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UN के मंच से सुषमा ने उठाए ये 10 मुद्दे, PAK को दिखाई औकात

संयुक्त राष्ट्र महासभा के 72वें सत्र के संबोधन में भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के निशाने पर पाकिस्तान के अलावा चीन और अमेरिका भी रहे. सुषमा स्वराज ने अपनी बात की शुरुआत तो पीएम मोदी द्वारा उठाए गए विकास कार्यों को बताने से की, लेकिन आतंकवाद के मसले पर आते-आते विदेश मंत्री ने पाकिस्तान की जमकर क्लास लगानी शुरू कर दी. सुषमा ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र जिन समस्याओं का समाधान तलाश रहा है उनमें आतंकवाद सबसे ऊपर है.

1. सुषमा ने अपने संबोधन में कहा, ‘अगर हम अपने शत्रु को परिभाषित नहीं कर सकते तो फिर मिलकर कैसे लड़ सकते हैं? अगर हम अच्छे आतंकवादियों और बुरे आतंकवादियों में फर्क करना जारी रखते हैं तो साथ मिलकर कैसे लड़ेंगे? अगर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद आतंकवादियों को सूचीबद्ध करने पर सहमति नहीं बना पाती है तो फिर हम मिलकर कैसे लड़ सकते हैं?’ सुषमा सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य चीन का परोक्ष रूप से हवाला दे रही थीं जिसने जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर को प्रतिबंधित करने के भारत के प्रयास को बार-बार अवरुद्ध करने का काम किया है. सुषमा स्वराज ने कहा, ‘मैं इस सभा से आग्रह करना चाहूंगी कि इस बुराई को आत्म-पराजय और निरर्थक अंतर के साथ देखना बंद किया जाए, बुराई तो बुराई होती है. आइए स्वीकार करें कि आतंकवाद मानवता के अस्तित्व के लिए खतरा है. इस निर्मम हिंसा को कोई किसी तरह से उचित नहीं ठहरा सकता.’

2. सुषमा ने सवाल पूछा, ‘आज मैं पाकिस्तान के नेताओं से कहना चाहूंगी कि क्या आपने कभी सोचा है कि भारत और पाकिस्तान एक साथ आजाद हुए. लेकिन आज भारत की पहचान दुनिया में आईटी की महाशक्ति के रूप में क्यों हैं और पाकिस्तान की पहचान आतंकवाद का निर्यात करने वाले देश और एक आतंकवादी देश की क्यों है?’ उन्होंने कहा, ‘हमने वैज्ञानिक, विद्वान, डॉक्टर, इंजीनियर पैदा किए और आपने क्या पैदा किया? आपने आतंकवादियों को पैदा किया. आपने आतंकी शिविर बनाए हैं, आपने लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद, हिज्बुल मुजाहिदीन और हक्कानी नेटवर्क पैदा किया है. सुषमा ने कहा कि पाकिस्तान ने जो पैसा आतंकवाद पर खर्च किया, अगर अपने विकास पर खर्च करता तो आज दुनिया अधिक सुरक्षित और बेहतर होती.

3. पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना की ओर से शांति और मित्रता की बुनियाद पर विदेश नीति तामीर किए जाने के अब्बासी के दावे पर सुषमा ने कहा कि वह नहीं जानतीं कि जिन्ना ने किन सिद्धांतों की पैरवी की थीं, लेकिन इतना जरूर कह सकती हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पदभार संभालने के बाद शांति और दोस्ती का हाथ बढ़ाया. सुषमा ने कहा, ‘पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को यह जवाब देना चाहिए कि आपके देश ने इस प्रस्ताव को क्यों ठुकराया.’

4. विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने कहा कि जलवायु परिवर्तन से पैदा हुई चुनौतियों पर ‘चर्चा से ज्यादा कार्रवाई’ की आवश्यकता है. उन्होंने विकसित देशों के नेताओं से अपील की कि वे अविकसित देशों की प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और हरित जलवायु वित्तपोषण के जरिये मदद करें. विकसित दुनिया को अन्य की तुलना में अधिक सावधानी से सुनना चाहिये क्योंकि उनके पास दूसरों की तुलना में अधिक क्षमता है. पेरिस समझौते से चीन और भारत जैसे देशों के अधिक लाभान्वित होने का दावा करते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था कि जलवायु परिवर्तन पर समझौता अमेरिका के लिये सही नहीं है क्योंकि यह उसके व्यापार और नौकरियों को बुरी तरह प्रभावित करता है.

5. यूएनजीए में अपने पिछले वर्ष के भाषण का जिक्र करते हुए सुषमा ने कहा कि उन्होंने जलवायु परिवर्तन को अपने अस्तित्व के लिए बड़ा खतरा बताया था. विदेश मंत्री ने कहा, ‘भारत कह चुका है कि वह पेरिस समझौते के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है. यह ऐसा इसलिए नहीं है कि हम किसी ताकत से डरे हुए हैं, किसी दोस्त या दुश्मन से प्रभावित हैं या किसी लालच के वश में ऐसा कर रहे हैं.’ उन्होंने कहा कि यह हमारे पांच हजार वर्षों के दर्शन का परिणाम है.

6. सुषमा ने कहा, ‘जब हम विश्व शांति की बात करते हैं तो हमारा मतलब न केवल मनुष्यों के बीच शांति की बात होती है, बल्कि प्रकृति के साथ शांति की भी बात होती है. हम समझते हैं कि मनुष्य का स्वभाव कई बार प्रकृति के प्रतिकूल होता है, लेकिन जब मनुष्य का स्वभाव गलत दिशा में जा रहा हो तो हमें इसमें बदलाव लाना चाहिए.’ उन्होंने कहा, ‘जब हम प्रकृति को अपने लालच से कष्ट पहुंचाते हैं, तो कई बार वह विस्फोटक रूप धारण कर लेती है. हमें प्रकृति के परिणामों, चक्रों और नवीन परिवर्तन के साथ रहना सीखना चाहिए.’

7. सुषमा ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधारों के लिए टेक्स्ट आधारित वार्ता पर जल्द शुरुआत करने का आह्वान किया. सुषमा बोलीं- सुरक्षा परिषद के सुधार एवं विस्तार पर टेक्स्ट आधारित वार्ता पर प्रयास गत सत्र में शुरू किया गया था. 160 से अधिक देशों ने इस प्रयास के लिए अपना समर्थन व्यक्त किया था. अगर हम गंभीर हैं, तब कम से कम हम यह कर सकते हैं कि हम एक ऐसा टेक्स्ट तैयार करें जो वार्ता के लिए आधार हो सके.’ उन्होंने कहा कि अगर यह होता है तो यह एक महत्वपूर्ण उपलब्धि होगी. उन्होंने कहा, ‘हमें संयुक्त राष्ट्र के नये महासचिव से बहुत अधिक उम्मीदें हैं.

8. सुषमा ने संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों से इसी साल अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद पर व्यापक संधि को लेकर समझौते पर पहुंचने के लिये नई प्रतिबद्धता दिखाने का आह्वान किया. उन्होंने कहा कि यद्यपि भारत ने 1996 में भी अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद पर व्यापक संधि (सीसीआईटी) का प्रस्ताव दिया था लेकिन दो दशक बाद भी संयुक्त राष्ट्र आतंकवाद की परिभाषा पर सहमत नहीं हो सका है. उन्होंने कहा, ‘हम भयानक और यहां तक कि दर्दनाक आतंकवाद के सबसे पुराने पीड़ित हैं. जब हमने इस समस्या के बारे में बोलना शुरू किया तो दुनिया की कई बड़ी शक्तियों ने इसे कानून व्यवस्था का मुद्दा बताकर खारिज कर दिया. अब वे इसे बेहतर तरीके से जानते हैं. सवाल है कि हम इस बारे में क्या करें.’

9. आतंकवाद पर अपनी बात रखती हुईं सुषमा ने कहा, ‘हम सबको आत्ममंथन करना चाहिये और खुद से पूछना चाहिए कि क्या हमारी चर्चा, जो कार्रवाई हम करते हैं कहीं से भी उसके करीब है. हम इस बुराई की निंदा करते हैं और अपने सभी बयानों में इससे लड़ने का संकल्प जताते हैं. सच्चाई यह है कि ये सिर्फ दस्तूर बन गए हैं.’ उन्होंने कहा कि तथ्य यह है कि जब हमें इस शत्रु से लड़ने और उसका नाश करने की जरूरत है तो कुछ का स्वहित उन्हें दोहरेपन की ओर ले जाता है.

10. भारत ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय को आगाह किया कि समुद्री सुरक्षा को लेकर सवालिया निशान खड़े हो रहे हैं और परमाणु प्रसार को लेकर फिर से खतरनाक खबरें सामने आ रही हैं. उन्होंने कहा, ‘कुछ उकसावे वाले और उत्तेजक मिले-जुले कारणों से लोग अपने परंपरागत गृह क्षेत्र की मनोवैज्ञानिक, सांस्कृतिक और आर्थिक सहूलियत छोड़ रहे हैं और दूसरे देश में शरण मांग रहे हैं जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेचैनी का माहौल बनता है. विदेश मंत्री ने कहा कि दुनिया की आबादी का बड़ा हिस्सा आज भी भूख और गरीबी का शिकार है. युवा उम्मीद खो रहे हैं क्योंकि वे बेरोजगारी का सामना कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि महिलाएं, ऐतिहासिक रूप से भेदभाव की शिकार हैं और वे लैंगिक सशक्तीकरण की मांग कर रही हैं.

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