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दुनिया की 10 सबसे ताकतवर हस्तियों में शुमार हुए नरेंद्र मोदी, No. 1 पर चिनफिंग

प्रतिष्ठित फोर्ब्‍स की लिस्‍ट में पीएम नरेंद्र मोदी दुनिया के 10 सबसे शक्तिशाली नेताओं की सूची में शुमार हो गए हैं. फोर्ब्‍स की लिस्‍ट में पीएम मोदी नौवें स्‍थान पर काबिज हैं. इस सूची में चीनी राष्‍ट्रपति शी जिनपिंग पहली बार पहले स्‍थान पर काबिज हुए हैं. वह रूसी नेता व्‍लादिमीर पुतिन को हटाकर पहले स्‍थान पर पहुंचे हैं. फोर्ब्‍स 2018 लिस्‍ट में दुनिया को चलाने वाले सबसे ताकतवर 75 नामों को शामिल किया गया है. फोर्ब्‍स ने लिस्‍ट जारी करते हुए कहा, ”दुनिया में करीब 7.5 अरब लोग हैं लेकिन ये 75 लोग दुनिया को चलाते हैं. फोर्ब्‍स की वार्षिक रैंकिंग में हर एक अरब में से एक ऐसे व्‍यक्ति को चुना जाता है जिनके एक्‍शन सबसे ज्‍यादा मायने रखते हैं.”

पीएम नरेंद्र मोदी
फोर्ब्स ने कहा कि पीएम मोदी दुनिया के दूसरे सबसे अधिक आबादी वाले देश (भारत) में “बेहद लोकप्रिय बने हुए हैं.” इसमें मनी लॉन्ड्रिंग और भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए मोदी सरकार के नवंबर 2016 के नोटबंदी के फैसले का हवाला दिया गया है. हाल के वर्षों में पीएम मोदी ने आधिकारिक यात्रा के दौरान डोनाल्‍ड ट्रंप और शी जिनपिंग के साथ मुलाकात की और वैश्विक नेता के रूप में अपनी पहचान बढ़ाई है. इसके अलावा वह जलवायु परिवर्तन से निपटने के अंतरराष्ट्रीय प्रयास में एक प्रमुख व्यक्ति के रूप में उभरे हैं.

mukesh ambani
PM मोदी के अलावा मुकेश अंबानी लिस्‍ट में शामिल होने वाले एकमात्र भारतीय हैं.(फाइल फोटो)

मुकेश अंबानी
रिलांयस इडस्ट्रीज के चेयरमैन मुकेश अंबानी इस सूची में पीएम मोदी के अलावा स्थान पाने वाले एकमात्र भारतीय हैं. वहीं, माइफ्रोसॉफ्ट के सीईओ भारतीय मूल के सत्या नाडेला को 40वें पायदान पर रखा गया है. अंबानी पर फोर्ब्स ने कहा कि अरबपति उद्योगपति ने 2016 में भारत के अति-प्रतिस्‍पर्द्धी बाजार में 4-G सेवा जियो शुरू करके कीमत की जंग छेड़ दी.

शी जिनपिंग
जिनपिंग ने पिछले लगातार चार वर्ष तक इस सूची में शीर्ष पर चले आ रहे पुतिन को दूसरे स्थान पर धकेल दिया है. सूची में तीसरे पायदान पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, चौथे पर जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल और पांचवें पर अमेजन प्रमुख जैफ बेजोस हैं. पीएम मोदी के बाद फेसबुक के सीईओ मार्क जुकरबर्ग(13वें), ब्रिटेन की प्रधानमंत्री थेरेसा मे(14), चीन के प्रधानमंत्री ली क्विंग(15), एपल के सीईओ टिम कुक(24) को रखा गया है. इस वर्ष सूची में 17 नए नामों को शामिल किया गया है, इसमें सऊदी अरब के शहजादे मोहम्मद बिन सलमान अल सऊद (8वें ) भी हैं. सूची में पोप फ्रांसिस(6), बिल गेट्स(7), फ्रांस के राष्ट्रपति एमैनुएल मैक्रों(12), अलीबाबा के प्रमुख जैक मा(21) भी शामिल हैं.

