखोई और मिराज विमानों ने लखनऊ आगरा एक्सप्रेस-वे पर इस कारनामे को दोबारा अंजाम देकर देशवासियों को आश्वस्त किया कि वायु सेना किसी भी तरह की आपात स्थिति से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार है। इस अभ्यास के लिए एक्सप्रेस-वे के इस हिस्से को विशेष रूप से तैयार किया गया था और एक्सप्रेस को दो दिन पहले वाहनों के लिए बंद कर दिया गया था।

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शराब पीने के बाद लोग अंग्रेज़ी क्यों बोलते हैं?

गैर-अंग्रेजीभाषियों के साथ आपने अक्सर ऐसा महसूस किया होगा?

अगर आप किसी दूसरी भाषा में बोलने की कोशिश करते हैं तो कई बार आपके साथ ऐसा हुआ होगा. सही शब्द आपको मुश्किल से मिलेंगे और उनका ठीक से उच्चारण करना भी चुनौती जैसा लगेगा.

लेकिन अगर आप थोड़ी सी शराब पी लें तो उस दूसरी भाषा के शब्द अपने आप मुंह से धारा प्रवाह निकलेंगे. लफ्जों की तलाश खत्म हो जाएगी और आपकी बातें लच्छेदार लगने लगेंगी. मानो ये जुबान आपकी अपनी हो.

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सामाजिक व्यवहार

ये शराब को लेकर कोई अंदाज़े की बात नहीं है. बल्कि इसे लेकर एक अध्ययन आया है. साइंस मैगज़ीन ‘जर्नल ऑफ़ साइकोफ़ार्माकोलॉजी’ में छपे एक अध्ययन के मुताबिक थोड़ी सी शराब किसी दूसरी भाषा में बोलने में मदद करती है.

ये भी सही है कि शराब हमारी याददाश्त और ध्यान केंद्रित करने की क्षमता पर असर डालती है और इस लिहाज से ये एक बाधा है. लेकिन दूसरी तरफ ये हमारी हिचकिचाहट भी दूर करती है, हमारा आत्म-विश्वास बढ़ाती है और सामाजिक व्यवहार में संकोच कम करती है.

जब हम किसी दूसरे शख्स से मिलते हैं और बात करते हैं तो इन सब बातों का असर हमारी भाषाई क्षमता पर पड़ता है. इस विचार अब तक बिना किसी वैज्ञानिक आधार के ही स्वीकार किया जाता था.

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थोड़ा एल्कोहल

लेकिन यूनिवर्सिटी ऑफ लीवरपूल, ब्रिटेन के किंग्स कॉलेज और नीदरलैंड्स के यूनिवर्सिटी ऑफ़ मास्ट्रिच के शोधकर्ताओं ने इस विचार को टेस्ट किया. टेस्ट के लिए 50 जर्मन लोगों के एक समूह को चुना गया जिन्होंने हाल ही में डच भाषा सीखी थी.

कुछ लोगों को पीने के लिए ड्रिंक दिया गया जिनमें थोड़ा एल्कोहल था. लोगों के वजन के अनुपात में एल्कोहल की मात्रा दी गई थी. कुछ के ड्रिंक्स में एल्कोहल नहीं था. टेस्ट में भाग लेने वाले जर्मन लोगों को नीदरलैंड्स के लोगों से डच में बात करने के लिए कहा गया.

डच भाषियों को ये पता नहीं था कि किसने शराब पी रखी है और किसने नहीं. जांच में ये बात सामने आई कि जिन्होंने शराब पी रखी थी वे बेहतर उच्चारण के साथ बात कर रहे थे. शोधकर्ताओं ने ये साफ किया कि उन्हें ये नतीजे शराब की बहुत कम मात्रा में खुराक देने से मिले हैं.

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अंतरिक्ष की जंग: जिसे शुरू रूस ने किया और अंजाम अमेरिका ने

रहस्य से आश्चर्य पैदा होता है. इंसान के अंदर जो समझने की ललक पैदा होती है, उसे पैदा करने वाला ये आश्चर्य ही है.

                                                                                      – नील आर्मस्ट्रॉन्ग (चांद पर कदम रखने के बाद)


 

जो पंछी हर साल एक मौसम के बाद गायब हो जाते हैं, वो दरअसल चांद चले जाते हैं. फिर वहां से लौटकर धरती वापस आते हैं.

