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दीपिका पादुकोण शामिल हुई बैलाट्रिक्स एरोस्पेस के सीड फंडिंग इन्वेस्टर्स में। जानें क्या है इस स्पेस कंपनी की विशेषता!

फ्लिपकार्ट से भारत में शुरू हुआ स्टार्टअप युग अब और संभावनाएं लेकर आ रहा है, जहाँ परंपरागत उद्योगों से हटकर काम करने वाली अलग क्षेत्रों की कंपनियों को भी महत्व दिया जा रहा है। आज हम आपको बताएंगे बैलाट्रिक्स एरोस्पेस के बारे में जिसने बॉलीवुड की शीर्ष अदाकारा दीपिका पादुकोण को भी अपने सीड राउंड में इन्वेस्ट करने को राजी कर लिया है।

Bellatrix logo

रोहन स. गणपति(CEO), यशस कर्णम और नूथन प्रसन्ना ने मिलकर 2015 में बैलाट्रिक्स एरोस्पेस की शुरुआत की और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस, बैंगलोर से इन्क्यूबेशन प्राप्त किया। वहाँ इनको अच्छा मार्गदर्शन मिला और अपनी कंपनी के लिए नई प्रतिभाओं को भी शामिल किया।

Bellatrix founders

हाल ही में बैलाट्रिक्स एरोस्पेस ने अपनी सीड फंडिंग के लिए कई जगह अप्रोच किया और इनकी प्रतिभा का कमाल ही है कि, दीपिका पादुकोण सहित, IDFC परंपरा, StartupXseed, Karsemven Fund, Survam Partners, GrowX Ventures, CIEE(IIM-A) और SINE(IIT-B) ने सम्मिलित रूप से 3 मिलियन डॉलर इन्वेस्ट किया।

Bellatrix founders Forbes
Forbes founders under 30

बैलाट्रिक्स एरोस्पेस ने इको-फ़्रेंडली इलेक्ट्रिक बेस्ड प्रोपल्शन सिस्टम तैयार किया है जो कि माइक्रोवेव प्लाज्मा थ्रस्टर(MPT) के नाम से जाना जाता है। इस नवीन सिस्टम की बदौलत सैटेलाइट को स्पेस में ले जाना अधिक सस्ता हो जाएगा। इनको मई 2017 में नेशनल टेक्नोलॉजी डे पर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा सम्मानित किया गया।

Bellatrix awarded by President of India

हम आपको बता दें कि भारत मे और भी स्टार्टअप हैं जो स्पेस टेक्नोलॉजी में क्रांतिकारी शोध करने का कार्य कर रहे हैं जिनमें Deep Space, Momentus Space Industries और Tethers Unlimited प्रमुख कंपनियां हैं।

Bellatrix chetak rocket
Bellatrix Rocket Chetak
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जब ब्रह्मांड नहीं था, तब क्‍या था? स्‍टीफन हॉकिंग ने खोला राज!

बिगबैंग थ्‍योरी के बारे में तो आप शायद जानते ही होंगे। हमारा संसार, आकाश गंगाएं, सौरमंडल और सारे ग्रह Big Bang के कारण अपने अस्तित्‍व में हैं। सालों से वैज्ञानिक यही मानते और बताते चले आ रहे हैं कि इस संसार में सबसे पहले बिगबैंग हुआ और उसके कारण ही पूरे ब्रह्मांड का उदय हुआ। अब दुनिया के फेमस वैज्ञानिक स्‍टीफन हॉकिंग ने वो राज खोला है, जिसे पूरी दुनिया बरसों से जानता चाहती है। स्‍टीफन हॉकिंग ने हाल ही में बिगबैंग के पहले के संसार के बारे में कुछ ऐसा बताया है, जिसे जानकर विज्ञान भी अचंभित है।

बिगबैंग के पहले क्‍या था संसार में? स्‍टीफन हॉकिंग ने किया खुलासा

आज से करीब 13.8 अरब साल पहले ब्रह्मांड बहुत छोटे से आकार से बढ़ना शुरु हुआ था। फिर बहुत ज्‍यादा तापमान और फोर्स के दम पर इसका आकार बढ़ना शुरु हुआ। इसके बाद अणुओं को आपस में मिलना शुरु हुआ। पहले उनका आकार बहुत बढ़ा और फिर उनका विघटन शुरु हुआ, जिससे तमाम तारा मंडल, ग्रह और आकाश गंगाएं अस्तित्‍व में आईं। यही बिगबैंग था, जिससे हमारा संसार बना और आजतक ब्रह्मांड का आकार धीरे धीरे बढ़ रहा है। पूरी दुनिया के वैज्ञानिक ब्रह्मांड के बारे में यही जानते हैं, लेकिन इस बिगबैंग के पहले क्‍या था या कहें कि दुनिया कैसी थी, इस पर अब तक वैज्ञानिक कुछ खास नहीं जान सके हैं और इस पर वैज्ञानिकों की बहस का कोई रिजल्‍ट नहीं निकल पाया है। इसी बीच वर्ल्‍ड फेमस वैज्ञानिक स्‍टीफन हॉकिंग ने टीवी शो StarTalk पर खुलासा करते हुए बताया है कि बिगबैंग के पहले आखिर क्‍या हुआ करता था।