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भारत दुनिया में सबसे ज्यादा हथियार खरीदने वाला देश, चार साल में हमारी 12% हिस्सेदारी: रिपोर्ट

हथियार खरीदने के मामले में भारत दुनिया में टॉप पर बना हुआ है। यह खुलासा सोमवार को स्टॉकहोम के थिंक टैंक इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट की एक रिपोर्ट में हुआ है। सोमवार को जारी इस रिपोर्ट के मुताबिक, भारत ने 2013-2017 के दौरान दुनिया में सबसे ज्यादा हथियार खरीदे हैं। इस मामले में दुनिया में उसकी हिस्सेदारी 12% है।रिपोर्ट के मुताबिक, 2008 से 2013 की तुलना में भारत ने 2013 से 2017 के बीच 24% ज्यादा हथियार खरीदे हैं।

सऊदी अरब दूसरे नंबर पर
– इस रिपोर्ट में भारत के बाद सबसे ज्यादा हथियार खरीदने वालों में सऊदी अरब, मिस्र, यूएई, चीन, ऑस्ट्रेलिया, अल्जीरिया, इराक, पाकिस्तान और इंडोनेशिया हैं।

 

भारत ने रूस से सबसे ज्यादा हथियार खरीदे
– भारत ने 2013 से 2017 तक सबसे ज्यादा हथियार रूस से खरीदे। कुल खरीदे गए हथियारों में रूस की हिस्सेदारी 62% है।

– इसके बाद भारत ने अमेरिका से 15% और इजरायल से 11% हथियार खरीदे हैं।

 

चीन से मुकाबले के लिए अमेरिका से बेहतर रिश्ते कर रहा भारत

– एशिया में चीन का दबदबा कम करने के लिए अमेरिका भारत के साथ दे रहा है। जिसका नतीजा है कि 2008 से 2012 की तुलना में 2013 से 2017 तक में भारत ने अमेरिका से काफी हथियार खरीदे हैं। इस दौरान अमेरिका से भारत के हथियारों की खरीद में लगभग 557% की बढ़ोत्तरी हुई है।

 

सबसे ज्यादा हथियार बेच रहा अमेरिका

– हथियार बेचने वाले देशों में अमेरिका टॉप पर है। इसके बाद रूस, फ्रांस और जर्मनी हैं। चीन पांचवे नंबर पर है। चीन सबसे ज्यादा हथियार पाकिस्तान को बेचता है।

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पुतिन के प्रेजेंटेशन में फ़्लोरिडा परमाणु हमले के निशाने पर क्यों?

रूस के राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन ने गुरुवार को परमाणु हथियारों के नए ज़खीरे को दुनिया के सामने लाते हुए एक प्रेज़ेंटेशन दिखाया. इस दौरान एक वीडियो ग्राफ़िक्स में अमरीका के फ़्लोरिडा पर मिसाइलों की बारिश होती दिखाई गई.

लेकिन यहां सवाल यह उठता है कि रूस परमाणु युद्ध की स्थिति में सनशाइन स्टेट फ़्लोरिडा को लक्ष्य क्यों बनाना चाहेगा?

फ़्लोरिडा में वॉल्ट डिज़नी वर्ल्ड और एवरग्लेड्स नेशनल पार्क जैसे पर्यटक स्थल हैं. इसके साथ ही यहां राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के मार-ए-लागो रिसॉर्ट जैसे हाई प्रोफाइल टारगेट भी हैं.

रूस में 18 मार्च को राष्ट्रपति चुनाव होने हैंइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES
Image captionरूस में 18 मार्च को राष्ट्रपति चुनाव होने हैं

ऐसा क्या है फ़्लोरिडा में?

अमरीकी रक्षा विभाग के एक प्रवक्ता ने कहा कि पेंटागन को पुतिन की इन बातों से आश्चर्य नहीं हुआ.

रूसी ख़तरे को महत्वहीन करार देते हुए पेंटागन प्रवक्ता डैना व्हाइट ने कहा, “अमरीकी लोग आश्वस्त रहें, हम पूरी तरह तैयार हैं.”

पुतिन के इस वीडियो एनिमेशन में कई परमाणु हथियारों को फ़्लोरिडा की ओर जाते दिखाया गया है.

राष्ट्रपति ट्रंप के फ़्लोरिडा स्थित मार-ए-लागो रिसॉर्ट में कई परमाणु बंकर हैं, जहां राष्ट्रपति बनने के बाद वो कई वीकेंड गुज़ार चुके हैं.

