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अटवाल वीजा विवाद: भारत पर लगाए आरोपों पर विपक्ष ने मांगी NSA से सफाई, ट्रूडो की पार्टी ने रोका प्रस्ताव

कनाडा के नेशनल सिक्युरिटी एडवाइजर (NSA) डेनियल जेना के उस बयान पर विवाद बढ़ता जा रहा है, जिसमें उन्होंने खालिस्तान समर्थक जसपाल अटवाल को वीजा जारी करने के पीछे भारत की साजिश होने की बात कही थी। शुक्रवार को विपक्ष ने NSA से अपने बयान को साबित करने की मांग करते हुए संसद में एक प्रस्ताव पेश किया। हालांकि, ट्रूडो की लिबरल पार्टी ने बहुमत का इस्तेमाल करते हुए प्रस्ताव रोक दिया। बता दें कि जेना ने कहा था कि ट्रूडो का भारत दौरा नाकाम करने के पीछे भारत का हाथ है। उनके इस बयान का प्रधानमंत्री ट्रूडो ने भी समर्थन किया था।

खालिस्तान समर्थकों के खिलाफ प्रस्ताव ला सकता है विपक्ष

– बता दें कि विपक्ष ने गुरुवार को भी ट्रूडो प्रशासन से भारत पर लगाए आरोपों के लिए सबूत की मांग की थी।

– विपक्षी कन्जर्वेटिव पार्टी के नेता एंड्रू शीर ने भारत पर लगाए गए आरोपों को बकवास बताते हुए पूछा कि क्या प्रधानमंत्री साजिश के दावों पर कोई सबूत भी देंगे?
– इसके साथ ही विपक्ष ने खालिस्तान समर्थकों की निंदा और भारत की एकता के सपोर्ट में संसद में एक प्रस्ताव लाने की बात भी कही थी।

ट्रूडो ने क्या कहा था?

– न्यूज एजेंसी के मुताबिक, साजिश के आरोपों पर ट्रूडो ने कहा, “जब हमारे सीनियर डिप्लोमैट और सिक्युरिटी अफसर देश के नागरिकों से कुछ कह रहे हैं तो वो जानते हैं कि इसमें कुछ सच्चाई हो सकती है।”
– साथ ही उन्होंने कहा, “यह पिछली कंजर्वेटिव (विपक्ष पार्टी) सरकार ही थी, जिसने पब्लिक सर्विस में हर संभव रुकावटें पैदा करने की कोशिश की।”

भारत ने आरोपों को बताया निराधार

– भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि हमने कनाडा की संसद में हाल की चर्चा को देखा है। हम साफ कहना चाहते हैं कि चाहे वह मुंबई में अटवाल की मौजूदगी हो या नई दिल्ली में डिनर में उसे न्योता दिए जाने का मामला हो, भारत की सुरक्षा एजेंसियों का अटवाल की मौजूदगी से कोई संबंध नहीं है। इस तरह की बातें आधारहीन हैं और हमें कतई मंजूर नहीं हैं।

ट्रूडो ने अटवाल को बुलाने पर क्या सफाई दी थी?

– अटवाल को स्पेशल डिनर में बुलाने के विवाद पर ट्रूडो ने कहा था, “हमने इस मसले को गंभीरता से लिया। उसे कोई भी न्योता नहीं दिया चाहिए था। जैसे ही हमें इसकी जानकारी मिली, कनाडा के हाईकमीशन ने इन्विटेशन रद्द कर दिया। पार्लियामेंट के एक मेंबर ने उसे पर्सनली बुलाया था।”
– कनाडा के पीएमओ ने कहा था, “यह साफ कर देना अहम है कि वह (अटवाल) पीएम (ट्रूडो) के ऑफिशियल डेलिगेशन का हिस्सा नहीं था, न ही उन्हें प्रधानमंत्री कार्यालय ने इन्वाइट किया था।”

किस-किस के साथ दिखा था अटवाल?

– मुंबई के एक इवेंट में अटवाल ट्रूडो की पत्नी सोफिया के साथ नजर आया। एक अन्य फोटो में वह ट्रूडो के मंत्री अमरजीत सोही के साथ भी दिखाई दिया था।
– तस्वीरें सामने आने पर विवाद हुआ तो कनाडा के सांसद रणदीप एस. सराई ने अटवाल को मुंबई के इवेंट में बुलाने की जिम्मेदारी ली थी।

कौन है जसपाल अटवाल?

