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किम जोंग उन से वार्ता के लिए प्योंगयोंग नहीं जाएंगे डोनाल्ड ट्रंप, अब यहां होगी वार्ता

किम जोंग उन से वार्ता के लिए अमेरिकी राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप अब प्‍योंगयोंग नहीं जाएंगे। लेकिन इसका अर्थ ये नहीं है कि यह वार्ता रद कर दी गई है, दरअसल, अब ये दोनों नेता उसी जगह पर मिलेंगे जहां पिछले दिनों दक्षिण कोरिया के राष्‍ट्रपति मून जे ने किम जोंग उन से मुलाकात की थी। इसका सुझाव खुद ट्रंप की तरफ से आया था जिसको किम ने हरी झंडी दे दी है।

आपको बता दें कि किम और मून के बीच 27 अप्रैल को पुनमुंजोम गांव में बैठक हुई थी। यह उत्तर और दक्षिण कोरिया की सीमा पर स्थित है। यहां 1953 के कोरियाई युद्ध के बाद से ही युद्ध विराम लागू है। इसका एक हिस्‍सा उत्‍तर तो दूसरा हिस्‍सा दक्षिण कोरिया में पड़ता है। आपके लिए यह जानना भी बेहद दिलचस्‍प है कि यह सीमा रेखा दुनिया की सबसे खतरनाक सीमाओं में गिनी जाती है। यही वजह है कि उत्तर और दक्षिण कोरिया की सीमा एक बार फिर से चर्चा का विषय बनने के साथ-साथ ऐतिहासिक वार्ता का भी गवाह बनने वाली है।

पीस हाउस में बैठक का सुझाव

आपको बता दें कि डोनाल्ड ट्रंप ने ही किम जोंग उन के साथ पीस हाउस में बैठक करने का सुझाव दिया है। पीस हाउस उत्तर और दक्षिण कोरिया की सीमा पर स्थित है। ट्रंप ने ट्वीट कर कहा कि उत्तर कोरिया के साथ शिखर बैठक के लिए कई देशों पर विचार किया जा रहा है। लेकिन किसी तीसरे देश की अपेक्षा पीस हाउस/फ्रीडम हाउस ज्यादा महत्वपूर्ण और स्थायी जगह है। तीन से चार हफ्ते में ट्रंप और किम की मुलाकात होने की संभावना है। गुरुवार को अमेरिकी राष्ट्रपति ने एक इंटरव्यू में कहा था कि किम के साथ शिखर वार्ता के लिए पांच जगहों पर विचार किया जा रहा है। हालांकि वह कई बार यह भी कह चुके हैं कि बातचीत नहीं भी हो सकती है।

दोनों के बीच वार्ता के अहम बिंदु

किम जोंग उन और डोनाल्‍ड ट्रंप के बीच होने वाली वार्ता का सबसे अहम बिंदु कोरियाई प्रायद्वीप को परमाणु हथियार मुक्‍त बनाना है। हालांकि इसको लेकर किम के तेवर में अब काफी नरमी आ चुकी है। पिछले दिनों मून से हुई मुलाकात में किम ने कहा था कि अगर अमेरिका कोरियाई युद्ध को औपचारिक रूप से खत्म करने का वादा करे और उत्तर कोरिया पर हमला नहीं करने का वचन दे, तो उनका देश परमाणु हथियारों को त्यागने को तैयार है। लेकिन अगर ऐसा नहीं होता है, तो उन्‍हें एक बार फिर विचार करना पड़ेगा।

कई लिहाज से खास है बैठक

किम ने ट्रंप को संबोधित करते हुए ये भी कहा है कि हमारे बीच जब बातचीत शुरू हो जाएगी, तब अमेरिकी राष्‍ट्रपति जान जाएंगे कि मैं ऐसा शख्‍स नहीं हूं कि दक्षिण कोरिया या अमेरिका पर परमाणु हथियार से हमला करूंगा। उन्‍होंने इस बात की भी उम्‍मीद जताई है कि यदि दोनों देशों के बीच बैठकों का सिलसिला बढ़ा और आपसी विश्‍वास बहाली हो सकी यह काफी अच्‍छा होगा। हालांकि अभी इन दोनों नेताओं की बैठक का दिन और समय निश्चित नहीं हो पाया है। लेकिन इतना जरूर तय है कि इस बैठक में दक्षिण कोरिया भी मौजूद होगा। यह बैठक इस लिहाज से भी खास होगी क्‍योंकि पहली बार पद पर रहते हुए कोई अमे‍रिकी राष्‍ट्रपति उत्तर कोरिया के प्रमुख से बात करेगा।

