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तीन दोस्तों द्वारा शुरू की गयी ऑनलाइन फ़ूड डिलीवरी कंपनी को मिला 1 अरब डॉलर का निवेश। जानें कैसे मिली इन्हें सफलता!

देश की सबसे बड़ी ऑनलाइन फ़ूड डिलीवरी कंपनी Swiggy को हाल ही में 1 अरब डॉलर का निवेश मिला है। इस निवेश में 66 करोड़ डॉलर का हिस्सा साउथ अफ्रीका की कंपनी नैस्पर का रहा जबकि बाकी निवेश टेंसेन्ट एंड हेज फंड्स और कैपिटल एंड वेलिंगटन मैनेजमेंट का रहा। इस नई फंडिंग के समय पांच साल पुरानी Swiggy की कीमत 3.3 अरब डॉलर आंकी गई। इसके साथ ही Swiggy भारतीय ऑनलाइन कम्पनियों में वैल्यूएशन के अनुसार छठे नंबर की स्टार्टअप कंपनी बन गई है।

सफलता की कहानी

Swiggy को तीन दोस्तों ने 5 साल पहले शुरू किया था। इस तिकड़ी में राहुल जैमिनी IIT खड़गपुर से, श्रीहर्ष IIT कलकत्ता से तथा नंदन रेड्डी BITS से स्नातक हैं। 5 डिलीवरी बॉयज से शुरू हुई Swiggy में अब 1.2 लाख डिलीवरी पार्टनर्स हैं और 42 शहरों के 50 हजार से ज्यादा रेस्त्रों स्विगी से जुड़े हुए हैं।

फ़ूड डिलीवरी मार्केट में स्विगी ने जोमाटो से जंग जीत ली है। गुरुग्राम की जोमाटो को 2018 में 41 करोड़ डॉलर की फंडिंग मिली जबकि स्विगी को तीन फंडिंग राउंड्स में 131 करोड़ डॉलर की फंडिंग मिली।

इस ताजा फंडिंग के बाद स्विगी ने बताया की अब वो डिलीवरी ओनली किचेन्स का विस्तार करेंगे, टीम को और मजबूती देंगे और साथ ही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर आधारित नेक्स्ट जेनेरेशन प्लेटफार्म बनाया जाएगा। आपको बता दें की स्विगी फ़िलहाल हर माह 2.5 करोड़ ऑर्डर पूरे कर रही है और भविष्य में इस आंकड़े को और बढ़ना स्वाभाविक है।

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महामानव की महाफिल्म #NarendraModi का क्या पड़ेगा चुनाव पर प्रभाव। सूक्ष्म विश्लेषण!

हमारे प्रिय प्रधानमंत्री मोदी जी पर बनी विवेक ओबरॉय द्वारा अभिनीत फ़िल्म #NarendraModi 11 अप्रैल को रिलीज़ हो रही है।

इस अनुपम व्यक्ति की महाकथा देखने को सभी देशभक्त उत्साहित हैं।
एक चाय वाले का बेटा, हिमालय में सिद्धि प्राप्त करने वाला योगी, माँ भारती का अनन्य सेवक, वर्ल्ड बैंक के कर्ज के नीचे दबे राज्य को एशिया का सबसे सफल राज्य बनाने वाला मुख्यमंत्री, पहली बार पूर्ण बहुमत से प्रधानमंत्री बनने वाला गैर-कांग्रेसी नायक और न जाने कितने ही रूप इस महामानव के व्यक्तित्व में आत्मसात हैं। इनको और जानने के लिए हर व्यक्ति इस फ़िल्म का इंतजार कर रहा है।

कांग्रेसी पंडितों ने फ़िल्म की रिलीज़ रोकने को एड़ी चोटी का जोड़ लगाया परन्तु वो इस फ़िल्म के पीछे की सद्भावना को नहीं जान सके। आप कांग्रेसी पंडित एक व्यक्ति की कथा से इतने भयभीत हैं कि आप अपनी हार पहले ही स्वीकार कर चुके हैं। सिर्फ मौका ढूंढ रहें हैं कि होने वाली हार का बहाना क्या बनाया जाए।

यदि फ़िल्म ही किसी चुनाव को प्रभावित कर सकती है तो ये रैली और प्रचार छोड़ कर सभी दलों को अपने नायकों पर फ़िल्म बना देनी चाहिए लेकिन यह तभी संभव है जब उनके नायकों में वह प्रतिभा हो और उन्होंने वह संघर्ष किया हो जिससे जनमानस प्रभावित हो।

सभी जानते हैं कि अन्य दलों के नायक या तो वंशवाद से बड़े बने हैं या फिर दुसरो का इस्तेमाल करके। कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने अपने वंश को ही धोका देकर सत्ता हतिया ली। फिर भी सब एक साथ इसलिए हैं क्योंकि इस महामानव को किसी भी तरह से हराना संभव नहीं है। यह फिजूल कोशिश सिर्फ इसलिए है की अपने दल की इज्जत बचाई जा सके।

जो पिछली बार 2014 में लहर थी अब वो सुनामी है और विश्व भर में मोदी जी की साख के आगे किसी का भी टिक पाना मुमकिन नहीं है।

इन सब बातों से दूर यह फ़िल्म आपके भीतर एक प्रेरणा को प्रज्वलित करेगी और आप भी अपनी वर्तमान परिस्थितियों पर पछताने को छोड़कर माँ भारती की सेवा करने को अग्रसर होंगे। फ़िल्म का आनंद उठाएं तथा औरों को भी माँ भारती की सेवा हेतु प्रेरित करें।

नोट: यह लेख AdTO.in के चीफ एडिटर के विचारों और शोध पर आधारित है। इसका किसी भी मीडिया समूह से कोई लेना-देना नहीं है और न ही किसी राजनीतिक दल के प्रभाव से शब्दों का चयन किया गया है।

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नवरात्रि के पहले दिन आज करें देवी शैलपुत्री की आराधना। कथा एवम् पूजा विधि!

नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की उपासना की जाती है। शैल का अर्थ पर्वत होता है और मां का ये स्वरुप हिमालय की पुत्री का है इसलिए देवी का नाम शैलपुत्री पड़ा। यह माता सती का ही रुप है। ऐसा माना जाता है कि प्रजापति दक्ष ने शिव का अपमान करने के लिए एक यज्ञ का आयोजन किया।

शिव और अपनी पु्त्री सती को इस यज्ञ में आमंत्रित नहीं किया। जब सती को इस बात का पता चला तो उन्होंने शिव से उस यज्ञ में जाने की आज्ञा मांगी लेकिन शिव ने उन्हें ऐसा करने से मना किया। बिना निमंत्रण कहीं जाना अच्छा नहीं माना जाता है।

फिर भी सती जिद्द कर शिव से आज्ञा ले यज्ञ में गई। वहां पहुंचने पर सभी अतिथियों ने उनका बिना बुलाएं आने पर अपमान किया। तब सती को एहसास हुआ कि उन्होंने शिव की बात न मान कर भूल की है। सती उस अपमान को सह न सकी और तुरन्त यज्ञाग्नि में कूद यज्ञ को भंग कर दिया।

शिव को जब इस घटना के बारे में पता चला तो अपने गणों को भेजकर यज्ञ को पूर्णत विध्वंस कर दिया। सती ने ही अगला जन्म पर्वतराज हिमालय के घर लिया। वहां मां का नाम शैलपुत्री रखा गया। इस स्वरुप में भी देवी ने शिव को ही अपना आराध्य माना।

प्रथम दिन मां की आराधना करने से कुंडलिनी शक्ति जागृत होती है जिससे रोग-शोक आदि का नाश होता है। भगवती का यह रुप अपने भक्तों के मन पर राज करता है। इस दिन योगी का मन मूलाधार चक्र में स्थित रहती है। इस स्थान पर देवी आद्य शक्ति कुंडलिनी के रुप में रहती है।

नवरात्रि में ऐसे करें पूजन-

  1. स्नानादि कर माता की चौकी पर जाएं।
  2. आसन लगाकर माता की प्रतिमा के समक्ष बैठे।
  3. सर्वप्रथम धूप, दीप और अगरबत्ती जलाएं।
  4. मां को पुष्पों की माला चढाएं।
  5. देवी की प्रतिमा को रोली का तिलक लगाएं।
  6. जिस देवी का व्रत हो, उस देवी के निमित्त 2 लौंग, पान, सपुारी, ध्वजा और नारियल चढ़ाएं।
  7. पूजन करने से पहले हाथ में चावल लेकर संकल्प करें।
  8. देवी के मंत्रों का उच्चारण करें।
  9. दुर्गा चालीसा, दुर्गा सप्तशती, महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र या दुर्गा स्तुति का पाठ करें।
  10. पाठ समाप्त होने पर आरती करें।
  11. देवी की प्रतिमा के सामने दण्डवत प्रणाम करें।
  12. भगवती के जयकारे लगाएं।
  13. जमीन पर थोड़ा जल डालकर उस जल का तिलक लगाएं। ऐसा न करने पर पूजा का फल आपको नहीं मिलेगा। क्योकि बिना जल का तिलक करें पूजा स्थल से उठने पर उस पूजा का फल इन्द्र देव ले लेते है।
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अविराम गौसेवा के लिए जर्मन मूल की मथुरा निवासी अम्मा जी को पद्मश्री। जानें गौसेवा से जुड़ी यह अनोखी दास्तां!

42 वर्षों से मथुरा में गोसेवा कर रही जर्मन मूल की सुदेवी गोवर्धन “अम्मा जी” को पद्मश्री मिलने पर बहुत बहुत बधाई।

पाँच बीघा के क्षेत्र में फैले सुरभि गौशाला का संचालन कर रही सुदेवी ने 1,500 से भी अधिक गायों को पाल रखा है, जिनकी वह लगातार देखभाल करती हैं। इन गायों में से अधिकतर बीमार, नेत्रहीन या अपाहिज हैं। इनमें से 52 गायें नेत्रहीन है जबकि 350 पैरों से अपाहिज है। उनके पैरों की नियमित मरहम-पट्टी की जाती है।

जर्मन महिला फ्रेड्रिन इरिन ब्रूनिंग उर्फ़ ‘सुदेवी दासी गोवर्धन’ को केंद्र सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित किया है। सुदेवी राधाकुंड धाम में विगत 42 वर्षों से गौसेवा कर रहीं हैं। बीमार और असहाय गायों की सेवा करने के कारण उन्हें ‘गायों की मदर टेरेसा’ भी कहा जाता है। उन्हें पद्म सम्मान मिलने का समाचार पाकर स्थानीय निवासी भी ख़ुश हुए और गौशाला पहुँच कर उन्होंने सुदेवी को माला पहनाकर सम्मानित किया। उन्हें शनिवार (मार्च 16, 2019) को राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद के हाथों पद्म श्री से सम्मानित किया गया।

