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इस खेती ने बदल दी लाखों की जिंदगी! अनेक हाथों को रोजी-रोटी मुहैया करा रहा मशरूम

मशरूम उत्पादन को कृषि और उद्योग दोनों ही क्षेत्रों में महत्व दिया गया है। भारतीय मशरूम उद्योग फिलहाल आकारा ले रहा है। बड़े अंतरराष्ट्रीय बाजार में वह अपना स्थान बनाने के संघर्षपूर्ण दौर में है। धीरे-धीरे सफलता भी मिल रही है। देश के अलग-अलग हिस्सों से सफलता की कुछ ऐसी ही प्रेरक कहानियों को बयां करतीं विकासनगर (उत्तराखंड) से राकेश खत्री, सोलन (हिमाचल प्रदेश) से आशुतोष डोगरा, पटना (बिहार) से अरविंद शर्मा और बांका से रवि वर्मा की रिपोर्ट।

हिरेशा के मशरूम की इंडोनेशिया से अमेरिका तक धमक

देहरादून, उत्तराखंड की महिला उद्यमी हिरेशा वर्मा ‘प्रोग्रेसिव मशरूम ग्रोअर’ अवार्ड पाने वाली देश की पहली महिला हैं। आज देश ही नहीं, विदेश में भी उनके मशरूम की धूम है। हाल ही में उन्हें दुबई में संपन्न कनेक्टिंग वूमेन चेंजमेकर्स समिट में अमेरिकी दूतावास की ओर से सफल महिला उद्यमी के रूप में नवाजा गया। वनस्पति विज्ञान में मास्टर्स डिग्री लेने के बाद हिरेशा ने घर से ही इसकी शुरुआत की।

दो हजार रुपये खर्च कर घर पर ही मशरूम के 25 बैग लगाए। इससे उन्हें पांच हजार रुपये की आमदनी हुई। फिर तो मशरूम उत्पादन को ही उन्होंने अपना लक्ष्य बना लिया। 2015 में यहां पछवादून के छरबा में मशरूम प्लांट लगाया। तीन वर्ष में ही प्लांट से एक हजार किलो प्रतिदिन मशरूम का उत्पादन होने लगा है। जिसका बाजार भाव 120 रुपये प्रति किलो है। आज वह स्थानीय बाजार के साथ-साथ निर्यात कर रही हैं। प्लांट में 32 लोगों को रोजगार भी मिला। नियमित मजदूरों को आठ हजार और सुपरवाइजर को 11 हजार रुपये प्रतिमाह वेतन का भुगतान किया जाता हैं।

महिलाओं ने बिहार के झिरवा को दिलाई पहचान

मशरूम उत्पादन में महिलाओं के सामूहिक प्रयास ने बांका, बिहार के झिरवा गांव को देश में अलग पहचान दिलाई है। मशरूम की खेती के बूते गांव की 400 महिलाएं आत्मनिर्भर हो चुकी हैं। शुरुआत गांव की दो महिलाओं विनीता कुमारी और रिंकू कुमारी ने की थी। स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र से प्रशिक्षण लेकर मशरूम उगाना शुरू किया और इसके बाद खुद का उद्यम तो स्थापित किया ही, साथ ही महिलाओं को भी प्रशिक्षण दिया।

गांव की रधिया देवी कहती हैं कि मशरूम की खेती से जुड़ने के बाद अब उन्हें रोजगार के लिए किसी के खेत पर काम करने नहीं जाना पड़ता है। 2013 में रिंकू-विनीता ने गन्ने के पत्ते पर मशरूम उत्पादन का सफल प्रयोग किया था। 2016 को सोसाइटी फॉर अपलिफ्टमेंट ऑफ रूलर इकोनोमी ने रिंकू को प्रोगेसिव वूमन फार्मर अवार्ड से नवाजा। दोनों को इस साल जगजीवन राम अभिनव नवाचार राष्ट्रीय पुरस्कार के लिए नामित किया गया था।

60 हजार किसानों को बनाया स्वावलंबी

राजेंद्र कृषि विवि के कृषि वैज्ञानिक डॉ. दयाराम को ‘मशरूम मैन’ कहा जाता है। उनके तीन मंत्र हैं- मशरूम उपजाइए, खाइए और बेचिए। तीन दशक से वे पिछड़े इलाके के अभावग्रस्त किसानों को मशरूम की खेती और मुनाफे का गणित समझा रहे हैं। महज दो कमरे की झोपड़ी में मशरूम उगाने की विधि समझाकर उन्होंने 60 हजार से अधिक किसानों की किस्मत बदल दी है। उनसे प्रशिक्षित किसान पुरस्कृत भी हो चुके हैं। परंपरागत खेती से पीछा छुड़ाकर किसानों और महिलाओं को नकदी फसलों के लिए प्रेरित करना दयाराम का मिशन है।