छह देशों की बैठक पर लगी निगाह

इस बीच जानकारों की निगाह कोरियाई प्रायद्वीप को परमाणु हथियार मुक्‍त बनाने के लिए छह देशों की बैठक पर भी लगी है, जो वर्षों से निलंबित हैं। जानकारों की दिलचस्‍पी इस बात को लेकर है कि इस बाबत छह देशों की वार्ता दोबारा शुरू होगी या नहीं। इन छह देशों में उत्तर और दक्षिण कोरिया, जापान, चीन, रूस और अमेरिका शामिल हैं। यॉनहॉप एजेंसी की मानें तो जानकार इस बात से इंकार नहीं कर रहे हैं कि कोरिया प्रायद्वीप को लेकर इन देशों की बैठकों का दौर दोबारा शुरू हो सकता है। जानकारों के मुताबिक इसको लेकर उत्तर कोरिया भी शायद पीछे न हटे और ऐसा करने पर अपनी सहमति व्‍यक्त करे। इस बारे में जापान की मीडिया ने यहां तक कहा है कि पिछले दिनों किम ने जो बीजिंग की यात्रा कर शी चिनफिंग के समक्ष अपनी बात रखी है उसके बाद इस सिक्‍स नेशन टॉक को लेकर सहमति बनी है।

उत्तर कोरिया खफा हो जाए

हालांकि जानकारों का एक मत यह भी है कि मुमकिन है कि जापान की मौजूदगी से उत्तर कोरिया खफा हो जाए। इसकी वजह ये है कि जापान काफी समय से अपने अगवा किए नागरिकों की वापसी की मांग उत्तर कोरिया से करता रहा है। वहीं इसको लेकर उत्तर कोरिया साफ इंकार कर रहा है। आपको बता दें कि छह देशों की यह वार्ता सबसे पहले 2003 में हुई थी। 2005 में वार्ता के बाद एक अहम समझौता भी हुआ था जिसमें उत्तर कोरिया को सुरक्षा की गारंटी तक दी गई थी। लेकिन वर्ष 2009 में उत्तर कोरिया द्वारा परमाणु परिक्षण किए जाने के चलते इसको निलंबित कर दिया गया था। इसके बाद से इस मुद्दे को लेकर इन देशों के बीच कोई वार्ता नहीं हुई।

दोनों के बीच विवादित बोल

इसके अलावा यह बैठक इस लिहाज से भी खास है क्‍योंकि इससे पहले दोनों नेताओं के बीच बदजुबानी का लंबा सिलसिला चला है। एक ओर जहां ट्रंप ने किम को रॉकेट मैन कहा वहीं किम ने ट्रंप को बूढ़ा तक कह डाला था। आइए जानते हैं दोनों नेताओं ने कब-कब और क्‍या-क्‍या कहा।

– नवंबर 2017 में ट्रंप को उत्तर कोरियाई अधिकारियों ने ‘बूढ़ा पागल’ बताया था। इस पर ट्रंप ने ट्वीट कर अपनी नाराजगी जाहिर की थी और लिखा था, ‘भला किम जोग-उन मुझे बूढ़ा बुला कर मेरा अपमान क्यों करेंगे, जब मैं उन्हें कभी नाटा और मोटा नहीं कहूंगा।’

– इसी तरह सितंबर 2017 में संयुक्त राष्ट्र महासभा के 72वें सत्र को संबोधित करते हुए ट्रंप ने किम जोंग उन को रॉकेट मैन कहा था और उनके देश को नेस्तनाबूद करने की धमकी दी थी।

– इसके जवाब में किम जोंग उन की तरफ से जिस तरह का बयान आया, अमेरिका और ट्रंप ने कल्पना भी नहीं की होगी। उत्तर कोरिया ने कहा था, ‘डरे हुए कुत्ते ज्यादा भौंकते हैं। ट्रंप आग से खेलने के शौकीन एक दुष्ट व्‍यक्ति हैं।’

– जनवरी के पहले हफ्ते में भी पूरी दुनिया इन दोनों नेताओं के अजीब-गरीब बयानों की गवाह बनी थीं। दरअसल, किम जोंग उन ने नए साल के मौके पर अपने संबोधन में अमेरिका को तबाह करने की धमकी दी थी और कहा था कि परमाणु बम का बटन हर वक्त उनकी टेबल पर होता है।

– इसका जवाब देते हुए ट्रंप ने कहा था, ‘कोई किम जोंग उन को बताए कि मेरे पास भी न्यूक्लियर बटन है, जो उसके बटन से बहुत बड़ा और ताकतवर है। मेरा बटन काम करता है।’

– 23 फरवरी 2018 को डोनाल्ड ट्रंप ने उत्तर कोरिया के खिलाफ अब तक के सबसे कड़े प्रतिबंध लगाने का एलान किया है। उत्तर कोरिया के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रमों पर रोक लगाने के लिए दबाव बढ़ाने को अमेरिकी राष्ट्रपति ने यह कदम उठाया है।