परमाणु हथियारइमेज कॉपीरइटREUTERS

1927 में निर्मित मार-ए-लागो में इन बंकरों में से तीन कोरियाई युद्ध के दौरान स्थापित किए गए थे.

कुछ मील की दूरी पर वेस्ट पाम बीच में ट्रंप के गोल्फ़ कोर्स में (अमरीकी मैगज़ीन स्कवायर के अनुसार दूसरे होल के नीचे) एक और बम शेल्टर है.

दूसरा बंकर राष्ट्रपति जॉन एफ़ केनेडी के लिए बनाया गया था जो मार-ए-लागो से बहुत दूर नहीं है.

पीनट आइलैंड पर स्थित इस बंकर से महज 10 मिनट की दूरी पर पाम बीच हाउस है, जहां केनेडी अकसर ठहरा करते थे.

पुतिन का प्रज़ेंटेशनइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

जानकार क्या मानते हैं?

विशेषज्ञ कहते हैं कि ये बंकर चाहे जितने भी शानदार तरीके से बनाए गए हों, सीधे हमले की स्थिति में कोई भी बंकर सुरक्षित नहीं बच सकेगा.

एक और लक्ष्य अमरीकी सेंट्रल कमांड (सेंटकॉम) हो सकता है, जिसका मुख्यालय टैंपा के मैक्डिल एयरबेस में है.

सेंटकॉम पर मध्य-पूर्व, मध्य एशिया और उत्तर अफ्रीका के कुछ हिस्सों में ऑपरेशन के ज़िम्मेदारी है.

लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि परमाणु युद्ध की स्थिति में मुख्य लक्ष्य फ़्लोरिडा नहीं होगा.

मैथ्यू क्रोएनिग अपनी किताब द लॉजिक ऑफ़ अमरीकन न्यूक्लियर स्ट्रैटजी में लिखते हैं कि रूस की प्राथमिकता अमरीका के मुंहतोड़ जवाबी कार्रवाई करने की क्षमता को कमज़ोर करने की होगी.

वो लिखते हैं, “बहुत संभव है कि मॉस्को मोंटाने के मालस्टॉर्म एयरफ़ोर्स बेस, नॉर्थ डकोटा में मिनोट एयरफोर्स बेस, ओमाहा, नेब्रास्का और ऑफ़ट जैसे एयर फोर्स बेस को लक्ष्य बनाना चाहेगा.”

परमाणु हथियारइमेज कॉपीरइटREUTERS

सिर्फ़ एक संदेश

क्रोएगिन लिखते हैं, “रूस सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण दो अमरीकी पन्डुब्बियों के ठिकानों, वॉशिंगटन के बांगोर और जॉर्जिया के किंग्स बे के साथ ही देश भर में फैले 70 अन्य अमरीकी सैन्य अड्डों को मिटाना चाहेगा.”

वो आगे लिखते हैं, “और साथ ही वो यहां की औद्योगिक क्षमता को नष्ट करने और बड़े पैमाने पर नुक़सान पहुंचाने के लिए सबसे अधिक आबादी वाले अमरीकी शहरों पर दो-दो मिसाइलें दागेगा.”

इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटजिक स्टडीज के मार्क फिट्ज़पैट्रिक ने बीबीसी से कहा, “फ़्लोरिडा पर हमले के वीडियो से युद्ध नीति का कोई संबंध नहीं है. यह एक संदेश है, जिसके संकेत मात्र के रूप में यह वीडियो है.”

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माइनस 60 डिग्री तापमान: टूटा थर्मामीटर, पलकों पर जमी बर्फ

 

  • दुनिया की सबसे ठंडी जगह साइबेरिया जहां इस बार रिकॉर्डतोड़ ठंड पड़ रही है. लगातार लुढ़कते पारे की वजह से थर्मामीटर भी जवाब देकर टूट गया है. और तो और लोगों की पलकों पर बर्फ जम गई है. तापमान माइनस 60 डिग्री के नीचे पहुंच गया है. लगातार लुढ़कते पारे के बीच स्कूलों में छुट्टी कर दी गई है.

  • माइनस 60 डिग्री तापमान: टूटा थर्मामीटर, पलकों पर जमी बर्फ
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    रूस के साइबेरिया में याकुटिया इलाके का एक छोटा सा गांव- ओम्याकोन है. इस जनवरी के महीने में यहां सब कुछ फ्रीज हो गया है. कई दिनों से सूर्य की रोशनी नसीब नहीं हुई है.