क्‍या बताया स्‍टीफन हॉकिंग ने

वैज्ञानिक स्‍टीफन हॉकिंग ने इस शो के होस्‍ट और एस्‍ट्रोफिजीसिस्‍ट नील डिग्रास से बात करते हुए बताया कि बिगबैंग के पहले क्‍या था, इस बारे में मेरा यह कहना है कि वो जितना आसान था उतना ही ज्‍यादा कॉम्‍प्‍लेक्‍स था, क्‍योंकि वास्‍तव में बिगबैंग से पहले कुछ नहीं था। हॉकिंग ने कहा कि एल्‍बर्ट आइंसटाइन की जनरल थ्‍योरी ऑफ रिलेटीविटी के अनुसार स्‍पेस और टाइम ने साथ मिलकर दुनिया में स्‍पेस और समय का कभी न रुकने वाला चक्र बनाया है, लेकिन सच में वो बिल्‍कुल सपाट नहीं है बल्कि ऊर्जा और भौतिक पदार्थ के दबाव के कारण ये आपस में घूमा हुआ है। यहीं वजह है कि इसे समझ पाना आसान नहीं है।

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स्‍टीफन हॉकिंग ने बताया, बिगबैंग के पहले समय’ का भी अस्तित्‍व नहीं था

बिगबैंग के पहले की दुनिया को लेकर स्‍टीफन हॉकिंग ने एक काफी नया विचार इस रखा है जो चौंकाने वाला है। उनका कहना है कि बिगबैंग के पहले टाइम यानि समय का भी कोई अस्तित्‍व नहीं था। वो कहते हैं कि Einstein के सिद्धांत के मुताबिक ब्रह्मांड की उत्‍पत्ति के समय संसार में मौजूद सभी भौतिक पदार्थ और ऊॅर्जा बहुत ही छोटी जगहों पर केंद्रित थी, लेकिन उनकी यह थ्‍योरी बिगबैंग के पहले और बाद की कंडीशन के बीच कोई गणितीय लिंक नहीं बताती।

स्‍टीफन हॉकिंग की थ्‍योरीज दुनिया के लिए अचंभा

वैसे तो स्‍टीफन हॉकिंग हमारी दुनिया और हमारे भविष्‍य के बारे में इससे पहले भी बहुत कुछ बता चुके हैं। जैसे कि उनका मानना है कि कोई भी एलियन प्रजाति हम इसांनो को खत्‍म नहीं करेंगे, बल्कि विज्ञान द्वारा बनाया गया आर्टीफिशियल इंटेलीजेंस ही धरती पर हम इसांनों को रिप्‍लेस कर देगा। उनका तो यह भी कहना है कि इंसानों जल्‍दी से जल्‍दी इस धरती को छोड़ देना चाहिए। स्‍टीफन हॉकिंग के लॉजिक्‍स भले ही कई बार आम लोगों को समझ नहीं आते हैं, लेकिन वैज्ञानिक उनके दिमाग का लोहा मानते हैं।

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मस्क का एक और करिश्मा: अंतरिक्ष में भेजा गया दुनिया का सबसे ताकतवर रॉकेट, मकसद है बेहद खास

बिजनेस टाइकून एलन मस्‍क की दिग्‍गज कंपनी ‘स्‍पेसएक्‍स’ ने दुनिया के सबसे ताकतवर रॉकेट ‘फॉल्‍कन हैवी’ को सफलतापूर्वक अंतरिक्ष में भेजकर इतिहास रच दिया है। मंगल पर मानव बस्‍ती बसाने की मस्‍क की महत्‍वाकांक्षी योजना की दिशा में यह पहला महत्‍वपूर्ण कदम है। इसके साथ एक दिलचस्‍प बात ये भी है कि इस रॉकेट के साथ एक स्‍पोर्ट्स कार को भी अंतरक्षि में भेजा गया है और ये भी गौर फरमाने वाली बात है कि पहली बार किसी प्राइवेट कंपनी ने बिना किसी सरकारी मदद से इतना बड़ा रॉकेट लॉन्‍च किया है। यह भी कहा जा रहा है कि इस रॉकेट को किसी 23 मंजिला इमारत के बराबर माना जा सकता है।