– 30 जनवरी को अमेरिका में सीआईए के निदेशक माइक पोंपियो ने आशंका जताई थी कि उत्तर कोरिया के पास ऐसी परमाणु मिसाइल हैं, जिससे वह कुछ महीनों के भीतर अमेरिका पर हमला कर सकता है।

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अब से आपके वाहन में पड़ेगा नए किस्म का पेट्रोल-डीजल, जानें क्यों है खास

राजधानी और आसपास के इलाकों में वायु प्रदूषण के खतरनाक स्तर तक पहुंचने की चुनौती से निपटने के लिये सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन कंपनियों ने एक अप्रैल से राजधानी में यूरो-6 मानक के  डीजल एवं पेट्रोल की आपूर्ति शुरू कर देंगी। कंपनियां इसके लिये कोई अतिरिक्त कीमत नहीं वसूलेंगी।

दिल्ली देश का पहला ऐसा शहर होगा जहां यूरो-4  मानक ईंधन का प्रयोग बंद कर सीधे यूरो-6  मानक ईंधन को इस्तेमाल में लाया जायेगा।

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में स्थित अन्य शहरों नोएडा, गाजियाबाद, गुरुग्राम और फरीदाबाद के अलावा मुंबई, चेन्नई,  बेंगलुरू, हैदराबाद और पुणे समेत 13 प्रमुख शहरों में यूरो-6 मानक ईंधन की आपूर्ति अगले साल एक जनवरी से शुरू होगी। देश के बाकी हिस्सों में यह अप्रैल 2020 से शुरू होगा।

इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (आईओसी)  के निदेशक (रिफाइनरी) बी. वी. रामगोपाल ने कहा कि सार्वजनिक तेल विपणन कंपनियां आईओसी, भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड और हिंदुस्तान पेट्रोलियम लिमिटेड  कल से दिल्ली के अपने सभी 391 पेट्रोल पंपों पर यूरो-छह उत्सर्जन मानक वाले ईंधन की आपूर्ति शुरू कर देंगी।

उन्होंने कहा कि भले ही कंपनियों ने स्वच्छ ईंधन उत्पादन के लिए भारी निवेश किया है, उपभोक्ताओं के ऊपर अभी कुछ समय तक इसका बोझ नहीं डाला जाएगा। उन्होंने संवाददाताओं से कहा, आश्वस्त रहिये, खर्च का बोझ उपभोक्ताओं पर डालने की कोई योजना नहीं है।  अभी उपभोक्ताओं से तत्काल लागत वसूलने की कोई योजना नहीं है।

लागत के हिसाब से स्वच्छ ईंधन50  पैसे प्रति लीटर महंगाहोना चाहिये। उन्होंने कहा कि जब पूरे देश में यूरो-6  मानक के ईंधन की आपूर्ति शुरू हो जाएगी तब लागत वसूलने की रूपरेखा तैयार की जाएगी।

रामगोपाल ने कहा कि दिल्ली की 9.6 लाख टन पेट्रोल तथा 12.65 लाख टन डीजल की सालाना खपत देखते हुए उत्तर प्रदेश स्थित मथुरा परिशोधन संयंत्र, हरियाणा की पानीपत रिफाइनरी, मध्य प्रदेश के बिना संयंत्र तथा पंजाब के बठिंडा  संयंत्र ने स्वच्छ ईंधन का उत्पादन शुरू कर दिया है। उन्होंने कहा कि इसके लिए अकेले पानीपत संयंत्र पर ही करीब 183  करोड़ रुपये खर्च किये गये।

उन्होंने कहा कि बाकी के संयंत्रों के उन्नयन का काम चल रहा है। वर्ष 2015 में निर्णय लिया गया था कि यूरो6  मानक के अनुकूल ईंधन की आपूर्ति पूरे देश में एक अप्रैल 2020 से शुरू की जायेगी  हालांकि, जहरीली धुंध की समस्या को देखते हुए दिल्ली में इसे पहले ही किया जा रहा है।

गोपाल ने कहा कि स्वच्छ यूरो6  मानक के ईंधन तथा पुराने इंजन के इस्तेमाल से पार्टिकुलेट उत्सर्जन में10 से 20  प्रतिशत की कमी आएगी। इसका पूरा लाभ उठाने के लिए यूरो6 मानक के इंजनों की भी जरूरत होगी।

उन्होंने कहा, यूरो6 मानक के ईंधन की आपूर्ति कल से शुरू हो जाने से वाहन निर्माता कंपनियों को यह भरोसा मिलेगा कि स्वच्छ ईंधन की उपलब्धता कोई समस्या नहीं है।