  • माइनस 60 डिग्री तापमान: टूटा थर्मामीटर, पलकों पर जमी बर्फ
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    ओम्योकोन की आबादी करीब 500  है. 13 जनवरी को यहां पर तापमान माइनस 62 डिग्री के नीचे तक गिर गया. इसके साथ ही तापमान मापने के लिए लगाया गया थर्मामीटर भी जवाब दे गया. थर्मामीटर टूट गया. वहीं यहां के निवासियों का दावा है कि पारा माइनस 67 डिग्री तक लुढ़का.

  • माइनस 60 डिग्री तापमान: टूटा थर्मामीटर, पलकों पर जमी बर्फ
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    बता दें कि इससे पहले 1933 में इतना न्यूनतम तापमान दर्ज किया गया था.

  • माइनस 60 डिग्री तापमान: टूटा थर्मामीटर, पलकों पर जमी बर्फ
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    तापमान गिरने के कारण यहां नल से पानी निकलना बंद हो गया है. गाड़ियों को एक्टिव मोड में रखने के लिए गैराज में हीटर का इंतजाम करना पड़ रहा है. या फिर जरूरत ना होने पर भी उन्हें स्टार्ट रखा जा रहा है. मोबाइल फोन का सिग्नल भी दम तोड़ चुका है.

  • माइनस 60 डिग्री तापमान: टूटा थर्मामीटर, पलकों पर जमी बर्फ
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    फ्रीज करने वाली जिंदगी की वजह से ही इसका नाम ‘पोर्ट सिटी ऑफ कोल्ड’ पड़ गया है.

  • माइनस 60 डिग्री तापमान: टूटा थर्मामीटर, पलकों पर जमी बर्फ
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    यहां का इमरजेंसी विभाग लगातार मौसम पर नजर बनाए हुए है. लेकिन साइबेरिया के मंत्रालय ने आशंका जताई है कि फिलहाल राहत की कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही.

    (PHOTO CREDIT: INSTAGRAM- anastasiagav)

 

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अमेरिका की टिप पर विफल हुआ रूस में आतंकी हमला, पुतिन ने जताया आभार

सेंट पीटर्सबर्ग शहर पर आतंकी हमले को नाकाम करने में मिली अमेरिकी मदद पर रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने फोन कर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को आभार जताया है। बीते सप्ताह रूस के सेंट पीटर्सबर्ग शहर में बड़े हमले की आतंकी संगठन आईएस ने साजिश रची थी।

इसकी भनक अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए को लग गई। उसने हमले से ठीक पहले इस बारे में रूसी खुफिया एजेंसी को सूचित कर दिया और इसके बाद हमले को निष्फल कर दिया गया।

सीआईए की सूचना पर सक्रिय हुई फेडरल सिक्योरिटी सर्विस (एफएसबी) ने छापेमारी करके आईएस से ताल्लुक रखने वाले सात आतंकियों को गिरफ्तार कर लिया। ये सभी शहर के भीड़ वाले इलाकों में आत्मघाती हमले की तैयारी कर रहे थे।

एफएसबी ने पूरे आतंकी तंत्र को ध्वस्त कर लिया है और रूसियों को जान-माल के नुकसान से बचा लिया है। पुतिन के आभार जताने के जवाब में ट्रंप ने कहा, अमेरिकी खुफिया एजेंसी तमाम निर्दोष रूसी लोगों की जान बचाने में सहयोग देकर खुशी महसूस कर रही है।

उन्होंने कहा कि इसी तरह से खुफिया जानकारी साझा करके दुनिया से आतंकवाद को नष्ट किया जा सकता है। दोनों नेताओं ने सहमति जताई कि इस तरह का सहयोग अन्य देशों के लिए भी उदाहरण पेश करेगा जिससे भविष्य में होने वाली वारदातों को रोका जा सकेगा। पुतिन ने सीआईए निदेशक माइक पोंपियो को भी फोन कर उन्हें और उनके संगठन को धन्यवाद दिया।

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अंतरिक्ष की जंग: जिसे शुरू रूस ने किया और अंजाम अमेरिका ने

रहस्य से आश्चर्य पैदा होता है. इंसान के अंदर जो समझने की ललक पैदा होती है, उसे पैदा करने वाला ये आश्चर्य ही है.