– जसपाल अटवाल खालिस्तान समर्थक रहा है। वह बैन किए गए इंटरनेशनल सिख यूथ फेडरेशन में काम करता था।
– इस संगठन को 1980 के दशक की शुरुआत में कनाडा सरकार ने आतंकी संगठन घोषित किया था।
– अटवाल को पंजाब के पूर्व मंत्री मलकीत सिंह सिद्धू और तीन अन्य लोगों को 1986 में वैंकूवर आईलैंड में जानलेवा हमला करने के केस में दोषी ठहराया गया था।
– जसपाल उन चारों लोगों में शामिल था, जिन्होंने सिद्धू की कार पर घात लगाकर हमला किया था और गोलियां चलाई थीं। हालांकि, सिद्धू ने आरोपों से इनकार किया था।
– इसके अलावा अटवाल को 1985 में एक ऑटोमोबाइल फ्रॉड केस में भी दोषी पाया गया था।

क्या है खालिस्तान का विवाद?

– पंजाब में कुछ लोगों ने 1980 के दशक में खालिस्तान नाम से अलग देश बनाने की मांग की थी। इसके लिए उन्होंने भारत विरोधी हिंसक आंदोलन किए। 1984 में भारतीय सेना ने स्वर्ण मंदिर में घुसकर वहां छिपे खालिस्तान सपोर्टर्स पर कार्रवाई की। इसके बाद धीरे-धीरे यह आंदोलन खत्म हो गया।

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ट्रूडो ने लगाया इमेज खराब करने का आरोप, भारत भड़का

कनाडा के पीएम जस्टिन ट्रूडो ने अपने देश पहुंच कर भारत के खिलाफ बयान दिया है। ट्रूडो ने इस दावे को सपॉर्ट किया है कि हाल की भारत यात्रा के दौरान भारत के सरकारी अमले ने उनकी इमेज खराब करने की कोशिश की। भारत ने इस आरोप का जोरदार खंडन किया है।

ट्रूडो पिछले दिनों भारत आए थे और जसपाल अटवाल के कारण उनकी यात्रा विवादों में घिर गई थी। भारतीय मूल के कनाडाई नागरिक अटवाल पर खालिस्तान की मुहिम से संबंध रखने का आरोप है। अटवाल प्रतिबंधित संगठन इंटरनैशनल सिख यूथ फेडरेशन का सदस्य है और इस संस्था को 2003 में बैन कर दिया गया। अटवाल पर 1986 में वैंकूवर आइलैंड पर भारतीय कैबिनेट मंत्री मलकीयत सिंह सिंधू की हत्या का प्रयास करने का आरोप है। इसके अलावा अटवाल को 1985 में एक ऑटोमोबाइल फ्रॉड केस में भी दोषी पाया गया था।

मुंबई में अटवाल की एक तस्वीर ट्रूडो की पत्नी सोफी और कनाडा के मंत्री अमरजीत सोढ़ी के साथ सामने आई, जिससे यह पता चला कि वह ट्रूडो के साथ भारत आया हुआ है। ट्रूडो के लिए राजधानी में कनाडाई उच्चायुक्त की ओर से आयोजित डिनर में भी अटवाल को न्योता दिया गया था। विवाद होने पर न्योता वापस ले लिया गया।

इस बारे में उठे सवालों पर ट्रूडो के दफ्तर में मीडिया के लिए एक बैकग्राउंड ब्रीफिंग का आयोजन कराया गया था। कनाडाई मीडिया के मुताबिक इसमें राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार डेनियल ज्यां ने कहा था कि अटवाल की मौजूदगी के पीछे भारत के उन सरकारी तत्वों (सुरक्षा एजेंसियों) का हाथ था, जो यह नहीं चाहते कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उस विदेशी सरकार के काफी करीब आएं जो उनकी नजर में भारत को एक नहीं देखना चाहती।