जौनपुर, उप्र के मूल निवासी दयाराम ने 1991 में प्लांट पैथोलॉजी में पीएचडी करने के बाद बिहार की राह पकड़ ली थी। तभी से मशरूम की खेती के लिए प्रयत्न करने लगे। उन्होंने साठ हजार किसानों को आर्थिक गुलामी से मुक्ति दिलाकर आत्मनिर्भर बनाया है। दयाराम ने मशरूम को सिर्फ उगाना ही नहीं सिखाया, बल्कि बिस्किट, समोसा, नमकीन और अचार के रूप में बाजार तक पहुंचाना सिखाया।

मशहूर होता मशरूम

  • 10,000 दुनिया में मशरूम की 10,000 प्रजातियां हैं जिसमें से महज 80 प्रायोगिक तौर पर, 20 व्यावसायिक स्तर पर व 4-5 प्रजातियां औद्योगिक स्तर पर पैदा की जा रही हैं।
  • 2000 भारत में 2000 प्रजातियों की पहचान की जा चुकी है। इनमें से आयस्टर, बटन एवं पेडिस्ट्रा मशरूम अधिक पैदा की जाती है।
  • 60 पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश में भारत के कुल उत्पादन का लगभग 60 प्रतिशत मशरूम उत्पादित किया जा रहा है।
  • 14,000 देश का कुल अनुमानित उत्पादन लगभग 14,000 टन ही है, जिसका लगभग 35 प्रतिशत ही निर्यात होता है। यूरोपीय देश हैं मुख्य आयातक।
  • 500 वर्ष 1994-95 से लगभग 500 मीट्रिक टन का निर्यात भारत ने किया, जिससे 40 करोड़ की विदेशी मुद्रा प्राप्त हुई।

तैयार किया रेडी टू फ्रूट बैग

मशरूम अब रसोई में भी तैयार होगा। इसके लिए विशेष कमरे की जरूरत नहीं पड़ेगी। राष्ट्रीय मशरूम अनुसंधान केंद्र चंबाघाट, सोलन ने इसके लिए रेडी टू फ्रूट (आरटीएफ) बैग तैयार किया है। 25 से 30 रुपये की कीमत के इस बैग से लगभग 20 दिन में 800 ग्राम मशरूम का उत्पादन हो सकेगा। डॉ. वीपी शर्मा, निदेशक, मशरूम अनुसंधान केंद्र ने बताया कि जल्द ही इसे बाजार में उतारने की तैयारी है। बैग की एक खासियत यह भी है कि इसे किसी जलवायु-स्थान पर इस्तेमाल किया जा सकेगा। हां, पानी का छिड़काव कर नमी का ध्यान रखना होगा। इसमें पिंक ऑयस्टर और व्हाइट ऑयस्टर प्रजाति का मशरूम उत्पादित होगा। ऑयस्टर से आचार व सूप भी तैयार किया जा सकता है।

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दिल्ली में बुधवार से चलेगी पिंक मेट्रो, जानिए ख़ास बातें

नॉर्थ दिल्ली को सीधे साउथ दिल्ली से जोड़ने वाली दिल्ली मेट्रो की पिंक लाइन बुधवार से शुरू हो जाएगी। इससे नॉर्थ दिल्ली से साउथ दिल्ली महज 35 मिनट में पहुंचा जा सकेगा। मेट्रो फेज-3 में मजलिस पार्क से शिव विहार के बीच 59 किमी लंबी पिंक लाइन बन रही है। इसका एक हिस्सा बुधवार से पब्लिक के लिए खुलने जा रहा है। अभी साउथ कैंपस से मजलिस पार्क के बीच मेट्रो चलेगी। बुधवार शाम 6 बजे से आम लोग इस रूट पर सफर कर सकेंगे। इस लाइन पर मेट्रो ने कई अनूठे कीर्तिमान भी स्थापित किए हैं। यहां कारीगरी के इतने सारे नमूने एक साथ देखने को मिलेंगे कि आप देखते रह जाएंगे। पिंक लाइन पर कुल 19 ट्रेनें दौड़ेंगी जिनकी फ्रिक्वेंसी 2 मिनट 28 सेकंड से लेकर 5 मिनट 12 सेकंड होगी। आइए नजर डालते हैं दिल्ली मेट्रो की इस नई लाइन की खासियतों पर;

12 स्टेशनों पर चलेगी मेट्रो
एलिवेटेड स्टेशन: 8 (साउथ कैंपस, दिल्ली कैंट, मायापुरी, राजौरी गार्डन, ईएसआई हॉस्पिटल, पंजाबी बाग वेस्ट, शकूरपुर, मजलिस पार्क)
अंडरग्राउंड स्टेशन : 4 (नारायणा विहार, नेताजी सुभाष प्लेस, शालीमार बाग, आजादपुर)
इंटरचेंज स्टेशन: 4 आजादपुर (यलो लाइन), नेताजी सुभाष प्लेस (रेड लाइन), राजौरी गार्डन (ब्लू लाइन), धौला कुआं (एयरपोर्ट लाइन)