                                                                                      – नील आर्मस्ट्रॉन्ग (चांद पर कदम रखने के बाद)


 

जो पंछी हर साल एक मौसम के बाद गायब हो जाते हैं, वो दरअसल चांद चले जाते हैं. फिर वहां से लौटकर धरती वापस आते हैं.

                                                                                       – चार्ल्स मॉर्टन, ब्रिटिश वैज्ञानिक, 17वीं सदी

चांद सदियों तक लोगों के लिए पहेली बना रहा. किसी को उसमें अपनी माशूका का चेहरा नजर आता. कभी चरखा कातती बुढ़िया. किसी को लगता, वहां परियां रहती हैं. किसी को कलंक नजर आता. कभी उसकी पूजा हुई. कभी उससे डर लगा. लोग तरह-तरह की बातें करते चांद के बारे में. चार्ल्स मॉर्टन की भी अपनी थिअरी थी. उनको लगता है, माइगेट्री पंछी चांद चले जाते हैं. तभी साल के बाकी महीने नहीं दिखते. इन सबका दिल टूट गया. उस दिन जब नील आर्मस्ट्रॉन्ग नाम का एक शख्स चांद पर उतरा. उसने बताया, चांद तो उजाड़ है. चांद के इस सफर की शुरुआत हुई थी 4 अक्टूबर, 1957 को. बस चांद की ही क्यों? हम जो किसी दिन सूरज पर जा पहुंचे, उसकी शुरुआत भी इसी दिन में छुपी हुई है.


 

चाहे चांद पर इंसान के पहुंचने की कहानी हो, या मंगल का मिशन, या फिर भविष्य की तमाम योजनाएं और सफलताएं, उन सबकी शुरुआत इसी 4 अक्टूबर की तारीख में छुपी है.

60 साल पहले शुरू हुआ था ये सफर, जो अब सूरज पहुंचने की तैयारी में है
4 अक्टूबर, 1957, 60 साल, इस दिन सोवियत संघ ने पहला कृत्रिम उपग्रह छोड़ा था, अंतरिक्ष में. सैटेलाइट का नाम था स्पूतनिक. रूसी भाषा में यात्री के लिए ये ही शब्द है. इंसानों के हाथों बनी पहली ऐसी कृत्रिम चीज, जिसे पृथ्वी की कक्षा में स्थापित किया गया था. इस तारीख ने यूं ही नहीं इतिहास बनाया. स्पूतनिक की लॉन्चिंग के साथ ही एक स्पेस ऐज शुरू हुआ. अंतरिक्ष युग. अमेरिका और सोवियत के बीच. स्पूतनिक की लॉन्चिंग की खबर सुनकर दुनिया भौंचक्की रह गई. अमेरिका को तो झटका लग गया. दोनों के बीच एक जंग जमीन पर चल रही थी. स्पूतनिक के बाद ये जंग अंतरिक्ष में पहुंच गई. होड़ लग गई दोनों में. आगे निकलने की. आज NASA का नाम कितनी मुहब्बत से लेते हैं हम. ये NASA भी इसी स्पेज ऐज की पैदाइश है. अमेरिका की महत्वाकांक्षी औलाद. बड़ी उम्मीदों से पैदा किया गया था इसे. NASA ने भी उम्मीदों को साबित किया. बड़ी लायक औलाद निकला.

पश्चिमी जर्मनी की एक बच्ची बर्लिन वॉल को तोड़ने की कोशिश करती हुई. दूसरे विश्व युद्ध के बाद सोवियत और अमेरिका में जो कोल्ड वॉर शुरू हुआ, वो सोवियत के बिखरने पर ही खत्म हुआ.

सोवियत और अमेरिका, दोनों एक-दूसरे से ऑब्सेस्ड थे
दूसरा विश्व युद्ध खत्म हो गया था. धरती पर दो छोर हैं. उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव. अमेरिका और सोवियत भी ऐसे ही हो गए थे. पूंजीवादी अमेरिका. वामपंथी सोवियत. विचारधारा का अंतर तो था ही. एक-दूसरे से आगे निकलने की गलाकाट होड़ भी थी. ये वो दौर था, जब लगता था दुनिया में बस दो देश हैं. मेन हीरो. बाकी सारे देश सपोर्टिंग भूमिका में थे. जिंदगी का कोई ऐसा हिस्सा नहीं बाकी रहा, जहां सोवियत और अमेरिका में होड़ नहीं थी. हथियार की होड़. परमाणु शक्ति की होड़. सेना की होड़. कारोबार की होड़. अर्थव्यवस्था की होड़. जासूसी की होड़. कोवर्ट ऑपरेशन की होड़. धमकियों की होड़. अपना दबदबा बढ़ाने की होड़. अपने-अपनी विचारधारा को बेहतर साबित करने की होड़. दोनों पक्ष खुद को सवा शेर साबित करना चाहते थे.