दिल्ली में सुचारू आपूर्ति के लिए आईओसी मथुरा और पानीपत संयंत्रों से स्वच्छ ईंधन मंगाएगी। एचपीसीएल की बठिंडा स्थित संयुक्त संयंत्र तथा बीपीसीएलबीना  संयंत्र से ईंधन मंगाएगी।

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अमेरिका : पेलोसी ने सबसे लंबा भाषण देने का बनाया रिकॉर्ड

वरिष्ठ डेमोक्रेट सांसद नैंसी पेलोसी ने अमेरिकी सदन में सबसे लंबा भाषण देने का रिकॉर्ड बनाया. उन्होंने लगभग 108 साल पुराने रिकॉर्ड को तोड़कर नया इतिहास बनाया. सांसद नैंसी पेलोसी ने गैर-दस्तावेजी युवा प्रवासियों को स्वदेश भेजने के बचाव में 8 घंटे से भी ज्यादा लंबा भाषण दिया. उन्होंने 1909 के बाद से सदन में सबसे लंबा भाषण देने का रिकार्ड बनाया है.

8 घंटे 7 मिनट तक बोलती रह गई 
कैलिफोर्निया की जानी मानी डेमोक्रेटक सांसद नैंसी पेलोसी सुबह 10 बजकर 4 मिनट पर सदन पहुंची और भाषण देना शुरू किया. नैंसी पेलोसी ने बोलना शुरू किया और वह लगातार बोलती रहीं. शाम 6 बजकर 11 मिनट पर उन्होंने बोलना बंद किया. 8 घंटे 7 मिनट तक लगातार बोलती रह गईं. एक सहयोगी के अनुसार पेलोसी ने 8 घंटे और सात मिनट तक भाषण दिया.

नैंसी पेलोसी अगले महीने 78 साल की हो जाएगी. उनके एक सहयोगी के ने बताया कि भाषण के दौरान वह 4 इंच की सैंडल पहनी हुयी थी और खड़ी होकर भाषण दे रही थी. इस दौरान उन्होंने सिर्फ पानी पीया.

रिकॉर्ड बनाने के बाद पेलोसी को हुआ आश्चर्य

उन्होंने एक क्लर्क से मिले संदेश को जोर से पढ़ते हुए कहा- ‘मुझे सदन हाउस के एक इतिहासकार से अभी एक संदेश मिला है जिसमें पुष्टि की गयी है कि मैंने कम से कम 1909 के बाद से सदन में सबसे लंबा भाषण देने का रिकार्ड बनाया है. मुझे इस बात से काफी आश्चर्य हो रहा है’

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पूर्ण चंद्रग्रहण आज: 150 साल बाद ऐसा नाजारा दिखेगा; आज जानें सुपर मून, ब्लू मून और ब्लड मून क्या होता

यह पूर्ण चंद्रग्रहण होगा यानी इस दौरान चंद्रमा पृथ्वी की छाया से कुछ देर के लिए पूरी तरह ढक जाएगा। यह पूरे देश में दिखाई देगा। यह स्थिति 35 साल बाद बनी है। इस साल का पहला चंद्रग्रहण आज है। इसके साथ ही एशिया में 35 सालों बाद ऐसा संयोग बन रहा है जब ब्लू मून ब्लड मून और सुपर मून एक साथ दिखेगा।

सुपर मून क्या होता है?
चंद्रमा का अपने सामान्य आकार से ज्यादा बड़ा दिखाई देना सुपर मून कहलाता है। इस दौरान चंद्रमा पृथ्वी के नजदीक होता है। सुपर मून का आकार सामान्य से 10 से 14 फीसदी बड़ा होता है।

ब्लू मून क्या होता है?
एक महीने में जब दो पूर्णिमा पड़ती हैं तो इस स्थिति को ब्लू मून कहते हैं। इस बार 2 जनवरी को भी पूर्णिमा थी। दूसरी 31 जनवरी को है। NASA के ब्लू मून हर ढाई साल में एक बार नजर आता है। इस दौरान चंद्रमा का नीचे का हिस्सा ऊपरी हिस्से से ज्यादा चमकीला दिखाई देता है और नीली रोशनी देता है।

ब्लड मून क्या होता है?