सुदेवी के अनुसार, जब मंत्रालय द्वारा उन्हें पुरस्कार मिलने की जानकारी दी गई, तब उन्हें समझ नहीं आया कि क्या हो रहा है। फिर स्थानीय निवासियों ने उन्हें इस से अवगत कराया। ये तब की बात है, जब सरकार ने उन्हें पद्मश्री देने की घोषणा की थी।

अपने माता-पिता की इकलौती संतान फ्रेड्रिन 42 वर्ष पहले भारत भ्रमण पर आई थी। इस दौरान उन्होंने ब्रज आकर श्रीकृष्ण के भी दर्शन किए। कृष्ण-भक्ति ने उन्हें अपनी तरफ ऐसा खींचा कि उन्होंने भारत में रहने की ठान ली। ब्रज में उन्होंने एक गाय भी पाल रखी थी, जिसके बीमार होने के बाद उन्होंने उसकी काफ़ी देखभाल की। इसके बाद वह जहाँ भी बीमार गाय देखती, उसकी देखभाल और सेवा में लग जाती। इसके बाद तो जैसे उन्होंने गोसेवा को ही अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। उन्होंने अपना पूरा जीवन ही गोसेवा को समर्पित कर दिया।

सुदेवी के पिता तीस वर्ष पहले तक दिल्ली स्थित जर्मन दूतावास में कार्यरत थे। इकलौती संतान होने के कारण उन्होंने पिता से मिलने वाली सारी धनराशि को गोसेवा में ही ख़र्च किया। उनकी गौशाला में गायों के लिए एक स्पेशल एम्बुलेंस भी है। अगर किसी गाय की मृत्यु निकट आ जाए और उसके बचने की कोई संभावना न रहे, तब सुदेवी उसे गंगाजल का सेवन कराती है। मरणोपरांत गायों के शरीर का अंतिम संस्कार भी पूरे विधि-विधान के साथ संपन्न किया जाता है।

सुदेवी बताती हैं कि गायों की सेवा में हर महीने ₹35 लाख तक ख़र्च होते हैं। गायों का इलाज डॉक्टरों द्वारा करवाया जाता है। सुदेवी दानदाताओं और जर्मनी से आने वाले रुपयों की मदद से इस गौशाला का संचालन कर रहीं हैं। सुरभि गौशाला में 70 से 80 कर्मचारी कार्यरत हैं। किराए की भूमि पर गौशाला चला रहीं सुदेवी को उम्मीद है कि उन्हें इस पुरस्कार के मिलने के बाद गौशाला के लिए भूमि उपलब्ध कराई जाएगी। साथ ही, उन्होंने इस बात की भी उम्मीद जताई कि अब गोसेवा के रास्ते में आने वाली अड़चनें दूर होंगी।

सुदेवी ने बताया कि अगर गौशाला के लिए उन्हें भूमि मिल जाती है तो मासिक किराए में ख़र्च हो रहे रुपयों की बचत होगी और उसका उपयोग गौसेवा में किया जाएगा। हाल ही में जब उनके वीजा की अवधि समाप्त हो गई थी तब उन्होंने मथुरा की सांसद हेमा मालिनी से लेकर विदेश मंत्री सुषमा स्वराज तक के दरवाज़े खटखटाए थे। इसके बाद उन्हें वीजा मिल गया था। सुदेवी अविवाहित हैं और अभी भी एक झोपड़ी में ही रहती हैं। स्थानीय निवासियों ने उन्हें भारतीय नागरिकता देने की भी माँग की है। उनके अतुलनीय सेवा कार्य के लिए हम सदा आभारी रहेंगे।

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Elon Musk के बारे में हर वो बात जो आपको जरूर जाननी चाहिए

दुनिया का सबसे शक्तिशाली और दोबारा से इस्तेमाल किया जाने वाला रॉकेट फॉल्कन हैवी बनाने वाले करीब एक दर्जन कंपनियों के मालिक एलन मस्क के बारे में हम आज आपको हर वो बात बताएंगे जो आपको जरूर जाननी चाहिए।

बचपन में ही मिला कई देशों का अनुभव

एलन रीव मस्क 28 जून 1971 को दक्षिण अफ्रीका के प्रिटोरिया में एक कनाडाई- अफ़्रीकी दंपति के यहाँ जन्मे एक सुप्रसिद्ध बिजनेस टायकून हैं। एलन की माँ एक मॉडल और डाइटीशियन रहीं थीं वहीं एलन के पिता एक इलेक्ट्रोकेमिकल इंजीनियर, पायलट और सेलर थे। 1980 में इनके माता-पिता का तलाक होने के बाद ये पिता के साथ प्रिटोरिया में रहे। स्कूल में पढ़ने वाले एलन के सहपाठी इनकी अक्सर पिटाई कर दिया करते थे। एक बार तो एलन को हॉस्पिटल भी जाना पड़ा जब सहपाठियों द्वारा इन्हें सीढ़ियों से नीचे फेंक दिया गया और बेहोश होने तक पिटाई की गई। कंप्यूटर में रूचि इनकी बचपन से थी। मात्र 10 वर्ष की छोटी उम्र में इन्होंने बेसिक लैंग्वेज खुद सीखनी शुरू की और 2 वर्षों की कड़ी मेहनत के बाद एक गेम ‘ब्लास्टर’ बनाया जो की एक मैगजीन “PC and Office Technology” द्वारा 500 डॉलर में ख़रीदा गया।