स्पेस एजेंसी नासा उसी धक्कामुक्की के दौर की निशानी है. इसपर अमेरिका को रेस में आगे ले जाने की जिम्मेदारी थी.

फिर आया स्पूतनिक, इस सरप्राइज से बौखला गया अमेरिका
स्पूतनिक की लॉन्चिंग सरप्राइज जैसी थी. 18,000 मील प्रति घंटे की रफ्तार थी इसकी. दूरबीन लगाकर देखने से दिखता था. सूरज उगने से पहले और सूरज डूबने के बाद. ये सैटेलाइट धरती पर रेडियो सिग्नल भेजता था. इतने मजबूत सिग्नल कि नए सीखे रेडियो ऑपरेटर भी कैच कर लेते थे. अमेरिका में जिनके पास ऐसे उपकरण थे, वो बड़े दंग थे. ये सैटेलाइट एक घंटे और 36 मिनट में धरती की एक बार परिक्रमा करता. अमेरिका भी तो इसी धरती पर है. सोवियत का ये सैटेलाइट रोजाना कई बार अमेरिका के ऊपर से भी गुजरता. बुरी तरह से कुढ़ गई थी अमेरिकी सरकार. सोवियत उनसे पहले अंतरिक्ष में जो पहुंच गया था. स्पूतनिक का काम तय था. इसके माध्यम से धरती और सौर मंडल पर अध्ययन किया जा रहा था. शक अजीब मर्ज है लेकिन. अमेरिकियों को लगता था कि सोवियत की साजिश है ये. सैटेलाइट के बहाने कुछ तो साजिश रची जा रही है.

स्पूतनिक औचक से आया. किसी ने उम्मीद नहीं की थी कि सोवियत इतनी जल्दी और यकायक इतना आगे बढ़ जाएगा. 4 अक्टूबर, 1957 की ये तारीख ऐतिहासिक थी.

पहली दौड़ तो बेशक सोवियत ने ही जीती थी
अमेरिका ने जिस पहले उपग्रह की योजना बनाई थी, उससे करीब 10 गुना बड़ा था स्पूतनिक. उसे भी 1958 में लॉन्च होना था. सोवियत की जीत तो हुई थी. उसने खबर तक नहीं लगने दी अपने इरादों की. चुपचाप काम करता रहा. सोवियत की इस तकनीकी श्रेष्ठता से अमेरिकी सरकार, सेना और वैज्ञानिकों की बहुत किरकिरी हुई. इसे दिल पर ले लिया उन्होंने. कसम खाई, सोवियत से पहले चांद पर पहुंचेंगे. सेना, सरकार और वैज्ञानिकों ने मिलकर सोवियत को हराने की रेस शुरू की. इसके साथ ही आगाज हुआ अंतरिक्ष की इस दौड़ का.

लाइका. ये ही कुत्ता था, जिसे स्पूतनिक 2 पर अंतरिक्ष में भेजा गया था.

दूसरी रेस भी सोवियत ने ही जीती
3 नवंबर, 1957. सोवियत ने अपना दूसरा उपग्रह छोड़ा. स्पूतनिक 2. बैक-टू-बैक. एक महीने से भी कम समय में दो सैटेलाइट. ये कोई साधारण उपग्रह नहीं था. सोवियत ने इसके साथ एक कुत्ते को भी भेजा था. मैं जब कभी इसके बारे में पढ़ती हूं, मन मसोस जाता है. लाइका नाम था उस कुत्ते का. उसे वन-वे सफर पर भेजा गया था. मालूम था, जिंदा नहीं लौटेगा. लाइका पहला जीव था, जिसने अंतरिक्ष से पृथ्वी की परिक्रमा की. कहते हैं, लाइका को कोई तकलीफ नहीं हुई होगी मरते समय. जो भी हो. मिशन पर भेजे जाने की अनुमति तो किसी ने नहीं ली होगी उससे.