बीएम बिरला साइंस सेंटर के डायरेक्टर बीजी सिद्धार्थ ने न्यूज एजेंसी को बताया जब तीनों (सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा) एक सीध में होंगे तो यह पूर्ण चंद्रग्रहण होगा। इस दौरान सूर्य की कुछ किरणें पृथ्वी के एटमॉस्फेयर से होकर चंद्रमा पर पड़ती हैं। इस दौरान वह हल्का भूरे और लाल रंग में चमकता है। कुछ लोग इसे ब्लड मून भी कहते हैं।

शाम 5:20 से रात 8:43 बजे तक नजर आएगा
यह चंद्रग्रहण शाम 5.20 बजे शुरू होगा। यह ठीक ढंग से सूर्यास्त के बाद 6:25 बजे से नजर आएगा और 8.43 बजे तक रहेगा।

भारत के अलावा यह एशिया रूस मंगोलिया जापान आस्ट्रेलिया आदि में चंद्रमा के उदय के साथ ही शुरू हो जाएगा। नॉर्थ अमेरिका कनाडा और पनामा के कुछ हिस्सों में चंद्रमा के अस्त होते वक्त दिखाई देगा।

इस साल भारत में सूर्यग्रहण नहीं दिखेगा
इस साल 2 चंद्रग्रहण और 3 सूर्यग्रहण होंगे। भारत में दोनों चंद्रग्रहण दिखाई देंगे लेकिन सूर्यग्रहण नहीं दिखाई देगा। इस साल का दूसरा चंद्रग्रहण 27 जुलाई को है।

19 साल बाद नजर आएगा ब्लू-ब्लड मून
ब्लड-ब्लू मून की स्थिति इससे पहले 1982 में बनी थी।
सुपर ब्लू-ब्लड मून के दिन चंद्रमा सामान्य से 10 फीसदी या इससे ज्यादा बड़ा नजर आएगा। यह 30 फीसदी ज्यादा चमकदार भी दिखाई देता है।
इसके बाद 31 जनवरी 2037 को भी सुपर ब्लू-ब्लड मून नजर आएगा।

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सऊदी अरब और ईरान के बीच अगर युद्ध हुआ तो क्या होगा?

मंगलवार को सऊदी अरब की राजधानी रियाद पर एक मिसाइल दागी गई. इस मिसाइल के निशाने पर था सऊदी अरब का राजमहल. जहां पर सऊदी किंग सलमान बजट पेश करने वाले थे. मिसाइल अपने निशाने तक पहुंचती, उससे पहले ही इसे हवा में मार गिराया गया.

यूं तो ये मिसाइल सऊदी अरब के पड़ोसी देश यमन के बाग़ी हूथियों ने दागी थी, मगर सऊदी अरब को यक़ीन है कि इसका रिमोट यमन से दूर ईरान की राजधानी तेहरान में था. ईरान, जो कई दशकों से सऊदी अरब का सबसे बड़ा दुश्मन है.

सऊदी अरब समेत दुनिया के कई देश मानते हैं कि यमन के शिया हूथी विद्रोहियों की पुश्त पर ईरान का हाथ है. रियाद पर दागी गई ये मिसाइल, सऊदी अरब और ईरान के बीच क़रीब एक सदी से जारी तनातनी की सबसे ताज़ा मिसाल है. इस साल ये तीसरा मौक़ा था जब हूथी विद्रोहियों ने सऊदी अरब पर मिसाइल फेंकी थी.

 

अगर सऊदी अरब और ईरान के बीच युद्ध हुआ तो?इमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

सियासी और सामरिक ताक़त

इन दिनों पश्चिमी एशिया में हालात कुछ यूं हैं कि मानो सऊदी अरब और ईरान में जंग छिड़ने वाली हो. तो, अगर सऊदी अरब और ईरान के बीच युद्ध हुआ, तो क्या होगा?बीबीसी की रेडियो सिरीज़ द इंक्वॉयरी में इस सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश की गई है.

सऊदी अरब और ईरान पश्चिमी एशिया की दो बड़ी सियासी और सामरिक ताक़तें हैं. दोनों बड़े तेल उत्पादक देश हैं. अगर दोनों के बीच युद्ध हुआ, तो इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा. ब्रिटेन के माइकल नाइट अरब मामलों के जानकार हैं. वो ब्रिटिश सरकार के अरब मामलों के सलाहकार रहे थे.

नाइट बताते हैं, “ईरान, ऐतिहासिक रूप से बहुत असरदार देश रहा है. कई सदियों तक उसने अरब देशों पर राज किया. तब इसे पर्शिया के नाम से जाना जाता है. वहीं, सऊदी अरब और दूसरे अरब देशों ने पिछली एक सदी में तेल की वजह से काफ़ी तरक़्क़ी की है. इस दौरान ये अरब देश ताक़तवर बनकर उभरे हैं. इस वजह से ईरान का असर इन इलाक़ों पर कम होता गया है.”

 

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ताकि विरोधी पर दबदबा क़ायम कर सकें

माइकल नाइट कहते हैं, “सऊदी अरब और ईरान के बीच तनातनी की बड़ी वजह मज़हबी भी है. सऊदी अरब एक सुन्नी देश है. वहीं ईरान, इस्लाम के शिया फ़िरक़े को मानने वाला. दोनों ही देश, अपने धार्मिक साथियों को दूसरे देशों में भी बढ़ावा देते रहे हैं, ताकि विरोधी पर दबदबा क़ायम कर सकें. ये भी ईरान और सऊदी अरब के बीच कड़वाहट की बड़ी वजह है.”