ट्रूडो के कनाडा वापस लौटने पर मंगलवार को वहां संसद में विपक्षी सांसदों ने अटवाल से कनेक्शन पर उन्हें घेर लिया। उनसे यह भी पूछा गया कि क्या उनके दफ्तर ने यह कहा है कि भारत सरकार की ओर से साजिश रची गई। ट्रूडो ने सरकारी अधिकारी के बयान का समर्थन किया। उन्हें यह कहते हुए सुना गया कि जब हमारे टॉप अधिकारियों में एक कनाडा के लोगों से कुछ कहता है तो वे जानते हैं कि यह सच है।

यहां विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा, ‘कनाडा के उच्चायुक्त की ओर से जसपाल अटवाल को दिए गए दो न्योतों के बारे में हमने कनाडा की संसद में हाल की चर्चा को देखा। हम यह साफ-साफ कहना चाहते हैं कि चाहे वह कनाडा के उच्चायुक्त की ओर से मुंबई में आयोजित इवेंट में जसपाल अटवाल की मौजूदगी का मामला हो या नई दिल्ली में कनाडा उच्चायुक्त की ओर से आयोजित भोज में उसे न्योता दिए जाने का मामला हो, भारत सरकार और उसकी सुरक्षा एजेंसियों का जसपाल अटवाल की मौजूदगी से कोई संबंध नहीं है। इस तरह की बातें आधारहीन हैं और हमें मंजूर नहीं हैं।’

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भारतीय राजनीति का सबसे बेबाक और बिंदास चेहरा यानी राम मनोहर लोहिया

महज चार साल में भारतीय संसद को अपने मौलिक राजनीतिक विचारों से झकझोर देने का करिश्मा राम मनोहर लोहिया ने कर दिखाया था.

चाहे वो जवाहर लाल नेहरू के प्रतिदिन 25 हज़ार रुपये खर्च करने की बात हो, या फिर इंदिरा गांधी को गूंगी गुड़िया कहने का साहस रहा हो. या फिर ये कहने के हिम्मत कि महिलाओं को सती-सीता नहीं होना चाहिए, द्रौपदी बनना चाहिए.

राम मनोहर लोहिया वो पहले राजनेता रहे जिन्होंने कांग्रेस सरकार को उखाड़ फेंकने का आह्वान करते हुए कहा था जिंदा कौमें पांच साल तक इंतज़ार नहीं करतीं.

उत्तर भारत में आज भी आप राजनीतिक रुझान रखने वाले किसी युवा से बात करें तो वे इस नारे का जिक्र ज़रूर करेगा- ‘जब जब लोहिया बोलता है, दिल्ली का तख़्ता डोलता है.’

नेहरू का विरोध

जब देश जवाहर लाल नेहरू को अपना सबसे बड़ा नेता मान रहा था, ये लोहिया ही थे जिन्होंने नेहरू को सवालों से घेरना शुरू किया था. नेहरू से उनकी तल्खी का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि उन्होंने एक बार ये भी कहा था कि बीमार देश के बीमार प्रधानमंत्री को इस्तीफ़ा दे देना चाहिए.

1962 में लोहिया फूलपुर में जवाहर लाल नेहरू के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ने चले गए. उस चुनाव में लोहिया की चुनाव प्रचार की टीम का हिस्सा रहे सतीश अग्रवाल याद करते हैं, “लोहिया जी कहते थे मैं पहाड़ से टकराने आया हूं. मैं जानता हूं कि पहाड़ से पार नहीं पा सकता लेकिन उसमें एक दरार भी कर दिया तो चुनाव लड़ना सफल हो जाएगा.”

जवाहर लाल नेहरू- महात्मा गांधीइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

बिहार में समाजवादी राजनीति का अहम चेहरा माने जाने वाले शिवानंद तिवारी को राम मनोहर लोहिया को करीब से देखने का मौका मिला था. 1967 में भोजपुर के शाहपुर विधानसभा सीट से शिवानंद तिवारी के पिता रामानंद तिवारी चुनाव लड़ रहे थे, उनके चुनाव प्रचार में लोहिया गए थे.

शिवानंद तिवारी कहते हैं, “मुझे उनके साथ चार सभाओं में जाने का मौका मिला था. वे एक भविष्यवक्ता के भांति बोल रहे थे. उन्होंने लोगों से कहा था कि आप ये सोचकर वोट दीजिए कि आप जिसे चुन रहे हैं वो मंत्री बनने वाला है या वो मंत्री बनाने वाला है.”