जब स्पूतनिक 2 लाइका को लेकर अंतरिक्ष गया, तो दुनिया में जैसे तहलका मच गया. पहला मौका था जब किसी जीव ने स्पेसक्राफ्ट में धरती की परिक्रमा की. अखबार में छपी ये खबर उसी मौके की है.

1958 में अमेरिका ने छोड़ा अपना पहला उपग्रह
31 जनवरी, 1958. वो तारीख जब अमेरिका ने अपना पहला सैटेलाइट छोड़ा. एक्सप्लोरर. जब तक अमेरिका ने अपना पहला कदम रखा, सोवियत आगे बढ़ गया था. ये जख्म पर मिर्च छिड़कने जैसी स्थिति थी.

बचपन में पढ़ा है कई बार. अंतरिक्ष में जाने वाले पहले शख्स का नाम यूरी गागरिन था. चांद पर कदम रखने वाले पहले शख्स का नाम नील आर्मस्ट्रॉन्ग था. इन दोनों के बीच का जो फासला था, वो स्पेस रेस का चरम है.

पहली-पहली बार करने के कई रेकॉर्ड तो सोवियत के ही नाम हैं
सोवियत का सिक्का जम गया था. उसे जैसे जुनून सवार था. पहली-पहली बार हासिल करने का. ऐसी कई उपलब्धियां सोवियत के नाम हैं. जिन्हें बचपन से ही हम सब सामान्य ज्ञान की किताबों में रटते आ रहे हैं.

अंतरिक्ष में जाने वाला पहला इंसान: यूरी गागरिन (रूस)
अंतरिक्ष में जाने वाली पहली महिला: वेलेंतिका तेरेशकोवा (रूस)
अंतरिक्ष में पहली बार चलने वाला शख्स: ऐलेक्सी लियोनोव (रूस)
चांद पर जाने वाला पहला अंतरिक्षयान: लूना 2
शुक्र की सतह पर भेजा गया पहला स्पेसक्राफ्ट:वेनेरा 3

इंसान भले ही अब अंतरिक्ष में काफी आगे निकल गया हो, लेकिन चांद पर पहला कदम रखने का अनुभव सबसे यादगार रहेगा.

फिर आया अमेरिका का दौर, सौ सोनार की और एक लोहार की
1960 के आखिरी सालों में अमेरिका ने बड़ा कदम बढ़ाया. राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी ने कहा था. दशक खत्म होने से पहले इंसान को चांद पर उतारेंगे. 1962 में जॉन ग्लेन पहले ऐसे अमेरिकी व्यक्ति बने, जिन्होंने स्पेसक्राफ्ट में धरती की परिक्रमा की. फिर आया NASA का ऐतिहासिक अपोलो मिशन. 1961 से 1964 के बीच अमेरिकी सरकार ने NASA का बजट करीब 500 फीसद बढ़ा दिया. चांद के मिशन के लिए NASA में करीब 34,000 कर्मचारी काम कर रहे थे. कॉन्ट्रैक्ट पर करीब पौने चार लाख लोग भी काम में लगाए गए थे. 1967 में अपोलो मिशन को झटका लगा. तीन अंतरिक्षयात्री मारे गए. सोवियत का लूनर मिशन उतना तेज नहीं था. सोवियत में इसे लेकर बहस थी. इसकी जरूरत है या नहीं, इसे लेकर. फिर सोवियत स्पेस प्रोग्राम के मुख्य इंजीनियर सेरेगी कोरोलोव की असमय मौत होने से भी सोवियत को धक्का लगा.

न वेकल सोवियत और अमेरिका की सरकारें, बल्कि दोनों देशों के लोग और मीडिया भी इस जंग का हिस्सा बन चुके थे. दोनों को एक-दूसरे से पिछड़ना किसी भी सूरत में मंजूर नहीं था.

ऐतिहासिक था वो दौर, पहली बार चांद पर उतरा था इंसान
दिसबंर 1968. इंसानों को लेकर पहला स्पेसक्राफ्ट चांद के लिए रवाना हुआ. इसे चांद की परिक्रमा करनी थी. 16 जुलाई, 1969. अपोलो 11 मिशन की रवानगी हुई. इसमें थे नील आर्मस्ट्रॉन्ग, ऐडविन अल्ड्रिन और माइकल कोलिन्स. 20 जुलाई को ये अंतरिक्षयान चांद की सतह पर पहुंचा. नील आर्मस्ट्रॉन्ग चांद की सतह पर कदम रखने वाले पहले इंसान बने. ये इतिहास था. सदियों से हम इंसान चांद को सिर उठाकर देखते आए थे. जाने कैसी-कैसी कल्पना करते थे. कविताओं में, कहानियों में, जाने कितने तरह की उपमाएं जोड़ते थे चांद के नाम पर. उसी चांद पर इंसानों ने कदम रखा. जब भी इंसानों की सबसे बड़ी उपलब्धियों की बात होगी, इस तारीख का जिक्र किया जाएगा. नील आर्मस्ट्रॉन्ग की वो तस्वीर पूरी इंसानी सभ्यता के सबसे यादगार पलों में से एक है.