पिछले कुछ सालों में ईरान, सऊदी अरब पर भारी पड़ता दिख रहा है. कई अरब देशों पर उसका दबदबा बढ़ रहा है. ईरान ने इराक़ में अपना असर बढ़ा लिया है. सीरिया और लेबनान में भी उसके प्यादे काफ़ी ताक़तवर हैं. वहीं, यमन में वो हूथी विद्रोहियों को हथियार और ट्रेनिंग मुहैया करा कर सऊदी अरब की नाक में दम किए हुए है.

माइकल नाइट का कहना है, “इसमें ईरानी फौज का इंक़लाबी दस्ता यानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स का बड़ा हाथ रहा है.” नाइट के मुताबिक़ रिवोल्यूशनरी गार्ड्स, ईरान का सबसे ताक़तवर हथियार हैं. इनका ख़ौफ़ अरब देशों पर तारी है. ये बेहद पेशेवर दस्ता है. जिसने कई मोर्चों पर अपनी ताक़त दिखाई है.

 

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Image captionरिवोल्यूशनरी गार्ड्स

शिया, सुन्नी और रिवोल्यूशनरी गार्ड्स

अरब देशों में शिया, रिवोल्यूशनरी गार्ड्स को अपनी फौज मानते हैं. वहीं सुन्नी अरब इससे डरते हैं.

माइकल नाइट के मुताबिक़, “सऊदी अरब और ईरान के बीच औपचारिक जंग भले न छिड़ी हो. मगर, दोनों ही देश कई मोर्चों पर लड़ रहे हैं. इसकी सबसे बड़ी मिसाल है यमन. जहां पर सऊदी अरब की अगुवाई में कई देशों की सेनाएं, हूथी विद्रोहियों से लड़ाई लड़ रही हैं. वहीं हूथियों को ईरान की सरपरस्ती हासिल है. सऊदी अरब, यमन पर लगातार हवाई हमले कर रहा है. मगर, वो निर्णायक जीत हासिल करने में नाकाम रहा है. सऊदी अरब की नज़र में उसकी जीत की राह में ईरान सबसे बड़ा रोड़ा है.”

यमन के अलावा, सीरिया में भी सऊदी अरब और ईरान, अलग-अलग गुटों के साथ हैं. ईरान, जहां राष्ट्रपति बशर अल असद का समर्थन कर रहा है. वहीं, सऊदी अरब, असद के ख़िलाफ़ बग़ावत करने वालों का साथ दे रहा है.

 

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Image caption1980-88 ईरान इराक के बीच युद्ध के दौरान प्रदर्शित मिसाइलें

शीत युद्ध की स्थिति

लेबनान में ईरान समर्थित हिज़बुल्लाह गुट ताक़तवर है. वहीं सऊदी अरब भी वहां के सुन्नियों का साथ देता है. इराक़ में भी ईरान और सऊदी अरब के बीच दबदबा बढ़ाने की होड़ लगी है. इराक़ की सरकार ने इस्लामिक स्टेट पर जीत हासिल की, तो इसमें ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स का बड़ा हाथ माना जाता है.

इसी तरह, एक छोटे से मुल्क़ बहरीन में भी सऊदी अरब और ईरान आमने-सामने हैं. बहरीन एक शिया बहुल मुल्क़ है. मगर यहां का शेख़ सुन्नी है. सऊदी अरब यहां के राजा के साथ है. वहीं, ईरान, बहरीन में सरकार विरोधी शिया गुरिल्ला संगठनों के साथ है.

माइकल नाइट कहते हैं कि अभी सऊदी अरब और ईरान के बीच कई देशों में शीत युद्ध सा चल रहा है. लेकिन ये कभी भी असल जंग का रूप ले सकता है.

एंथनी कोडिसमन अमरीका और नैटो के अरब मामलों के सलाहकार रहे हैं. वो मानते हैं कि ईरान और सऊदी अरब के बीच जंग एक छोटी सी चिंगारी के तौर पर शुरू हो सकती है. जो आगे चलकर बड़ी जंग बन सकती है. एंथनी मानते हैं कि ये जंग लंबे वक़्त तक चल सकती है.

सऊदी अरब और ईरान के बीच युद्ध हुआ तो क्या होगा?इमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

सऊदी अरब के पास F-15, F-16 और ब्लैक टॉरनेडो

हालांकि एंथनी को लगता है कि ज़मीनी मोर्चे पर तो दोनों देशों की सेनाएं शायद ही आमने-सामने आएं. हां, हवाई जंग ज़रूर भयंकर हो सकती है. एंथनी के मुताबिक़, “हवाई ताक़त में सऊदी अरब फ़िलहाल ईरान पर भारी दिखता है.”

