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दुनिया की सारी खूबसूरती समेटे है भारत के ये विश्वप्रसिद्ध आइलैंड्स। जानें इनका हर पहलू करीब से!

जब भी सिनेमा पर हम आइलैंड और बीच का नजारा देखते हैं हम यही सोचते हैं की जरूर यह कोई विदेशी जगह होगी, परंतु आपकी यही गलतफहमी को हम आज दूर कर रहे हैं। आज आपको लेकर चलते हैं भारत के विश्वप्रसिद्ध आइलैंड्स की सैर पर। जानिए इनको करीब से और अगली छुट्टियों में इनका करीब से दीदार करने का प्लान बनाइये!

लक्षद्वीप

अरब सागर में बसा लक्षद्वीप भारत की मुख्य भूमि सीमा से कटा हुआ है। नारियल और पाम के ख़ूबसूरत जंगल इस आइलैंड को और आकर्षक बनाते हैं। सरकार यहां पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए लगातार कोशिश कर रही है।

दीव

दीव को आप अनजाने में पुर्तगाल समझ सकते हैं। दीव के रेतीले मैदान, ऐतिहासिक इमारतें, गुजराती और पुर्तगाली संस्कृति का संगम पर्यटकों को किसी स्वप्न लोक की तरह लगते हैं।

दमन

इस आइलैंड को पुरानी इमारतें, नदियां, झरने और समंदर के ख़ूबसूरत नज़ारे बेहद ख़ास बनाते हैं। यहां दमनगंगा, मोती बीच, देविका बीच, जैमपोरे बीच पर पर्यटकों की भीड़ लगी रहती है। यहां किसी भी मौसम में आया जा सकता है।

माजुली आइलैंड

माजुली आइलैंड ब्रम्हपुत्र नदी का हिस्सा है। यह नदियों पर बसे सबसे बड़े आइलैंड्स में से एक है। गुवाहाटी से यहां आना बेहद आसान है। असमिया संस्कृति की झलक इस आइलैंड पर आपको मिल सकती है।

दीवर आइलैंड

मांडवी नदी में बसे इस आइलैंड पर प्रकृति मेहरबान है। बहुत दिनों तक सब इस जगह से अनजान थे। यहां लेडी ऑफ कम्पैशन और यूरोपियन हाउस लोग देखने आते हैं। फिल्म दिल चाहता है के कुछ सीन यहां शूट किए गए थे।

सेंट मैरी आइलैंड

वास्को डी गामा भारत इसी आइलैंड के रास्ते आया था। ये आइलैंड चार हिस्सों में बंटा है। कोकोनट, नॉर्थ, साउथ और दरया बहादुरगढ़ आइलैंड। इस आइलैंड के बारे में भारत में बहुत कम लोग जानते हैं।

बैरन आइलैंड

बैरन आइलैंड में लोग नहीं रहते। साउथ एशिया का यह इकलौता जीवित ज्वालामुखी है। यहां स्पेशल परमिट बनवाने पर केवल कुछ हिस्सों की सैर की जा सकती है।

ग्रेट निकोबार आइलैंड

निकोबार देश का सबसे खूबसूरत और बड़ा आइलैंड है। हर मौसम में लोग यहां आते हैं। यहां की खूबसूरती वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफी के लिए सबसे अनुकूल जगह है। यहां आप किसी भी मौसम में आ सकते हैं।

तो फिर हमें बताइए कौनसा आइलैंड आपको सबसे ज्यादा पसंद आया और अगर सोच ही लिया तो फैसला भी करिए। किसी भी मार्गदर्शन के लिए हम सदैव आपके साथ हैं।

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स्वामी रामदास 12 साल की उम्र में घर त्यागकर बने थे संत, हनुमान अवतार के रूप में होती है पूजा

9 फरवरी को स्वामी रामदास की जयंती है. स्वामी रामदास महाराष्ट्र के प्रसिद्ध सन्त थे. दक्षिण भारत में हनुमानजी के अवतार के रूप में उनकी पूजा की जाती है. वे छत्रपति शिवाजी के भी गुरु थे. उन्होंने मराठी भाषा में एक ग्रन्थ ‘दासबोध’ की रचना की थी. स्वामी रामदास को समर्थ रामदास के नाम से भी जाना जाता है. उनका जन्म 9 फरवरी, 1608 में हुआ था. उनके पिता का नाम सूर्याय पंत था. पिता सूर्यदेव के उपासक थे और प्रतिदिन ‘आदित्यह्रदय’ स्तोत्र का पाठ करते थे. उनकी माता का नाम राणुबाई था. माता भी सूर्य नारायण की उपासिका थीं. स्वामी रामदास के बड़े भाई का नाम गंगाधर था और वे भी अध्यात्मिक पुरुष थे.

मां की बात दिल से लग गई और बन गए संत
कहा जाता है कि मां की एक बात को उन्होंने दिल से लगा लिया. उसके बाद वे नारायण से संत बन गए. स्वामी रामदास के बचपन का नाम नारायण था. वे बहुत शरारती किया करते थे. गांव के लोग उनके शरारत की शिकायत किया करते थे. कहा जाता है कि एक दिन उनकी मां ने कहा कि नाराणय तुम पूरा दिन शरारत करते हो और तुम्हारे बड़े भाई घर परिवार की चिंता करते हैं. तुम्हें किसी की परवाह नहीं रहती. मां की यह बात सुनकर वे घर के एक कमरे में ध्यान लगाकर बैठ गए. पूरे दिन जब वह अपनी को दिखाई नहीं दिए तो शाम को उनकी खोज की जाने लगी. मां ने उन्हें एक कमरे में ध्यानमग्न अवस्था में देखा. इस पर उनकी मां ने पूछा कि यह क्या कर रहे हो तो उन्होंने जवाब दिया कि मैं पूरी दुनिया की चिंता कर रहा हूं.

12 साल की उम्र में घर को त्याग दिया था
स्वामी रामदास 12 साल की उम्र में घर को त्यागकर नासिक के टाकली गांव में आ गए. यहां पर उन्होंने कठोर तप शुरू किया. वे हर रोज सुबह उठकर 1200 सूर्यनमस्कार करते थे. उसके बाद गोदावरी नदी में खड़े होकर राम नाम और गायत्री मंत्र का जाप करते थे. कठोर तप के दौरान ही उन्होंने एक रामायण लिखा जो ‘करुणाष्टक’ नाम से प्रसिद्ध है. वे 12 साल तक कठोर तप करते रहे. 24 साल की उम्र में उन्हें आत्म साक्षात्कार हुआ.

राम नाम का जप करते हुए छोड़ दिया शरीर
स्वामी रामदास अपने जीवन के अंतिम समय में सतारा के पास एक किले पर थे. इस किले को सज्जनगढ़ के नाम से जाना जाता है. तमिलनाडू के एक कारीगर ने प्रभु श्री रामचंद्र, माता सीता और लक्ष्मण की मूर्ति बनाकर सज्जनगढ़ को भेज दी. इसी मूर्ति के सामने स्वामी रामदास ने अपने जीवन के अंतिम पांच दिन निर्जल उपवास किया. फिर रामनाम जाप करते हुए पद्मासन में बैठकर ब्रह्मलीन हो गए. यहीं पर उनकी समाधि है. उनका समाधी दिवस ‘दासनवमी’ के नाम से जाना जाता हैं.