                                                                                       – चार्ल्स मॉर्टन, ब्रिटिश वैज्ञानिक, 17वीं सदी

चांद सदियों तक लोगों के लिए पहेली बना रहा. किसी को उसमें अपनी माशूका का चेहरा नजर आता. कभी चरखा कातती बुढ़िया. किसी को लगता, वहां परियां रहती हैं. किसी को कलंक नजर आता. कभी उसकी पूजा हुई. कभी उससे डर लगा. लोग तरह-तरह की बातें करते चांद के बारे में. चार्ल्स मॉर्टन की भी अपनी थिअरी थी. उनको लगता है, माइगेट्री पंछी चांद चले जाते हैं. तभी साल के बाकी महीने नहीं दिखते. इन सबका दिल टूट गया. उस दिन जब नील आर्मस्ट्रॉन्ग नाम का एक शख्स चांद पर उतरा. उसने बताया, चांद तो उजाड़ है. चांद के इस सफर की शुरुआत हुई थी 4 अक्टूबर, 1957 को. बस चांद की ही क्यों? हम जो किसी दिन सूरज पर जा पहुंचे, उसकी शुरुआत भी इसी दिन में छुपी हुई है.


 

चाहे चांद पर इंसान के पहुंचने की कहानी हो, या मंगल का मिशन, या फिर भविष्य की तमाम योजनाएं और सफलताएं, उन सबकी शुरुआत इसी 4 अक्टूबर की तारीख में छुपी है.

60 साल पहले शुरू हुआ था ये सफर, जो अब सूरज पहुंचने की तैयारी में है
4 अक्टूबर, 1957, 60 साल, इस दिन सोवियत संघ ने पहला कृत्रिम उपग्रह छोड़ा था, अंतरिक्ष में. सैटेलाइट का नाम था स्पूतनिक. रूसी भाषा में यात्री के लिए ये ही शब्द है. इंसानों के हाथों बनी पहली ऐसी कृत्रिम चीज, जिसे पृथ्वी की कक्षा में स्थापित किया गया था. इस तारीख ने यूं ही नहीं इतिहास बनाया. स्पूतनिक की लॉन्चिंग के साथ ही एक स्पेस ऐज शुरू हुआ. अंतरिक्ष युग. अमेरिका और सोवियत के बीच. स्पूतनिक की लॉन्चिंग की खबर सुनकर दुनिया भौंचक्की रह गई. अमेरिका को तो झटका लग गया. दोनों के बीच एक जंग जमीन पर चल रही थी. स्पूतनिक के बाद ये जंग अंतरिक्ष में पहुंच गई. होड़ लग गई दोनों में. आगे निकलने की. आज NASA का नाम कितनी मुहब्बत से लेते हैं हम. ये NASA भी इसी स्पेज ऐज की पैदाइश है. अमेरिका की महत्वाकांक्षी औलाद. बड़ी उम्मीदों से पैदा किया गया था इसे. NASA ने भी उम्मीदों को साबित किया. बड़ी लायक औलाद निकला.

पश्चिमी जर्मनी की एक बच्ची बर्लिन वॉल को तोड़ने की कोशिश करती हुई. दूसरे विश्व युद्ध के बाद सोवियत और अमेरिका में जो कोल्ड वॉर शुरू हुआ, वो सोवियत के बिखरने पर ही खत्म हुआ.

सोवियत और अमेरिका, दोनों एक-दूसरे से ऑब्सेस्ड थे
दूसरा विश्व युद्ध खत्म हो गया था. धरती पर दो छोर हैं. उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव. अमेरिका और सोवियत भी ऐसे ही हो गए थे. पूंजीवादी अमेरिका. वामपंथी सोवियत. विचारधारा का अंतर तो था ही. एक-दूसरे से आगे निकलने की गलाकाट होड़ भी थी. ये वो दौर था, जब लगता था दुनिया में बस दो देश हैं. मेन हीरो. बाकी सारे देश सपोर्टिंग भूमिका में थे. जिंदगी का कोई ऐसा हिस्सा नहीं बाकी रहा, जहां सोवियत और अमेरिका में होड़ नहीं थी. हथियार की होड़. परमाणु शक्ति की होड़. सेना की होड़. कारोबार की होड़. अर्थव्यवस्था की होड़. जासूसी की होड़. कोवर्ट ऑपरेशन की होड़. धमकियों की होड़. अपना दबदबा बढ़ाने की होड़. अपने-अपनी विचारधारा को बेहतर साबित करने की होड़. दोनों पक्ष खुद को सवा शेर साबित करना चाहते थे.