‘फॉल्‍कन हैवी’ के लॉन्‍च का हुआ लाइव प्रसारण

फॉल्‍कन हैवी को फ्लोरिडा के कैनेडी अंतरिक्ष केंद्र से भारतीय समयानुसार मंगलवार देर रात 2 बजकर 25 मिनट पर लॉन्‍च किया गया और स्‍पेसएक्‍स ने इस पूरी प्रकिया का लाइव प्रसारण किया। इसको लेकर लोगों में जबरदस्‍त उत्‍साह देखने को मिला। फॉल्‍कन हैवी के लांच होने के बाद स्पेसएक्स के कमेंटेटर लॉरेन लियॉन्स ने कहा, ‘वाह, क्या आप लोगों ने देखा? यह बेहद शानदार था।’

स्‍पेसएक्‍स का है सबसे महत्‍वाकांक्षी प्रोजेक्‍ट

फॉल्‍कन हैवी पृथ्वी की ऑर्बिट से मंगल की ऑर्बिट तक चक्कर लगाता रहेगा। मस्‍क ने बताया था कि अपने ऑर्बिट में पहुंचने के बाद इसकी रफ्तार 11 किलोमीटर/सेकंड की होगी। हालांकि इसमें किसी इंसान को नहीं, बल्कि फ्यूचर स्‍पेस सूट पहने एक पुतले को भेजा गया है। यह स्‍पेसएक्‍स का अब तक का सबसे महत्‍वाकांक्षी प्रोजेक्‍ट है और विशेषज्ञों ने इसकी सराहना करते हुए इसे गेम-चेंजर करार दिया है।

इस वजह से नासा की भी है इस पर नजर

नासा की भी इस पर नजर है। चांद-मंगल पर लोगों को भेजने के मकसद को देखते हुए वह भी इस ताकतवर रॉकेट का इस्‍तेमाल कर सकता है। स्‍पेसएक्‍स का दावा है कि यह मौजूदा समय में इस्तेमाल हो रहे सबसे पॉवरफुल रॉकेट डेल्टा-4 हैवी से दोगुना वजन ले जा सकता है। मस्क ने यह दावा भी किया था कि यह रॉकेट मनुष्यों को चांद और मंगल ग्रह तक ले जा सकेगा। उन्‍होंने बताया था कि फॉल्कन हैवी को ठीक उसी जगह से लॉन्च किया जाएगा, जहां से ‘सैटन 5 अपोलो 11 मून रॉकेट’ को लॉन्च किया गया था।

जानिए क्‍या है ‘फॉल्‍कन हैवी’ की खासियत

पिछले साल दिसंबर में मस्क ने 27 मर्लिन इंजन वाले इस रॉकेट की तस्‍वीरें सोशल मीडिया पर साझा की थीं। इसे फॉल्कन 9 नामक तीन रॉकेट को मिलाकर बनाया गया है। यह 40 फीट चौड़ा व 230 फीट लंबा है और इसका कुल वजन 63.8 टन है, जो दो स्पेस शटल के वजन के बराबर है। जमीन से उठने पर यह 50 लाख पाउंड का थ्रस्ट पैदा करता है जो बोइंग 747 एयरक्राफ्ट के 18 प्लेन द्वारा मिलाकर पैदा करने वाले थ्रस्ट के बराबर है। इससे लगभग एक लाख 40 हजार पाउंड का वजन अंतरिक्ष में भेजा जा सकता है।

इस रॉकेट का हो सकता है दोबारा इस्‍तेमाल

स्पेसएक्स काफी लंबे समय से ऐसे रॉकेट पर प्रयोग कर रही थी, जिसे एक से अधिक बार इस्तेमाल किया जा सके। मगर उसे सफलता अब जाकर मिली है। कंपनी का दावा था कि दोबारा इस्तेमाल होने वाले रॉकेट से इसकी लॉन्चिंग पर होने वाले खर्च में काफी कमी आएगी। यूरोपियन स्पेस एजेंसियां, रूस और जापान भी इस टेक्नोलॉजी पर काम कर रहे हैं, मगर अभी वह प्रायोगिक दौर में ही हैं। आपको बता दें कि अंतरिक्ष में किसी सेटेलाइट को स्थापित करने के लिए रॉकेट की सहायता ली जाती है। इसलिए ऐसे अनुसंधानों पर प्रोग्राम से ज्यादा खर्च स्थापित करने वाले सेटेलाइट व्हिकल पर होता है।