लोहिया की राजनीतिक विरासत

शिवानंद तिवारी के मुताबिक जब 1967 में जब हर तरफ कांग्रेस का जलवा था, तब राम मनोहर लोहिया इकलौते ऐसे शख़्स थे जिन्होंने कहा था कि कांग्रेस के दिन जाने वाले हैं और नए लोगों का जमाना आ रहा है. नौ राज्यों में कांग्रेस हार गई थी.

राम मनोहर लोहिया
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Image captionजर्मनी में डॉक्टरेट की पढ़ाई करने के दौरान लोहिया की तस्वीर

लोहिया की मौत के बाद उनकी विरासत और उनके नाम की राजनीति ख़ूब देखने को मिली. कम से कम उत्तर प्रदेश और बिहार में. मुलायम सिंह यादव तो अपनी पार्टी को लोहिया की विरासत को मानने वाली पार्टी के तौर पर देखते रहे हैं.

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव कहते हैं, “लोहिया जी हमारे पार्टी के सबसे बड़े आदर्श हैं. 1967 में पहली बार उन्होंने ही नेताजी को टिकट दिया था. जसवंत नगर विधानसभा सीट से. लोहिया समाज में गरीब गुरबों की आवाज़ उठाना चाहते थे, वे पिछड़ों को सत्ता में भागीदारी देना चाहते थे. उनका सपना था सौ में पावें पिछड़े साठ.”

मुलायम की राजनीतिक क्षमता को सबसे पहले लोहिया जी ने ही देखा था. मुलायम सिंह यादव ने जल्दी ही प्रकाशित होने वाली अपनी राजनीतिक जीवनी द सोशलिस्ट में याद किया है, “1963 में फर्रूख़ाबाद सीट से उपलोकसभा चुनाव में मैं अपने साथियों के साथ उनके प्रचार में जुटा था. विधुना विधानसभा में उन्होंने मुझसे पूछा था कि प्रचार के दौरान क्या खाते हो, कहां रहते हो. मैं ने कहा कि लैइया चना रखते हैं, लोग भी खिला देते हैं और जहां रात होती है उसी गांव में सो जाते हैं. उन्होंने मेरे कुर्ते की जेब में सौ रूपये का नोट रख दिया था.”

राम मनोहर लोहिया के साथ मुलायम की तस्वीरइमेज कॉपीरइटALAMY

हालांकि मुलायम को बाद में शिवानंद तिवारी से बहुत ज्यादा मिलने जुलने का मौका नहीं मिला, लेकिन परिवारवाद के पहलू को छोड़कर लोहिया के राजनीतिक विरासत पर मुलायम लगातार अपना दावा जताते रहे.

समाजवादी राजनीति को शिवानंद तिवारी लंबे समय से देख रहे हैं. लोहिया की राजनीति के असली वारिस की बात होने पर शिवानंद तिवारी कहते हैं, “लोहिया जिस तरह की राजनीति की बात करते थे, उसके ठीक ठीक अपनाने वाले तो केवल किशन पटनायक ही हो पाए. हालांकि उनको वो सम्मान नहीं मिला. बिहार की राजनीति में लोहिया को जिन्होंने काफी हद तक अपने जीवन में उतारा वो लालू ही रहे हैं.”

हिंदी के हिमायती रहे लोहिया

शिवानंद तिवारी आगे कहते हैं, “अगर आप 1990 से 1995 के बीच के लालू के भाषणों को देखें तो उनमें लोहिया की झलक मिलती थी. हालांकि बाद में उनके क़दम डगमगाए और उनमें उतना बड़ा विजन भी विकसित नहीं हो पाया. लालू लोहिया के जितने करीब पहुंच सकते थे, वहां तक पहुंचने में वो चूक गए.”

चाहे मुलायम हों या फिर लालू या शरद या राम विलास पासवान, इन सब पर लोहिया का असर दिखा ज़रूर लेकिन ये सब उस जातिवादी राजनीति के दायरे से नहीं निकल पाए, जिसका लोहिया आजीवन विरोध करते रहे.

शिवानंद तिवारी के मुताबिक लोहिया होने आसान नहीं हैं क्योंकि लोहिया को देश और दुनिया के राजनीति की जितनी समझ थी, उससे ज्यादा वे भारतीय परंपराओं और भारतीय समाज को जानते बूझते थे, वे लगातार पढ़ने लिखने वाले राजनेता थे.