स्पेस एजेंसी नासा उसी धक्कामुक्की के दौर की निशानी है. इसपर अमेरिका को रेस में आगे ले जाने की जिम्मेदारी थी.

फिर आया स्पूतनिक, इस सरप्राइज से बौखला गया अमेरिका
स्पूतनिक की लॉन्चिंग सरप्राइज जैसी थी. 18,000 मील प्रति घंटे की रफ्तार थी इसकी. दूरबीन लगाकर देखने से दिखता था. सूरज उगने से पहले और सूरज डूबने के बाद. ये सैटेलाइट धरती पर रेडियो सिग्नल भेजता था. इतने मजबूत सिग्नल कि नए सीखे रेडियो ऑपरेटर भी कैच कर लेते थे. अमेरिका में जिनके पास ऐसे उपकरण थे, वो बड़े दंग थे. ये सैटेलाइट एक घंटे और 36 मिनट में धरती की एक बार परिक्रमा करता. अमेरिका भी तो इसी धरती पर है. सोवियत का ये सैटेलाइट रोजाना कई बार अमेरिका के ऊपर से भी गुजरता. बुरी तरह से कुढ़ गई थी अमेरिकी सरकार. सोवियत उनसे पहले अंतरिक्ष में जो पहुंच गया था. स्पूतनिक का काम तय था. इसके माध्यम से धरती और सौर मंडल पर अध्ययन किया जा रहा था. शक अजीब मर्ज है लेकिन. अमेरिकियों को लगता था कि सोवियत की साजिश है ये. सैटेलाइट के बहाने कुछ तो साजिश रची जा रही है.

स्पूतनिक औचक से आया. किसी ने उम्मीद नहीं की थी कि सोवियत इतनी जल्दी और यकायक इतना आगे बढ़ जाएगा. 4 अक्टूबर, 1957 की ये तारीख ऐतिहासिक थी.

पहली दौड़ तो बेशक सोवियत ने ही जीती थी
अमेरिका ने जिस पहले उपग्रह की योजना बनाई थी, उससे करीब 10 गुना बड़ा था स्पूतनिक. उसे भी 1958 में लॉन्च होना था. सोवियत की जीत तो हुई थी. उसने खबर तक नहीं लगने दी अपने इरादों की. चुपचाप काम करता रहा. सोवियत की इस तकनीकी श्रेष्ठता से अमेरिकी सरकार, सेना और वैज्ञानिकों की बहुत किरकिरी हुई. इसे दिल पर ले लिया उन्होंने. कसम खाई, सोवियत से पहले चांद पर पहुंचेंगे. सेना, सरकार और वैज्ञानिकों ने मिलकर सोवियत को हराने की रेस शुरू की. इसके साथ ही आगाज हुआ अंतरिक्ष की इस दौड़ का.

लाइका. ये ही कुत्ता था, जिसे स्पूतनिक 2 पर अंतरिक्ष में भेजा गया था.

दूसरी रेस भी सोवियत ने ही जीती
3 नवंबर, 1957. सोवियत ने अपना दूसरा उपग्रह छोड़ा. स्पूतनिक 2. बैक-टू-बैक. एक महीने से भी कम समय में दो सैटेलाइट. ये कोई साधारण उपग्रह नहीं था. सोवियत ने इसके साथ एक कुत्ते को भी भेजा था. मैं जब कभी इसके बारे में पढ़ती हूं, मन मसोस जाता है. लाइका नाम था उस कुत्ते का. उसे वन-वे सफर पर भेजा गया था. मालूम था, जिंदा नहीं लौटेगा. लाइका पहला जीव था, जिसने अंतरिक्ष से पृथ्वी की परिक्रमा की. कहते हैं, लाइका को कोई तकलीफ नहीं हुई होगी मरते समय. जो भी हो. मिशन पर भेजे जाने की अनुमति तो किसी ने नहीं ली होगी उससे.

जब स्पूतनिक 2 लाइका को लेकर अंतरिक्ष गया, तो दुनिया में जैसे तहलका मच गया. पहला मौका था जब किसी जीव ने स्पेसक्राफ्ट में धरती की परिक्रमा की. अखबार में छपी ये खबर उसी मौके की है.