जून 1989 को अपने जन्मदिन से एक दिन पहले एलन अपनी माँ के पास कनाडा आ गए क्योंकि वो जानते थे कि अमेरिका में सपनों को जीने का सफर कनाडा आ जाने से और आसान हो जाएगा। इसके लिए इन्होंने अफ़्रीकी मिलेट्री की अनिवार्य सर्विस छोड़ दी और कनाडा की क्वींस यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया। 2 साल बाद इन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ पेंसिल्वेनिया में दाखिला लिया जहाँ इन्होंने इकोनॉमिक्स और फिजिक्स दोनों की पढ़ाई की। इसके बाद इन्होंने कैलिफोर्निया की यूनिवर्सिटी ऑफ स्टैनफोर्ड में एनर्जी फिजिक्स में Ph.D में दाखिल लिया लेकिन 2 दिन बाद ही पढ़ाई छोड़ इंटरनेट बूम को देख कर व्यापार करने का फैसला किया।

इंटरनेट बूम मिलेनियम क्रैश और एलन के स्टार्टअप्स

एलन ने फरवरी 1995 में अपने भाई किम्भल मस्क के साथ मिलकर एक मार्केटिंग और सिटी सर्च कंपनी ‘Zip2’ बनाई जो की न्यूजपेपर्स के लिए सर्विस देती थी। Zip2 को Compaq ने 307 मिलियन डॉलर कैश और 34 मिलियन डॉलर स्टॉक ऑप्शन में ख़रीदा।

मिलेनियम क्रैश के वक्त एक ओर जहाँ सारी दुनिया की अर्थव्यवस्था चरमरा गई थी वहीं ऐसे मौके पर एलन के पास मिलियंस डॉलर का मुनाफा था।

इसके बाद एलन ने मार्च 1999 में इंटरनेट पेमेंट ट्रांसफर सिस्टम ‘X.com’ की शुरुआत की जो बेहद सफल रही। कैलिफोर्निया में X.com के ऑफिस के पास ही पीटर थील का भी ऑफिस था जो अपनी कंपनी ‘Confinity’ के माध्यम से यही कार्य कर रहे थे। एक साल बाद दोनों ने अपनी कम्पनियों का विलय कर ‘PayPal Services’ की शुरुआत 2001 में की जिसका बाद में नाम ‘PayPal’ कर दिया गया।

मई 2002 में एलन ने ‘SpaceX’ की शुरुआत करी जिसका उद्देश्य मार्स ओएसिस को मंगल ग्रह पर बनाना और वहाँ मानव बस्तियाँ बसाने के साथ- साथ लांच वेहिकल्स और रेवोल्यूशनरी रॉकेट बनाना है। ऑक्टूबर 2002 को PayPal को Ebay ने 1.5 बिलियन डॉलर स्टॉक ऑप्शन में ख़रीदा जिसमे से 11.7% के लिए एलन को 165 मिलियन डॉलर मिले जिसका निवेश इन्होने SpaceX में किया।

फरवरी 2004 में ‘Tesla’ की Series A फंडिंग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और जून 2003 में बनी इस कम्पनी के चेयरमैन बन गए। 2007 में CEO और प्रोडक्ट आर्किटेक्ट बनने के बाद 2008 में कंपनी ने पहली इलेक्ट्रिक कार Tesla Roadster लॉन्च की जो बेहद सफल रही।

मुश्किलें आती रही और कदम बढ़ते रहे

एलन को SpaceX की सफलता रातों रात नहीं मिली। सारी पूंजी और निवेशकों का धन लगाकर जो पहले 3 रॉकेट लॉन्च हुए वो फेल रहे। हार न मानने का जज्बा ही था कि इन्होने चौथा रॉकेट सफलता पूर्ण लॉन्च किया और SpaceX को नासा से 1.6 बिलियन डॉलर का निवेश प्राप्त हुआ।


दुनिया का सबसे शक्तिशाली रॉकेट फॉल्कन हेवी एलन की ही खोज है और रॉकेट को दोबारा से इस्तेमाल किये जाने की तकनीक भी एलन की ही देन है। जरूरत पड़ने पर Tesla और SpaceX कंपनी में स्लीपिंग बैग में सो जाना एलन को बेहद पसन्द है क्योंकि एलन काम के समय सिर्फ काम पर ही अपना सारा ध्यान देते हैं और किसी भी लक्ष्य को मुश्किल नही मानते।

एलन SpaceX, Tesla और Neuralink के CEO हैं। एलन Zip2, OpenAI, PayPal और Neuralink के Co-Founder हैं तथा X.com , theboringcompany और SpaceX के Founder हैं।

एलन एक बहुआयामी सोच वाले उत्कृष्ट बुद्धि से संपन्न वैज्ञानिक और आंत्रेप्रीन्योर हैं जिनकी विलक्षण प्रतिभा का लोहा समस्त विश्व मानता है। एलन 21वें सबसे शक्तिशाली व्यक्तित्व के स्वामी और दुनिया के 54वें सबसे धनी व्यक्ति हैं। एक बेहद खास रिपोर्ट के अनुसार एलन ने वर्ष 2017 में X.com को दोबारा से ख़रीदा है और जल्द ही इसके साथ एक नई पारी शुरू करना वो जरूर पसंद करेंगे।