राम मनोहर लोहियाइमेज कॉपीरइटLOHIA TRUST

ये कम ही लोग जानते होंगे कि लोहिया ने जर्मनी से डॉक्टरेट की डिग्री हासिल की थी. वे अंग्रेजी, जर्मन, फ्रेंच, मराठी और बांग्ला धड़ल्ले से बोल सकते थे, लेकिन वे हमेशा हिंदी में बोलते थे, ताकि आम लोगों तक उनकी बात ज्यादा से ज्यादा पहुंचे.

लोहिया ने चाहे आम लोगों के हितों की बात की हो, या समाज में महिलाओं की बराबरी देने की बात कही हो, ऐसे लगता है कि वे भारतीय राजनीति के सबसे दूरदर्शी नेताओं में शामिल थे, लेकिन उनके अंदर एक आग हमेशा धधकती रहती थी.

लोहिया की जीवनीकार श्रीमति इंदू केलकर ने लोहिया की रामधारी सिंह दिनकर से एक मुलाकात का जिक्र किया है, वे लिखती हैं, “निधन से एक महीने पहले ही दिनकर लोहिया से मिले थे और कहा था कि क्रोध कम कीजिए, देश आपसे बहुत प्रसन्न है, कहीं ऐसा न हो कि भार जब आपके कंधों पर आए तब आपका अतीत आपकी राह का कांटा बन जाए. लोहिया बोले थे- आपको लगता है तब तक मैं जी पाऊंगा?”

लोहिया का निजी जीवन भी कम दिलचस्प नहीं था. लोहिया अपनी ज़िंदगी में किसी का दख़ल भी बर्दाश्त नहीं करते थे. हालांकि महात्मा गांधी ने उनके निजी जीवन में दख़ल देते हुए उनसे सिगरेट पीना छोड़ देने को कहा था. लोहिया ने बापू को कहा था कि सोच कर बताऊंगा. और तीन महीने के बाद उनसे कहा कि मैंने सिगरेट छोड़ दी.

बिंदास जीवन था लोहिया का

लोहिया जीवन भर रमा मित्रा के साथ लिव इन रिलेशनशिप में रहे. रमा मित्रा दिल्ली के मिरांडा हाउस में प्रोफेसर रहीं. दोनों के एक दूसरे को लिखे पत्रों की किताब भी प्रकाशित हुई. शिवानंद तिवारी बताते हैं, “लोहिया ने अपने संबंध को कोई छिपाकर नहीं रखा था. लोग जानते थे, लेकिन उस दौर में निजता का सम्मान किया जाता था. लोहिया जी ने जीवन भर अपने संबंध को निभाया और रमा जी ने उसे आगे तक निभाया.”

राम मनोहर लोहियाइमेज कॉपीरइटLOHIA TRUST

50-60 के दशक में भारत में आम लोगों की राजनीति करने वाला कोई नेता अपने निजी जीवन में इतना बिंदास हो सकता है, इसकी कल्पना आज भी मुश्किल ही है. लोहिया महिलाओं को समान अधिकार दिए जाने की वकालत करते हुए कहते थे कि देश की सती-सीता की ज़रूरत नहीं बल्कि द्रौपदी की ज़रूरत है जो संघर्ष कर सके, सवाल पूछ सके.

1962 के आम चुनाव में लोहिया का फूलपुर में चुनाव प्रचार में हिस्सा ले चुके सतीश अग्रवाल बताते हैं, “लोहिया किस हद तक बिंदास थे, इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि एक बार तारकेश्वरी सिन्हा ने उनसे कहा कि आप महिलाओं और उनके अधिकारों के बारे में काफ़ी बात करते हैं लेकिन आपने तो शादी नहीं की. लोहिया ने तत्काल जवाब दे दिया- भई तुमने तो मौका ही नहीं दिया.”

