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स्पेशल रिपोर्ट: जम्‍मू-कश्‍मीर में भाजपा ने पीडीपी से समर्थन लिया वापस, महबूबा मुफ्ती ने दिया इस्‍तीफा

मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने भाजपा द्वारा राज्य में सत्तासीन गठबंधन सरकार से अलग होने का एलान करने के बाद अपना इस्तीफा राज्यपाल एनएन वोहरा को सौंप दिया। राज्य सरकार के प्रवक्ता और सत्ताधारी पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के वरिष्ठ नेता नईम अख्तर ने महबूबा मुफ्ती द्वारा इस्तीफा दिए जाने की पुष्टि की है। इस बीच, उपमुख्यमंत्री कवींद्र गुप्ता ने भी भाजपा की तरफ से मुख्यमंत्री महबूबा मुफती के मंत्रीमंडल में शामिल सभी मंत्रियों के इस्तीफों की पुष्टि करते हुए कहा कि अब हम गठबंधन से अलग हो चुके हैं। इसलिए मंत्रीमंडल और सरकार में बने रहने का कोई औचित्य नहीं हैं। हमने अपने इस्तीफे मुख्यमंत्री को सौंप दिए हैं।

भाजपा के महासचिव और जम्मू-कश्मीर के प्रभारी राम माधव ने कहा, ‘हम खंडित जनादेश में साथ आए थे। लेकिन मौजूदा समय के आकलन के बाद इस सरकार को चलाना मुश्किल हो गया था। महबूबा मुफ्ती हालात संभालने में नाकाम साबित हुईं। हम एक एजेंडे के तहत सरकार बनाई थी। केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर सरकार की हर संभव मदद की। गृहमंत्री समय पर राज्य का दौरा करते रहे। सीमा पार से जो भी पाकिस्तान की सभी गतिविधियों को रोकने के लिये सरकार और सेना करती रही। लेकिन हालात सुधर नहीं रहे हैं।

उन्‍होंने कहा कि हाल ही में वरिष्ठ पत्रकार शुजात बुखारी की हत्या कर दी गई। राज्य में बोलने और प्रेस की आजादी पर खतरा हो गया है। राज्य सरकार की किसी भी मदद के लिये केंद्र सरकार करती रही। लेकिन राज्य सरकार पूरी तरह से असफल रही। जम्मू और लद्दाख में विकास का काम भी नहीं हुआ। कई विभागों ने काम की दृष्टि से अच्छा काम नहीं किया। भाजपा के लिये जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है, लेकिन आज जो स्थिति है उस पर नियंत्रण करने के लिये हमने फैसला किया है कि हम शासन को राज्यपाल का शासन लाएं।

राम माधव ने कहा कि रमजान के महीने में हमने सीजफायर कर दिया था। हमें उम्मीद थी कि राज्य में इसका अच्छा असर दिखेगा। यह कोई हमारी मजबूरी नहीं थी। हमने अमन के लिए ये कदम उठाया था। लेकिन इसका असर ना तो आतंकवादियों पर पड़ा और ना हुर्रियत पर। केंद्र सरकार ने घाटी में हालात संभालने के लिये पूरी कोशिश की है। आतंकवाद के खिलाफ हमने व्यापक अभियान चलाया था, जिसका हमें फायदा भी हुआ। राष्ट्रपति शासन लागू होने के बाद आतंकवाद के खिलाफ अभियान जारी रहेगा। घाटी में शांति स्थापित करना हमारा एजेंडा था और रहेगा।

भाजपा नेता ने मुफ्ती सरकार पर जम्‍मू-कश्‍मीर में काम ना करने देने का आरोप लगाया। उन्‍होंने कहा कि पीडीपी ने विकास के कामों में अड़चन डालने का काम किया। कश्मीर में जो परिस्थिति है उसे ठीक करने के लिए, उसे काबू में करने के लिए राज्य में राज्यपाल का शासन लाया जाए। पीडीपी ने विकास के कामों में अड़चन डालने का काम किया जम्मू-कश्मीर में सीजफायर लागू करना हमारी मजबूरी नहीं थी।

जम्मू कश्मीर विधानसभा में सीटों की स्थिति
पीडीपी- 28
भाजपा- 25
नेशनल कॉन्फ्रेंस- 15
कांग्रेस- 12
अन्य- 07
कुल सीटें 87

 

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भारत बंद की सफलता का श्रेय लेने उतरी कांग्रेस, बोले “सबसे पहले उठाई आवाज”

दलित उत्पीड़न कानून पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ लड़ाई का श्रेय कांग्रेस खुद लेने की कोशिश में जुट गई है। कांग्रेस ने भारत बंद को पूरी तरह सफल बताते हुए दावा किया कि सबसे पहले उसी ने इसके खिलाफ आवाज उठाई थी और राष्ट्रपति को ज्ञापन सौंपा था।

राजनीतिक मोर्चाबंदी करते हुए कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले से लेकर बंद के दौरान हुई हिंसा के लिए पूरी तरह से केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहराया।

कांग्रेस की ओर से मोर्चा संभालने आए राज्यसभा में विपक्ष के नेता गुलाम नबी आजाद और लोकसभा में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि संसद के पास अधिकार है कि वह सुप्रीम कोर्ट के फैसले को रद कर दे। 20 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट पर जो फैसला दिया था उसे संसद में रद किया जा सकता था। सरकार कदम बढ़ाती को सभी दल साथ होते, लेकिन चुप्पी छाई रही। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के तत्काल बाद सरकार पुनर्विचार याचिका दाखिल कर देती तो सोमवार को बंद के दौरान हिंसा नहीं होती।

अब तक कांग्रेस पुनर्विचार याचिका की बात कहती रही थी। अब सरकार ने पुनर्विचार याचिका पेश कर दी है तो कांग्रेस ने संसद के जरिये इसे रद करने का दबाव बढ़ाया है। मल्लिकार्जुन खड़गे के अनुसार, सिर्फ पुनर्विचार याचिका से ज्यादा राहत मिलने की उम्मीद नहीं है क्योंकि इसकी सुनवाई समान बेंच में होती है। इसके लिए सरकार को क्यूरेटिव याचिका दाखिल करनी चाहिए या फिर संसद बजट सत्र के बचे हुए चार दिनों में विधेयक लाकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को निरस्त करना चाहिए।

इसके साथ ही कांग्रेस ने देश में दलित उत्पीड़न कानून लागू करने और उसे और मजबूत करने का श्रेय भी लेने की कोशिश की। गुलाम नबी आजाद ने कहा कि दलित उत्पीड़न कानून राजीव गांधी के कार्यकाल में लाया गया था और 2014 में संप्रग सरकार ने संशोधन का अध्यादेश लाकर इसे और कड़ा कर दिया था। मल्लिकार्जुन खड़गे ने इस कानून के दुरुपयोग के सवाल को भी सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि दुरुपयोग तो किसी भी कानून हो सकता है, लेकिन इसका उपाय उस कानून को खत्म करना नहीं होता। उनके अनुसार दलित उत्पीड़न कानून के दुरुपयोग के मामले 2-3 फीसद से अधिक नहीं हैं।