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IIT Roorkee: शोधकर्ताओं ने एक अविष्कार किया है जिससे कैंसर कोशिकाओं का पता लगाने और उन्हें नष्ट करने में मदद मिल सकती है।

iit roorkee campus main building

जनसांख्यिकी आंकड़ों के मुताबिक पिछले एक दशक में इस खतरनाक बीमारी ने 8 लाख से भी अधिक लोगों को अपने चपेट में ले लिया। हालांकि वैज्ञानिक लगातार शोध कर रहे हैं और कैंसर से मुक्ति पाने की दवाएं विकसित करने में लगे हैं। भारतीय प्रोद्योगिकी संस्थान के कुछ शोधकर्ताओं ने भी ऐसा ही एक अविष्कार किया है जिससे कैंसर कोशिकाओं का पता लगाने और उन्हें नष्ट करने में मददगार साबित हो सकती है।

आईआईटी रुड़की के शोधकर्ताओं ने फ्लोरोसेंट कार्बन नैनौडॉट विकसित किए हैं जो एक साथ ही कैंसर कोशिकाओं का पता लगा सकते हैं और उन्हें नष्ट भी कर सकते हैं। यह पदार्थ काफी सूक्ष्म आकार का है जिसे एक प्रकार की वनस्पति से निकाला गया है। इस पौधे में गुलाबी रंग के फूल होते हैं। इसलिए इन्हें फ्लोरेसेंट कार्बन नैनो डॉट्स नाम दिया गया है। जिस टीम ने इस पर रिसर्च किया उसका नेतृत्व कर रहे डॉ. पी गोपीनाथ के मुताबिक नैनो आकार (10-9 मीटर) के कार्बन कण को रोजी पेरिविंकल प्लांट की पत्तियों से तैयार किया गया है।

शोधकर्ताओं की इस उपलब्धि को साइंस एंड इंजीनियरिंग रिसर्च बोर्ड, डिपार्टमेंट ऑफ बायोटेक्नोलॉजी और भारत सरकार ने भी सराहा है। गोपीनाथ ने कहा, ‘नैनो कार्बन पार्टिकल की मदद से कैंसर कोशिकाओं को आसानी से देखा जा सकता है। इतना ही नहीं इमेजिंग सिस्टम की मदद से कहां जा रही हैं इसका भी पता लगाया जा सकता है। कैंसर कोशिकाओं की सही स्थिति का का पता चलने के बाद इसे खत्म करने में आसानी हो जाती है। गोपीनाथ के अनुसार नैनोटैग आधारित रिसर्च जानवरों और क्लीनिकल ट्रायल में सफल रही है। यह एक कम लागत नैनो दवा है जो कैंसर जैसे खतरनाक रोग को दूर करने में मदद करेगी। ‘

आईआईटी की टीम के इस शोध को साइंस एंड इंजीनयरिंग रिसर्च बोर्ड (सर्ब) और जैव प्रौद्योगिकी विभाग, केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय से सहयोग प्राप्त हुआ है। गोपीनाथ ने कहा कि कैंसर कोशिकाओं की पहचान और उन्हें नष्ट करना कैंसर उपचार और इसकी औषधि पर शोध के क्षेत्र में कई साल से चुनौती है। उन्होंने आगे कहा, ‘हम आगे का मूल्यांकन करने के लिए इन नैनोमटीरियल्स को जानवरों पर प्रयोग करेंगे ताकि जांच और उपचार का पता लगाया जा सके।’ कैंसर कोशिकाओं का पता लगाना काफी मुश्किल काम है और इस पर दुनियाभर के वैज्ञानिक लगातारा शोध कर रहे हैं।

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Story of Success 23 साल की उम्र में बना ली करोड़ों की कंपनी, जानिये कैसे

सफलता के लिए कोई उम्र की सीमा नहीं है और ना ही कोई समय तय है. आइडिया और विजन है तो आप किसी भी उम्र में सफल हो सकते हैं. ऐसी ही एक मिसाल हैं OYO के फाउंडर और मालिक 23 साल के रितेश अग्रवाल.

रितेश के माता-पिता दरअसल चाहते थे कि वो आईआईटी में दाखिला लें और इंजीनियर बनें. रितेश भी कोटा, राजस्‍थान में रह कर आईआईटी एंट्रेस एग्‍जाम की ही तैयारियों में जुटे थे.

पर अपने आइडियाज और वीजन को पूरा होता देखने के लिए रितेश इंतजार नहीं करना चाहते थे. उन्‍होंने IIT की तैयारी छोड़कर अपने बिजनेस की तैयारी शुरू कर दी.

19 साल के रितेश अग्रवाल महीनों घूमते और बजट होटल में रुकते, ताकि वहां की तमाम चीजों के बारे में जान सकें. अपने अनुभव के बल पर रितेश ने अपने पहले स्‍टार्ट-अप यात्रा की शुरुआत की.

रितेश ने एक वेबसाइट तैयार किया, जहां वो सस्‍ते और किफायती होटल्‍स के बारे में जानकारी देते थे. इस वेबसाइट का नाम रखा ‘ओरावल’.

कुछ दिनों तक वेबसाइट चलाने के बाद रितेश को लगा कि लोग शायद नाम के चलते वेबसाइट को समझ नहीं पा रहे हैं. इसलिए उन्‍होंने साल 2013 में उसका नाम बदल कर OYO Rooms कर दिया. द न्‍यूयॉर्क टाइम्‍स की CB Insights ने OYO Rooms को उन कंपनियों में रखा, जो भविष्‍य में सफलता का परचम लहरा सकती हैं.