सचमुच का ‘जबरा फैन’
आजादपुर स्टेशन के कोनकोर्स लेवल पर मेट्रो ने खास तरह के 5 पंखे लगाए हैं। ये पंखे साइज में इतने बड़े हैं कि आपने शायद ही पहले कभी इतने बड़े पंखे नहीं देखे होंगे। इनका आकार 5 डायमीटर जितना बड़ा है। ये एचवीएलएस (हाई वॉल्यूम लो स्पीड) फैन चलेंगे स्लो स्पीड में, लेकिन इनसे हवा खूब आएगी। स्टेशन के अनपेड एरिया में एयर कंडिशनिंग सिस्टम के बजाय डीएमआरसी ने पहली बार इस तरह के विशालकाय पंखे लगाए हैं। सामान सिंगापुर से मंगाकर उन्हें यहीं असेंबल किया गया है।

(पिंक लाइन के सबसे ऊंचे पॉइंट से ऐसी दिखती है दिल्ली)

7 मंजिला ऊंचाई पर मेट्रो
धौला कुआं पर मेट्रो 23.6 मीटर की ऊंचाई से गुजरेगी, जो किसी 7 मंजिला इमारत के बराबर है। नीचे से एयरपोर्ट मेट्रो और उसके नीचे एनएच-8 से गुजरती गाड़ियां दिखेंगी। दूसरी तरफ हरा-भरा रिज एरिया सरदार पटेल मार्ग नजर आएंगे। डीएमआरसी ने ट्रैफिक या एयरपोर्ट मेट्रो को डिस्टर्ब किए बिना पिंक लाइन का रास्ता निकाला है। कुछ ही दूर नारायणा के पास मेट्रो का सबसे गहरा पॉइंट भी है। यहां बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन के ऑफिस के नीचे मेट्रो 26 मीटर की गहराई पर गुजरेगी।

कॉरिडोर में आर्ट गैलरी
नेताजी सुभाष प्लेस स्टेशन के कोनकोर्स एरिया में इतनी खूबसूरत पेंटिंग लगाई गई हैं कि देखकर आपको ऐसा लगेगा कि आप किसी मेट्रो स्टेशन में नहीं, बल्कि किसी आर्ट गैलरी में खड़े हैं। यहां दर्जन भर से ज्यादा आर्ट वर्क इंस्टॉल किए गए हैं। कई नामचीन आर्टिस्टों की पेंटिंग्स को ग्लास पर उकेरने के बाद उन्हें यहां लगाया गया है। यह एक सेमी अंडरग्राउंड स्टेशन है, जिसके कोनकोर्स और ग्राउंड लेवल के बीच सिर्फ ढाई मीटर का गैप है।

पिंक लाइन मेट्रो से जुड़े अहम फैक्ट्स

मजलिस पार्क से साउथ कैंपस के बीच शुरू होगी लाइन

19 मेट्रो ट्रेनें चलेंगी इस पूरे सेक्शन पर, हर मेट्रो में होंगे 6 कोच

2.4 मीटर है घरों से मेट्रो लाइन की सबसे कम दूरी राजौरी गार्डन में

23.6 मीटर का बना है सबसे ऊंचा पॉइंट धौला कुआं के पास

26 मीटर है सबसे गहरा पॉइंट पूरे सेक्शन पर नारायणा के पास

एक ही स्टेशन पर 4 प्लैटफॉर्म
इंटरचेंज स्टेशनों पर ही दो से ज्यादा प्लेटफॉर्म देखने को मिलते हैं, लेकिन इस लाइन के 2 स्टेशनों पर इंटरचेंज की सुविधा न होने के बावजूद 4-4 प्लैटफार्म बनाए गए हैं। शकूरपुर और मजलिस पार्क पर इस तरह का स्ट्रक्चर है। भविष्य में जब यह 59 किमी लंबी लाइन पूरी खुल जाएगी, तो कभी किसी ट्रेन को बीच में रोकने या टर्मिनेट करने की जरूरत भी पड़ सकती है। इसे देखते हुए इन दोनों स्टेशनों पर 4-4 प्लैटफार्म बनाए गए हैं। आमतौर पर इंटरचेंज स्टेशनों पर लाइन चेंज करने के लिए कोनकोर्स लेवल या ग्राउंड पर जाना पड़ता है, मगर राजौरी गार्डन स्टेशन पर आपको प्लैटफॉर्म से एक लेवल और ऊपर जाना पड़ेगा और उसके बाद आप ब्लूलाइन पर पहुंचेंगे। ट्रैक के ऊपर 16.5 मीटर लंबा एक रैंप बनाया है। यहां से 134 मीटर लंबे ट्रैवलेटर से होते हुए ब्लूलाइन वाले राजौरी गार्डन स्टेशन में एंट्री करेंगे। स्टेशन के बगल में राजौरी गार्डन फ्लाइओवर है, ऐसे में मेट्रो ने पहली बार इस तरह का प्रयोग किया।