1958 में अमेरिका ने छोड़ा अपना पहला उपग्रह
31 जनवरी, 1958. वो तारीख जब अमेरिका ने अपना पहला सैटेलाइट छोड़ा. एक्सप्लोरर. जब तक अमेरिका ने अपना पहला कदम रखा, सोवियत आगे बढ़ गया था. ये जख्म पर मिर्च छिड़कने जैसी स्थिति थी.

बचपन में पढ़ा है कई बार. अंतरिक्ष में जाने वाले पहले शख्स का नाम यूरी गागरिन था. चांद पर कदम रखने वाले पहले शख्स का नाम नील आर्मस्ट्रॉन्ग था. इन दोनों के बीच का जो फासला था, वो स्पेस रेस का चरम है.

पहली-पहली बार करने के कई रेकॉर्ड तो सोवियत के ही नाम हैं
सोवियत का सिक्का जम गया था. उसे जैसे जुनून सवार था. पहली-पहली बार हासिल करने का. ऐसी कई उपलब्धियां सोवियत के नाम हैं. जिन्हें बचपन से ही हम सब सामान्य ज्ञान की किताबों में रटते आ रहे हैं.

अंतरिक्ष में जाने वाला पहला इंसान: यूरी गागरिन (रूस)
अंतरिक्ष में जाने वाली पहली महिला: वेलेंतिका तेरेशकोवा (रूस)
अंतरिक्ष में पहली बार चलने वाला शख्स: ऐलेक्सी लियोनोव (रूस)
चांद पर जाने वाला पहला अंतरिक्षयान: लूना 2
शुक्र की सतह पर भेजा गया पहला स्पेसक्राफ्ट:वेनेरा 3

इंसान भले ही अब अंतरिक्ष में काफी आगे निकल गया हो, लेकिन चांद पर पहला कदम रखने का अनुभव सबसे यादगार रहेगा.

फिर आया अमेरिका का दौर, सौ सोनार की और एक लोहार की
1960 के आखिरी सालों में अमेरिका ने बड़ा कदम बढ़ाया. राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी ने कहा था. दशक खत्म होने से पहले इंसान को चांद पर उतारेंगे. 1962 में जॉन ग्लेन पहले ऐसे अमेरिकी व्यक्ति बने, जिन्होंने स्पेसक्राफ्ट में धरती की परिक्रमा की. फिर आया NASA का ऐतिहासिक अपोलो मिशन. 1961 से 1964 के बीच अमेरिकी सरकार ने NASA का बजट करीब 500 फीसद बढ़ा दिया. चांद के मिशन के लिए NASA में करीब 34,000 कर्मचारी काम कर रहे थे. कॉन्ट्रैक्ट पर करीब पौने चार लाख लोग भी काम में लगाए गए थे. 1967 में अपोलो मिशन को झटका लगा. तीन अंतरिक्षयात्री मारे गए. सोवियत का लूनर मिशन उतना तेज नहीं था. सोवियत में इसे लेकर बहस थी. इसकी जरूरत है या नहीं, इसे लेकर. फिर सोवियत स्पेस प्रोग्राम के मुख्य इंजीनियर सेरेगी कोरोलोव की असमय मौत होने से भी सोवियत को धक्का लगा.

न वेकल सोवियत और अमेरिका की सरकारें, बल्कि दोनों देशों के लोग और मीडिया भी इस जंग का हिस्सा बन चुके थे. दोनों को एक-दूसरे से पिछड़ना किसी भी सूरत में मंजूर नहीं था.

ऐतिहासिक था वो दौर, पहली बार चांद पर उतरा था इंसान
दिसबंर 1968. इंसानों को लेकर पहला स्पेसक्राफ्ट चांद के लिए रवाना हुआ. इसे चांद की परिक्रमा करनी थी. 16 जुलाई, 1969. अपोलो 11 मिशन की रवानगी हुई. इसमें थे नील आर्मस्ट्रॉन्ग, ऐडविन अल्ड्रिन और माइकल कोलिन्स. 20 जुलाई को ये अंतरिक्षयान चांद की सतह पर पहुंचा. नील आर्मस्ट्रॉन्ग चांद की सतह पर कदम रखने वाले पहले इंसान बने. ये इतिहास था. सदियों से हम इंसान चांद को सिर उठाकर देखते आए थे. जाने कैसी-कैसी कल्पना करते थे. कविताओं में, कहानियों में, जाने कितने तरह की उपमाएं जोड़ते थे चांद के नाम पर. उसी चांद पर इंसानों ने कदम रखा. जब भी इंसानों की सबसे बड़ी उपलब्धियों की बात होगी, इस तारीख का जिक्र किया जाएगा. नील आर्मस्ट्रॉन्ग की वो तस्वीर पूरी इंसानी सभ्यता के सबसे यादगार पलों में से एक है.