बता दें कि रितेश के OYO Rooms में सॉफ्टबैंक ग्रुप, ग्रीनओक्‍स, सेक्‍यूइया कैपिटल और लाइटस्‍प्रेड इंडिया जैसी कंपनियों ने निवेश किया है. रितेश अग्रवाल को साल 2013 में Thiel Fellowship के ’20 अंडर 20′ के लिए चुना गया था.

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इस खेती ने बदल दी लाखों की जिंदगी! अनेक हाथों को रोजी-रोटी मुहैया करा रहा मशरूम

मशरूम उत्पादन को कृषि और उद्योग दोनों ही क्षेत्रों में महत्व दिया गया है। भारतीय मशरूम उद्योग फिलहाल आकारा ले रहा है। बड़े अंतरराष्ट्रीय बाजार में वह अपना स्थान बनाने के संघर्षपूर्ण दौर में है। धीरे-धीरे सफलता भी मिल रही है। देश के अलग-अलग हिस्सों से सफलता की कुछ ऐसी ही प्रेरक कहानियों को बयां करतीं विकासनगर (उत्तराखंड) से राकेश खत्री, सोलन (हिमाचल प्रदेश) से आशुतोष डोगरा, पटना (बिहार) से अरविंद शर्मा और बांका से रवि वर्मा की रिपोर्ट।

हिरेशा के मशरूम की इंडोनेशिया से अमेरिका तक धमक

देहरादून, उत्तराखंड की महिला उद्यमी हिरेशा वर्मा ‘प्रोग्रेसिव मशरूम ग्रोअर’ अवार्ड पाने वाली देश की पहली महिला हैं। आज देश ही नहीं, विदेश में भी उनके मशरूम की धूम है। हाल ही में उन्हें दुबई में संपन्न कनेक्टिंग वूमेन चेंजमेकर्स समिट में अमेरिकी दूतावास की ओर से सफल महिला उद्यमी के रूप में नवाजा गया। वनस्पति विज्ञान में मास्टर्स डिग्री लेने के बाद हिरेशा ने घर से ही इसकी शुरुआत की।

दो हजार रुपये खर्च कर घर पर ही मशरूम के 25 बैग लगाए। इससे उन्हें पांच हजार रुपये की आमदनी हुई। फिर तो मशरूम उत्पादन को ही उन्होंने अपना लक्ष्य बना लिया। 2015 में यहां पछवादून के छरबा में मशरूम प्लांट लगाया। तीन वर्ष में ही प्लांट से एक हजार किलो प्रतिदिन मशरूम का उत्पादन होने लगा है। जिसका बाजार भाव 120 रुपये प्रति किलो है। आज वह स्थानीय बाजार के साथ-साथ निर्यात कर रही हैं। प्लांट में 32 लोगों को रोजगार भी मिला। नियमित मजदूरों को आठ हजार और सुपरवाइजर को 11 हजार रुपये प्रतिमाह वेतन का भुगतान किया जाता हैं।

महिलाओं ने बिहार के झिरवा को दिलाई पहचान

मशरूम उत्पादन में महिलाओं के सामूहिक प्रयास ने बांका, बिहार के झिरवा गांव को देश में अलग पहचान दिलाई है। मशरूम की खेती के बूते गांव की 400 महिलाएं आत्मनिर्भर हो चुकी हैं। शुरुआत गांव की दो महिलाओं विनीता कुमारी और रिंकू कुमारी ने की थी। स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र से प्रशिक्षण लेकर मशरूम उगाना शुरू किया और इसके बाद खुद का उद्यम तो स्थापित किया ही, साथ ही महिलाओं को भी प्रशिक्षण दिया।

गांव की रधिया देवी कहती हैं कि मशरूम की खेती से जुड़ने के बाद अब उन्हें रोजगार के लिए किसी के खेत पर काम करने नहीं जाना पड़ता है। 2013 में रिंकू-विनीता ने गन्ने के पत्ते पर मशरूम उत्पादन का सफल प्रयोग किया था। 2016 को सोसाइटी फॉर अपलिफ्टमेंट ऑफ रूलर इकोनोमी ने रिंकू को प्रोगेसिव वूमन फार्मर अवार्ड से नवाजा। दोनों को इस साल जगजीवन राम अभिनव नवाचार राष्ट्रीय पुरस्कार के लिए नामित किया गया था।

60 हजार किसानों को बनाया स्वावलंबी

राजेंद्र कृषि विवि के कृषि वैज्ञानिक डॉ. दयाराम को ‘मशरूम मैन’ कहा जाता है। उनके तीन मंत्र हैं- मशरूम उपजाइए, खाइए और बेचिए। तीन दशक से वे पिछड़े इलाके के अभावग्रस्त किसानों को मशरूम की खेती और मुनाफे का गणित समझा रहे हैं। महज दो कमरे की झोपड़ी में मशरूम उगाने की विधि समझाकर उन्होंने 60 हजार से अधिक किसानों की किस्मत बदल दी है। उनसे प्रशिक्षित किसान पुरस्कृत भी हो चुके हैं। परंपरागत खेती से पीछा छुड़ाकर किसानों और महिलाओं को नकदी फसलों के लिए प्रेरित करना दयाराम का मिशन है।

जौनपुर, उप्र के मूल निवासी दयाराम ने 1991 में प्लांट पैथोलॉजी में पीएचडी करने के बाद बिहार की राह पकड़ ली थी। तभी से मशरूम की खेती के लिए प्रयत्न करने लगे। उन्होंने साठ हजार किसानों को आर्थिक गुलामी से मुक्ति दिलाकर आत्मनिर्भर बनाया है। दयाराम ने मशरूम को सिर्फ उगाना ही नहीं सिखाया, बल्कि बिस्किट, समोसा, नमकीन और अचार के रूप में बाजार तक पहुंचाना सिखाया।