सैटर्न-5 था अब तक का सबसे शक्तिशाली रॉकेट

आपको बता दें कि सैटर्न-5 अब तक का सबसे शक्तिशाली रॉकेट था, जिसका अब इस्तेमाल बंद हो गया है। सैटर्न-5 में 140 टन पेलोड ले जाने की ताकत थी। नासा ने सैटर्न-5 की मदद से ही चांद पर खोज के लिए कई मिशन भेजे थे। स्काईलैब भी इसी से लॉन्च की गई थी। यह 1973 तक प्रचलन में था।

अंतरिक्ष में भेजी गई मस्‍क की रोडस्टर कार भी

फॉल्‍कन हैवी के साथ मस्‍क की रोडस्‍टर कार को भी अंतरिक्ष में भेजा गया। ऐसा पहली बार हुआ है। मस्क ने इस बारे में बताया था कि वह फॉल्‍कन हैवी के साथ मंगल ग्रह की ओर अपनी टेस्ला कंपनी की रोडस्टर कार भी लॉन्च करेंगे। यह एक स्पो‌र्ट्स कार है और एक बार चार्जिंग में यह एक हजार किमी की यात्रा कर सकती है। वहीं 1.9 सेकंड में 0 से 100 किमी प्रतिघंटे की रफ्तार पकड़ सकती है। इस कार की अधिकतम रफ्तार 400 किमी प्रतिघंटे है।

मंगल-चांद पर मानव बस्‍ती बसाना है सपना

पृथ्‍वी से इतर दूसरे ग्रहों पर जीवन की संभावनाओं को ले‍कर पिछले काफी लंबे दशक से दुनियाभर में शोध और प्रयोग होते आ रहे हैं। खास तौर से सभी की नजरें मंगल और चांद पर मानव बस्‍ती बसाने पर टिकी हुई है। स्‍पेसएक्‍स के सीईओ मस्‍क का भी यह सपना है और इस सपने को पूरा करने की दिशा में उन्‍होंने अपना पहला कदम बढ़ा दिया है और इसमें उन्‍हें सफलता भी मिल गई है। फाल्‍कन हैवी को लॉन्‍च करने का मुख्‍य मकसद मंगल और चांद पर लोगों को भेजना और वहां मानव बस्‍ती बसाना ही है। यह लोगों के लिए भी बेहद रोमांचकारी है, मगर देखना होगा कि मस्‍क का यह सपना पूरा होता है या नहीं।

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ISRO ने लॉन्‍च किया 100वां सैटेलाइट, अंतरिक्ष जगत में भारत की उपलब्धि से घबराया पाकिस्‍तान

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने शुक्रवार को अपने अंतरिक्ष केंद्र से दूर संवेदी कार्टोसैट -2 और 30 अन्य उपग्रहों को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित किया। ऐसे में ISRO ने अपना 100वां सैटलाइट सफलतापूर्वक स्पेस में लॉन्च कर दिया है। इसरो के पूर्व चेयरमैन ए.एस. किरण कुमार ने चेन्नई से लगभग 80 किलोमीटर दूर पूर्वोत्तर में मिशन नियंत्रण केंद्र में बताया, ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान (पीएसएलवी-सी40) ने भारत के 710 किलोग्राम वजनी कार्टोसैट और 10 किलोग्राम नैनो उपग्रह और 100 किलोग्राम वजनी माइक्रो उपग्रह सहित 28 विदेशी उपग्रहों को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित किया।

श्रीहरिकोटा हाई आल्टीट्यूड रेंज (एसडीएससी-एसएचएआर) के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से प्रक्षेपण के लगभग 17 मिनट और 33 सेकंड के बाद 320 टन वजनी रॉकेट ने काटरेसैट-2 को सूर्य की तुल्यकालिक कक्षा में स्थापित किया। कार्टोसैट-2 ने सूर्य की 505 किलोमीटर कक्षा में प्रवेश किया और यह पांच वर्षो की अवधि तक यहां रहेगा। 100 किलोग्राम वजनी माइक्रो उपग्रह ने पृथ्वी से 359 किलोमीटर की ऊंचाई पर सूर्य की तुल्यकालीक कक्षा में प्रवेश किया। इसकी लॉन्चिंग के बाद ही पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय की ओर से बयान आया कि भारत के इस सैटेलाइट क्षेत्र के स्‍थायित्‍व के लिए संकट पैदा होने की आशंका तक जता दी। पाकिस्तान के मुताबिक, दोहरी प्रकृति वाले सेटलाइट से क्षेत्र की सामरिक स्थिरता पर नकारात्मक असर पड़ेगा।