सोवियत ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया, लेकिन चांद पर उतरने की उसकी कोशिशें लगातार नाकाम होती गईं.

चांद पर क्या पहुंचा अमेरिका, लगा दौड़ खत्म हो गई
स्पूतनिक के साथ दौड़ शुरू हुई. अपोलो ने इसे अंजाम पर पहुंचाया. वो कहते हैं ना, तुमने शुरू किया है लेकिन खत्म मैं करूंगा. वैसे ही. सोवियत में रेस में बने रहने की पुरजोर कोशिश की. 1969 से 1972 के बीच चार बार कोशिश की. चांद की सतह पर स्पेसक्राफ्ट लैंड करने की. हर बार नाकामयाबी हाथ लगी. जुलाई 1969 में लॉन्चिंग के वक्त जोरदार धमाका हुआ. सोवियत ने बहुत हाथ-पैर मारे आगे आने के लिए. कामयाब नहीं हो सका पर. एक बार जो पिछड़ा, तो पिछड़ ही गया. ऐस्ट्रोनॉट्स हीरो बन गए. लोग उन जैसा बनना चाहते थे. अमेरिकी जनता और अमेरिकी मीडिया शुरू से ही लगातार इस पूरी स्पेस रेस में बेहद दिलचस्पी ले रही थी. सरकार पर दबाव बना रही थी. सोवियत की हर उपलब्धि पर वहां सवाल होते थे. सरकार को जवाब देना पड़ता था. जमीन पर सोवियत और अमेरिका की तल्खियां चरम पर थीं. अंतरिक्ष में भी कुछ राहत नहीं थी. इन दोनों देशों ने हर मोर्चे पर जमकर दुश्मनी निभाई. दोनों एक-दूसरे से ऑब्सेस्ड थे. ये प्रतिस्पर्धा नहीं थी. ये दुश्मनी थी. दांत काटे की दुश्मनी.

बाईं ओर हैं अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज एच डब्ल्यु बुश और दाहिनी ओर सोवियत संघ के राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाचेव. ये तस्वीर 1991 में ली गई. मॉस्को में हाथ मिलाते हुए दोनों नेताओं की ये तस्वीर शीत युद्ध की सबसे प्रभावी तस्वीरों में से एक है.

हाथ मिलाया और रेस खत्म
साल 1975. अमेरिका और सोवियत का जॉइंट मिशन. अपोलो-सोयुज मिशन. अपोलो का स्पेसक्राफ्ट. सोवियत में बना सोयुज. दोनों यानों के अधिकारियों ने एक-दूसरे का अभिवादन किया. हाथ मिलाया. धरती की दुश्मनी को अंतरिक्ष में तिलांजलि दी गई. धरती पर दुश्मनी खत्म नहीं हुई थी. बराबर निभाई जा रही थी. उसे खत्म होने में वक्त लगा. बर्लिन की दीवार टूटी. सोवियत संघ टूटा. शीत युद्ध खत्म हुआ. स्पेस रेस में लोग अक्सर सोवियत को हारा हुआ खिलाड़ी बताते हैं. ऐसा नहीं है. कई अहम उपलब्धियां सोवियत के नाम हैं. पहली-पहली बार कई चीजें तो उसने ही की. शायद सोवियत को पीछे छोड़ने की ललक ही थी, जिसने अमेरिका को इतनी तेजी से पैर पसारने को मजबूर किया. बिना सोवियत के शायद ये सब मुमकिन नहीं हो पाता. सोवियत और अमेरिका की इस धक्कामुक्की में दुनिया को बहुत फायदा हुआ. अंतरिक्ष विज्ञान में इतनी तरक्की की इंसानों ने. देखा जाए, तो फायदा पूरी दुनिया का हुआ.

(सौजन्य: लल्लनटोप)