वो कहते हैं, “ईरान के पास सत्तर और अस्सी के दशक के लड़ाकू विमान हैं. ईरान ने इनका रख-रखाव बड़े अच्छे तरीक़े से कर रखा है. साथ ही ईरान ने रूस से भी कुछ लड़ाकू विमान अस्सी के दशक में ख़रीदे थे. यही विमान ईरान की एयरफ़ोर्स की प्रमुख ताक़त हैं.”

वहीं, सऊदी अरब की वायुसेना के पास अमरीकी लड़ाकू विमान जैसे F-15 और F-16 हैं. ब्लैक टॉरनेडो है. यानी हवाई मोर्चे पर सऊदी अरब ज़्यादा ताक़तवर दिखता है. हालांकि ईरान के पास, सऊदी अरब से ज़्यादा बेहतर मिसाइलें और ड्रोन हैं. ये सऊदी अरब के अहम शहरी ठिकानों को निशाना बना सकती हैं.

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Image captionब्लैक टॉरनेडो

इसराइल भी ईरान के ख़िलाफ़!

एंथनी कहते हैं कि जंग छिड़ी तो ईरान, सऊदी अरब के बुनियादी ढांचे को तबाह कर सकता है. ईरान की मिसाइलें, सऊदी अरब के पानी साफ़ करने के प्लांट और बिजलीघरों को निशाना बना सकता है. इससे सऊदी अरब बुरी तरह तबाह हो सकता है. सऊदी अरब के शहरों को पानी और बिजली की सप्लाई ठप हो जाएगी.

इसके बदले में सऊदी अरब अपने लड़ाकू विमानों से ईरान में बिजली सप्लाई करने वाले ठिकानों, पानी साफ़ करने वाले संयंत्रों पर हमला कर सकता है. इसके अलावा सऊदी अरब, ईरान के तेल के ठिकानों और रिफ़ाइनरी पर हवाई हमले कर सकता है.

एंथनी मानते हैं, “ईरान और सऊदी अरब की जंग बड़ी आर्थिक तबाही का बायस बन सकती है. वो इसकी तुलना शतरंज के त्रिकोणीय मुक़ाबले से करते हैं. सऊदी अरब के साथ जहां संयुक्त अरब अमीरात, मिस्र, ओमान, जॉर्डन, अमरीका, ब्रिटेन और फ्रांस खड़े नज़र आते हैं. वहीं ईरान के खेमे में सीरिया, रूस और इराक़ जैसे देश हैं.”

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युद्ध हुआ तो तेल सप्लाई ठप

एंथनी मानते हैं कि जंग की सूरत में इसराइल भी ईरान के ख़िलाफ़ गठबंधन में शामिल हो सकता है. साफ़ है कि ईरान और सऊदी अरब के बीच युद्ध की सूरत में अमरीका और रूस जैसे देशों का रोल ज़्यादा बड़ा होगा. अमरीका फ़िलहाल सऊदी अरब के साथ खड़ा है.

मैरी कॉलिंस, अमरीका की जॉन हॉपकिंस इंस्टीट्यूट से जुड़ी हैं. उन्होंने कई बरस अमरीकी रक्षा मंत्रालय के साथ काम किया है.

मैरी मानती हैं कि ईरान और सऊदी अरब के बीच युद्ध में अमरीका यक़ीनी तौर पर दखल देगा. फारस की खाड़ी स्थित होर्मुज़ जलसंधि से दुनिया के तेल कारोबार का एक बड़ा हिस्सा गुज़रता है. युद्ध हुआ तो ये सप्लाई ठप हो सकती है. इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा.

आधुनिक लड़ाकू विमान

अमरीका क़तई नहीं चाहेगा कि दुनिया को तेल की सप्लाई पर असर पड़े. इसीलिए, ईरान और सऊदी अरब के बीच युद्ध की सूरत में अमरीका का शामिल होना तय है.

मैरी कॉलिंस कहती हैं कि होर्मुज़ में ईरान समुद्र में बारूदी सुरंगे बिछा सकता है. इससे उस इलाक़े से गुज़रने वाले जहाज़ तबाह होने का ख़तरा हो सकता है. ऐसी तबाही होने से रोकने के लिए अमरीका युद्ध होने के एक घंटे के भीतर शामिल हो जाएगा.

कॉलिंस कहती हैं कि खाड़ी देशों में अमरीका के 35 हज़ार से ज़्यादा सैनिक तैनात हैं. अमरीका वायुसेना के F-22 जैसे अति आधुनिक लड़ाकू विमान भी यहां पर तैनात हैं. एक बेड़ा हमेशा फ़ारस की खाड़ी में मौजूद रहता है.