बता दें कि यह 2018 का पहला अंतरिक्ष मिशन है, जो कि हमारे देश की नए साल की नई उपलब्धि है। यह हमारे लिए बेहद गौरवान्वित करने वाली बात है। गौरतलब है कि इससे पहले 31 अगस्त, 2017 को पीएसएलवी-सी39 मिशन असफल हो गया था। किरण कुमार ने कहा, हमने यह सुनिश्चित करने के लिए कड़े प्रबंध किए थे कि पिछले मिशन (पीएसएलवी-39) की असफलता का कारण बनी हीट शील्ड संबंधी समस्या फिर सामने न आए। इसरो ने कुल 31 उपग्रह प्रक्षेपित किए हैं, जिनमें से कार्टोसैट-2, नैनो उपग्रह और माइक्रो उपग्रह भारत के हैं। कुमार ने कहा कि मिशन केंद्र से की जा रही निगरानी से पता चला है कि स्थापित किया गया काटरेसैट-2 संतोषजनक प्रदर्शन कर रहा है।

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अंतरिक्ष की जंग: जिसे शुरू रूस ने किया और अंजाम अमेरिका ने

रहस्य से आश्चर्य पैदा होता है. इंसान के अंदर जो समझने की ललक पैदा होती है, उसे पैदा करने वाला ये आश्चर्य ही है.

                                                                                      – नील आर्मस्ट्रॉन्ग (चांद पर कदम रखने के बाद)


 

जो पंछी हर साल एक मौसम के बाद गायब हो जाते हैं, वो दरअसल चांद चले जाते हैं. फिर वहां से लौटकर धरती वापस आते हैं.

                                                                                       – चार्ल्स मॉर्टन, ब्रिटिश वैज्ञानिक, 17वीं सदी

चांद सदियों तक लोगों के लिए पहेली बना रहा. किसी को उसमें अपनी माशूका का चेहरा नजर आता. कभी चरखा कातती बुढ़िया. किसी को लगता, वहां परियां रहती हैं. किसी को कलंक नजर आता. कभी उसकी पूजा हुई. कभी उससे डर लगा. लोग तरह-तरह की बातें करते चांद के बारे में. चार्ल्स मॉर्टन की भी अपनी थिअरी थी. उनको लगता है, माइगेट्री पंछी चांद चले जाते हैं. तभी साल के बाकी महीने नहीं दिखते. इन सबका दिल टूट गया. उस दिन जब नील आर्मस्ट्रॉन्ग नाम का एक शख्स चांद पर उतरा. उसने बताया, चांद तो उजाड़ है. चांद के इस सफर की शुरुआत हुई थी 4 अक्टूबर, 1957 को. बस चांद की ही क्यों? हम जो किसी दिन सूरज पर जा पहुंचे, उसकी शुरुआत भी इसी दिन में छुपी हुई है.


 

चाहे चांद पर इंसान के पहुंचने की कहानी हो, या मंगल का मिशन, या फिर भविष्य की तमाम योजनाएं और सफलताएं, उन सबकी शुरुआत इसी 4 अक्टूबर की तारीख में छुपी है.

60 साल पहले शुरू हुआ था ये सफर, जो अब सूरज पहुंचने की तैयारी में है
4 अक्टूबर, 1957, 60 साल, इस दिन सोवियत संघ ने पहला कृत्रिम उपग्रह छोड़ा था, अंतरिक्ष में. सैटेलाइट का नाम था स्पूतनिक. रूसी भाषा में यात्री के लिए ये ही शब्द है. इंसानों के हाथों बनी पहली ऐसी कृत्रिम चीज, जिसे पृथ्वी की कक्षा में स्थापित किया गया था. इस तारीख ने यूं ही नहीं इतिहास बनाया. स्पूतनिक की लॉन्चिंग के साथ ही एक स्पेस ऐज शुरू हुआ. अंतरिक्ष युग. अमेरिका और सोवियत के बीच. स्पूतनिक की लॉन्चिंग की खबर सुनकर दुनिया भौंचक्की रह गई. अमेरिका को तो झटका लग गया. दोनों के बीच एक जंग जमीन पर चल रही थी. स्पूतनिक के बाद ये जंग अंतरिक्ष में पहुंच गई. होड़ लग गई दोनों में. आगे निकलने की. आज NASA का नाम कितनी मुहब्बत से लेते हैं हम. ये NASA भी इसी स्पेज ऐज की पैदाइश है. अमेरिका की महत्वाकांक्षी औलाद. बड़ी उम्मीदों से पैदा किया गया था इसे. NASA ने भी उम्मीदों को साबित किया. बड़ी लायक औलाद निकला.

पश्चिमी जर्मनी की एक बच्ची बर्लिन वॉल को तोड़ने की कोशिश करती हुई. दूसरे विश्व युद्ध के बाद सोवियत और अमेरिका में जो कोल्ड वॉर शुरू हुआ, वो सोवियत के बिखरने पर ही खत्म हुआ.

सोवियत और अमेरिका, दोनों एक-दूसरे से ऑब्सेस्ड थे
दूसरा विश्व युद्ध खत्म हो गया था. धरती पर दो छोर हैं. उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव. अमेरिका और सोवियत भी ऐसे ही हो गए थे. पूंजीवादी अमेरिका. वामपंथी सोवियत. विचारधारा का अंतर तो था ही. एक-दूसरे से आगे निकलने की गलाकाट होड़ भी थी. ये वो दौर था, जब लगता था दुनिया में बस दो देश हैं. मेन हीरो. बाकी सारे देश सपोर्टिंग भूमिका में थे. जिंदगी का कोई ऐसा हिस्सा नहीं बाकी रहा, जहां सोवियत और अमेरिका में होड़ नहीं थी. हथियार की होड़. परमाणु शक्ति की होड़. सेना की होड़. कारोबार की होड़. अर्थव्यवस्था की होड़. जासूसी की होड़. कोवर्ट ऑपरेशन की होड़. धमकियों की होड़. अपना दबदबा बढ़ाने की होड़. अपने-अपनी विचारधारा को बेहतर साबित करने की होड़. दोनों पक्ष खुद को सवा शेर साबित करना चाहते थे.

स्पेस एजेंसी नासा उसी धक्कामुक्की के दौर की निशानी है. इसपर अमेरिका को रेस में आगे ले जाने की जिम्मेदारी थी.

फिर आया स्पूतनिक, इस सरप्राइज से बौखला गया अमेरिका
स्पूतनिक की लॉन्चिंग सरप्राइज जैसी थी. 18,000 मील प्रति घंटे की रफ्तार थी इसकी. दूरबीन लगाकर देखने से दिखता था. सूरज उगने से पहले और सूरज डूबने के बाद. ये सैटेलाइट धरती पर रेडियो सिग्नल भेजता था. इतने मजबूत सिग्नल कि नए सीखे रेडियो ऑपरेटर भी कैच कर लेते थे. अमेरिका में जिनके पास ऐसे उपकरण थे, वो बड़े दंग थे. ये सैटेलाइट एक घंटे और 36 मिनट में धरती की एक बार परिक्रमा करता. अमेरिका भी तो इसी धरती पर है. सोवियत का ये सैटेलाइट रोजाना कई बार अमेरिका के ऊपर से भी गुजरता. बुरी तरह से कुढ़ गई थी अमेरिकी सरकार. सोवियत उनसे पहले अंतरिक्ष में जो पहुंच गया था. स्पूतनिक का काम तय था. इसके माध्यम से धरती और सौर मंडल पर अध्ययन किया जा रहा था. शक अजीब मर्ज है लेकिन. अमेरिकियों को लगता था कि सोवियत की साजिश है ये. सैटेलाइट के बहाने कुछ तो साजिश रची जा रही है.

स्पूतनिक औचक से आया. किसी ने उम्मीद नहीं की थी कि सोवियत इतनी जल्दी और यकायक इतना आगे बढ़ जाएगा. 4 अक्टूबर, 1957 की ये तारीख ऐतिहासिक थी.

पहली दौड़ तो बेशक सोवियत ने ही जीती थी
अमेरिका ने जिस पहले उपग्रह की योजना बनाई थी, उससे करीब 10 गुना बड़ा था स्पूतनिक. उसे भी 1958 में लॉन्च होना था. सोवियत की जीत तो हुई थी. उसने खबर तक नहीं लगने दी अपने इरादों की. चुपचाप काम करता रहा. सोवियत की इस तकनीकी श्रेष्ठता से अमेरिकी सरकार, सेना और वैज्ञानिकों की बहुत किरकिरी हुई. इसे दिल पर ले लिया उन्होंने. कसम खाई, सोवियत से पहले चांद पर पहुंचेंगे. सेना, सरकार और वैज्ञानिकों ने मिलकर सोवियत को हराने की रेस शुरू की. इसके साथ ही आगाज हुआ अंतरिक्ष की इस दौड़ का.

लाइका. ये ही कुत्ता था, जिसे स्पूतनिक 2 पर अंतरिक्ष में भेजा गया था.

दूसरी रेस भी सोवियत ने ही जीती
3 नवंबर, 1957. सोवियत ने अपना दूसरा उपग्रह छोड़ा. स्पूतनिक 2. बैक-टू-बैक. एक महीने से भी कम समय में दो सैटेलाइट. ये कोई साधारण उपग्रह नहीं था. सोवियत ने इसके साथ एक कुत्ते को भी भेजा था. मैं जब कभी इसके बारे में पढ़ती हूं, मन मसोस जाता है. लाइका नाम था उस कुत्ते का. उसे वन-वे सफर पर भेजा गया था. मालूम था, जिंदा नहीं लौटेगा. लाइका पहला जीव था, जिसने अंतरिक्ष से पृथ्वी की परिक्रमा की. कहते हैं, लाइका को कोई तकलीफ नहीं हुई होगी मरते समय. जो भी हो. मिशन पर भेजे जाने की अनुमति तो किसी ने नहीं ली होगी उससे.

जब स्पूतनिक 2 लाइका को लेकर अंतरिक्ष गया, तो दुनिया में जैसे तहलका मच गया. पहला मौका था जब किसी जीव ने स्पेसक्राफ्ट में धरती की परिक्रमा की. अखबार में छपी ये खबर उसी मौके की है.

1958 में अमेरिका ने छोड़ा अपना पहला उपग्रह
31 जनवरी, 1958. वो तारीख जब अमेरिका ने अपना पहला सैटेलाइट छोड़ा. एक्सप्लोरर. जब तक अमेरिका ने अपना पहला कदम रखा, सोवियत आगे बढ़ गया था. ये जख्म पर मिर्च छिड़कने जैसी स्थिति थी.

बचपन में पढ़ा है कई बार. अंतरिक्ष में जाने वाले पहले शख्स का नाम यूरी गागरिन था. चांद पर कदम रखने वाले पहले शख्स का नाम नील आर्मस्ट्रॉन्ग था. इन दोनों के बीच का जो फासला था, वो स्पेस रेस का चरम है.

पहली-पहली बार करने के कई रेकॉर्ड तो सोवियत के ही नाम हैं
सोवियत का सिक्का जम गया था. उसे जैसे जुनून सवार था. पहली-पहली बार हासिल करने का. ऐसी कई उपलब्धियां सोवियत के नाम हैं. जिन्हें बचपन से ही हम सब सामान्य ज्ञान की किताबों में रटते आ रहे हैं.

अंतरिक्ष में जाने वाला पहला इंसान: यूरी गागरिन (रूस)
अंतरिक्ष में जाने वाली पहली महिला: वेलेंतिका तेरेशकोवा (रूस)
अंतरिक्ष में पहली बार चलने वाला शख्स: ऐलेक्सी लियोनोव (रूस)
चांद पर जाने वाला पहला अंतरिक्षयान: लूना 2
शुक्र की सतह पर भेजा गया पहला स्पेसक्राफ्ट:वेनेरा 3

इंसान भले ही अब अंतरिक्ष में काफी आगे निकल गया हो, लेकिन चांद पर पहला कदम रखने का अनुभव सबसे यादगार रहेगा.

फिर आया अमेरिका का दौर, सौ सोनार की और एक लोहार की
1960 के आखिरी सालों में अमेरिका ने बड़ा कदम बढ़ाया. राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी ने कहा था. दशक खत्म होने से पहले इंसान को चांद पर उतारेंगे. 1962 में जॉन ग्लेन पहले ऐसे अमेरिकी व्यक्ति बने, जिन्होंने स्पेसक्राफ्ट में धरती की परिक्रमा की. फिर आया NASA का ऐतिहासिक अपोलो मिशन. 1961 से 1964 के बीच अमेरिकी सरकार ने NASA का बजट करीब 500 फीसद बढ़ा दिया. चांद के मिशन के लिए NASA में करीब 34,000 कर्मचारी काम कर रहे थे. कॉन्ट्रैक्ट पर करीब पौने चार लाख लोग भी काम में लगाए गए थे. 1967 में अपोलो मिशन को झटका लगा. तीन अंतरिक्षयात्री मारे गए. सोवियत का लूनर मिशन उतना तेज नहीं था. सोवियत में इसे लेकर बहस थी. इसकी जरूरत है या नहीं, इसे लेकर. फिर सोवियत स्पेस प्रोग्राम के मुख्य इंजीनियर सेरेगी कोरोलोव की असमय मौत होने से भी सोवियत को धक्का लगा.

न वेकल सोवियत और अमेरिका की सरकारें, बल्कि दोनों देशों के लोग और मीडिया भी इस जंग का हिस्सा बन चुके थे. दोनों को एक-दूसरे से पिछड़ना किसी भी सूरत में मंजूर नहीं था.

ऐतिहासिक था वो दौर, पहली बार चांद पर उतरा था इंसान
दिसबंर 1968. इंसानों को लेकर पहला स्पेसक्राफ्ट चांद के लिए रवाना हुआ. इसे चांद की परिक्रमा करनी थी. 16 जुलाई, 1969. अपोलो 11 मिशन की रवानगी हुई. इसमें थे नील आर्मस्ट्रॉन्ग, ऐडविन अल्ड्रिन और माइकल कोलिन्स. 20 जुलाई को ये अंतरिक्षयान चांद की सतह पर पहुंचा. नील आर्मस्ट्रॉन्ग चांद की सतह पर कदम रखने वाले पहले इंसान बने. ये इतिहास था. सदियों से हम इंसान चांद को सिर उठाकर देखते आए थे. जाने कैसी-कैसी कल्पना करते थे. कविताओं में, कहानियों में, जाने कितने तरह की उपमाएं जोड़ते थे चांद के नाम पर. उसी चांद पर इंसानों ने कदम रखा. जब भी इंसानों की सबसे बड़ी उपलब्धियों की बात होगी, इस तारीख का जिक्र किया जाएगा. नील आर्मस्ट्रॉन्ग की वो तस्वीर पूरी इंसानी सभ्यता के सबसे यादगार पलों में से एक है.

सोवियत ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया, लेकिन चांद पर उतरने की उसकी कोशिशें लगातार नाकाम होती गईं.

चांद पर क्या पहुंचा अमेरिका, लगा दौड़ खत्म हो गई
स्पूतनिक के साथ दौड़ शुरू हुई. अपोलो ने इसे अंजाम पर पहुंचाया. वो कहते हैं ना, तुमने शुरू किया है लेकिन खत्म मैं करूंगा. वैसे ही. सोवियत में रेस में बने रहने की पुरजोर कोशिश की. 1969 से 1972 के बीच चार बार कोशिश की. चांद की सतह पर स्पेसक्राफ्ट लैंड करने की. हर बार नाकामयाबी हाथ लगी. जुलाई 1969 में लॉन्चिंग के वक्त जोरदार धमाका हुआ. सोवियत ने बहुत हाथ-पैर मारे आगे आने के लिए. कामयाब नहीं हो सका पर. एक बार जो पिछड़ा, तो पिछड़ ही गया. ऐस्ट्रोनॉट्स हीरो बन गए. लोग उन जैसा बनना चाहते थे. अमेरिकी जनता और अमेरिकी मीडिया शुरू से ही लगातार इस पूरी स्पेस रेस में बेहद दिलचस्पी ले रही थी. सरकार पर दबाव बना रही थी. सोवियत की हर उपलब्धि पर वहां सवाल होते थे. सरकार को जवाब देना पड़ता था. जमीन पर सोवियत और अमेरिका की तल्खियां चरम पर थीं. अंतरिक्ष में भी कुछ राहत नहीं थी. इन दोनों देशों ने हर मोर्चे पर जमकर दुश्मनी निभाई. दोनों एक-दूसरे से ऑब्सेस्ड थे. ये प्रतिस्पर्धा नहीं थी. ये दुश्मनी थी. दांत काटे की दुश्मनी.

बाईं ओर हैं अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज एच डब्ल्यु बुश और दाहिनी ओर सोवियत संघ के राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाचेव. ये तस्वीर 1991 में ली गई. मॉस्को में हाथ मिलाते हुए दोनों नेताओं की ये तस्वीर शीत युद्ध की सबसे प्रभावी तस्वीरों में से एक है.

हाथ मिलाया और रेस खत्म
साल 1975. अमेरिका और सोवियत का जॉइंट मिशन. अपोलो-सोयुज मिशन. अपोलो का स्पेसक्राफ्ट. सोवियत में बना सोयुज. दोनों यानों के अधिकारियों ने एक-दूसरे का अभिवादन किया. हाथ मिलाया. धरती की दुश्मनी को अंतरिक्ष में तिलांजलि दी गई. धरती पर दुश्मनी खत्म नहीं हुई थी. बराबर निभाई जा रही थी. उसे खत्म होने में वक्त लगा. बर्लिन की दीवार टूटी. सोवियत संघ टूटा. शीत युद्ध खत्म हुआ. स्पेस रेस में लोग अक्सर सोवियत को हारा हुआ खिलाड़ी बताते हैं. ऐसा नहीं है. कई अहम उपलब्धियां सोवियत के नाम हैं. पहली-पहली बार कई चीजें तो उसने ही की. शायद सोवियत को पीछे छोड़ने की ललक ही थी, जिसने अमेरिका को इतनी तेजी से पैर पसारने को मजबूर किया. बिना सोवियत के शायद ये सब मुमकिन नहीं हो पाता. सोवियत और अमेरिका की इस धक्कामुक्की में दुनिया को बहुत फायदा हुआ. अंतरिक्ष विज्ञान में इतनी तरक्की की इंसानों ने. देखा जाए, तो फायदा पूरी दुनिया का हुआ.

(सौजन्य: लल्लनटोप)