मशहूर होता मशरूम

  • 10,000 दुनिया में मशरूम की 10,000 प्रजातियां हैं जिसमें से महज 80 प्रायोगिक तौर पर, 20 व्यावसायिक स्तर पर व 4-5 प्रजातियां औद्योगिक स्तर पर पैदा की जा रही हैं।
  • 2000 भारत में 2000 प्रजातियों की पहचान की जा चुकी है। इनमें से आयस्टर, बटन एवं पेडिस्ट्रा मशरूम अधिक पैदा की जाती है।
  • 60 पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश में भारत के कुल उत्पादन का लगभग 60 प्रतिशत मशरूम उत्पादित किया जा रहा है।
  • 14,000 देश का कुल अनुमानित उत्पादन लगभग 14,000 टन ही है, जिसका लगभग 35 प्रतिशत ही निर्यात होता है। यूरोपीय देश हैं मुख्य आयातक।
  • 500 वर्ष 1994-95 से लगभग 500 मीट्रिक टन का निर्यात भारत ने किया, जिससे 40 करोड़ की विदेशी मुद्रा प्राप्त हुई।

तैयार किया रेडी टू फ्रूट बैग

मशरूम अब रसोई में भी तैयार होगा। इसके लिए विशेष कमरे की जरूरत नहीं पड़ेगी। राष्ट्रीय मशरूम अनुसंधान केंद्र चंबाघाट, सोलन ने इसके लिए रेडी टू फ्रूट (आरटीएफ) बैग तैयार किया है। 25 से 30 रुपये की कीमत के इस बैग से लगभग 20 दिन में 800 ग्राम मशरूम का उत्पादन हो सकेगा। डॉ. वीपी शर्मा, निदेशक, मशरूम अनुसंधान केंद्र ने बताया कि जल्द ही इसे बाजार में उतारने की तैयारी है। बैग की एक खासियत यह भी है कि इसे किसी जलवायु-स्थान पर इस्तेमाल किया जा सकेगा। हां, पानी का छिड़काव कर नमी का ध्यान रखना होगा। इसमें पिंक ऑयस्टर और व्हाइट ऑयस्टर प्रजाति का मशरूम उत्पादित होगा। ऑयस्टर से आचार व सूप भी तैयार किया जा सकता है।

घर बैठे आप उत्तराखंड की वादियों में यहां के किसानों द्वारा पैदा की गयी 100% नेचुरल ऑयस्टर मशरूम पा सकते हैं। तो आर्डर कीजिए

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श्रीकृष्ण से लेकर इंद्र तक से जुड़ी है रक्षाबंधन की कहानी, जानें क्यों मनाते हैं राखी

मुख्य रूप से रक्षाबन्धन को हिन्दू आैर जैन त्योहार के तौर पर मान्यता प्राप्त है। ये प्रतिवर्ष श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। सावन में मनाये जाने के कारण इसे श्रावणी या सलूनो भी कहते हैं। रक्षाबन्धन में राखी अर्थात रक्षासूत्र का सबसे अधिक महत्त्व होता है। ये सूत्र कच्चे सूत से लेकर रंगीन कलावे, रेशमी धागे, सोने आैर चाँदी जैसी मंहगी धातु तक से र्निमित हो सकते हैं। हांलाकि राखी सामान्यतः बहनें ही भाई को बांधती हैं परन्तु कर्इ स्थानों पर बेटियों द्वारा पिता या परिवार के बड़े लोगों को, ब्राह्मणों, आैर गुरुओं को भी बांधने की परंपरा है। राखी बांधने के पीछे मूल भावना प्रेम आैर रक्षा का आश्वासन ही होता है। कन्याएं अपने भार्इ आैर पिता को राखी इसी भावना के तहत बांधती हैं। राखी से जुड़ी कथायें भी इसी का संदेश देती हैं। राखी कैसे शुरू हुर्इ इससे जुड़ी इसी तरह की कर्इ कथायें बतार्इ जाती हैं।

भगवान विष्णु आैर बलि की कथा

कहते हैं कि भगवान विष्णु के प्रभाव से जब राजा बलि को पताल लोक में जाना पड़ा इससे देवताओं की रक्षा हुई तभी से हिंदू धर्मावलंबी रक्षाबंधन मनाते हैं। दूसरी आेर उसी समय बलि ने विष्णु जी से अपने साथ रहने का आर्शिवाद प्राप्त कर लिया आैर उससे अपने पति को वापस लाने आैर अपने साथ रखने के लिए माता लक्ष्मी ने बलि को राखी बांधीं आैर बदले में अपने पति को वापस प्राप्त किया। तबसे राखी की परंपरा की शुरूआत मानी जाती है, क्योंकि इस तरह लक्ष्मी जी के सौभाग्य की रक्षा हुर्इ। बलि से जुड़ा ये श्लोक भी इसी की पुष्टि करता है। येन बद्धो बलिराजा दानवेन्द्रो महाबल:। तेन त्वामपि बध्नामि रक्षे मा चल मा चल ॥

अर्थात जिस रक्षासूत्र से महान शक्तिशाली दानवेन्द्र राजा बलि को बांधा गया था, उसी सूत्र से मैं तुझे बांधता हूं। हे रक्षे मतलब राखी! तुम अडिग रहना यानि तू अपने संकल्प से कभी भी विचलित न हो।