हुसेन की पेंटिंग- लोहिया- नेहरू
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राम मनोहर लोहिया ऐसे राजनेता थे जो अमरीका जा कर वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन से समाजवाद पर बहस कर सकते थे और मक़बूल फ़िदा हुसेन जैसे कलाकार की कला को भी राह दिखा सकते थे. दिल्ली के एक रेस्टोरेंट में लोहिया ने ही मक़बूल फ़िदा हुसेन को कहा था, “ये जो तुम बिरला और टाटा के ड्राइंग रूम में लटकने वाली तस्वीरों से घिरे हो, उससे बाहर निकलो. रामायण को पेंट करो.”

अस्पताल की लापरवाही के चलते मौत

लोहिया की मौत भी कम विवादास्पद नहीं रही. उनका प्रोस्टेट ग्लैंड्स बढ़ गया था और इसका ऑपरेशन दिल्ली के सरकारी विलिंग्डन अस्पताल में किया गया था.

उनकी मौत के बारे में वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर ने अपनी ऑटो बायोग्राफी बियांड द लाइन्स में भी किया है. इसमें उन्होंने लिखा है, “मैं राम मनोहर लोहिया से अस्पताल में मिलने गया था. उन्होंने मुझसे कहा कुलदीप मैं इन डॉक्टरों के चलते मर रहा हूं.”

कुलदीप आगे लिखते हैं कि लोहिया की बात सच ही निकली क्योंकि डॉक्टरों ने उनकी बीमारी का गलत इलाज कर दिया था. उनकी मौत के बाद सरकार ने दिल्ली के सभी सरकारी अस्पतालों के निरीक्षण करवाने हेतु एक समिति नियुक्त की गई थी. आज यही अस्पताल राम मनोहर लोहिया अस्पताल के रूप में जाना जाता है.

लोहिया अस्पतालइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

इस समिति की रिपोर्ट का एक हिस्सा 26 जनवरी, 1968 को टाइम्स ऑफ़ इंडिया में प्रकाशित हुआ था, इसमें समिति ने दावा किया था, “अगर अस्पताल के अधिकारी आवश्यक और अनिवार्य सावधानी से काम लेते तो लोहिया का दुखद निधन नहीं होता.”

शिवानंद तिवारी याद करते हैं कि तब वो बड़ा मुद्दा बना था लेकिन बाद वो बात दबा दी गई. 1977 में केंद्र सरकार में राजनारायण स्वास्थ्य मंत्री बने तो उन्होंने लोहिया की मौत के कारणों की जांच करने के लिए विशेषज्ञों की समिति नियुक्त या, लेकिन अस्पताल में तब सारे कागज़ ग़ायब थे.

पैनी नज़र थी लोहिया की

लोहिया के जीवन और उनके विचारों को संजोने की कोशिश उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद के समाजिक कार्यकर्ता नितेश अग्रवाल जैन कर रहे हैं. उन्होंने लोहिया पर करीब 90 मिनट की डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म बनाने का जोख़िम उठाया है.

लोहिया के जीवन पर फ़िल्मइमेज कॉपीरइटNITESH JAIN

वे कहते हैं, “उनके विचारों को पढ़ने के बाद मुझे लगा कि इनकी बात आम लोगों तक पहुंचनी चाहिए. मेरी फ़िल्म एंबैसडर ऑफ सोशलिज्म डॉक्टर राम मनोहर लोहिया लगभग तैयार है. उनके जन्म दिन पर अगले साल रिलीज करेंगे ताकि उनका संदेश देश दुनिया के कोने कोने तक पहुंचे.”

लोहिया की राजनीतिक दृष्टि जितनी पैनी थी, उतनी ही सामाजिक दृष्टिकोण. उन्होंने मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड में सुधार की बात हो या फिर गंगा की सफ़ाई का मुद्दा हो या फिर हिंदु मुस्लिम सांप्रदायिकता की बात हो, इन सब मुद्दों पर बेबाकी से अपनी बात रखी थी. वो भी पचास साल पहले.

हालांकि कुछ राजनीतिक विश्लेषक लोहिया पर जनसंघ को बढ़ावा देने का आरोप लगाते हैं हालांकि ये समझना मुश्किल नहीं कि कांग्रेस के विरोध के लिए दूसरे तमाम लोगों को एक साथ लाना पड़ा. अखिलेश यादव कहते हैं, “लोहिया के जमाने में कांग्रेस की जो स्थिति थी वही अब बीजेपी की है. बीजेपी के ख़िलाफ़ हमने भी कांग्रेस को साथ लिया है.”