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एक ही दिन में तबाही

कॉलिंस के मुताबिक़ ईरान और सऊदी अरब के युद्ध शुरू होने पर अमरीका सेनाएं फ़ौरन सक्रिय हो जाएंगी. और ये एक दिन में ईरान की पूरी की पूरी नौसेना को बर्बाद कर सकती हैं. वो नब्बे के दशक की एक मिसाल देती हैं. तब अमरीका का एक जहाज़ बारूदी सुरंग की वजह से तबाह हो गया था.

इसके बदले में एक दिन में ही अमरीका ने ईरान की पूरी नौसैनिक ताक़त को तबाह कर दिया था. अमरीकी दखल की वजह से ईरान और सऊदी अरब के बीच जंग कुछ दिनों में ही ख़त्म हो जाएगी. तो, क्या युद्ध के साथ ईरान और सऊदी अरब के बीच झगड़ा हमेशा के लिए ख़त्म हो जाएगा? क्या इस इलाक़े में शांति बहाल हो सकेगी?

ईरानी मूल के अली वाइज़ अमरीका में रहते हैं. वो इंटरनेशन क्राइसिस ग्रुप के लिए काम करते हैं. इस संगठन का काम जंग को रोकना है. अली वाइज़ का बचपन अस्सी के दशक के ईरान-इराक़ युद्ध के दौरान ईरान में गुज़रा था.

दुनिया की अर्थव्यवस्था

ली वाइज़ मानते हैं कि ईरान और सऊदी अरब के युद्ध से दोनों देशों की अर्थव्यवस्था तबाह हो जाएगी. क्योंकि ज़्यादा से ज़्यादा नुक़सान पहुंचाने के लिए दोनों ही देश एक-दूसरे के तेल के ठिकानों, रिफाइनरी, पानी सप्लाई करने वाले प्लांट और बिजली घरों को निशाना बनाएंगे.

युद्ध हुआ तो कच्चे तेल का उत्पादन ठप हो सकता है. इसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा. ईरान और सऊदी अरब के बीच कुछ दिनों की जंग भी हुई, तो तेल के दाम आसमान पर पहुंच जाएंगे. अली मानते हैं कि सऊदी अरब और ईरान के बीच युद्ध की वजह से पूरे इलाक़े में शियाओं और सुन्नियों के बीच तनातनी बढ़ जाएगी.

यानी, ईरान-सऊदी अरब के युद्ध को तो अमरीका अपने दखल से कुछ दिनों में ही ख़त्म कर देगा. मगर इसके बाद, पूरे पश्चिमी एशिया में ईरान और सऊदी अरब के बीच शीत युद्ध का नया दौर शुरू होगा. ताक़त बढ़ाने के नए मोर्चे खुलेंगे. इराक़, सीरिया, यमन जैसे झगड़े दूसरे देशों में पांव पसारेंगे.

अगर सऊदी अरब और ईरान के बीच युद्ध हुआ तो?इमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

दशकों तक महसूस किएजाएंगे ज़ख़्म

क्योंकि अमरीका के हमले से ईरान की सेनाएं तो तबाह हो जाएंगी. मगर ईरान, सऊदी अरब के सुन्नी साथी देशों का विरोध करने वालों को समर्थन बढ़ा देगा. जैसे कि इराक़ में शिया और सुन्नी हथियारबंद गुटों के बीच झगड़े बढ़ जाएंगे. लेबनान में हिज़्बुल्लाह और सऊदी समर्थित गुटों की भिड़ंत बढ़ जाएगी.

यही हालात सीरिया और जॉर्डन में दिख सकते हैं. अली वाइज़ बताते हैं कि ईरान और सऊदी अरब के बीच न तो कारोबारी रिश्ते हैं, न सामाजिक और सांस्कृतिक संबंध हैं. ऐसे में युद्ध के ज़ख़्म आने वाले कई दशक तक महसूस किए जाते रहेंगे. कुल मिलाकर ये कहें कि अगर सऊदी अरब और ईरान के बीच युद्ध हुआ, तो ये हवाई जंग होगी.

दोनों देशों के बीच नौसैनिक युद्ध भी होगा. अमरीका, सऊदी अरब की तरफ़ से दखल देकर ईरान को कुछ दिनों में ही हरा देगा. मगर, ईरान सऊदी अरब के लिए छोटी-छोटी जंगों के दूसरे मोर्चे खोल देगा. युद्ध के ज़ख़्म भरेंगे नहीं. बल्कि दोनों देशों के बीच तनातनी का असर दूसरे देश झेलेंगे. इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा.