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रूस के साथ दो लाख करोड़ के लड़ाकू विमान समझौते से अलग हो सकता है भारत। जानें क्या है कारण

मालूम हो कि सैन्य संबंधों को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के मकसद से भारत और रूस के बीच 2007 में लड़ाकू विमानों को संयुक्त रूप से तैयार करने का अंतर-सरकारी करार हुआ था।

लेकिन लागत साझा करने, इस्तेमाल की जाने वाली तकनीक और तैयार किए जाने वाले विमानों की संख्या के मसले पर गंभीर मतभेदों के कारण पिछले 11 साल से यह परियोजना अटकी हुई है। परियोजना पर बातचीत में शामिल एक शीर्ष अधिकारी ने बताया, ‘हमने परियोजना की लागत समेत तमाम मसलों पर अपनी राय रख दी है। लेकिन रूसी पक्ष की ओर से अब तक कोई प्रतिबद्धता व्यक्त नहीं की गई है।’

बता दें कि भारत ने लड़ाकू विमान के प्रारंभिक डिजायन के लिए दिसंबर, 2010 में 29.5 करोड़ डॉलर देने पर सहमति व्यक्त की थी। बाद में दोनों पक्षों ने अंतिम डिजाइन और पहले चरण में विमान के उत्पादन के लिए छह-छह अरब डॉलर का योगदान देने पर सहमति जताई, लेकिन इस पर कोई अंतिम समझौता नहीं हो सका।

कहां फंसा है पेंच

भारत चाहता है कि विमान में इस्तेमाल होने वाली तकनीक पर दोनों देशों का समान अधिकार हो, लेकिन रूस विमान में इस्तेमाल की जाने वाली सभी अहम तकनीकों को भारत के साथ साझा करने के लिए तैयार नहीं है। वार्ता के दौरान भारत ने जोर देकर कहा कि उसे सभी जरूरी कोड और अहम तकनीक उपलब्ध कराई जानी चाहिए ताकि वह अपनी जरूरतों के हिसाब से विमान को अपग्रेड कर सके। फरवरी, 2016 में तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रीकर की सहमति से परियोजना पर वार्ता फिर शुरू हुई थी। दोनों देश गतिरोध वाले मसलों का समाधान निकालने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन भारत परियोजना की बेहद ऊंची लागत की वजह से इसके फलदायी होने के प्रति आशान्वित नहीं है।

एचएएल कर रही पैरवी, वायुसेना की रुचि नहीं

दिलचस्प बात यह है कि सरकारी कंपनी हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) इस परियोजना की जोरदार पैरवी कर रही है। उसका मानना है कि इस परियोजना के जरिये भारत को अपने एरोस्पेस सेक्टर को बढ़ावा देने का सुनहरा मौका मिलेगा क्योंकि किसी अन्य देश ने भारत को आज तक ऐसी अहम तकनीक का प्रस्ताव नहीं दिया है। वहीं, दूसरी ओर ऊंची लागत की वजह से भारतीय वायुसेना ने इस परियोजना में दिलचस्पी नहीं दिखाई है।

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स्पेशल रिपोर्ट: जम्‍मू-कश्‍मीर में भाजपा ने पीडीपी से समर्थन लिया वापस, महबूबा मुफ्ती ने दिया इस्‍तीफा

मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने भाजपा द्वारा राज्य में सत्तासीन गठबंधन सरकार से अलग होने का एलान करने के बाद अपना इस्तीफा राज्यपाल एनएन वोहरा को सौंप दिया। राज्य सरकार के प्रवक्ता और सत्ताधारी पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के वरिष्ठ नेता नईम अख्तर ने महबूबा मुफ्ती द्वारा इस्तीफा दिए जाने की पुष्टि की है। इस बीच, उपमुख्यमंत्री कवींद्र गुप्ता ने भी भाजपा की तरफ से मुख्यमंत्री महबूबा मुफती के मंत्रीमंडल में शामिल सभी मंत्रियों के इस्तीफों की पुष्टि करते हुए कहा कि अब हम गठबंधन से अलग हो चुके हैं। इसलिए मंत्रीमंडल और सरकार में बने रहने का कोई औचित्य नहीं हैं। हमने अपने इस्तीफे मुख्यमंत्री को सौंप दिए हैं।

भाजपा के महासचिव और जम्मू-कश्मीर के प्रभारी राम माधव ने कहा, ‘हम खंडित जनादेश में साथ आए थे। लेकिन मौजूदा समय के आकलन के बाद इस सरकार को चलाना मुश्किल हो गया था। महबूबा मुफ्ती हालात संभालने में नाकाम साबित हुईं। हम एक एजेंडे के तहत सरकार बनाई थी। केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर सरकार की हर संभव मदद की। गृहमंत्री समय पर राज्य का दौरा करते रहे। सीमा पार से जो भी पाकिस्तान की सभी गतिविधियों को रोकने के लिये सरकार और सेना करती रही। लेकिन हालात सुधर नहीं रहे हैं।

उन्‍होंने कहा कि हाल ही में वरिष्ठ पत्रकार शुजात बुखारी की हत्या कर दी गई। राज्य में बोलने और प्रेस की आजादी पर खतरा हो गया है। राज्य सरकार की किसी भी मदद के लिये केंद्र सरकार करती रही। लेकिन राज्य सरकार पूरी तरह से असफल रही। जम्मू और लद्दाख में विकास का काम भी नहीं हुआ। कई विभागों ने काम की दृष्टि से अच्छा काम नहीं किया। भाजपा के लिये जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है, लेकिन आज जो स्थिति है उस पर नियंत्रण करने के लिये हमने फैसला किया है कि हम शासन को राज्यपाल का शासन लाएं।

राम माधव ने कहा कि रमजान के महीने में हमने सीजफायर कर दिया था। हमें उम्मीद थी कि राज्य में इसका अच्छा असर दिखेगा। यह कोई हमारी मजबूरी नहीं थी। हमने अमन के लिए ये कदम उठाया था। लेकिन इसका असर ना तो आतंकवादियों पर पड़ा और ना हुर्रियत पर। केंद्र सरकार ने घाटी में हालात संभालने के लिये पूरी कोशिश की है। आतंकवाद के खिलाफ हमने व्यापक अभियान चलाया था, जिसका हमें फायदा भी हुआ। राष्ट्रपति शासन लागू होने के बाद आतंकवाद के खिलाफ अभियान जारी रहेगा। घाटी में शांति स्थापित करना हमारा एजेंडा था और रहेगा।

भाजपा नेता ने मुफ्ती सरकार पर जम्‍मू-कश्‍मीर में काम ना करने देने का आरोप लगाया। उन्‍होंने कहा कि पीडीपी ने विकास के कामों में अड़चन डालने का काम किया। कश्मीर में जो परिस्थिति है उसे ठीक करने के लिए, उसे काबू में करने के लिए राज्य में राज्यपाल का शासन लाया जाए। पीडीपी ने विकास के कामों में अड़चन डालने का काम किया जम्मू-कश्मीर में सीजफायर लागू करना हमारी मजबूरी नहीं थी।

जम्मू कश्मीर विधानसभा में सीटों की स्थिति
पीडीपी- 28
भाजपा- 25
नेशनल कॉन्फ्रेंस- 15
कांग्रेस- 12
अन्य- 07
कुल सीटें 87

 

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ATM से पैसे निकालना हुआ आसान, ना होगा कार्ड और ना ही पिन की जरूरत

अगर आपका एटीएम कार्ड कहीं खो जाता है या आप एटीएम कार्ड का पिन भूल जाते है, तो अब आपको परेशान होने की जरुरत नहीं है। अब बिना एटीएम कार्ड और पिन के भी आप एटीएम से पैसे निकाल सकते है। निजी क्षेत्र के यस बैंक ने फिनटेक क्षेत्र की स्टार्टअप नियरबाय टेक्नोलॉजीज के साथ करार किया है। इस करार के तहत नियरबाय टेक बैंक को आधार आधारित ऐसा एटीएम उपलब्ध कराएगी जिसमें कार्ड या पिन की जरूरत नहीं होगी।

यस बैंक से मिली जानकारी के मुताबिक ग्राहक रिटेलरों के पास पैसा जमा करा सकेंगे और निकाल सकेंगे। बैंक ने कहा कि पेनियरबाय मोबाइल एप्लिकेशन का इस्तेमाल स्मार्टफोन पर किया जा सकेगा। इसमें कोई रिटेलर ग्राहकों के लिए आधार एटीएम-आधार बैंक शाखा के रूप में काम कर सकेगा और नकदी जमा कराने या निकालने की सुविधा दे सकेगा। यस बैंक और नियरबाय ने इस सेवा को शुरू करने के लिए नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन आफ इंडिया के साथ नजदीकी में काम किया है।
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इसके नेटवर्क में 40,000 टच पॉइंट होंगे। आधार नंबर और उंगली की छाप का इस्तेमाल कर ग्राहक उन स्थानों से नकदी निकाल सकेगा या किसी तरह का अन्य लेनदेन कर सकेगा। नियरबाय ने आधार सेवाओं के बारे में जागरूकता और इसको लोकप्रिय बनाने के लिए रिटेलर्स असोसिएशन ऑफ इंडिया से करार किया है। इसके तहत ग्राहकों को जागरूक किया जाएगा और यह सेवा देश के दूरदराज स्थानों तक पहुंचाई जाएगी।

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चीन को लगने लगा है पाकिस्‍तान से डर, एक नहीं कई हैं वजह

पाकिस्‍तान के सबसे करीबी समझे जाने वाले देश चीन को भी अब उससे डर लगने लगा है। इस डर की एक नहीं कई वजह हैं। इनमें से एक वजह पाकिस्‍तान में मौजूद अपने नागरिकों की सुरक्षा को लेकर है। दूसरा डर पाकिस्‍तान में निवेश को लेकर भी है। इन दोनों को लेकर चीन की सरकार की तरफ से न सिर्फ आशंका जताई गई है बल्कि अपने नागरिकों को एडवाइजरी तक जारी की गई है। इस एडवाइजरी में चीन ने कहा है कि उनके कार्यस्थलों को आतंकी निशाना बना सकते हैं, इसलिए वे अतिरिक्त सतर्कता बरतें। पाकिस्‍तान में स्थित चीनी दूतावास द्वारा जारी इस एडवाइजरी में नागरिकों को भीड़-भाड़ वाली जगहों पर न जाने की भी सलाह दी गई है।

जारी की एडवाइजरी

इससे पहले चीन ने पाकिस्तान सरकार से अपने नागरिकों की मौजूदगी वाले स्थानों की सुरक्षा बढ़ाने के लिए कहा था। चीनी दूतावास की ओर से जारी इस एडवाइजरी पर पाकिस्तान के विदेश मंत्रलय ने फिलहाल कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की है। गौरतलब है कि इसी वर्ष की शुरुआत में सीपैक इलाके से दो चीनी नागरिकों को अगवा कर कत्‍ल कर दिया गया था। उस वक्‍त भी चीन का डर छलक कर सामने आया था। चीन के डर की वाजिब वजह पाकिस्‍तान के मौजूदा सेनाध्‍यक्ष जनरल कमर जावेद के उस बयान में भी साफतौर पर छलकती है जिसमें उन्‍होंने मदरसों की शिक्षा प्रणाली पर सवाल उठाया है। मीडिया में आई रिपोर्ट्स के मुताबिक उन्‍होंने यहां तक कहा है कि मदरसों के जरिए तैयार हो रहे आतंकियों पर अपनी गहरी चिंता जताई है। इसके अलावा उन्‍होंने मदरसों को अत्‍याधुनिक बनाने पर भी जोर दिया है।

चीन को सबसे बड़ा दुश्‍मन मानता है अलकायदा 

शंघाई अकादमी ऑफ सोशल साइंस के इंस्टिट्यूट ऑफ इंटरनेशनल रिलेशन के रिसर्च फैलो हू झीयोंग का मानना है कि भले ही चीन और पाकिस्‍तान के बीच लंबे समय से दोस्‍ताना रिश्‍ते हैं लेकिन कुछ कट्टरवादी समूह और अलकायदा चीन और उसके नागरिकों को अपना सबसे बड़ा दुश्‍मन मानता है। यह अपने फायदे के लिए चीनी नागरिकों पर हमला करते हैं। इन हमलों की वजह से ही चीन को पाकिस्‍तान में हो रहे निवेश को लेकर भी चिंता है। हू का यह भी कहना है कि चीन हमेशा से ही अपने नागरिकों के खिलाफ होने वाली इस तरह की आतंकी गतिविधियों का कड़ा विरोध करता रहा है। हालांकि वह यह भी मानते हैं कि पाकिस्‍तान ने इसको रोकने के लिए कुछ कदम भी उठाए हैं जिन्‍हें चीन समर्थन करता है। चीन के विदेश मंत्रालय के मुताबिक पाकिस्‍तान ने सीपैक इलाके में चीन के निवेश और उसके नागरिकों की सुरक्षा के लिए करीब 15000 सैनिक तैनात किए हुए हैं।

उइगरों पर कड़े प्रतिबंध

उल्लेखनीय है कि चीन अपने शिनजियांग प्रांत में रहने वाले उइगर मुस्लिम समुदाय की गतिविधियों को लेकर सशंकित रहता है। कुछ घटनाओं के बाद चीन सरकार ने उइगरों पर कड़े प्रतिबंध लगा रखे हैं। उइगरों के पाकिस्तानी और अफगान आतंकी संगठनों से रिश्ते बेपर्दा हो चुके हैं। ऐसे में चीन को आशंका है कि पाकिस्तान के कट्टरपंथी माहौल में आसानी से उसके नागरिकों को निशाना बनाया जा सकता है। जून में चीन के दो नागरिकों की बलूचिस्तान प्रांत में अपहरण करके हत्या कर दी गई थी। वारदात की जिम्मेदारी आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट ने ली थी।

निवेश पर चिंता

यहां पर ध्‍यान देने वाली बात यह भी है कि तीन लाख करोड़ रुपये की लागत वाले वन बेल्ट-वन रोड प्रोजेक्ट और कुछ अन्य परियोजनाओं पर इन दिनों हजारों चीनी नागरिक पाकिस्तान में कार्य कर रहे हैं। चीन बेल्ट-रोड परियोजना के जरिये सड़क मार्ग से पाकिस्तान होकर अरब देशों और यूरोप तक पहुंचना चाहता है। लेकिन उसे अपने नागरिकों और निवेश की चिंता भी सता रही है। चीन को अंदेशा है कि उसके निवेश वाली परियोजनाओं, कार्यस्थलों और नागरिकों पर आंतकी हमले हो सकते हैं। पाकिस्तान स्थित चीनी दूतावास ने बयान जारी कर कहा है कि आतंकी निकट भविष्य में चीनी हितों को चोट पहुंचा सकते हैं। इसके लिए आतंकी सिलसिलेवार हमलों को अंजाम दे सकते हैं।