सोवियत ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया, लेकिन चांद पर उतरने की उसकी कोशिशें लगातार नाकाम होती गईं.

चांद पर क्या पहुंचा अमेरिका, लगा दौड़ खत्म हो गई
स्पूतनिक के साथ दौड़ शुरू हुई. अपोलो ने इसे अंजाम पर पहुंचाया. वो कहते हैं ना, तुमने शुरू किया है लेकिन खत्म मैं करूंगा. वैसे ही. सोवियत में रेस में बने रहने की पुरजोर कोशिश की. 1969 से 1972 के बीच चार बार कोशिश की. चांद की सतह पर स्पेसक्राफ्ट लैंड करने की. हर बार नाकामयाबी हाथ लगी. जुलाई 1969 में लॉन्चिंग के वक्त जोरदार धमाका हुआ. सोवियत ने बहुत हाथ-पैर मारे आगे आने के लिए. कामयाब नहीं हो सका पर. एक बार जो पिछड़ा, तो पिछड़ ही गया. ऐस्ट्रोनॉट्स हीरो बन गए. लोग उन जैसा बनना चाहते थे. अमेरिकी जनता और अमेरिकी मीडिया शुरू से ही लगातार इस पूरी स्पेस रेस में बेहद दिलचस्पी ले रही थी. सरकार पर दबाव बना रही थी. सोवियत की हर उपलब्धि पर वहां सवाल होते थे. सरकार को जवाब देना पड़ता था. जमीन पर सोवियत और अमेरिका की तल्खियां चरम पर थीं. अंतरिक्ष में भी कुछ राहत नहीं थी. इन दोनों देशों ने हर मोर्चे पर जमकर दुश्मनी निभाई. दोनों एक-दूसरे से ऑब्सेस्ड थे. ये प्रतिस्पर्धा नहीं थी. ये दुश्मनी थी. दांत काटे की दुश्मनी.

बाईं ओर हैं अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज एच डब्ल्यु बुश और दाहिनी ओर सोवियत संघ के राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाचेव. ये तस्वीर 1991 में ली गई. मॉस्को में हाथ मिलाते हुए दोनों नेताओं की ये तस्वीर शीत युद्ध की सबसे प्रभावी तस्वीरों में से एक है.

हाथ मिलाया और रेस खत्म
साल 1975. अमेरिका और सोवियत का जॉइंट मिशन. अपोलो-सोयुज मिशन. अपोलो का स्पेसक्राफ्ट. सोवियत में बना सोयुज. दोनों यानों के अधिकारियों ने एक-दूसरे का अभिवादन किया. हाथ मिलाया. धरती की दुश्मनी को अंतरिक्ष में तिलांजलि दी गई. धरती पर दुश्मनी खत्म नहीं हुई थी. बराबर निभाई जा रही थी. उसे खत्म होने में वक्त लगा. बर्लिन की दीवार टूटी. सोवियत संघ टूटा. शीत युद्ध खत्म हुआ. स्पेस रेस में लोग अक्सर सोवियत को हारा हुआ खिलाड़ी बताते हैं. ऐसा नहीं है. कई अहम उपलब्धियां सोवियत के नाम हैं. पहली-पहली बार कई चीजें तो उसने ही की. शायद सोवियत को पीछे छोड़ने की ललक ही थी, जिसने अमेरिका को इतनी तेजी से पैर पसारने को मजबूर किया. बिना सोवियत के शायद ये सब मुमकिन नहीं हो पाता. सोवियत और अमेरिका की इस धक्कामुक्की में दुनिया को बहुत फायदा हुआ. अंतरिक्ष विज्ञान में इतनी तरक्की की इंसानों ने. देखा जाए, तो फायदा पूरी दुनिया का हुआ.

(सौजन्य: लल्लनटोप)