इंद्र से जुड़ी कथा

भविष्यपुराण के अनुसार देवराज इंद्र जब देव दानव युद्घ में दानवों से पराजित हो रहे थे तो उनकी पत्नी इन्द्राणी द्वारा निर्मित रक्षासूत्र को देवगुरु बृहस्पति ने इन्द्र के हाथों बांधते हुए उपरोक्त श्लोक पढ़ा था जिसके चलते ना सिर्फ इंद्र की रक्षा हुर्इ थी बल्कि उनकी जीत भी हुर्इ थी। इसे भी रक्षाबंधन की शुरूआत कहा जाता है।

कृष्ण आैर युधिष्ठिर की कथा

स्कन्ध पुराण, पद्मपुराण और श्रीमद्भागवत में वामनावतार नामक कथा में भी रक्षाबन्धन का प्रसंग है ये कहा जाता है। इसी प्रकार मान्यता है कि द्वापर युग में ही युधिष्ठिर ने वासुदेव नंदन श्रीकृष्ण को राखी बांधी थी। उसी दिन से श्रावण पूर्णिमा के दिन यह रक्षा सूत्र बांधने की प्रथा चली आ रही है। अपनी इन्हीं विशेषताआें के चलते धागा धन, शक्ति, हर्ष और विजय देने वाला माना जाता है।

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पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी जी का निधन, लंबे समय से थे बीमार

Atal bihari bajpeyi ji

पूर्व प्रधानमंत्री और भारतीय जनता पार्टी के संस्थापक भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी का निधन गुरुवार शाम 5.05 मिनट पर हो गया। वह 93 साल के थे। अटल जी लंबे समय से बीमार चल रहे थे। हमारे देश के उन चुनिंदा लोगों में अटल जी का नाम लिया जाता है जिन्होंने भारतीय राजनीती में आमूलचूल परिवर्तन किये और इसको एक नई दिशा दी। प्रधानमंत्री पद के लिए परिवारवाद की जीत को दरकिनार करने के लिए अगर किसी एक शख्स को जिम्मेदार माना जायेगा तो वो अटल जी ही हैं।

वाजपेयी जी को सांस लेने में परेशानी, यूरीन व किडनी में संक्रमण होने के कारण 11 जून को एम्स में भर्ती किया गया था। 15 अगस्‍त को उनकी तबीयत काफी बिगड़ गई थी, जिसके बाद उन्‍हें लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर रखा गया। थोड़ी देर में उनका पार्थिव शरीर उनके निवास पर लाया जाएगा, जहां उसे लोगों के दर्शनार्थ रखा जाएगा। इस संबंध में 6.30 बजे केंद्रीय कैबिनेट होगी।
एम्स के मुताबिक, बुधवार सुबह वाजपेयी जी को सांस लेने में तकलीफ हुई थी। इसके बाद उन्हें जरूरी दवाइयां दी गई थीं, लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर रखा गया। भाजपा के संस्थापकों में शामिल वाजपेयी 3 बार देश के प्रधानमंत्री रहे। वह पहले ऐसे गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री रहे, जिन्होंने अपना कार्यकाल पूरा किया। उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

वाजपेयी जी काफी दिनों से बीमार थे और वह करीब 15 साल पहले राजनीति से संन्यास ले चुके थे। अटल बिहारी वाजपेयी जी ने लाल कृष्ण आडवाणी के साथ मिलकर भाजपा की स्थापना की थी और उसे सत्ता के शिखर पहुंचाया। भारतीय राजनीति में अटल-आडवाणी की जोड़ी सुपरहिट साबित हुई। अटल बिहारी जी देश के उन चुनिन्दा राजनेताओं में से एक थे, जिन्हें दूरदर्शी माना जाता था। उन्होंने अपने राजनीतिक करियर में ऐसे कई फैसले लिए जिसने देश और उनके खुद के राजनीतिक छवि को काफी मजबूती दी। अटल जी एक उच्च कोटि के चिंतक एवं विचारक होने के साथ-साथ एक श्रेष्ठ कवि, लेखक, रणनीतिकार और राजनीतिज्ञ थे।

उनका जन्म 25 दिसंबर, 1924 को ब्रह्ममूहुर्त में शिन्दे की छावनी वाले घर में हुआ था। वैसे उनके स्कूल के सर्टिफिकेट में जन्म की तिथि 25 दिसंबर 1926 लिखी है। यह दो वर्षों का अंतर उनके पिताजी ने इसलिए कराया था कि कम आयु लिखी जाएगी तो लड़का ज्यादा दिनों तक नौकरी कर सकेगा।

इस संदर्भ का जिक्र स्वयं अटल बिहारी वाजपेयी जी ने ग्वालियर के श्री नारायण तरटे को 7 जनवरी, 1986 को लिखे एक पत्र में किया था। उन्होंने लिखा था ‘आपका पत्र मिला। बड़ी प्रसन्नता हुई। इतने संगी-साथियों में यदि किसी के स्नेह-आशीर्वाद की अभिलाषा रहती है तो वह आप ही हैं। मेरा जन्म 1924 में हुआ था। पिताजी ने स्कूल में नाम लिखाते समय 1926 लिखा दिया कि उम्र कम होगी तो नौकरी ज्यादा कर सकेगा, देर में रिटायर होगा। उन्हें क्या पता था कि मेरी वर्षगांठ मनेगी और मनाने वाले मुझे छोटा बनाकर पेश करेंगे।’